“केरल में कम्युनिस्ट-इस्लामिक आतंकवाद पर लगाम लगाना जरूरी” in Punjab Kesari

केरल में हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकताओं के खिलाफ जानलेवा हमले रूकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। 15 अक्तूबर को कन्नूर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक कार्यकर्ता निदेश पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी (सीपीएम ) के गुंडों ने सरेआम हमला किया। निदेश की हालत नाजुक है। इससे सिर्फ चार दिन पहले 11 अक्तूबर को कन्नूर में ही एक अन्य संघ कार्यकर्ता केएम सुरेश पर जानलेवा हमला हुआ और भाजपा कार्यालय पर बम फेंका गया। गौरतलब है कि ये हमले तब हए जब भारतीय जनता पार्टी राज्य में जनरक्षा अभियान चला रही थी। तीन अक्तूबर को आरंभ हुआ ये अभियान 17 अक्तूबर को तिरूवनंतपुरम में समाप्त हुआ।

केरल में सैकड़ों संघ-भाजपा कार्यकर्ता अब तक सीपीएम की हत्यारी और इस्लामिक सांप्रदायिक सोच के शिकार हो चुके हैं। लेकिन सीपीएम ने आज तक एक बार भी अफसोस नहीं जताया। वैसे भी जब हमले खुद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की देखरेख में हो रहें हों और राज्य पुलिस खुद हत्यारों को संरक्षण दे रही हो तब ये सोचना भी बेमानी है कि राज्य की लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार या उनकी पार्टी सीपीएम इन हिंसक घटनाओं पर खेद जताएंगी। अपनी हरकतों से बाज आने की जगह अब सीपीएम, संघ और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ ही अफवाहें फैलाने में लग गई है। वैसे भी कम्युनिस्ट पार्टियां अफवाहें फैलाने में माहिर मानी जाती हैं।

आज केरल में ‘धर्मनिरपेक्षता’ (हिंदुओं के खिलाफ उन्माद और मुस्लिम तुष्टिकारण) की रक्षा के नाम पर संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्याओं को ‘राजनीतिक संघर्ष’ का नाम देकर महिमामंडित किया जा रहा है। हत्याओं को उपलब्धि और ट्राॅफी के तौर पर पेश किया जा रहा है। राजनीतिक संघर्ष लोकतंत्र का अहम हिस्सा है और हर राज्य में होता है, लेकिन ऐसा क्यों कि कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा शासित प्रदेशों में ये खूनी खेल में बदल जाता है? इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ कम्युनिस्टों की खूनी विचारधारा का है जो ‘वर्ग संघर्ष’ में ‘दुश्मन’ के खिलाफ हिंसा को उचित मानती है। हालांकि पुराने कम्युनिस्ट नेता इस खून-खराबे से बचते रह, लेकिन पिनराई विजयन के नेतृत्व में कम्युनिस्ट नेताओं की नई फसल इसे पूरी तरह जायज मानती है। ये मानते हैं कि पार्टी के विस्तार के लिए अगर प्रतिद्वद्वियों को जान से भी मारना पड़े तो मारना चाहिए।

कहने की आवश्यकता नहीं, इस खूनी खेल का गढ़ खुद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का गृह जिला कन्नूर है। कन्नूर पर कभी कांग्रेस ने भी वर्चस्व जमाने की कोशिश की, पर सीपीएम के हिंसक तौर तरीकों के आगे जल्दी ही हथियार डाल दिए, लेकिन संघ ने हार नहीं मानी। इसका नतीजा भी उन्हें भुगतना पड़ा।
केरल में और विशेषकर कन्नूर में कम्युनिस्टांे और संघ का संघर्ष आजादी के पहले से चला आ रहा है, लेकिन वर्ष 1969 में संघ के एक मुख्यशिक्षक वडिक्कल रामकृष्णन की हत्या के साथ ही इसमें अभूतपूर्व तेजी आई। कहा जाता है कि सीपीएम ने रामकृष्णन की हत्या की क्योंकि वो यहां के तलचेरी इलाके में संघ की शाखा स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे जहां मुस्लिम व्यापारियों का अधिपत्य था। ध्यान रहे उनकी हत्या के मामले में पहला अभियुक्त पिनराई विजयन था जो अब राज्य का मुख्यमंत्री है। उस समय विजयन सीपीएम की युवा शाखा केएसवाईएफ का सदस्य था।

