“चीन पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है क्वाड्रीलेटरल, अपनी शर्तों पर इसका समर्थन करे भारत” in Punjab Kesari

वक्त की नई करवट के साथ अंतरराष्ट्रीय राजनय में नए समीकरणों की आहट भी सुनाई देने लगी है। सोवियत रूस के धराशायी होने के बाद माना जाने लगा कि अमेरिका विश्व की एकमात्र सुपर पावर है और दुनिया में उसका सिक्का चलता है। लेकिन रूस इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। अमेरिका के आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को सीमित करने और दुनिया को बहुध्रुवीय बनाए रखने के लिए शीत युद्ध से उबर रहे रूस ने दो महत्वपूर्ण संगठनों की परिकल्पना की। वर्ष 1993 में रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने रिक (रशिया, इंडिया, चाइना ट्राइलेटरल) का खाका पेश किया। हालांकि इसका पहला शिखर सम्मेलन वर्ष 2000 में ही हो पाया। वर्ष 1996 में पांच देशों – चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रशिया और तजाकिस्तान ने शंघाई काॅआॅपरेशन आॅर्गनाइजेशन की स्थापना की। इसका मूल उद्देश्य था शंघाई के सीमांत इलाके में सैन्य विश्वास विकसित करना और सीमा विवादों को शांति से हल करना। इन देशों ने सीमांत इलाकों में सैन्य बल कम करने के लिए 24 अप्रैल 1997 को एक समझौते पर भी हस्ताक्षर किए। इसी साल 20 मई को रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और चीनी प्रधानमंत्री जियांग जेमिन ने ‘मल्टीपोलर वल्र्ड’ (बहुध्रुवीय विश्व) के समझौते पर हस्ताक्षर किए। वर्ष 2017 में भारत और पाकिस्तान भी इसके पूणकालिक सदस्य बन गए।

लंबे अर्से तक अमेरिकी ये सोचते रहे कि सोवियत रूस जैसे चीन भी धीरे-धीरे ध्वस्त हो जाएगा। वर्ष 2002 में वहां एक किताब भी आई जिसका शीर्षक था – चाइना कोलेप्स थ्योरी (चीन के पतन का सिद्धांत)। लेकिन ये थ्योरी फेल हो गई। अगले आठ साल में चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। यही नहीं 2002 से 2017 के बीच चीन का सकल घरेलू उत्पाद तिगुना हो गया।

तेजी से उभरते चीन ने दुनिया का महानतम देश बनने का लक्ष्य रखा है। इसे ध्यान में रखते हुए चीन ने दुनिया की सुपर पावर अमेरिका के साथ वर्चस्व साझा करने, परस्पर सहयोग बढ़ाने और अपने लक्ष्य को धीरे-धीरे अमली जामा पहनाने के लिए कई प्रस्ताव किए जिन्हें अमेरिका ने निरस्त कर दिया। चीन ने जो प्रस्ताव किए उनमें संभवतः सबसे पहला था वन बेल्ट, वन रोड इनीशिएटिव। इस परियोजना के बारे में पिछले पांच साल से सुगबुगाहट चल रही है। हालांकि इसका पहला महासम्मेलन इसी वर्ष बीजिंग में हुआ, अमेरिका ने इसमें अपना प्रतिनिधिमंडल भी भेजा लेकिन इसमें भागीदारी का कोई वादा नहीं किया। इसकी खास वजह रही परियोजना की अस्पष्टता और चीन का अंधा स्वार्थीपन। चीन ने इसके लिए विवादास्पद क्षेत्रों में जाने से भी परहेज नहीं किया। पाक अधिकृत कश्मीर को भारत अपना हिस्सा मानता है, लेकिन चीन ने वहां भी चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर बना डाला जो वन बेल्ट वन रोड का ही एक हिस्सा है। श्रीलंका और ग्रीस में चीन के व्यवहार से भी अमेरिका नाराज हुआ। चीन ने श्रीलंका और चीन को ऊंची दरों पर ऋण दिया और जब वो इसे अदा नहीं कर पाए तो उनके महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर कब्जा कर लिया। चीन ने तो ग्रीस पर यहा तक दबाव डाला कि वो उससे संबंधित यूरापियन यूनियन के मानवाधिकार हनन के प्रस्तावों को बाधित करे।

चीन का दूसरा प्रस्ताव रहा – ‘न्यू माॅडल आॅफ ग्रेट पाॅवर रिलेशंस’ (शक्ति के महान संबंधों का नया माॅडल)। शी जिनपिंग के इस व्यक्तिगत प्रस्ताव पर अमेरिका के कुछ राजनयिकों ने विचार का प्रस्ताव किया, लेकिन ‘माॅडल’ की अस्पष्टता के कारण ये भी ठंडे बस्ते में चला गया। इसके निरस्त होने का एक बड़ा कारण चीन की अजीबो-गरीब अपेक्षा भी थी कि यदि चीन किसी अमेरिकी सहयोगी पर हमला करता है तो अमेरिका उसके बचाव में नहीं आएगा। ये एक तरह से चीन का वर्चस्व स्वीकार करने जैसा था। एशिया में अपना कब्जा बनाने के लिए चीन का एक अन्य प्रस्ताव था – ‘एशिया फाॅर एशियंस’ (एशिया एशियाई लोगों के लिए)। अमेरिका ने इसे भी अस्वीकार कर दिया। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘कम्युनिटी आॅफ काॅमन डेस्टिनी’ (साझा नियति का समुदाय) नाम से प्रस्ताव दिया। लेकिन इसमें न तो ये स्पष्ट था कि ‘कम्युनिटी’ में कौन से देश शामिल होंगे और न ही ‘डेस्टिनी’ का अर्थ। लेकिन अमेरिका को लगा कि इसके तहत चीन अपने नेतृत्व में विश्व की ‘नियति’ निर्धारित करना चाहता है। इसलिए ये प्रस्ताव भी सिरे नहीं चढ़ पाया।

