“इमरान! तुम सेना के बूट पाॅलिश करने वाले नहीं तो और क्या हो?” in Punjab Kesari

चुनावी नतीजे आने के बाद अपने पहले विजय संबोधन में इमरान खान ने भारतीय मीडिया से शिकायत की कि उसने उन्हें बाॅलीवुड फिल्मों के विलेन (आतंकी पाकी सेना के एजेंट) के तौर पर पेश किया। अगर इमरान के नजरिए से देखें तो हो सकता है कि उनकी शिकायत जायज हो, लेकिन अगर ठोस तथ्यों के आधार पर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मीडिया का रवैया बहुत हद तक सही है। वैसे भी भारतीय मीडिया इमरान की तरह सेना के इशारों पर नहीं चलता जिन्हें उनकी दूसरी पूर्व पत्नी रेहाम खान सेना का ‘बूट पाॅलिशर’ करार दे चुकी हैं।

भारतीय मीडिया अगर इमरान को सेना का एजेंट मानता है जो इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। बात शुरू करते हैं प्री-पोल रिगिंग से यानी चुनाव से पहले की धांधली से। क्या ये अकस्मात था कि पाकिस्तानी अदालतों ने चुनाव से एन पहले ताबड़तोड़ कई फैसले सुनाए और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को जेल भिजवा दिया? क्या ये महज संयोग था कि शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज (पीएमएलएन) के अनेक मजबूत उम्मीदवारों को धमकाया गया और पार्टी बदलने के लिए मजबूर किया गया? क्या ये संयोग था कि चुनाव प्रचार के दौरान इमरान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को वरीयता दी गई जबकि पीएमएलएन और बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) को अनेक स्थान पर रैली करने की इजाजत तक नहीं दी गई? आखिर किसकी शह पर अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद के गुर्गों को चुनाव लड़ने की मोहलत दी गई? आखिर क्यों एन चुनाव से पहले 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना और घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया? आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने इमरान को जिताने के लिए पूरी बिसात बिछाई….इतनी मेहनत (धांधली) की? आखिर क्यों सेना और इमरान की आलोचना करने वाले अखबारों और न्यूजचैनलों पर गाज गिराई गई, उनका प्रसारण का रोका गया?

इसका जवाब इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिद्दिकी ने दिया। उन्होंने इसके लिए साफ तौर से पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने साफ कहा कि आईएसआई अपने इरादे पूरे करने के लिए अदालतों, मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सबको धमकाती है। जज सिद्दिकी को 30 जुलाई को उनकी इस ‘हिमाकत’ के लिए सजा भी दे दी गई। वो इमरान खान नाअहली (अयोग्यता) केस की सुनवाई करने वाली डिवीजनल बैंच के सदस्य थे। उन्हें बड़ी बेशर्मी से इससे हटा दिया गया और उनकी जगह जज मियां गुल हसन औरंगजेब को शामिल किया गया। इस मामले की सुनवाई एक अगस्त को होनी है, लेकिन फैसला क्या आएगा, लगता है ये भी पहले ही तय हो चुका है।

अब बात करते हैं चुनाव के दौरान होने वाली धांधलियों की। आगे बढ़ने से पहले ये बता दें कि ये सिर्फ भारतीय मीडिया नहीं था जिसने पाकिस्तानी चुनावों को फर्जी करार दिया। पाकिस्तान के अनेक दलों ने चुनाव नतीजों को स्वीकार करने से इनकार किया है। पीएमएलएन और पीपीपी ने तो चुनाव आयोग के अधिकारियों के इस्तीफे तक मांग लिए। 27 जुलाई को विपक्षी दलों की बैठक में पीएमएलएन और मुŸााहिदा मजलिए-ए-अमल ने चुनाव नतीजों को खारिज करते हुए दोबारा चुनाव करवाने की मांग की। नेशनल असेंबलीऔर राज्यों की विधानसभाओं के करीब 300 उम्मीदवारों ने फिर से मतगणना की मांग की है।

इमरान खुद को पाकिस्तान का नया हीरो मानने की गलतफहमी पाल सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें खुद नहीं सोचना चाहिए कि उनकी और आईएसआई की इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद क्यों वो नेशनल असेंबली और पंजाब विधानसभा में सादा बहुमत तक नहीं हासिल कर सके? ऐसा क्या हुआ कि आतंकियों को चुनाव लड़वाने की महत्वकांक्षी योजना क्यों मुंह के बल गिर पड़ी? आईएसआई की पूरी मेहनत के बावजूद वो एक सीट तक नहीं हासिल कर सके?

