“चिंताजनक है शहरी नक्सलियों और मुख्यधारा के दलों की सांठगांठ” in Punjab Kesari

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार देश के 640 जिलों में से 90 जिले अब भी माओवादी या नक्सली आतंक से पीड़ित हैं। यानी देश के करीब 15 प्रतिशत भूभाग पर उनका कब्जा है। मोदी सरकार का दावा है कि उसके अब तक के कार्यकाल में 44 जिलों को माओवादी आतंकियों के कब्जे से छुड़वाया गया। भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,000 वर्ग किलोमीटर है। इसके 15 प्रतिशत यानी 4,93,050 वर्ग किलोमीटर पर माओवादी आतंकियों का कब्जा है। ये क्षेत्रफल इंग्लैंड के कुल क्षेत्रफल 2,42,495 वर्ग किलोमीटर से लगभग दुगना है अर्थात किसी छोटे-मोटे देश से भी बडे़ भूभाग पर नक्सलियों का कब्जा है।

जाहिर है, ये समस्या छोटी नहीं है। ये अकारण नहीं था कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सली आतंकवाद को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ जंगलों में या सुरक्षित पनाहगाहों में ही रहते हैं? जवाब है नहीं। नक्सली सिर्फ उस इलाके पर कब्जा करके ही संतुष्ट नहीं हैं। उनका असली लक्ष्य तो है – भारत में अराजकताा फैलाना, उसे अस्थिर करना, उसके टुकड़े करना और फिर उसपर कब्जा करना। सिर्फ जंगलों में रह कर वो अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते, इसके लिए जरूरी है वो देश के अन्य हिस्सों में भी अपने पैर पसारें, जंगलों के बाहर भी लोगों के बीच अपनी पैठ बनाएं। सरकारी कार्यालयों, मीडिया, पुलिस, प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका, विधानसभाओं और लोकसभा में भी घुसपैठ करें। जंगलों से बाहर जो नक्सली चुपचाप अपने काम को अंजाम देते हैं, उन्हें हम अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली कहते हैं।

कभी आपने सोचा कि अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ आधी रात को न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने वाले कौन लोग थे? वो कौन हैं जो आतंकियों को फांसी दिए जाने को ‘न्यायिक हत्या’ करार देते हैं और नक्सलियों के हाथों पुलिस वालों के मारे जाने पर जश्न मनाते हैं? वो कौन हैं जो कश्मीरी अलगाववादियों को महिमामंडित करते हैं, हिंदुओं को ‘फासीवादी’ करार देते हैं? ये और कोई नहीं शहरी नक्सली ही हैं। ये अपना नेरेटिव स्थापित करने के लिए फर्जी प्रचार करते हैं और लोगों को बहकाते हैं। हाल ही में जब नक्सलियों की प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश का भंडाफोड़ हुआ तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की एक कुख्यात शहरी नक्सली शहला राशिद ने ट्वीट किया कि मोदी को नक्सली नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नितिन गडकरी खत्म करना चाहते हैं।

शहला राशिद की बात चली है तो बता दें कि जेएनयू में नक्सली गतिविधियों से परेशान अनेक शिक्षकों ने हाल ही में मीडिया को विश्वविद्यालय परिसर में इनकी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के सबूत दिए। उन्होंने इसके लिए नक्सली विचारधारा वाले शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराया जो छात्रों का ब्रेनवाश करते हैं। वैसे भी वहां अफजल गुरू की बरसी पर हुए हंगामे को कौन भूल सकता है, जब सरेआम भारत विरोधी नारे लगाए गए। उसके बाद कैसे राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, अरविंद केजरीवाल, डी राजा आदि वहां नक्सलियों को समर्थन देने पहंुचे, ये भी आप भूले नहीं होंगे। सिर्फ जेएनयू ही क्यों, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, नागपुर विश्विद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय आदि भी इनके अड्डे बने हुए हैं। आपको नक्सली रोहित वेमूला का आत्महत्या प्रकरण तो याद ही होगा जिसे इन्होंने दुनिया भर में बहुत उछाला। रोहित नक्सलियों द्वारा चलाए जा रहे अंबेदकर विचार मंच का सदस्य था जबकि असलियत में अंबेदकर का नक्सलियों से तो क्या, कम्युनिस्टों तक से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। वो तो साम्यवाद के धुर विरोधी थे।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में ही नहीं, मीडिया, अदालतों, गैरसरकारी संगठनों यहां तक कि सरकारी महकमों तक में इनकी गहरी घुसपैठ है। इनका नेटवर्क सिर्फ भारत में ही नहीं, विकसित देशों में भी है। ये बहुत सोची समझी साजिश के तहत राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दों को उछालते हैं और सरकार पर दबाव बनाते हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में इनकी पहुंच और पैठ कितनी गहरी है, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने 2014 में गिरफ्तार किए गए शहरी नक्सली और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साइंबाबा की रिहाई की अपील की। ध्यान रहे ये वही आयोग है जिसने कुछ ही दिन पहले कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में फर्जी रिपोर्ट जारी की थी।

अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि नक्सलियों को पैसा कहां से मिलता है? ये अपने प्रभाव वाले इलाकों में लोगों पर मनमाने कर लगाते हैं और वहां काम करने वाली कंपनियों, ठेकेदारों आदि से वसूली करते हैं। ये मादक पदार्थों, हथियारों और जाली नोटों का कारोबार भी करते हैं। इनके लिए धन एकत्र करने के लिए शहरी नक्सली अलग-अलग नामों से गैरसरकारी संगठन बनाते हैं जो चीन और पाकिस्तान से ही नहीं, अमेरिका और इंग्लैंड आदि से इनके लिए ‘सहायता राशी’ इकट्ठा करते हैं। दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ काम करने वाली ईसाई और इस्लामिक संस्थाएं भी इन्हें काफी पैसा देती हैं। कभी आपने सोचा कि नक्सली इलाकों में ईसाई मिशनरियों पर कोई हमला क्यों नहीं होता? सिर्फ पुलिस, सुरक्षा बल या उनके कथित मुखबिर ही क्यों इनका शिकार बनते हैं?

शहरी नक्सलियों के काम करने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। लेकिन ये लोग आमतौर से पहले पिछड़ी बस्तियों में जनकल्याण के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोलते हैं। धीरे-धीरे ये लोगों में आक्रोश भड़काते हैं या अगर कोई मसला पहले से ही गर्म हो तो उसमें आग में घी डालने का काम करते हैं। देसी-विदेशी मीडिया, विश्वविद्यालयों, मानवाधिकार संगठनों आदि में बैठे इनके साथी तत्परता से इनका साथ देते हैं और जनता के मन में चुनी हुई सरकार की छवि बिगाड़ने का सुनियोजित तरीके से षडयंत्र रचते हैं। पूरी कोशिश की जाती है कि लोगों का स्थापित व्यवस्था से मोहभंग हो और उसके प्रति आक्रोश बढ़े। आजकल शहरी नक्सली देश-दुनिया में मोदी सरकार की छवि बिगाड़ने और उसे मुस्लिम-दलित विरोधी करार देने की मुहिम छेड़े हुए हैं। इसके पीछे कारण ये है कि ये अपने अलगाववादियों, इस्लामिक आतंकियों और चर्च के नेटवर्क में दलितों को भी शामिल करना चाहते हैं। इसके लिए इन्होंने बहुत सोचे-समझे तरीके से दलित संगठनों में पैठ भी बना ली है। तथाकथित दलित रोहित वेमूला प्रकरण दलितों को भड़काने और उन्हें अपने साथ लाने की साजिश ही तो थी। दुख की बात है कि मुख्यधारा के दलों ने भी इस साजिश में इनका साथ दिया।

