“उत्तर प्रदेशः संयुक्त विपक्ष के सामने भाजपा की चुनौतियां और संभावनाएं” in Punjab Kesari

उत्तर प्रदेश में लगातार तीन लोक सभा सीटें हारने के बाद केंद्र में सत्तारूढ़  भारतीय जनता पार्टी में निःसंदेह विचार विमर्श आरंभ हो गया होगा। वर्ष 2014 में 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भाजपा आज 272 सीटों पर सिमट गई है, जो लोकसभा की कुल सीटों का करीब 50 फीसदी है। अब भी तीन लोक सभा सीटें– शिमोगा 1⁄4बी एस येदियुरप्पा, भाजपा1⁄2, बेल्लारी 1⁄4बी श्रीरामुलु, भाजपा1⁄2, अनंतनाग 1⁄4मेहबूबा मुफ्ती, पीडीपी1⁄2 खाली है। अगर भाजपा ये तीनो  सीटें जीत लेती है तो वो पुनः 50 प्रतिशत के निशान के ऊपर जा सकती है। वैसे ध्यान रहे, चुनाव आयोग आमतौर से उपचुनाव तब नहीं करवाता जब लोकसभा या विधानसभा का कार्यकाल एक वर्ष से भी कम बचा हो।

हम फिर अपने विषय उत्तर प्रदेश पर आते हैं। 2014 के चुनावों में भाजपा को देश के इस सबसे अधिक जनसख्ं या वाले पद्र श्े ा में अपत््र याशित रूप से 80 में से 71 सीटें मिली। तब राज्य में मसु लमानांे आरै यादवों को अपना वोट बैंक मानने वाली समाजवादी पार्टी की बहुमत वाली सरकार थी। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी की चुनौती भी थी जिसकी प्रमुख मायावती खुद को दलितों का मसीहा बताती हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में सपा को 29.15 आरै बसपा को 25.91 और भाजपा को 15 प्रतिशत मत मिले थे। ऐसे में 71 सीटें हासिल करना चमत्कार से कम नहीं था। इसके लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने काफी दिमाग लगाया और लगातार दो साल तक मेहनत की। उन्हांेने यादवांे को छोड़ कर सभी पिछडे़ वर्गांे आरै जाटवांे को छाडे ़ कर सभी अन्य दलित वर्गांे को अपने साथ लाने का पय्र ास किया। इसके लिए सपा और बसपा के अनेक जातीय नेताओं को भाजपा में शामिल किया गया।

वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों में मात खाने के बाद सपा नेता अखिलेश यादव को समझ आ गया कि सिर्फ अपने बूते पर वो भाजपा का सामना नहीं कर पाएंगे। इसलिए उन्हांेने राहुल गांधी से हाथ मिलाने का मन बनाया। एक के बाद एक चुनाव हार रही कागं े्रस को भी ये पस््र ताव भाया। 2017 के विधानसभा चुनावों में ‘उत्तर प्रदेश के लड़कों’ ने एक साथ सघन प्रचार किया, लेकिन नतीजा आया तो पता लगा कागंसे्र , सपा को ले डूबी। गठबंधन में उसे सौ सीटें दी गईं थीं, लेकिन वो सिर्फ सात सीटें ही जीत पाई। इसके बाद बबुआ अखिलेश ने राहुल गांधी को छोड़ बुआ मायावती का दामन थामने का मन बनाया जिनके पास अपना समर्पित वोट बैंक है।
फलू परु आरै गारे खपरु चुनावों में अखिलेश की रणनीति काम कर गई। इन दोनों  चुनावों में सपा ने
अपने प्रत्याशी खड़े किए और मायावती ने अपने समर्थको को सीधे सपा को वोट करने के लिए तो नहीं कहा, बस उस पत््र याशी के लिए वाटे डालने के लिए कहा जो भाजपा को हरा सक।े कछु सपा-बसपा के सहयोग और कुछ भाजपा के अतिविश्वासी रवैये के कारण भाजपा ये उपचुनाव बुरी तरह हारी। बेहद कम मतदान के बावजदू वो फलू परु में वो 54,960 आरै गारे खपरु में 21,881 मतांे से हार गइर्। फलू परु लोक सभा सीट तो 2014 में पहली बार भाजपा को मिली थी, लेकिन केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बावजूद, भाजपा इसे संभाल नहीं सकी। उधर गोरखपुर की हार के लिए तो कोई स्पष्टीकरण देना भी मुश्किल हो गया क्यांेकि स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस सीट को पांच बार जीत चुके थे और उनसे पहले तीन बार उनके गुरू स्वर्गीय महंत अवैद्यनाथ इसका प्रतिनिधित्व कर चुके थे।
जहां गारे खपरु आरै फलू परु सीटें यागे ी आरै मौर्य के मुख्यमंत्री आरै उपमख्ु यमंत्री पद सभ्ं ाालने के कारण खाली र्हइु ं, वहीं करै ाना सीट भाजपा सांसद हकु ुम सिंह के निधन के कारण खाली हइु र्। यहां भाजपा ने उनकी बेटी मृगांका सिंह को चुनाव में उतारा। मृगांका ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत 2017