इमरान क्या इस बात का जवाब देना चाहेंगे कि जो मतगणना चंद घंटों में पूरी हो जाती है, वो चार दिन तक भी पूरी क्यों नहीं हो सकी? नेशनल असेंबली की करीब 18 सीटें ऐसी हैं जिनमें इमरान की पार्टी की जीत का अंतर 1,000 मतों का भी नहीं है। 23 सीटों में जीत का अंतर 5,000 से भी कम है, जबकि 41 सीटों में 10,000 से भी कम। ध्यान रहे इन सीटों पर रिजेक्टेड वोट हजारों में हैं।

मतगणना में देरी क्यों की गई? अन्य सीटों के मुकाबले चुनींदा सीटों पर ही रिजेक्टेड वोट इतनी बड़ी तादाद में क्यों पड़े? क्या पाकिस्तान के वोटर इतने जाहिल हैं कि वो ठीक से वोट तक नहीं दे सकते? आखिर एन चुनाव नतीजों की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग का सर्वर क्यों जवाब दे गया? ऐसे हालात में पाकिस्तानी जनता और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी क्यों आंख मंूद कर मान ले कि पाकिस्तानी चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हुए?

27 जुलाई को इस्लामाबाद में अपने संवाददाता सम्मेलन में यूरोपियन यूनियन के निगरानी दल ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों को बराबरी से अवसर नहीं मिला। इमरान भले ही इस बार के चुनावों को सबसे साफ-सुथरे बता रहे हों, लेकिन यूरोपियन यूनियन इलेक्शन आॅब्सर्वेशन मिशन (ईयूईओएम) के चीफ आॅब्सर्वर माइकल गेहलर ने साफ कहा, “इस बार के चुनाव 2013 के चुनावों जितने अच्छे नहीं थे। हालांकि सभी पार्टियों को निष्पक्ष तरीके से समान अवसर देने के लिए अनेक वैधानिक उपाय मौजूद थे, लेकिन हमारा निष्कर्ष है कि न तो इस मामले में समानता बरती गई और न ही पार्टियों को बराबरी से अवसर मिले। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व सŸाारूढ़ दल को हानि पहुंचाने के लिए व्यवस्थागत तरीके से प्रयास किए गए। राजनीतिक दलों, नेताओं, उम्मीदवारों और चुनाव अधिकारियों पर लगातार हमलों ने चुनाव प्रचार के माहौल को प्रभावित किया।“

यूरोपियन पार्लियामेंट इलेक्शन आॅब्सर्वेशन डेलीगेशन के प्रमुख जीन लैम्बार्ट ने मतदान के दौरान मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में फौजियों की उपस्थिति पर आपŸिा दर्ज करवाई। उन्होंने कहा, “हम मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में सुरक्षाबलों की उपस्थिति से हैरान थे। हम सुरक्षा की आवश्यकता समझते हैं, लेकिन चुनाव सिविल सोसायटी का काम होता है, हम चाहते हैं कि इसमें सेना से ज्यादा सिविल संस्थाओं का सुपरविशन हो, खासतौर से मतदान केंद्रों के भीतर जहां लोग वोट डालते हैं।”

यही नहीं काॅमनवेल्थ पर्यवेक्षकों ने भी अनेक विषयों पर आपŸिा जताई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपनी विज्ञप्ति में कहा, ”शासन-प्रणाली की मजबूत लोकतांत्रिक और सिविल संस्थाओं का विकास पाकिस्तान के दीर्घकालिक स्थायित्व और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में अमेरिका, मतदान पूर्व चुनावी प्रक्रिया में त्रुटियों को लेकर पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग की चिंताओं से सहमति जताता है। इनमें अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाना भी शामिल है….हम इस विषय में ईयूईओएम के निष्कर्षों से भी सहमत हैं।“

