“कब तक विश्वमत की उपेक्षा कर पाएंगे अब्दुल्ला यामीन?” in Punjab Kesari

हिंद महासागर के 1,192 द्वीपों में फैला मालदीव दुनिया का सबसे छोटा देश है पर भारतीय विदेशनीति के लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर उभरा है। मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने जेलबंद विपक्षी नेताओं की रिहाई के संबंध में एक फरवरी को जो फैसला सुनाया, उससे न सिर्फ देश में उथल-पुथल मची, बल्कि इसकी गूंज दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया में सुनाई दी।

इस मामले की शुरूआत हुई असल में सात फरवरी 2012 को हुई जब मालदीव के पहले लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति और मालदीवियन डेमोक्रेटिक पार्टी के संस्थापक मौहम्मद नाशीद ने विरोध प्रदर्शनों के बाद संदिग्ध परिस्थितियों में इस्तीफा दे दिया। अगले ही दिन नाशीद ने आरोप लगाया कि पुलिस और सेना ने उन्हें बंदूक की नोक पर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया।

मार्च 2015 में नाशीद और उनके आठ साथियों को आतंकवाद विरोधी कानून के तहत 13 साल की जेल की सजा सुना दी गई और माफूशी जेल भेज दिया गया। उनपर आतंकवाद फैलाने और क्रिमिनल कोर्ट के जज अब्दुल्ला मोहम्मद को गिरफ्तार करने का आरोप लगाया गया। वर्ष 2016 में नाशीद इलाज के लिए इंग्लैंड गए जहां उन्हें राजनीतिक शरण मिल गई। इंग्लैंड से वो श्रीलंका चले गए जहां वो आजकल रह रहे हैैं।

एक फरवरी को अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजोें ने कहा कि नाशीद और उनके साथियों पर लगे आतंकवाद के आरोप बेबुनियाद हैं और पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है। अदालत ने सभी बंदी नेताओं को रिहा करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश में संवैधानिक संकट पैदा हो गया। लेकिन वर्तमान राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने विपक्षी नेताओं को रिहा करने की जगह देश में 15 दिन के लिए आपातकाल की घोषणा कर दी और तीन जजों को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद दो जजों ने अपने पिछले फैसले को रद्द कर दिया।

फिलहाल देश में आपातकाल जारी है और अब्दुल्ला यामीन ने सारी शक्तियां अपने हाथ में ले ली हैं। सवाल ये है कि आखिर यामीन को सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों का फैसला मानने में इतनी परेशानी क्यों है? क्यों वो तीन जजों को गिरफ्तार करने और बाकी को डरा धमका कर अपने पक्ष में फैसला लेने पर आमादा हो गए? क्यों वो आपातकाल घोषित करने के लिए तत्पर हो गए? इसके पीछे मुख्यतः दो कारण हैं – 1) चीन का खुला समर्थन और 2) इस वर्ष के अंत में होने वाले राष्ट्रपति पद के चुनाव। सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के फैसले ने नाशीद को बरी कर उनके चुनाव लड़ने का रास्ता भी खोल दिया था। अगर नाशीद इस वर्ष होने वाले चुनाव लड़ते हैं और जीत जाते हैं, जिसकी पूरी संभावना भी है, तो यामीन का चीन समर्थित पूरा साम्राज्य ढहने का खतरा पैदा हो जाएगा। बहरहाल अब नाशीद खम ठोक कर दावा कर रहे हैं कि वो चुनाव मैदान में उतरेंगे और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का समर्थन भी मांग रहे हैं।

