किसान कर्ज माफी या अर्थव्यव्स्था चौपट करने की सुपारी in “Punjab kesari”

किसान कर्ज माफी या अर्थव्यव्स्था चौपट करने की सुपारी

जब से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ये ऐलान किया है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तब तक चैन से नहीं सोने देंगे जब तक देश के सभी किसानों का ऋण माफ नहीं हो जाता, पहले ही कम सोने वाले कर्मठ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नींद तो पता नहीं उड़ी या नहीं, लेकिन देश और दुनिया के अर्थशास्त्री और बैंक अवश्य उन्हें संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं। उन्हें शक हो गया है कि कहीं राहुल ने ‘किसी’ से देश की अर्थव्यवस्था तबाह करने की सुपारी तो नहीं ले ली? इसकी ठोस वजह भी है। लेकिन आगे बढ़ने से पहले बता दें कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कर्ज माफी की घोषणा की है जिस पर करीब 60,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे। देश के 12 राज्यों में किसान कर्ज माफी की मद में 2,30,000 करोड़ रूपए बकाया हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने राज्यों की वित्तीय स्थिति के बारे में जुलाई में अपनी रिपोर्ट में किसान कर्ज माफी के खिलाफ चेतावनी दी थी। आरबीआई ने कहा कि इससे राज्यों पर दोतरफा मार पड़ रही है। एक ओर तो गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स (जीएसटी) की वजह से उनके राजस्व में कमी आई है तो दूसरी ओर ऐसे कदमों से उनका राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है। असल में पिछले वित्त वर्ष में उनका राजकोषीय घाटा 0.27 प्रतिशत से बढ़ कर 0.32 प्रतिशत हो गया है। आरबीआई ने इससे पहले वर्ष 2017 में भी इसी प्रकार की चेतावनी दी थी। अगले वर्ष लोकसभा चुनाव हैं। अगर किसान ऋर्ण माफी का जूनून ऐसे ही सवार रहा तो ये डर है कि राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के दो प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।

जब राजकोषीय घाटा बढ़ता है तो इसकी भरपाई के लिए राज्यों को केंद्र या दूसरे माध्यमों से कर्ज लेना होता है जिसपर ब्याज भी देना होता है। कुल मिलाकर अनावश्यक व्यय बढ़ता है और विकास कार्यों की मद में कटौती करनी पड़ती है। संभवतः इसी लिए नीति आयोग ने भी इसका विरोध किया है। नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) ने राज्यों को चेतावनी दी है कि वो कर्ज माफी की नई घोषणाओं से पहले पुराना ऋण चुकाएं क्योंकि बकाया राशी बढ़ने से बैंकों के लोन सायकल पर प्रभाव पड़ता है और उनकी नए कर्ज देने की क्षमता कम हो जाती है।

यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक अशोक कुमार प्रधान कहते हैं, ”ये जानलेवा जहर है, समस्या को हल करने का गलत तरीका है।“ सिंडीकेट बैंक के प्रबंध निदेशक मृत्युंजय महापात्रा कहते हैं, ”निःसंदेह कर्ज माफी को लेकर किसानों की उम्मीदें बढ़ रही हैं, ये देश की ऋण संस्कृति के लिए अच्छा नहीं है। इससे बैंकों को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनकी भरपाई तो सरकारी खजाने से हो जाती है, लेकिन इससे वो सतर्क हो जाते हैं और किसानों और कृषि संस्थाओं को कम कर्ज देते हैं।“ वैसे भी अगर कर्ज माफी से किसानों की हालत सुधरनी होती तो कब की सुधर जाती क्योंकि ये प्रथा काफी पहले से चली आ रही है। गौरतलब ये है कि इसका ज्यादातर फायदा तो बड़े किसानों को ही होता है। छोटे किसान अब भी स्थानीय साहुकारोें पर निर्भर हैं जिनका कर्ज सरकारें माफ नहीं करतीं।

आपको याद दिला दें कि जब प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आशंका जताई थी कि इससे जीडीपी की वृद्धि दर में दो प्रतिशत तक कटौती हो सकती है। उनकी बात तो गलत साबित हुई, लेकिन राहुल गांधी पर अगर ऐसे ही कर्ज माफी का दौरा जारी रहा तो बहुत संभव है कि अब मनमोहन सिंह की भविष्यवाणी सही साबित हो जाए। क्या अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह, राहुल बाबा को समझाएंगे कि वो कोई ऐसी जिद न पालें जिस से अर्थव्यवस्था चौपट हो जाए? गांधी परिवार के प्रति मनमोहन सिंह का जो ‘मौन समर्पण’ है उसे देखते हुए तो लगता नहीं कि वो राहुल को सद्बुद्धि देने का प्रयास करेंगे।

