“कब तक बहेगा निर्दोष अफगानियों का खून? कब होगी पाकिस्तान के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई?” in Punjab Kesari

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अफगानिस्तान को केंद्र में रखते हुए ने पिछले वर्ष 21 अगस्त को नई दक्षिण एशिया नीति की घोषणा की थी। उसके बाद छह महीने होने को आए, लेकिन अफगानिस्तान में हालात जस के तस बने हुए हैं, या कहें बदतर हो गए हैं तो गलत नहीं होगा। ट्रंप की घोषणा से पहले वहां जितने लोग मारे गए, उनकी घोषण की बाद उस से ज्यादा लोग वहां मारे गए हैं। 22 जनवरी को काबुल के होटल इंटर काॅंटिनेनटल पर लगभग वैसा ही हमला हुए जैसा मुंबई में हुआ था। इसमें करीब 50 लोग मारे गए और कई गंभीर रूप से घायल हुए।

होटल इंटरकाॅंटिनेनटल की आग अभी शांत भी नहीं हुई थी कि 27 जनवरी को भीड़ भरे मध्य काबुल के चिकन स्ट्रीट बाजार में बारूद से भरी एक एंबुलेंस में धमाका हुआ जिसमें सौ से अधिक लोग मारे गए। विस्फोट स्थल के पास ही यूरोपियन यूनियन का दफ्तर और एक अस्पताल भी था। ये तो सिर्फ राजधानी काबुल की घटनाएं थीं, इनके अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी लगातार बम धमाके और अकारण गोलीबारी की बहुत सी घटनाएं दर्ज की गईं जिनमें अनेक लोगों ने जान गंवाई।

ट्रंप की नई नीति की घोषणा के बाद तालीबान के कब्जे वाले इलाके में भी बढ़ोतरी हुई है। अमेरिकी मीडिया हाउस सीएनएन के अनुसार 2017 के आखिरी छह महीनों में तालीबान ने अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत की। अक्तूबर 2017 में 14 प्रतिशत अफगान जिले तालीबान या अन्य आतंकवादियों के प्रभाव में थे, ये पिछली छमाही से एक प्रतिशत अधिक है। ताजा जानकारी के मुताबिक 56 प्रतिशत जिले अफगान सरकार के नियंत्रण या प्रभाव में थे, जबकि 30 प्रतिशत आतंक से प्रभावित थे। आतंकवादियों के प्रभावक्षेत्र का विस्तार हालांकि इनक्रीमेंटल है, फिर भी ये दुर्दांत तालीबान आतंक के सामने अफगान सेना की ढीली होती पकड़ को दर्शाता है। ध्यान रहे, वर्ष 2015 में करीब 72 फीसदी इलाके पर अफगान सरकार का कब्जा था और 7 प्रतिशत इलाका आतंकवादियों के प्रभाव में था।

उधर ब्रिटिश मीडिया हाउस बीबीसी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक तालीबान का अफगानिस्तान के चार प्रतिशत भौगोलिक हिस्से पर पूरा कब्जा है, परंतु देश का 70 फीसदी इलाका उसके प्रभाव में है। यहां वो जब चाहे हमला कर सकता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 15 प्रतिशत हिस्सा ऐसा है जहां सप्ताह में दो या उससे अधिक आतंकी हमले होते हैं। 20 प्रतिशत हिस्से में महीने में कम से कम तीन आतंकी हमले होते हैं जबकि 31 प्रतिशत इलाके में हर तीन महीनों में एक न एक हमला तो होता ही है।

जिस प्रकार पिछले महीने तालीबान ने राजधानी काबुल में ताबड़तोड़ हमले किए, उससे स्पष्ट है कि अब देश का कोई इलाका ऐसा नहीं बचा, जहां तालीबान हमला नहीं कर सकते। तालीबान के बढ़ते हमले असल में ट्रंप को सीधी चुनौती हैं। जब भी ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान के खिलाफ कोई सख्त बयान जारी करता है, तालीबान उसका जवाब एक नए हमले से देता है। पिछले महीने काबुल में हुए भीषण हमलों को भी पाकिस्तान में हुए दो ड्रोन हमलों का जवाब माना जा रहा है।

