चीन के साथ संयम ही नहीं, दृढ़ता और स्पष्टता भी आवश्यक in Punjab kesari

फरवरी 14 को पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 जवानों की शहादत के बाद एक ओर तो केंद्र सरकार पाकी सेना के बगल बच्चे जैश-ए-मौहम्मद को सबक सिखाने की योजना बना रही थी, तो लगभग उसी समय उŸार पूर्वी सीमा पर भारत के अनुरोध पर म्यांमार की सेना आतंकी अराकान आर्मी के लगभग 12 बड़े शिविरों को तबाह कर रही थी। ये अभियान मिजोरम से सटे म्यांमार के चिन प्रांत में चलाया गया। अराकान आर्मी के कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी से घनिष्ठ संबंध है जो चीन के काफी करीब समझी जाती है। इससे पहले जनवरी में म्यांमार सेना ने सागैंग डिवीजन के टैगा क्षेत्र में सफाई अभियान चलाया जहां भारत विरोधी आतंकी संगठनों जैसे एनएससीएन (खापलांग) का मुख्यालय और उल्फा (आई), एनडीएफबी (एफ) तथा अनेक मणिपुरी विद्रोही गुटों के शिविर थे।

भारत के अनुरोध पर म्यांमार सेना ने अराकान आर्मी के शिविरों को ध्वस्त किया क्यांेकि ये कोलकाता बंदरगाह को म्यांमार के सितवे बंदरगाह और आगे जल तथा थल मार्ग से मिजोरम को जोड़ने वाली कलादान परियोजना में रोड़े अटका रही थी और अवैध उगाही कर रही थी। ध्यान रहे अराकान आर्मी वही आतंकी संगठन है जिसने वर्ष 2016 में म्यांमार के राखाइन प्रांत में सेना और और पुलिस के शिविरों पर हमला किया था जिसके बाद सेना की जवाबी कार्रवाई में बड़ी तादाद में मुस्लिम रोहिंग्याओं को अपना घरबार छोड़ना पड़ा था। अराकान आतंकी म्यांमार सेना के साथ ही बांग्लादेश की सेना से उलझते रहते हैं। समझा जाता है कि चीन के साथ ही, पाकिस्तानी आतंकी खुफिया संगठन आईएसआई भी इन्हें प्रशिक्षण और हथियार देती है। एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तानी शहर कराची में चार लाख से अधिक रोहिंग्या रहते हैं जहां आईएसआई इन्हें आतंकी प्रशिक्षण देती है।

उŸार भारतीय मीडिया पाकिस्तान से जुड़ी घटनाओं को तो खासी तवज्जो देता है लेकिन उŸार पूर्व भारत में चल रही अलगाववादी और आतंकी घटनाओं से मुंह फेरे रखता है। अरकान आर्मी के खिलाफ म्यांमार सेना का अभियान और उसे भारतीय सेना का समर्थन पाकिस्तान में की गई सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक से कम महत्पूर्ण नहीं थे, लेकिन मीडिया में इसे वो महत्व नहीं मिला जो मिलना चाहिए था। मीडिया ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में चीन द्वारा द्वारा लगाई गई रूकावटों पर तो बहुत चर्चा की लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया की उŸार पूर्व में चीन क्या कर रहा है। असल में अराकान आर्मी के शिविरों पर हमला सीधे चीन को चेतावनी है जो इसे सक्रिय समर्थन देता है। चीन की शह पर ही अराकान आर्मी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण भारतीय विकास परियोजनाओं में बाधा डाल रही थी या कहें कि उन्हें नष्ट करने का षडयंत्र रच रही थी।