वर्ष 2008 में भी कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों से पहले किसानों के 60,000 करोड़ रूपए के कर्जों की माफी का ऐलान किया था। संघीय बजट 2008-09 प्रस्तुत करते हुए तबके वित्त  मंत्री पी चिदंबरम ने इसकी घोषणा की थी। कहा गया था कि कर्ज माफी से तीन करोड़ छोटे और हाशिए पर पड़े किसानों को लाभ होगा। इसके अलावा एक करोड़ किसानों को एक मुश्त निपटारे की योजना का लाभ मिलेगा। इससे उन्हें नए सिरे से कर्ज लेने में भी सुविधा होगी।

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस के चुनावी पंडितों ने दावा किया कि उनकी जीत में किसान कर्ज माफी बड़ा कारण रही। जहां जितने ज्यादा किसानों का कर्ज माफ हुआ, पार्टी को वहां उतनी ही अधिक सीटें मिलीं। जाहिर है राहुल गांधी को लग रहा है कि इस दांव को एक बार फिर खेला जाए। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में जीत के बाद उनके हौसले बुलंद हैं। अब उन्होंने ये दांव पूरे देश में खेला है। पहले गांधी परिवार ने मनमोहन सिंह के कंधे पर रख कर बंदूक चलाई थी और इस बार वो मोदी का इस्तेमाल करना चाहते हैं। क्या मोदी राहुल को ‘किसानों का मसीह’ बनाने के लिए अपने कंधों का इस्तेमाल होने देना चाहेंगे?

मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी को इस विषय में पहले से ही सावधान हो जाना चाहिए था। क्योंकि राहुल काफी अर्से से इसके लिए जमीन तैयार कर रहे थे। मोदी सरकार को ‘सूटेट-बूटेड सरकार’ बताना, उसपर सिफ उद्योगपतियों का भला करने के बेसिरपैर के आरोप लगाना, उद्योगपतियों के खिलाफ किसानों और मजदूरों को बरगलाना…ये सब इसी ओर तो इशारा करते थे।

वित्त मंत्री अरूण जेटली राहुल के तरकशों के जवाब में जनता को ‘गुइ इकॉनॉमिक्स’ समझाते रहे, लेकिन राहुल का निशाना सता पर रहा। जाहिर है उनका मकसद किसान-मजदूर की भलाई नहीं, प्रधानमंत्री पद की कुर्सी है। किसान-मजूदूर तो सिर्फ मोहरे हैं।

ट्वीटर पर एक सज्जन ने बहुत खूब लिखा है – ”मोदी ने अपनी राजनीतिक पूंजी जीएसटी और नोटबंदी जैसे सुधारों में गंवा दी जिससे सरकार के राजस्व में चार लाख करोड़ रूपए की वृद्धि हुई। अब राहुल इसका इस्तेमाल किसानों के कर्ज माफ करने और 2019 में सता हासिल करने में करेंगे।” ऐसे में मोदी के सामने दो ही विकल्प हैं – 1. आदर्शवादी रवैया अपनाते हुए ‘गुड इकॉनॉमिक्स’ की बात की जाए और जनता को अपनी उपलब्धियों से अवगत करवाया जाए या 2. ‘गुड इकॉनॉमिक्स’ को ताक पर रखते हुए, आगामी बजट में किसानों के लिए राहुल से बेहतर योजना पेश की जाए और 2019 के चुनाव जीतने के बाद हालात को संभाला जाए।

मनमोहन सिंह ने अर्थशास्त्री होत हुए भी ‘निहित स्वार्थों’ के लिए प्रधानमंत्री पद का कैसे दुरूपयोग किया और कैसे अर्थव्यवस्था की नैया डुबो दी, इसके बारे में अरूण जेटली सौ वाजिब और वैध तर्क दे सकते हैं। ये भी सही है कि उत्तर प्रदेश में किसान कर्ज माफी और गन्ना किसानों को अच्छा खासा भुगतान करने के बावजूद भाजपा गोरखपुर, फूलपुर और कैराना की लोकसभा सीटें हारी। लेकिन इसका ये मतलब तो कतई नहीं कि किसान कर्ज माफी मुद्दा नहीं है।

भारत में लोग अक्सर भावात्मक मुद्दोें पर चुनाव लड़ते हैं। एक बड़ा मुद्दा चुनावों का रूख बदल सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि मोदी सरकार ने किसानों और ग्रामीण विकास के लिए जितने काम किए है, उतने तो आजादी के बाद किसी सरकार ने नहीं किए। लेकिन सिर्फ काम करने से काम नहीं चलेगा, लोगों को, विशेषकर लाभार्थियों को इसका अहसास भी करवाना पड़ेगा।