में कैराना विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के साथ की जो वो सपा के नाहिद हसन से हारीं। इस बार उन्हें तब्बसुम हसन ने हराया जो नाहिद की मां हैं। कैराना से पहले सांसद रही चुकीं तब्बसुम भी पूर्व
में सपा में थीं। अजित सिंह और अखिलेश की रणनीति के तहत उन्हें 2018 के संसदीय चुनावों के लिए खासतारै से राष्टंीय लोकदल में शामिल करवाया गया ताकि जाटों आरै मसु लमानों का समीकरण तयै ार

किया जा सके। इसका परिणाम भी आशानुरूप निकला और तब्बसुम हसन 44,600 मतांे से जीतीं। हालांकि जाटों और मुसलमानों के समीकरण के बूते जिस भव्य जीत का दावा किया जा रहा था, वो हासिल न हो सकी। तब्बसुम हसन को 51.26 प्िर तशत मत मिले तो मगृ ाकं ा सिहं को 46.51 प्िर तशत यानी कुल अंतर 4.75 प्िर तशत का रहा। ध्यान रहे तब्बसुम विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार थीं जिन्हें सपा और रालोद का ही नहीं, कांगे्रस और बसपा का समर्थन भी हासिल था। संयुक्त विपक्ष के बरक्स अकेली मृगांका को 46.51 प्िर तशत मिलना भाजपा से अधिक विपक्ष के लिए चितं ा का विषय हाने ा चाहिए।
करै ाना लाके सभा सीट में पाचं विधानसभा सीटें हैं – कैराना, शामली, थानाभवन, नकुड़ और गंगोह। इनमें से दो सीटों – कैराना और शामली में भाजपा क्रमशः 14,203 और 414 मतों से जीती। यानी जिस विधानसभा सीट से मृगांका पहले हारीं, वहां उन्हें इस बार जीत हासिल हुई। ये सीट मुस्लिम बहुल है, फिर भी यहां भाजपा को अधिक मत मिलना, विपक्षियों को हैरान कर रहा है। थानाभवन और नकुड़ विधानसभा सीटों पर इस बार भाजपा पिछड़ गई जबकि इन दोनों सीटों के मौजूदा विधायक क्रमशः सुरेश राणा और धरम सिंह मंत्री हैं। सुरेश राणा तो स्वतंत्र प्रभार वाले गन्ना मंत्री हैं, जिनपर इस क्षेत्र के गन्ना किसानांे की समस्या हल करने का दारामे दार भी था।
अभी कैराना और पहले फूलपुर और गोरखपुर से भाजपा को कई सबक मिल सकते है। पहला सबक तो ये है कि अगर विपक्षी साथ आ जाएं तो भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकते है। इसके अलावा स्थानीय आंदोलनों और संस्थाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्वयं भाजपा के विश्लेषण पर विश्वास करें तो कैराना में भाजपा, जाट-मुसलमान गठबंधन की वजह से नहीं, बल्कि भीम सेना की वजह से हारी जिसने नकुड़ और गंगोह में दलितों के साथ मुस्लिम युवकों को भाजपा के खिलाफ लामबंद किया। इन दोनों क्षेत्रों में अन्य क्षेत्रों से अधिक मतदान दर्ज किया गया था।
2014 के चुनावों से पहले अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण साधने में लंबा समय लगाया था। 2019 के चुनावों में मुि श्कल से एक वर्ष का समय रह गया है| एसे े में विपक्षी एकता के मद्दे नजर भाजपा को हर सीट के लिए बहतु साचे विचार कर अलग-अलग रणनीति बनानी होगी। इसके लिए तेज दिमाग वाले एक नहीं अनेक अमित शाह चाहिए होंगे। 2014 की तरह, भाजपा नेता 2019 में भी मोदी लहर की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अबकी बार मोदी लहर होगी या नहीं, ये अभी से कहना मुश्किल है, लेकिन ये बिना झिझक कहा जा सकता है कि वहां सिर्फ विकास का नारा काम नहीं आएगा। राज्य के अधिकाश्ं ा लागे अब भी धामिर्क आरै जातीय समदु ायांे में बटं े है आरै बार-बार ये स्पष्ट हो रहा है कि वो इससे ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं।