आखिर चीन अराकान आर्मी को समर्थन क्यों दे रहा है। इसका जवाब सीधा सा है – चीन नहीं चाहता कि म्यांमार मंे भारत का प्रभाव बढ़े। चीन वहां अपनी महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड योजना के तहत अनेक परियोजनाएं स्थापित कर रहा है। वह नहीं चाहता कि भारतीय परियोजनाएं उनसे प्रतिस्पर्धा करें। चीन म्यांमार में कुछ सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजनाएं भी विकसित कर रहा है जिनमें से एक है बंगाल की खाड़ी में क्याउकप्यू बंदरगाह परियोजना। भारत मानता है कि चीन इसके और चिटगांव बंदरगाह (बांग्लादेश), हंबनटोटा बंदरगाह (श्रीलंका), ग्वादर बंदरगाह (पाकिस्तान) परियोजनाओं आदि के जरिए भारत को घेरना चाहता है और सामरिक, रणनीतिक और व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हिंद महासागर क्षेत्र मंे अपना वर्चस्व बढ़ाना चाहता है। स्पष्ट है कि चीन, भारत द्वारा म्यांमार में बनाए जा रहे सितवे बंदरगाह को अपने क्याउकप्यू बंदरगाह के लिए खतरा मानता है। चीन सीधे-सीधे तो भारत को मना नहीं कर सकता क्यांेकि भारत म्यांमार की सहमति से ही परियोजनाएं विकसित कर रहा है। इसलिए चीन अपने प्राॅक्सियों द्वारा भारत को धमकाना चाहता है।

स्पष्ट है कि अगर भारत ने बालाकोट में सीधे पाकिस्तान को चुनौती दी है तो उŸार पूर्व भारत में चीन को। मजे की बात ये है कि दोनों ही भारत के खिलाफ प्राॅक्सियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। यही वजह है कि जब भारतीय वायु सेना ने बालाकोट में और म्यांमार सेना ने भारतीय सेना के सहायोग से चिन प्रांत में कार्रवाई की तो चीन भारत पर कोई आरोप नहीं लगा पाया। जब फ्रांस ने पुलवामा हमले के आरोपी जैश-ए-मौहम्मद प्रमुख मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव रखा तो उसके अतिरिक्त अन्य स्थायी और अस्थायी सदस्यों द्वारा इसका समर्थन करने के बावजूद उसने इसमें रोड़ा अटकाया।

इस कदम से चीन भले ही अपने सदाबहार दोस्त को कुछ सांत्वना दे पाया हो, लेकिन दुनिया में इसका कड़ा विरोध हुआ और पाकिस्तान के साथ ही चीन भी विश्व मंच पर अकेला पड़ गया। भारत ने कहा कि उसे चीन के रवैये से निराशा हुई तो फ्रांस, अमेरिका और इंग्लैंड ने कहा कि वो इस संबंध में अन्य विकल्प तलाशेंगे। फ्रांस ने तो अपने देश में मसूद अजहर की संपŸिा जब्त करने और बैंक खाते जब्त करने की घोषणा तक कर दी। विश्व मंच पर हुई फजीहत से घबराए चीन ने सफाई दी है कि अभी उसने इस प्रस्ताव को ‘टैक्निकल होल्ड’ पर डाला है और वो इसके सभी पहलुओं पर विचार कर रहा है। भारत में चीन के राजदूत लो झांगउई ने कहा, “मुझ पर विश्वास करें ये मसला (मसूद अजहर) हल कर लिया जाएगा। इसे सिर्फ टैक्निकल होल्ड पर रखा गया है जिसका अर्थ है कि अभी सलाह-मश्विरे के लिए समय बाकी है“।

चीन इस मामले में आखिरकार वीटो का इस्तेमाल करेगा या मसूद अजहर पर फ्रांस के प्रस्ताव को मान्यता देगा ये तो चीन ही बता पाएगा, लेकिन भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वो इस मामले में संयम से काम लेगी।

मसूद अजहर मामले को ‘टैक्निकल होल्ड’ पर डालने पर भारत में स्वाभाविक तौर पर कड़ी प्रतिक्रिया हुई। लोगों ने खुलकर चीन के प्रति अपने गुस्से का इजहार किया और अनेक संस्थाओं ने तो चीनी समान के बहिष्कार की धमकी तक दे डाली। डोकलाम विवाद और मानसरोवर यात्रा के दौरान चीनी अधिकारियों से गुपचुप बैठकें करने वाले राहुल गांधी और उनकी पार्टी अनावश्यक रूप से हमलावार हो उठी और प्रधानमंत्री मोदी पर चीनी राष्ट्रपति के सामने घुटने टेकने और कमजोर होने के बचकाने आरोप लगाने लगी। वो ये भूल गई कि चीन ने ये हरकत पहली नहीं, चैथी बार की है। जब 2009 में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव लाई थी तब भी चीन ने उस पर वीटो किया था और दुनिया के किसी देश ने भारत का साथ नहीं दिया था। आज चीन को छोड़ कर पूरी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद भारत के साथ खड़ी है। ये मोदी सरकार की विफलता नहीं, बड़ी सफलता है जिसने जिद्दी चीन को भी विश्व पटल पर अलग-थलग कर दिया है।