रामकष्णन की हत्या के दो वर्ष बाद 1971 में तलचेरी में भीषण सांप्रदायिक दंगे हुए। दंगों में सीपीएम ने मुस्लिम दंगाइयों का साथ दिया। ऊपरी तौर पर ये सब ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर किया जा रहा था, लेकिन असली मकसद था संघ का विस्तार रोकना। कुछ लोग तो मानते हैं कि सीपीएम ने ये दंगे भड़काए ताकि इनकी आड़ में संघ के कार्यकर्ताओं का सफाया किया जा सके। ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर केरल में सीपीएम अब भी इस्लामिक सांप्रदायिक ताकतों को अंधा समर्थन दे रही है। ये मामला अब अधिक गंभीर हो गया है क्योंकि वो राज्य में पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) को खुला समर्थन और छूट दे रही है जिसके खिलाफ आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने, आईएसआई और लश्कर ए तौएबा से संबंध होने, केरल के मुस्लिम युवाओं को शस्त्र प्रशिक्षण देने और उन्हें आईएस कैंपों में भेजने और हिंदू लड़कियों का जबरन धर्म परिवर्तन करवाने जैसे गंभीर आरोप है।

ध्यान रहे ओमन चंडी के नतृत्व वाली कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार ने 26 जुलाई 2012 को हाई कोर्ट में एक शपथ पत्र में कहा था कि पीएफआई प्रतिबंधित सिमी (स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया) का ही दूसरा रूप है। हालांकि घोषित रूप से पीएफआई अल्पसंख्यकों के अधिकारों और मानवाधिकारों की रक्षा की बात करता है, लेकिन वो अंदर ही अंदर आपराधिक गतिविधियों में लगा है और उसका वास्तविक उद्देश्य ‘इस्लाम की रक्षा’ है। पीएफआई कार्यकर्ताओं पर 27 हत्याओं के आरोप हैं।

पीएफआई और सिमी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इसे समझने के लिए किसी राॅकेट साइंस की आवश्यकता नहीं है। पीएफआई का राष्ट्रीय अध्यक्ष अब्दुल रहमान सिमी का पूर्व राष्ट्रीय सचिव था। इसका राज्य सचिव अब्दुल हमीद मास्टर सिमी का पूर्व राज्य सचिव था। इनके अलावा भी इसके अनेक वरिष्ठ पदाधिकारियों के सिमी से संबंध रह चुके हैं। सिमी पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के आरोप में 2001 में प्रतिबंध लगा दिया गया था।

यहां ये भी बता दिया जाए कि पीएफआई से सिर्फ सीपीएम के ही नहीं कांग्रेस के भी अच्छे खासे संबंध है। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने हाल ही में पीएफआई के एक कार्यक्रम में शिरकत की जिसके बाद काफी हंगामा मचा। आपको याद होगा ये वही हामिद अंसारी हैं जिन्होंने कहा था कि एनडीए सरकार में मुस्लिम खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं। अब सोचने की बात है कि क्या हामिद अंसारी जैसे मुस्लिम, आतंकी पीएफआई की छत्रछाया में खुद को सुरिक्षित समझते हैं जो उनके कार्यक्रमों में भाग लेते हैं?

केरल के सीपीएम और कांग्रेस नेता मुस्लिम वोटों के लिए किस हद तक गिर सकते हैं, इसका उदाहरण नौ अगस्त को देखने को मिला जब इनके अनेक वरिष्ठ नेता कोयम्बतूर और बेंगलूरू धमाकों के आरोपी अब्दुल नासिर मदनी के लड़के की शादी में शामिल हुए। कोयम्बतूर धमाकों में 60 लोग मारे गए थे। कन्नूर में हुए मदनी के बेटे के विवाह में सीपीएम की सेंट्रल कमेटी के सदस्य ईपी जयराजन, पार्टी की जिला इकाई के सचिव पी जयराजन, कांग्रेस नेता के सुधाकरण, जिला कांग्रेस अध्यक्ष सतीशन पचेनी आदि शामिल हुए। इनके अलावा जमात ए इस्लामी और जमीयत उलेमा के नेता भी वहां पहुंचे।

अब्दुल नासिर मदनी पर आईएसआई और लश्कर ए तौएबा से संबंध होने के आरोप भी हैं पर फिर भी सीपीएम और मदनी की पीपल्स डेमाक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) का चुनावी गठबंधन होता रहा है। मदनी का सीपीएम ही नहीं कांग्रेस पर भी क्या प्रभाव है, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि केरल विधानसभा में 16 मार्च 2006 को एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर मानवीय आधार पर मदनी की रिहाई की मांग की गई थी।

खुफिया एजेंसियों की माने तो पीडीपी और पीएफआई में नजदीकी रिश्ते हैं और इन्होंने सिर्फ केरल ही नहीं, दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी इस्लामिक कट्टरवाद और आईएसआई का जाल बिछाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैै।