इस बीच पूर्व राष्ट्रपति मौहम्मद नाशीद ने हालात पर काबू पाने के लिए भारत सरकार से सेना भेजने की अपील की है। भारत फिलहाल मालदीव में सेना भेजने का इच्छुक नहीं दिखता पर अपने इस रूख पर सख्ती से कायम है कि यामीन सरकार को लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करना चाहिए और आपातकाल हटा कर सुप्रीम कोर्ट सहित सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं का कामकाज बहाल करना चाहिए। यामीन सरकार ने हालात पर बातचीत के लिए एक विशेष दूत भारत भेजने के बारे में सात फरवरी को चर्चा की थी, परंतु भारत ने इसे समय न होने की बात कह इसे टाल दिया क्योंकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज सउदी अरब के दौर पर थीं और प्रधानमंत्री भी विदेश यात्रा पर जा रहे थे। बहरहाल मालदीव ने अपने दूत चीन, पाकिस्तान और सउदी अरब भेजे जिनके राष्ट्रपति से घनिष्ठ संबंध हैं। चीन पहंुचे यामीन के दूत मौहम्मद सईद ने तो मालदीव में चीनी निवेश की रक्षा के लिए सेना भेजने की मांग भी की जिसे चीन ने मना कर दिया।

एक तरफ तो यामीन चीन के गोद में बैठे हैं तो दूसरी तरफ मौहम्मद नाशीद भारत से उम्मीद लगाए बैठे हैं। क्या भारत उन पर भरोसा कर सकता है? ध्यान रहे ये नाशीद ही थे जिन्होंने भारत की आपत्तियों के बावजूद वर्ष 2011 में चीन को दूतावास खोलने और व्यापार करने की अनुमति दी थी। ये बात अलग है कि इस रिश्ते को परवान चढ़ाया यामीन ने। भारत के साथ 1981 के प्रिफरेंशियल ट्रेड एग्रीमेंट के बावजूद यामीन ने 2017 में चीन के साथ आनन फानन में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए। वर्ष 1981 के समझौते के तहत मालदीव बेरोकटोक अपना सामान भारत में बेच सकता है। चीन के साथ हुआ समझौता एक तरह चीन को, वाया मालदीव, भारत में अपना माल आसानी से बेचने का मौका देना ही है।

यामीन को चीन की छाया से दूर रखने की गरज से वर्ष 2016 में भारत ने यामीन का स्वागत रक्षा सहयोग और अन्य समझौतों से किया। इनके तहत भारत, मालदीव को रक्षा ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग देता, लेकिन यामीन ने भारत को डबलक्राॅस किया। यामीन ने न केवल चीन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किया, बल्कि उसकी आपत्ति के बावजूद चीनी यु़द्धपोतों को मालदीव आने की अनुमति भी दे दी। ध्यान रहे उड़ी हमले के बाद जब भारत ने इस्लामाबाद में सार्क शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया तो मालदीव ने इसमें साथ देने में आनाकानी की। ये बात अलग हे कि आखिरकार उसने भारत की बात मानी।

चीन और मालदीव के संबंध वर्तमान में कितने प्रगाढ़ हो चुके हैं, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि वर्ष 2017 में तीन लाख से भी ज्यादा चीनी पर्यटक वहां पहुंचे। चीन वर्तमान में मालदीव का सबसे बड़ा विदेशी निवेशक है जो आंतरिक ढांचे से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है। हाल ही में एक चीनी कंपनी ने रिसाॅर्ट बनाने के लिए वहां एक पूरा द्वीप 50 साल की लीज पर लिया है। चीन के प्रभाव मंे मालदीव, भारत की रक्षा और रणनीतिक आवश्यकताओं की उपेक्षा ही नहीं कर रहा, इस विषय में तयशुदा परियोजनाओं को भी टाल रहा है।

चीन मालदीव को अपने वन बेल्ट, वन रोड इनिशिएटिव का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है जिसके तहत उसने म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान, मालदीव होते हुए जिबूती (अफ्रीका) तक अपने पांव फैलाए हैं।

लेकिन मालदीव जितना चीन के लिए महत्वपूर्ण है, उतना ही भारत के लिए भी। इंडो-पैसेफिक रीजन (हिंद-प्रशांत क्षेत्र) में भारत की नई रणनीति में मालदीव का महत्वपूर्ण स्थान है। चीन के प्रभाव को सीमित करने के लिए भारत, आॅस्ट्रलिया, जापान और अमेरिका के साथ मिल कर जो क्वाड्रीलेट्रल (चार देशों का गठबंधन) बनाने की सोच रहा है, उसमें भी मालदीव महत्वपूर्ण है। अब सवाल ये है कि चीनी एजेंट बने यामीन के रहते मालदीव में भारत के सामने क्या विकल्प हैं?