चीन जहां भारत को उलझाए रखने के लिए की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और उसके आतंकियों को बढ़ावा देता है, वहीं उŸार पूर्व में विभिन्न अलगाववादी आतंकी संगठनों और म्यांमार स्थित आतंकी गुटों का इस्तेमाल करता है। इसके चलते भारत को तीन मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है – पाकिस्तान, चीन और भारत में चीनी-पाकी लाॅबी जिसमें नक्सली, तरह-तरह के कम्युनिस्ट, अनेक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता, गैरसरकारी संगठन, मीडियाकर्मी आदि शामिल हैं।

सवाल ये है कि इनसे कैसे निपटा जाए? जवाब तो इसके कई हैं, लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि भारत संयम से काम ले और हड़बड़ी में कोई ऐसा कदम ने उठा ले जो अंततः चीनी-पाकी लाॅबी की ही मदद करे जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से इन देशों को भारत की चुनावी राजनीति और लोकतंत्र में दखलअंदाजी करने का मौका देती है। भारत और चीन मंे करीब 82 अरब डाॅलर का व्यापार होता है जिसमें व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है। इसके बरक्स पाकिस्तान चीन में मुश्किल से 20 अरब डाॅलर का व्यापार होता है। अगर भारतीय चीनी वस्तुओं का बहिष्कार करते हैं तो इससे निःसंदेह चीन का नुकासान पहुंचेगा। लेकिन ध्यान रहे चीन के लिए आर्थिक हितों से अधिक दीर्घकालिक सामरिक हित अधिक महत्वपूर्ण हैं जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। बहरहाल चीन भारत पर सीधे हमला नहीं कर रहा, इसलिए भारत को भी नहीं चाहिए कि वो उससे सीधे पंगा ले। अलबŸाा भारत भी चीन की तरह उसके खिलाफ प्राॅक्सी का इस्तेमाल कर सकता है।

चीन, पाक अधिकृत कश्मीर मंे चाइना पाकिस्तान इकाॅनोमिक काॅरीडोर योजना के तहत कई परियोजनाएं विकसित कर रहा है। भारत इनका विरोध कर रहा है क्यांेकि वो इसे अपना हिस्सा मानता है। चीनी धमकियों और प्राॅक्सी वाॅर के पीछे संभवतः एक प्रमुख कारण ये भी है कि वो भारत से अनेक मोर्चों पर सौदेबाजी करना चाहता है। लेकिन भारत को उसे स्पष्ट कर देना चाहिए कि वो भौगोलिक संप्रभुता और अखंडता पर कोई समझौता नहीं करेगा। भारत चीन-पाकिस्तान की प्राॅक्सी वाॅर से भी नहीं झुकेगा और जरूरत पड़ने पर इसका माकूल जवाब देगा। मोदी सरकार अनेक अवसरों पर इसका स्पष्ट संकेत भी दे चुकी है।

असल में चीन 2050 तक सामरिक-आर्थिक दृष्टि से दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनना चाहता है और इसके लिए उसके पास रोडमैप भी तैयार है। भारत, चीन को उसकी सीमा के भीतर ताकत बढ़ाने से नहीं रोक सकता और न ही वो उसके और दूसरे देशों के समझौतों पर सवाल उठा सकता है। लेकिन भारत को चीन को ये स्पष्ट करना होगा कि भारत उसके व्यापारिक विस्तार का हामी है और इसमें भागीदार भी बनना चाहेगा लेकिन वो उसकी सामरिक-रणनीतिक दादागिरी को नहीं सहेगा और जरूरत पड़ी तो इसके लिए अन्य महाशक्तियों के साथ मिलकर विकल्प भी विकसित करेगा जिसके लिए योजनाएं पहले ही तैयार की जा चुकी हैं।

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