हर हमले के बाद ट्रंप पाकिस्तान को धमकाते हुए एक ट्वीट कर देते हैं। चिकन स्ट्रीट पर हमले के बाद भी उन्होंने पाकिस्तान को धमकाया कि वो ऐसा कदम उठाएंगे जैसा पहले कभी नहीं उठाया गया होगा। लेकिन आश्चर्य नहीं जब वो पाकिस्तान को धमका रहे थे, अमेरिकी विदेश विभाग के डिप्टी सेक्रेट्री (उपसचिव) जाॅन सुलीवान लगभग उसी समय (30 जनवरी) काबूल में संवाददाताओं से कुछ ओर ही कह रहे थे।

जब वाशिंग्टन पोस्ट के संवाददाता पैन कांस्टेबल ने उनसे ट्रंप के उस बयान के बारे में पूछा जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका तालीबान से बात नहीं करेगा और उसके खिलाफ ऐसा कदम उठाया जाएगा जैसा पहले कभी नहीं उठाया गया, तो सुलीवान ने कहा – “इसमें शक नहीं कि कुछ बहुत अधिक नकारात्मक घटनाएं हुई हैं, आप राष्ट्रपति के कल के और पिछले जिन बयानों का हवाला दे रहे हैं वो यही बताते हैं कि हमारी दक्षिण एशिया नीति परिस्थितियों पर आधारित है। हम समझते हैं कि इसे लागू करने में काफी समय लग सकता है। हम यहां से जाने और शांति वार्ता के लिए कोई समयसीमा नहीं तय कर रहे हंै। आप राष्ट्रपति के जिस बयान का जिक्र कर रहे हैं वो ये इंगित करता है कि हमने हाल ही में हुए भयावह हादसों का संज्ञान लिया है और इसका अर्थ ये है कि तालीबान के कुछ धड़े अफगान समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के इच्छुक नहीं हैं। इससे हमारी नीति की दीर्घकालिक रणनीति नहीं बदलती जो कहती है कि सैन्य दृष्टि से दृढ़ता से काम लिया जाए और तालीबान और उसके महत्वपूर्ण धड़ों को आश्वस्त किया जाए कि इस समस्या का कोई सैन्य समाधान नहीं है और अफगानिस्तान में शांति और सुरक्षा अततः शांतिवार्ता से ही सुनिश्चित होंगी। हम इसके लिए तालीबान पर दबाव बनाने और उसे इसके लिए आश्वस्त करने के लिए अफगान सरकार की साझेदारी में लंबे समय तक काम करने के लिए भी तैयार हैं। हमने समयसीमा तय नहीं की है। सब हालात पर निर्भर करेगा। पिछले दो सप्ताह की हिंसक आतंकी घटनाएं हमें थोड़ा रोकती हैं, पर ये हमें हमें हमारे अफगान साझीदारों का साथ देने से नहीं रोक सकतीं।”

जाहिर है ट्रंप भले ही जहर बुझे ट्वीट से पाकिस्तान को गालियां देते रहें पर न तो उनकी सेना और न ही विदेश विभाग अभी पाकिस्तान को सही तरीके से सबक सिखाने के मूड में हैं। जाॅन सुलीवान हों या अमेरिका की प्रिंसिपल डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेट्री आॅफ स्टेट एम्बेस्डर एलिस वेल्स जो 15-16 जनवरी को इस्लाबाद गईं थीं, सब एक ही राग अलाप रहे हैं। एलिस वेल्स की इस्लामाबाद यात्रा के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने जो बयान जारी किया उस पर भी एक नजर डालिए – ”पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ अपनी बैठक में एम्बेस्डर वेल्स ने ये रेखांकित किया कि अमेरिका, पाकिस्तान के साथ एक नए रिश्ते की ओर बढ़ना चाहता है जो इस क्षेत्र को स्थायित्व और समृद्धि देने के हमारे साझा हित पर आधारित हो। आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान के बलिदानों को स्वीकार करते हुए एम्बेस्डर वेल्स ने इस बात पर बल दिया कि अमेरिका की दक्षिण एशिया नीति एक शांतिपूर्ण और स्थिर अफगानिस्तान बनाने, दक्षिण एशिया में आईएसआईएस को हराने और ऐसे सभी आतंकी समूहों के उन्मूलन के लिए संयुक्त रूप से काम करने का अवसर देती है जो पाकिस्तान और अमेरिका दोनों के लिए खतरा हैं। एम्बेस्डर वेल्स ने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो अपनी धरती पर सक्रिय हक्कानी नेटवर्क और अन्य आतंकी समूहों की ओर ध्यान दे।“