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते समीकरणों के चलते मालदीव अब चीन और भारत के बीच का विषय नहीं रह गया है। अमेरिका और उसके सहयोगी देश भी मालदीव में उतनी ही रूचि रखते हैं जितनी भारत या चीन। वो चीन को बढ़ावा देने की जगह, भारत के पक्ष का समर्थन करना चाहेंगे। मालदीव में 70 प्रतिशत विदेशी निवेश चीन का है और उसके संरक्षक हैं अब्दुल्ला यामीन। यामीन के जाने का मतलब होगा चीनी वर्चस्व में कमी। इसलिए चीन कह रहा है कि मालदीव के लोग खुद ये समस्या सुलझाएं यानी कमान यामीन के हाथ में ही रहे। यामीन को अंतरराष्ट्रीय दबाव से बचाने के लिए ही चीन इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में जाने से रोकना चाहता है। लेकिन भारत के सामने इस विषय को संयुक्त राष्ट्र में उठाने का विकल्प खुला है और भारत ने मालदीव के हालात की समीक्षा संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधिमंडल से करवाने की मांग भी की है।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव सिर्फ संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से ही नहीं होता। आठ फरवरी को यूरोपियन यूनियन, जर्मनी, ब्रिटेन के दूत वहां पहुंचे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मची उठा-पटक के बाद माले पहुंचने वाला यह पहला विदेशी प्रतिनिधिमंडल था। इन्होंने यामीन से मिलने के लिए समय मांगा, परंतु उन्हें समय नहीं दिया गया। इस पर जर्मनी के प्रतिनिधि और श्रीलंका में राजदूत जाॅन रोड ने ट्वीट किया – ”यामीन के रूख से तो मसला हल करने की कोई मंशा नजर नहीं आती।“ उधर अमेरिकी और फ्रांसिसी विदेश विभाग भी यामीन की हठधर्मिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अपमानजनक रवैये की निंदा कर चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय दबाव से यदि काम न बने तो भारत मालदीव के साथ अपनी संधियां रद्द करने के बारे में भी सोच सकता है जिनके तहत वो चीन को भारतीय बाजार उपलब्ध करवा रहा है।

इस बीच पर्दे के पीछे भी बातचीत शुरू हो गई है। सउदी अरब के दौरे पर गईं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने वहां के विदेश मंत्री अदेल जुबेर से इस विषय में विस्तार से बात की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस विषय में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात कर चुके हैं। इस बीच चीन ने कहा है कि वो डोकलाम के बाद मालदीव को अपने और भारत के बीच फ्लैशपाइंट नहीं बनने देना चाहता और इस बारे में वो लगातार भारत से बात कर रहा है।

फिलहाल मालदीव में तनावपूर्ण शांति है। आपातकाल के 15 दिन बाद यामीन क्या करते हैं, इसपर पूरे विश्व की दृष्टि रहेगी। ये बात यामीन भी जानते हैं और चीन भी कि वो लंबे अर्से तक विश्वमत की उपेक्षा नहीं कर सकते। लेकिन यामीन ने जो सख्त रवैया अपनाया है, उससे स्पष्ट है कि वो आसानी से हार नहीं मानेंगे। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के हस्तक्षेप के बाद समझौता किन शर्तों पर होगा, ये अभी स्पष्ट नहीं है। लेकिन यामीन को भूलना नहीं चाहिए कि जब पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ जैसे शक्तिशाली तानाशाह को जाना पड़ा तो वो किस खेत की मूली हैं?

अंत में एक जरूरी बात। मालदीव में भारत के करीब 25,000 नागरिक हैं। भारत स्पष्ट कर चुका है कि अगर उनपर संकट आया तो वो सेना भेजने से नहीं हिचकेगा।

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