यूरोपियन यूनियन, काॅमनवेल्थ और अमेरिका इशारों ही इशारों में जिन्हें पाकिस्तान के लोकतंत्र का दुश्मन बता रहे हैं, क्या इमरान उसे नहीं समझ पा रहे हैं? क्या ये ‘लोकतंत्र के दुश्मन’ ही तो इमरान के दोस्त नहीं हैं? ये सिर्फ भारत का मीडिया ही नहीं है जो उन्हें सेना का पिट्टू मानता है, पूरी दुनिया और खुद उनके देश के लोग और चुने गए स्वतंत्र उम्मीदवार भी यही मानते हैं जिन्हें इमरान को समर्थन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इमरान ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’, झूठा और न जाने क्या क्या कहा, वो हो सकता है भारत में मुसलमान वोट बैंक की राजनीति करने वाले दलोें को बहुत भाया हो, लेकिन उससे करोंड़ों-करोड़ लोगों को इमरान से वितृष्णा भी हुई है। इमरान ने नवाज शरीफ को मोदी का यार बताते हुए नारा लगाया – जो मोदी का यार है, वो देश का गद्दार है। नवाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए पर इमरान ने उनपर ‘देश बेचने’ का आरोप लगा दिया। न केवल चुनावी भाषणों में, बल्कि अपने विजय संबोधन में भी इमरान ने जैसे कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद को आजादी की लड़ाई बताया और भारतीय फौज को गाली दी, उससे भारत की आम जनता का उनसे मोहभंग होना स्वाभाविक है।

ये आश्चर्यचकित ही करता है कि जो इमरान पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नवाज शरीफ को भारत से व्यापार के लिए ‘गद्दार’ बताते रहे, वो अपने विजय संबोधन में आतंकवाद को जायज ठहराते हुए भी भारत से दोस्ती के गीत गाने लगे, भारत के साथ ‘व्यापार संबंधों’ की बात करने लगे? डूबती हुई पाकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए उन्होंने अपने चुनाव घोषणापत्र में 100 दिवसीय कार्यक्रम की घोषणा की है। जाहिर है, भारत के साथ व्यापारिक संबंध इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उन्हें अब थूक कर चाटना भी मंजूर है। इमरान, शरीफ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन चले अपने धरने को इतनी जल्दी भूल जाएंगे, ऐसा सोचा भी न था।

इमरान खान! भारतीय मीडिया तुम्हें ‘बाॅलीवुड के विलेन’ की तरह नहीं पेश कर रहा, तुम्हें सिर्फ ‘सच का आइना’ दिखा रहा है। तुम्हारी पार्टी ने तुम्हें पाकिस्तान के युवाओं की धड़कन के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है, हालांकि हम ये भी नहीं मानते। इस बार कुल 51.85 प्रतिशत मत पड़े, इसमें सिर्फ तुम्हारे समर्थक और युवा ही नहीं, दूसरी पार्टियों के समर्थक और सभी आयुवर्ग के लोग थे। ऐसे में हमारे लिए ये बात गले के नीचे उतारना मुश्किल है कि तुम युवाओं के दिल की धड़कन हो, लेकिन जैसे आईएसआई ने तुम्हें जितवाने के लिए जी जान एक कर दिए, उससे ये तो साफ है कि तो सेना के मुखबिर हो।

भारत की सेना को लतिया कर तुम भारत के नेताओं का समर्थन नहीं हासिल कर सकते। पाकिस्तान के आवाम ने हाफिज सईद के उम्मीदवारों को धक्का दे कर ये स्पष्ट कर दिया है कि वो आतंकवाद के समर्थक नहीं है। अगर तुम्हारी सेना खुद ये बात समझ जाए, या तुम उन्हें अपनी नीतियों बदलने के लिए तैयार कर सको तो दोनों देशोें के संबंध बेहतर हो सकते हैं। याद रखना आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। अगर तुम और तुम्हारी सेना कश्मीर सहित पूरे भारत में अपना आतंकी नेटवर्क समेटने के लिए गंभीरता दिखाओगे तो भारत तुम्हारी अवश्य मदद करेगा। पहल तुम्हें और तुम्हारी सेना को ही करनी होगी।

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