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 2014 के लाके सभा आरै 2017 के विधानसभा चुनावों में जो वाद किए थे उन्हें पूरा करना। ऐसा नहीं है कि योगी सरकार ने काम नहीं किए, लेकिन जो काम किए हैं, उन्हें जनता तक पहंुचाना भी होगा और इसके लिए बेहतर मीडिया प्रबंधन करना होगा। योगी आदित्यनाथ जनता से सीधे संपर्क के लिए जाने जाते हैं, लेि कन अब जनसंपर्क के काम में जैसी नौकरशाही फैल गई है, उसका इलाज तो करना ही।
विपक्षी अगर एकजुट हो रहे हैं तो भाजपा को भी अपने वर्तमान सहयोगियों की व्यथा को समझना होगा और उसे दूर करना होगा। राज्य के वक्फ मंत्री मोहसिन रजा ने बसपा नेता मायावती को भाजपा के साथ आने का सुझाव दिया था। मायावती के पास समर्पित वोट बैंक है, भाजपा नेतृत्व उचित समझे तो इस दिशा में संभावनाएं टटोल सकता है। हालांकि मायावती ने राजनीतिक हलकों में ये खबर फैला दी है कि बसपा उसके साथ गठबंधन करेगी जो उसे 40 सीटें देगा। संकेत साफ है कि मायावती से कोई बातचीत आसान नहीं होगी।
ये सही है कि विपक्ष के पास प्रधानमंत्री नरेंदर  मोदी जैसा कोई बड़ा नेता नहीं है, न ही अमित शाह
जैसा चाणक्य, लेि कन भाजपा सिर्फ उनके भरासे े हाथ पर हाथ रख कर नहीं बठै सकती। भाजपा के स्थानीय नेताओं को जमीनी स्तर पर परू ी तयै ारी खदु करनी होगी। अब भाजपा 2014 वाली भाजपा नहीं रही, देश के अधिकांश राज्यों में उसकी सरकार है। मोदी और शाह को अब सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं,
पूरे देश की कमान संभालनी है, वो हमेशा उन्हें उंगली पकड़ कर नहीं चला सकते। ऐसे में स्थानीय नेताआंे को अपने झगड़ांे और गुटबाजी से ऊपर उठ कर अपना स्तर उठाने और छवि सुधारने के लिए खदु काम करना होगा।

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