स्पष्ट है अमेरिका अफगान समस्या के हल के लिए मूलतः दोतरफा नीति पर काम कर रहा है – 1) अफगान धरती पर मौजूद तालिबानियों को अफगान सेना की सहायता से हरा कर वार्ता की मेज पर लाया जाए और 2) पाकिस्तान से अफगानिस्तान में तबाही मचाने वाले आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए पाकिस्तान को मजबूर किया जाए। अफसोस! अमेरिका अब तक दोनों मोर्चों पर नाकाम रहा है। अमेरिका को पता है कि इस क्षेत्र में समस्या आतंकवादी नहीं, पाकिस्तानी सेना है। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद कारजाई बार-बार इस ओर ध्यान दिलाते रहते हैं। चिकन स्ट्रीट पर भयानक हमले के बाद जब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहिद खक्कान अब्बासी ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी से फोन पर बात करने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने इनकार कर दिया। जबानी जमा खर्च की जगह घनी ने घटना के तुरंत बाद अपनी खुफिया एजेंसी के प्रमुख मासूम स्टानेजई और गृह मंत्री वैस बरमक को पाकिस्तान भेजा जिन्होंने काबुल की आतंकी घटनाओं में पाकिस्तानी हाथ होने के पुख्ता सबूत सौंपे।

भारत में हुए आतंकी हमलों के बाद ऐसे न जाने कितने सबूत और डोसियर भारत पाकिस्तान को सौंप चुका है, जिनपर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। वहां हाफिज सईद और सय्यद सलाहुद्दीन जैसे दुर्दांत आतंकवादी अब भी छुट्टे घूम रहे हैं। सवाल ये है कि अमेरिका कब लल्लो-चप्पो बंद कर पाकी सेना के खिलाफ सख्त और निर्णायक कार्रवाई करेगा?

काबुल हमलों में जब पाकिस्तान की थू थू हुई तो पाकिस्तान ने दावा किया कि वो आतंकवाद से लड़ने के लिए ईमानदारी से काम कर रहा है और पिछले वर्ष जब नवंबर में पाकी सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा अफगानिस्तान गए थे तब उसने हक्कानी नेटवर्क के 27 आतंकी अफगानिस्तान को सौंपे थे। इसकी पुष्टि अफगानिस्तान या अमेरिका ने अब तक नहीं की है। लेकिन ताजा हमलों से स्पष्ट है कि आतंकियों की जड़े कितनी गहरी हैं, सिर्फ 27 आतंकियों के सफाए से काम नहीं चलेगा।

ये सही है कि अफगानिस्तान में अमेरिका के हित सिर्फ अफगान स्थिरता और विकास से ही नहीं जुड़े हैं। वहां बैठ कर वो पूरे मध्य एशिया और चीन पर भी करीब निगाह रख सकता है। लेकिन सोचने के बात ये है कि ऐसे विनाश के बीच क्या अमेरिका के हित सध पाएंगे? क्या नवगठित और अनुभवहीन अफगान सेना शातिर पाक सेना और उसके दुर्दांत आतंकियों को हरा पाएगी? अब वक्त आ गया है कि अमेरिका अफगानिस्तान को अधर में छोड़ कर इराक जाने की अपनी गलती का प्रायश्चित करे और आतंकियों और उनके आकाओं पर निर्णायक प्रहार करे। निर्दोष अफगान कब तक मारे जाते रहेंगे? अमेरिका को समझना होगा कि लगातार हो रही आतंकी घटनाओं से धीरे-धीरे अफगान लोगों का विश्वास काबुल सरकार और अमेरिका से खत्म हो जाएगा। ये पाकी सेना और उसके आतंकियों की बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत होगी और वियतनाम के बाद अमेरिका के लिए एक और कूटनीतिक और रणनीतिक हार की शुरूआत।

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