इस्लामिक आतंकवादियों से सीपीएम और कांग्रेस के रिश्तों की ये दास्तान खुद ब खुद बयान करती है कि केरल में संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं की क्यों आए दिन हत्याएं हो रहीं हैं और क्यों उनके कार्यालयों पर बम बरसाए जा रहे हैं।

देश में आतंकी घटनाओं की जांच के लिए बनी नेशनल इनवेस्टिगेटिव एजेंसी (एनआईए) केरल की घटनाओं की बारीकी से जांच कर रही है। स्वयं एलडीएफ और यूडीएफ की सरकारें पीएफआई और पीडीपी जैसी संस्थाओं के खिलाफ विभिन्न अदालतों में शपथपत्र दे चुकी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर माहौल सुधरने का नाम नहीं ले रहा है। एलडीएफ की पिनराई विजयन सरकार आने के बाद तो हालात और बदतर हो गए हैं क्योंकि कम्युनिस्टों और इस्लामिक आतंकवादियों का दर्शन एक ही है – ‘दुश्मन’ की हत्या।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ इस मसले से लंबे समय से जूझ रहा है, लेकिन दिल्ली के मीडिया और विशेषकर हिंदी मीडिया का ध्यान इस ओर कम ही गया। दिल्ली की कांग्रेसी-कम्युनिस्ट लाॅबी (इनटाॅलरेंस ब्रिगेड) एक संप्रदाय विशेष के मुद्दों पर तो बहुत हायतौबा मचाती है और ‘नाॅट इन माई नेम’ जैसे अभियान शुरू कर देती है। ये लोग उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली ऐसी घटनाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत सरकार को बदनाम करने से नहीं चूकते, पर अफसोस, इन्हें केरल का नरसंहार नहीं दिखता जहां सैकड़ों संघ-भाजपा कार्यकर्ता या तो जान गंवा चुके हैं या अपंग हो चुके हैं।

पिनराई विजयन के गद्दी संभालने के बाद जब संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याएं अचानक बहुत ज्यादा बढ़ गईं तो केंद्र ने केरल सरकार को कानून-व्यवस्था बेहतर करने की सलाह दी। भारतीय संविधान के मुताबिक कानून-व्यवस्था राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। विजयन की विपक्षी नेताओं से वार्ता भी हुई, लेकिन अब तक कोई नतीजा नहीं निकला है। इस बीच केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली भी केरल गए। लोगों में इस विषय में जागरूकता पैदा करने के लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चार अक्तूबर को 15 दिवसीय जनरक्षा यात्रा का आगाज किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी 11 नवंबर को तिरूवनंतपुरम में रैली करने की घोषणा की है जिसमें देश भर से छात्र एकत्र होंगे।

संघ और भाजपा के जनजागरण अभियान अपनी जगह सही हैं, लेकिन सोवियत संघ, चीन, क्यूबा, उत्तरी कोरिया जैसे देशों और स्वयं भारत में कम्युनिस्टों का इतिहास बताता है कि ऐसे उपायों से निर्दयी, रक्तपिपासु और घोर इस्लामिक सांप्रदायिक कम्युनिस्टों पर कोई असर नहीं पड़ता। यहां पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार के कार्यकाल में हुई व्यापक हिंसा की याद दिलाना जरूरी है।

वर्ष 1997 में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने विधानसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि 1977 (जब कम्युनिस्ट सत्ता में आए) से 1996 के बीच राज्य में 28,000 राजनीतिक हत्याएं हुईं। अर्थात हर छह घंटे में एक, रोज चार, हर महीने 127.7 राजनीतिक हत्याएं। एक अनुमान के अनुसार राज्य में 32 (1977-2009) साल के कम्युनिस्ट शासन में करीब 55,000 राजनीतिक हत्याएं हुईं।

केरल भले ही दिल्ली से भौगोलिक रूप से दूर है लेकिन आज के सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनलों के डिजिटल युग में, केरल को बंगाल नहीं बनने दिया जा सकता। अगर पिनराई विजयन सरकार राज्य में कम्युनिस्ट-इस्लामिक गठबंधन के आतंक पर रोक नहीं लगाती, तो केंद्र को वहां राष्ट्रपति शासन लगाना चाहिए। ये संघ-भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमले और उनकी हत्याएं रोकने के लिए ही नहीं, राज्य को इस्लामिक कट्टरवाद/ आतंकवाद से बचाने के लिए भी जरूरी है जो वहां कैंसर की तरह फैल चुका है।

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