विपक्षी दलों ने धीरे-धीरे अपनी रणनीति तय कर ली है। वो भले ही महागठबंधन न बनाएं, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि वो चुनावों के बाद भाजपा को बाहर करने के लिए हाथ मिलाने से नहीं चुकेंगे। अगर सीधे-सादे शब्दों में कहें तो तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के फॉर्मूले पर काम हो रहा है जो कहता है – जो राजनीतिक दल जहां मजबूत है, वहां सभी अन्य विपक्षी दल उसे भाजपा को हराने में मदद दें। प्रधानमंत्री कौन बनेगा, ये फैसला चुनाव के बाद मिल-बैठ कर कर लिया जाएगा। इसी फॉमूले के तहत उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव, मायावती और अजित सिंह गठबंधन बनाने पर विचार कर रहे हैं। हाल ही में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित ने संकेत दिया था कि दिल्ली में उनकी पार्टी आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती है। ध्यान रहे इस समय इस्लामिक सांप्रदायिक और देशद्रोही नक्सली ताकतें भी राहुल के पीछे खड़ी हैं, जिनका मानना है कि ‘हिंदू’ मोदी के नेतृत्व में मजबूत हिंदुस्तान की जगह, कमजोर और लाचार भारत उनके हित में है।

जाहिर है विपक्षी दलों की सांठगांठ (महागठबंधन नहीं) और भावात्मक मुद्दे भाजपा की चिंता बढ़ा सकते हैं। आने वाले दिनों में भाजपा क्या रणनीति बनाएगी, ये तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ही बता सकते हैं, लेकिन चलते-चलते हम ये भी बताते चलें कि कांग्रेसी कर्ज माफी किसानों के साथ कितना बड़ा धोखा है। इसके लिए सिर्फ मध्य प्रदेश का उदाहरण ही काफी होगा।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने किसान कर्ज की फाइल पर सबसे पहले हस्ताक्षर कर वाहवाही तो बहुत लूटी, मगर जब किसानों को इसकी हकीकत पता लगी तो उन्होंने माथा पीट लिया। कमलनाथ ने फाइल पर हस्ताक्षर तो कर दिए पर ये नहीं बताया कि कर्ज माफी के तौर-तरीके क्या होगे। अब तक जो अपुष्ट सूचनाएं मिली हैं उनके मुताबिक जून 2009 के बाद लिए गए कर्ज ही माफ किए जाएंगे। लेकिन इसमें अभी कई पेच सामने आने वाले हैं। किसका कर्ज माफ होगा, इसकी पात्रता और मापदंड कर्ज माफी के लिए बनाई गए कमेटियां ही तय करेंगी। ये कमेटियां राज्य से लेकर जिला स्तर तक गठित की जाएंगी। इसमें कई शर्तें हैं, जैसे यदि किसान ने ट्रैक्टर या कृषि उपकरण खरीदने या कुंआ बनवाने के लिए कर्ज लिया है, तो वो माफ नहीं होगा। सिर्फ खेती के लिए उठाए गए कर्ज पर ही माफी मिलेगी। अगर किसान ने दो या उससे अधिक बैंकों से कर्ज लिया है तो सिर्फ सहकारी बैंक का कर्ज माफ होगा। कर्ज माफी भी कुल दो लाख रूपए तक ही होगी। किसानों को 2009 से पहले की बकाया राशी बैंकों को लौटानी होगी हालांकि इसके बारे में अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री के साथ बैठक के बाद ही लिया जाएगा।

कांग्रेस शासित राज्यों में विपक्षी दल कर्ज माफी के लिए बनने वाली समितियों पर भी उंगली उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि इसमें सतारूढ़ दल के लोग ही भरे जाएंगे और जमकर भ्रष्टाचार होगा। कुल मिलाकर किसानों की भलाई के लिए किए जा रहे इस ड्रामे का इस्तेमाल पार्टी के लिए चंदा जुटाने के लिए होगा।

कांग्रेस एक ओर तो दावा कर रही है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़  में खजाना खाली है। लेकिन फिर भी यहां कर्ज माफी का नाटक किया जा रहा है क्योंकि असली मकसद लोकसभा चुनाव हैं। अभी घोषणा कर दी गई है, और जैसा कि हमने ऊपर बताया तौर-तरीके तय करते समय तो लगेगा ही और तब तक आम चुनाव आ जाएंगे और आचार संहिता लागू हो जाएगी। ऐसे में नई सरकार आने तक कितने किसानों को लाभ मिलेगा, कितनों का भला होगा, ये तो वक्त ही बताएगा। अलबता राहुल ने कुछ न करके भी किसानों का मसीहा होने का दावा तो ठोक ही दिया है। इसे ही कहते हैं – हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा आए। लेकिन मोदी भी कम नहीं हैं। उन्होंने तो वास्तव में काम किए हैं। वो जनता को अपनी उपलब्धियां गिनवा सकते हैं और दावा कर सकते हैं – सौ सुनार की, एक लोहार की।

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