“उत्तर कोरिया के बाद, अमेरिका से पाकिस्तानीे परमाणु निरस्त्रीकरण की बात करे भारत” in Punjab Kesari

उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात से ‘उत्साहित’ पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई और पाकिस्तानी पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री शाबाज शरीफ ने बयान दिया कि अगर ये दोनों देश आपसी दुश्मनी छोड़ कर बातचीत कर सकते हैं तो भारत और पाकिस्तान क्यों नहीं। ध्यान रहे पाकिस्तान में 25 जुलाई को आम चुनाव होने हैं और भ्रष्टाचार के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवाज शरीफ को अयोग्य करार देने के बाद, शाबाज शरीफ ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।

शाबाज शरीफ का बयान निसंदेह स्वागत योग्य है। दोनों देशों को आपसी रंजिश भुला कर साथ आना ही चाहिए। भारत-पाकिस्तान में शांति होने का असर दोनों देशों पर ही नहीं, समूचे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा जो दुनिया के सबसे गरीब इलाकों में से एक है। शाबाज के बड़े भाई नवाज ने भी पिछले चुनाव में इस मुद्दे को उछाला था और सत्ता में आने के बाद इसके लिए दिखावटी ही सही, कुछ कोशिशें अवश्य की थीं। हम नवाज की कोशिशों को दिखावटी कह रहे हैं क्योंकि भारत में घुसपैठ करने वाले सभी आतंकी समूहों के मुख्यालय पाकिस्तानी पंजाब में हैं जहां शाबाज शरीफ मुख्यमंत्री थे। न नवाज और न ही शाबाज ने इन पर लगाम लगाने की कोई ईमानदार कोशिश की, उलटे सरकारी खजाने से उनकी मदद ही की। नवाज शरीफ ने तो चार साल तक कोई विदेश मंत्री ही नहीं नियुक्त किया और ये मंत्रालय अपने पास रखा क्योंकि विदेश और रक्षा नीति सेना देखती है और वो नहीं चाहते थे कि इन दोनों मामलों में सेना से कोई टकराव हो। शरीफ बंधुओं का इतिहास देखते हुए तो यही समझ में आता है कि शाबाज का औचक ‘शांति प्रस्ताव’ चुनावी शिगुफे से अधिक कुछ नहीं है। याद रहे ये वही शाबाज हैं जो पर्दे के पीछे सेना से अपने बड़े भाई नवाज शरीफ और पार्टी मुस्लिम लीग, नवाज के लिए ‘डील’ मांगने गए थे।

पाकिस्तानी सेना के मौजूदा प्रमुख कमर जावेद बाजवा भी पिछले छह महीनों में दो बार भारत के साथ शांति की इच्छा जता चुके हैं, लेकिन इसका जमीन पर कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है। भारत और पाकिस्तान की सेनाओं ने तय किया था कि वो जम्मू-कश्मीर में युद्धविराम करेंगी, लेकिन पाकिस्तान की ओर से आतंकियों को भेजा जाना और और हमारे जवानों को निशाना बनाया जाना बदस्तूर जारी है। भारत ने तो सीमा पर ही नहीं, जम्मू-कश्मीर में भी एकतरफा युद्धविराम घोषित कर शांति बहाली की कोशिश की, लेकिन आईएसआई के गुर्गे अब भी वहां आग लगाए हुए हैं। नतीजतन भारत को वहां युद्धविराम समाप्त करना पड़ा। कश्मीर में भारत की तरफ से एकतरफा युद्धविराम स्थानीय आतंकियों और अलगाववादियों को ही नहीं, पाकिस्तान को भी इशारा था कि भारत शांति चाहता है। लेकिन जैसे हुर्रियत के आतंकियों ने युद्धविराम को नकारा, हिंसा को बढ़ावा दिया और शांति के पक्षधर राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की हत्या की, उससे भारत को स्पष्ट जवाब मिल गया है कि पाकिस्तान की शांति और सदभाव की कोई इच्छा नहीं है।

वैसे भी पाकिस्तान सिर्फ कश्मीर में ही आतंक नहीं फैला रहा, वो खालिस्तान के मुद्दे को भी भरपूर हवा दे रहा है। वो पाकिस्तानी गुरूद्वारों में जाने वाले भारतीय तीर्थयात्रियों को बरगलाने के साथ ही इंग्लैंड, अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यू जीलैंड आदि में बसे सिखों को भी भड़का रहा है। इसके अलावा नक्सलियों और पूर्वोत्तर के अलगाववादियों में भी आईएसआई की घुसपैठ के पक्के सबूत मिले हैं।

भारत बार-बार कहता रहा है कि आतंक और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। लेकिन पाकिस्तान एक तरफ तो शांति की बात करता है, तो दूसरी तरफ वो भारत पर हमला करने वाले आतंकियों को ठिकाने लगाने की जगह, मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहा है। मुंबई हमलों का मास्टरमाइंड हाफिज सईद, अपनी पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग को अनुमति न मिलने के बाद, अल्लाह-उ-अकबर तहरीक के बैनर तले 265 उम्मीदवारों को चुनाव लड़ाने की तैयारी कर चुका है। इनमें उसका बेटा हाफिज ताल्हा और दामाद खालिद वलीद भी शामिल हैं। भारत में समय-समय पर पकड़े गए पाकी आतंकी बताते हैं कि यहां हमें भले ही लश्कर-ए-तौएबा, जैश-ए-मौहम्मद, हिजुबल मुजाहिदीन वगैरह अलग-अलग नजर आते हों, लेकिन पाकिस्तान में सब आईएसआई की सरपरस्ती में आपसी सामंजस्य से काम करते हैं। कहने का मतलब ये कि अगर एक जमात बंद भी हो जाए तो दूसरी तैयार रहे, विकल्प हमेशा खुले रहें।

