‘चीनः दोस्ती के साथ दृढ़ता और स्पष्टता भी आवश्यक’ in Punjab Kesari

भारत के पड़ोसी देश श्री लंका में चीन जो खेल खेल रहा है, उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। चीन के हाथों बिके श्री लंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला श्रीसेना ने जब नौ नवंबर को संसद भंग की तो अमेरिका, इंग्लैंड सहित अनेक देशों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे लोकतंत्र के लिए घातक बताया। लेकिन भारत का रूख ‘देखो और प्रतीक्षा करो’ का रहा। भारत को लग रहा है कि ऐसे समय में जब भारत और चीन के रिश्ते सुधरते दिखाई दे रहे हैं, भारत को श्री लंका के घटनाक्रम के बारे में संयम से काम लेना चाहिए। भारत को ये भी लग रहा है कि पीड़ित पक्ष इस मामले को अवश्य ही अदालत में ले जाएगा, ऐसे में अदालती फैसले का इंतजार भी करना चाहिए।

भारत का रवैया कूटनीतिक दृष्टि से किसी हद तक सही हो सकता है, लेकिन देशहित की दृष्टि से ये जोखिम भरा भी हो सकता है। ध्यान रहे जब चीन तिब्बत पर कब्जा कर रहा था, तब जवाहरलाल नेहरू ऐसी ही पशोपेश में थे, हालांकि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने इसके बारे में उन्हें बाकायदा पत्र लिख कर चेताया था। मोदी सरकार को पड़ोसी देशों में चीन की हरकतों के बारे में स्पष्ट रूख अपनाना चाहिए। आखिर चीन हमारे पड़ोसी देशों में जो कुछ करता है या करेगा, उसका प्रभाव दीर्घकाल में ही नहीं, अल्पकाल में भी हमारे सामरिक और रणनीतिक हितों पर पड़ेगा। वैसे भी चीन पड़ोसी देशों में जो चालें चल रहा है, उसका सीधा निशाना भारत ही है। भारत उन्हें नजरअंदाज कैसे कर सकता है?

भारत के अन्य पड़ोसी देशों में चीनी घुसपैठ के बारे में बात करें, उससे पहले श्रीलंका के बारे में आपको कुछ जानकारी दे दें। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार श्री लंका में बर्खास्त प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे और चीनी दलाल राष्ट्रपति श्रीसेना में ताजा टकराव तब आरंभ हुआ जब विक्रमसिंघे ने इस बात पर जोर दिया कि कोलंबो पोर्ट पर एक कंटेनर टर्मिनल बनाने का ठेका भारत-जापान के संयुक्त उपक्रम को दिया जाए जिसके बारे में समझौते (मेमोरंेडम आॅफ अंडरस्टैंडिंग, एमओयू) पर पहले ही हस्ताक्षर किए जा चुके थे। विक्रमसिंघे ने स्वीकार किया है कि पिछले महीने मंत्रिमंडल की बैठक में इस विषय को लेकर उनके और राष्ट्रपति के बीच में गहमागहमी हुई थी। इस सौदे को भारत-जापान उपक्रम को न देने के संबंध में एक दस्तावेज भी रखा गया था जिससे इस बात को हवा मिली कि इस पूरे मामले में एक विदेशी हाथ (चीन) भी शामिल है।

आपको याद दिला दें कि पिछले महीने 18 तारीख को जब विक्रमसिंघे तीन दिवसीय भारत यात्रा पर आए थे तब उससे ठीक दो दिन पहले यानी 16 अक्तूबर को राष्ट्रपति श्रीसेना ने आरोप लगाया था कि भारत की खुफिया एजेंसी राॅ उनकी हत्या की योजना बना रही है, हालांकि अगले ही दिन उन्होंने इसका खंडन भी कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति ने विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया जबकि वर्ष 2015 में पारित संविधान के 19वें संशोधन के अनुसार राष्ट्रपति अपनी मर्जी से प्रधानमंत्री को बर्खास्त नहीं कर सकता। राष्ट्रपति ने न सिर्फ अपनी मर्जी से संवैधानिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री को बर्खास्त किया, बल्कि उनकी जगह पर चीन के करीब माने जाने वाले विवादास्पद महींदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री भी बना दिया। जब उन्हें लगा कि राजपक्षे संसद में बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे तो उन्होंने संसद को ही भंग कर दिया और 5 जनवरी को चुनाव करवाने की घोषणा कर दी।