नक्सली, दलितों में पहुंच बनाने और उन्हें भड़काने को कोई मौका नहीं छोड़ते। भीमा कोरेगांव में इसी नाम से 200 साल पहले लड़े गए युद्ध की वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद, सुधीर धवले आदि के भड़काऊ भाषणों के बाद फैली सुनियोजित हिंसा इसका जीता-जागता सबूत है। इस मामले में पुलिस की चार्जशीट आंखें खोलने वाली है। इसके मुताबिक नक्सली कई महीनों से इसकी तैयारी कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर को खास तौर पर चुना क्योेंकि दलित भीमा कोरेगांव युद्ध को इसलिए याद करते हैं कि इसमें मूलतः दलित सैनिकों वाली ब्रिटिश सेना ने सवर्ण पेशवाओं की सेना को हराया था। अबकी बार इस युद्ध की 200वीं सालगिरह थी, और नक्सली इस अवसर का इस्तेमाल दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काने और अपने साथ लाने के लिए करना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए भड़काऊ पोस्टर लगाए, पर्चे बांटे और आखिर में उग्र भाषण करवाए और उसके बाद सुनियोजित हिंसा की गई, अफवाहें फैलाई गईं और जितना हो सकता था, दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काया गया और उनसे दूर किया गया।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विलसन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

इस मामले में में दायर चार्जशीट में संलग्न दस्तावेज शहरी नक्सलियों के काम-काज, उनके सहयोगियों और उनके इरादों पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। एक पत्र में एक कामरेड दूसरे को बता रहा है कि ‘वरिष्ठ कामरेड’ ने ‘कांग्रेस में अपने मित्रों’ से बात कर ली है और वो सवर्ण विरोधी षडयंत्र के लिए पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। एक पत्र में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की हत्या के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि उनके लिए भी वैसा ही षडयंत्र हो जैसा राजीव गांधी की हत्या के लिए किया गया था। यानी उन्हें किसी सार्वजनिक समारोह में मौका मिलते ही खत्म कर दिया जाए।

भीमा कोरेगांव प्रकरण में शहरी नक्सलियों की गिरफ्तारी और उनके षडयंत्र का भंडाफोड़ होने के बाद, देश-विदेश में इनके समर्थक इनके बचाव में उतर पड़े। इन्हें दलित अधिकार कार्यकर्ता बताया गया और दावा किया गया कि ‘दलित विरोधी, सवर्णवादी’ मोदी सरकार इनकी आवाज दबाने और इन्हें फंसाने की कोशिश कर रही है। इन्हें मानवाधिकारों का मसीहा बताया जा रहा है, जबकि असलियत ये है कि सिर्फ ये पांच ही नहीं, नक्सलियों को पूरा गैंग, संविधान में नागरिकों को दिए गए अधिकारों का दुरूपयोग देश तोड़ने और बदनाम करने में करता है। ये ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘मानवाधिकारों’ के सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं, जबकि हकीकत में ये सबसे पहले इनका गला घोंटते हैं। ये अपने अधिकार वाले इलाके में विकास के हर काम में बाधा डालते हैं, पुलिस थानांे, रेलवे स्टेशनों, बिजली कें खंभों, स्कूलों, सड़कों को डायनामाइट से उड़ा देते हैं। इनकी अपनी अदालतें चलती हैं जिनमें दोषियों और सरकार के मुखबिरों को सबक सिखाने के लिए दिल दहलाने वाली क्रूर सजाएं दी जाती हैं।

नक्सली और शहरों में उनके प्रतिनिधि तो देश के लिए घातक हैं हीं, उससे भी ज्यादा खतरनाक ये है कि कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, आम आदमी पार्टी जैसी मुख्यधारा की पार्टियां, अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए इनसे समझौता कर चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर इनका बचाव भी करती हैं। नक्सली जिग्नेश मेवानी और राहुल गांधी का रिश्ता किसी से छुपा नहीं है। दूर जाने की आवश्यकता नहीं, कुछ समय पहले हुए गुजरात और कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस ने नक्सलियोें, पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों और चर्च का जैसा इस्तमेमाल, उसे सबने देखा। कुछ वर्ष पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलियों को सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, क्या ये चिंता की बात नहीं कि आज उसी पार्टी के अध्यक्ष नक्सलियों की ढाल बन कर खड़े हो गए है?

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