भारत सरकार ने बार-बार पाकिस्तान के प्रति नेकनीयती दिखाई, लेकिन पाकिस्तान के रवैये को देखते हुए यहां ये सवाल भी उठ रहा है कि आखिर भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत की जरूरत ही क्या है? भारत आज पाकिस्तान के मुकाबले हर दृष्टि से बेहतर स्थिति में है। चाहे अर्थव्यवस्था हो, या दुनिया की सबसे बड़ी और मजबूत ताकतों से संबंध का मसला, भारत हर लिहाज से पाकिस्तान से कोसों आगे है। पाकिस्तान का कथित रूप से सबसे घनिष्ठ मित्र चीन भी आज पूरी तरह उसके साथ नहीं है। अगर ऐसा होता तो चीन आतंकी फंडिंग और हवाला पर निगरानी रखने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स में पाकिस्तान के खिलाफ वोट कर उसे ग्रे लिस्ट में नहीं जाने देता।

उधर दुनिया की सबसे बड़ी ताकत अमेरिका भी उससे नाराज है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उसे सुधरने की चेतावनी ही नहीं, ‘ठीक करने की धमकी’ भी दे चुके हैं। आज पाकिस्तान दीवालिया होने की कगार पर है, वहां एक डाॅलर 123 पाकी रूपए का हो गया है, महंगाई से लोगों का बुरा हाल है, न बिजली है, न पानी, भ्रष्टाचार का बोलबाला है, सब बड़े नेताओं और नौकरशाहों के पास दोहरी नागरिकता है, वो कभी भी पाकिस्तान छोड़ सकते हैं।

ऐसे में भारत का एक बड़ा वर्ग अब ये मानता है कि पाकिस्तान एक फेल्ड स्टेट (मरता हुआ देश) है और उसके संदेहास्पद इतिहास को देखते हुए भारत को उसकी सहायता के लिए आगे नहीं आना चाहिए। इस समय भारत के साथ रिश्ते बेहतर करना पाकिस्तान के अपने अस्तित्व के बहुत लिए महत्वपूर्ण है। मौजूदा हालात की नजाकत को देखते हुए अगर पाकिस्तान थोड़ा झुकता है और भारत दरियादिली दिखाते हुए उससे कोई समझौता कर लेता है, तो भी क्या गारंटी है कि कल आने वाली चुनी हुई सरकार या अगला जनरल उसे मानेंगे और सम्मान देंगें?

शाबाज शरीफ, अमेरिका और उत्तर कोरिया की वार्ता से ‘प्रभावित’ हुए, ये समझ में आता है। भारत में भी लोगों के मन में ये बात आई। लेकिन शाबाज शरीफ को समझना होगा कि शांति हासिल करने के लिए उत्तर कोरिया ने बड़े समझौते भी किए हैं। किम जोंग उन अपना जान से भी ज्यादा प्यारा परमाणु कार्यक्रम और अपने दादा के जमाने से चली आ रही नीतियों को छोड़ने के लिए तैयार हुए हैं। यही नहीं, उन्होंने दोनों देशों में बातचीत का माहौल बनाने के लिए वार्ता से ठीक पहले अपने देश के कट्टरवादी जनरलों तक को बाहर की राह दिखा दी। क्या पाकिस्तानी सरकार या सेना भारत से शांति के लिए अपनी नीतियां छोड़ने के लिए तैयार हैं? क्या पाकिस्तान अपने परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए तैयार होगा? क्या वो कश्मीर और खालिस्तान राग भूल सकता है? ऐसा लगता तो नहीं।

भारत को अब पाकिस्तान से बातचीत और शांति के प्रयास बंद कर उसके परमाणु निरस्त्रीकरण पर काम शुरू करना चाहिए। भारत को अमेरिका से पूछना चाहिए कि अगर वो परमाणु कार्यक्रम चलाने के लिए ईरान और उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगा सकता है, तो पाकिस्तान पर क्यों नहीं? राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो खुद पाकिस्तान को आतंक का गढ़ बताते हैं। लगभग सभी अमेरिकी थिंक टैंक मानते हैं कि पाकिस्तानी परमाणु हथियारों का आतंकियों के हाथ में पड़ना बहुत संभव है। जिस देश में सेना खुद आतंकियों को चुनाव लड़वाती हो और उन्हें पड़ोसी देशों के खिलाफ इस्तेमाल करती हो, वहां परमाणु हथियारों का आतंकियों तक पहुंचना क्या मुश्किल है? ऐसे में पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध क्यों नहीं?

अमेरिका पिछले 17 साल से अफगानिस्तान में पाक समर्थित आतंकियों से लड़ रहा है। आए दिन वहां खून-खराबा हो रहा है। अफगानिस्तान में शांति तब तक नहीं आ सकती, जब तक पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने पर न आए। इसके लिए उसके परमाणु निरस्त्रीकरण से बड़ा उपाय और क्या हो सकता है? पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगभग चैपट हो चुकी है, उसकी मौजूदा निगरान सरकार अमेरिकी वर्चस्व वाले इंटरनेशनल माॅनीटरी फंड के पास सहायता के लिए जाना चाहती थी, लेकिन उसने ये फैसला आगामी निर्वाचित सरकार के लिए छोड़ दिया है। क्या अमेरिका और अन्य विकसित देशों को पाकिस्तान को आर्थिक सहायता देने से पहले परमाणु कार्यक्रम बंद करने की शर्त नहीं लगानी चाहिए? भारत को अब ये बात सभी विकसित देशों को जल्द से जल्द समझानी चाहिए।

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