राष्ट्रपति श्रीसेना एक के बाद एक असंवैधानिक काम करते रहे, लेकिन ‘देखो और प्रतीक्षा करो’ की नीति अपनाते हुए भारत चुपचाप बैठा रहा। अभी बहुत दिन नहीं बीते जब हमने ऐसा ही खेल मालदीव में भी देखा था जब चीन परस्त राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने सुप्रीम कोर्ट के दो जजों को अपने खिलाफ फैसला सुनाने के लिए गिरफ्तार कर लिया था और इमरजैंसी लगा दी थी। पाकिस्तान की बात करना तो बेमानी है। लेकिन कहना तो होगा कि भारत के विरोध में वो इतना अंधा हो गया है कि उसने अपनी संप्रभुता ही चीन के हाथों गिरवी रख दी है। सोचने की बात है कि आज चीन पाकिस्तान को ढाल बना कर वहां जो खेल खेल रहा है और हथियार सप्लाई कर रहा है, उसका निशाना भारत नहीं तो और कौन है? यही हाल नेपाल का है जहां चीन परस्त प्रधानमंत्री खडग प्रसाद ओली न केवल पाकिस्तान की तरह चीन की महत्वाकांक्षी योजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ का हिस्सा बनने के लिए तैयार हैं, बल्कि उसे भारत के खिलाफ हर रणनीतिक और सामरिक सहायता देने के लिए भी तत्पर हैं। म्यांमार की कहानी भी अलग नहीं है। वो न केवल ‘वन बेल्ट, वन रोड’ का हिस्सा बन चुका है, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर क्याकप्यू में बंदरगाह बनाने के लिए चीन के साथ कुछ दिन पहले नौ नवंबर को समझौता भी कर चुका है।

म्यांमार में क्याकप्यू के साथ ही, चीन का भारत को हर ओर से घेरने का सपना पूरा हो गया है। भारत के पूर्व में अगर क्याकप्यू है तो दक्षिण में श्री लंका में हंबनटोटा है और पश्चिम में पाकिस्तान में ग्वादर। ऊपरी तौर पर चीन दावा करता है कि वो इन बंदरगाहों का इस्तेमाल व्यापारिक उद्देश्यों के लिए करेगा, लेकिन क्या गारंटी है कि जरूरत पड़ने पर वो इनका सामरिक प्रयोग नहीं करेगा? स्पष्ट है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से वूहान की अनौपचारिक बातचीत में भले ही मीठी-मीठी बातें की हों, परंतु चीन अपने दूरगामी रणनीतिक और सामरिक हितों से समझौता करने के लिए तैयार नहीं है जिसका एक हिस्सा भारत को चारों ओर से घेरना भी है।

ऐसे में भारत के लिए स्थिति और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि यहां देश के भीतर भी चीनी एजेंटों की कमी नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टियों और नक्सलियों की चीन से नजदीकी कोई छुपी नहीं है। समय-समय पर स्वयं भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर चीन से सांठगांठ का आरोप लगाती रही है।

ये सही है कि चीन अमेरिकी धमकियोें और व्यापार युद्ध के कारण भारत, जापान आदि देशों के प्रति थोड़ी नरमी दिखा रहा है, लेकिन इसे स्थायी नहीं माना जा सकता। चीन ने वर्ष 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य सुपरपावर बनने का लक्ष्य रखा है और वो इस ओर बिना डिगे चल रहा है। ऐसे में भारत के समक्ष एकमात्र विकल्प यही है कि वो अपने आर्थिक हितों की रक्षा के साथ ही रणनीतिक और सामरिक हितों के प्रति भी सजग रहे। चीन के प्रति नरमी बरतने की जगह उसे सख्ती और स्पटता से बताता रहे कि वो उसकी साजिशों को लेकर सजग है और आवश्यकता हुई तो उनके खिलाफ कदम भी उठाएगा।

चलते-चलते एक बात स्पष्ट कर दें कि चीन अपने हितों के आगे दुनिया के किसी कानून को मानने के लिए तैयार नहीं है। इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस ने साउथ चाइना सी पर उसका स्वामित्व मानने से इनकार कर दिया, परंतु वो अब भी वहां कब्जा जमा कर बैठा है। अंतरराष्ट्रीय राजनय में भी वो किसी नैतिकता को नहीं मानता। उसके पास अपार धन है और वो हर उस नेता को खरीदने के लिए तैयार है जो पैसों की खातिर उसके लिए काम करना चाहता है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने पैसा कमाने के लिए फर्जी पूंजीवाद गढ़ लिया है जो पूंजीवाद के कायदे-कानूनों को नहीं मानता, जिसका एकमात्र लक्ष्य है पैसा कमाना और दुनिया पर अपना रूतबा कायम करना। इसके लिए वो किसी भी सीमा तक जा सकता है।

ऐसे में मोदी सरकार के लिए सतर्क रहना ही एकमात्र विकल्प है। भारत-चीन संबंधों का इतिहास और चीन की वर्तमान नीतियों को देखते हुए बेहतर होगा कि भारत अपनी सुरक्षा तथा रणनीतिक और सामरिक हितों के लिए दीर्घकालिक नीति बनाए और उसपर गंभीरता से अमल करे। अमेरिका ने जिस प्रकार ईरान और रूस से जुड़े मामलों में भारत को छूट दी है, उससे ये स्पष्ट है कि वो चीन के खिलाफ भारत के साथ रणनीतिक भागीदारी के प्रति वास्तव में गंभीर है। हाल ही में जब प्रधानमंत्री मोदी जापान गए तब वहां भी ऐसी ही सोच दिखाई दी। भारत को इस रणनीतिक समझ को अमेरिका, जापान ही नहीं आॅस्ट्रेलिया और आसियान सहित दुनिया भर के देशों के साथ साझा और गहरा करना होगा। चीन की दादागिरी और अवैध दौलत का एक ही तोड़ है – दुनिया के देशों को उसके नापाक इरादों के प्रति सजग करना और उन्हें एकजुट करना।

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