लेकिन अब तक अमेरिका को चीनी प्रस्ताव और उनके निहितार्थ अच्छी तरह समझ आने लगे थे। साथ ही यह भी समझ आ गया था कि चीन का उदय काल्पनिक नहीं बल्कि वास्तविक है। अमेरिका ने अब न केवल चीन के अभ्युदय में सहायक बनीं पक्षपाती आर्थिक-व्यापारिक नीतियों का विश्लेषण और विरोध शुरू किया, बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की जगह भारतीय-प्रशांत क्षेत्र शब्दावली का प्रयोग शुरू किया। इसका सीधा सा उद्देश्य चीन को ये संकेत देना था कि अमेरिका एशिया में चीन के एकछत्र प्रभुत्व को मान्यता नहीं देता। अगर वन बेल्ट वन रोड के तहत चीन भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कब्जा जमाने की कोशिश करेगा तो भारत की मदद से उसका सामना किया जाएगा। इसी सिलसिले में बराक ओबामा ने भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी घोषित किया जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने और मजबूती से दोहराया। ट्रंप ने तो अपनी नयी दक्षिण एशिया नीति में चीन के सदाबहार दोस्त पाकिस्तान पर भी नकेल कसी और अफगानिस्तान में भारत को और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार किया।

अपनी पहली एशिया यात्रा में, जिसमें चीन के साथ जापान, साउथ कोरिया, वियतनाम और फिलीपींस भी शामिल थे, ट्रंप ने अपने इरादे स्पष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चीन जैसे भारत के खिलाफ पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है, वैसे ही अमेरिका को धमकाने के लिए उत्तर कोरिया का। ट्रंप ने उसके दुःसाहस के लिए भी सीधे चीन को जिम्मेदार ठहराया और उस पर लगाम लगाने की मांग की।

अब समय का पहिया लगभग पूरा घूम चुका है। पहले जहां रूस और चीन अमेरिका पर लगाम लगाने के लिए संधियां कर रहे थे वहीं अब अमेरिका, एशिया में चीन पर लगाम लगाने के लिए नए गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहा है। इस श्रंखला में जो सबसे महत्वपूर्ण गठबंधन उभर कर सामने आ रहा है वो है आॅस्ट्रेलिया, जापान, भारत और अमेरिका का क्वाड्रिलेटरल या संक्षेप में क्वाड। क्वाड्रिलेटरल का अर्थ होता है चार भुजाओं वाला। उम्मीद की जा रही है कि क्वाड चीन की महत्वकांक्षी ओबीओआर परियोजना को तो चुनौती देगा ही, भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दखलअंदाजी और सैन्य विस्तारवाद पर भी रोक लगाएगा और उसपर निगाह रखेगा।

अमेरिका क्वाड के लिए भारत, जापान और आॅस्ट्रेलिया को हर तरह की मदद देने के लिए तैयार है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ये अमेरिका की हथियार बेचने की चाल है। लेकिन ओबीओआर के नाम पर चीन की अब तक की हरकतों को देखते हुए लगता है कि हाथ पर हाथ रखे नहीं बैठा जा सकता और इसका मजबूत अंतरराष्ट्रीय विकल्प तैयार करना जरूरी है ताकि क्वाड के सिर्फ चार देश ही नही,ं जापान से अमेरिका तक पूरी दुनिया में कानून सम्मत, न्यायपूर्ण तरीके से व्यापार किया जा सके। ओबीओआर के नाम पर जहां चीन जहां समुद्री मार्गों पर मनमाने तरीके से कब्जा करने की कोशिश कर रहा है वहीं म्यांमार, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल आदि में विवादास्पद क्षेत्रों में घुस रहा है। ये व्यापार संवर्धन के नाम पर गरीब देशों को ऊंची दरों पर ़ऋण दे रहा है और जब ये देश ऋण चुकाने में असमर्थ हो रहे हैं तो उनकी जमीनों पर मनमानी शर्तों पर कब्जा कर रहा है। कुल जमा ये कि चीन अपने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार के दम पर आर्थिक उपनिवेशवाद को नए सिरे से बढ़ावा दे रहा है।

मोटे तौर पर क्वाड का लक्ष्य तो स्पष्ट है, पर इसकी बारीकियों का सामने आना अभी बाकी है। काफी समय तक तो क्वाड सिर्फ राजनयिक बातचीत और जुमलेबाजी तक सीमित रहा। इसे चीन का प्रभाव ही कहा जाएगा कि भारत जैसे देश इसकी आवश्यकता को महसूस करते हुए भी इससे जुड़ने से बचते रहे। इस वर्ष फिलीपींस में ईस्ट एशिया समिट के दौरान 12 नवंबर को चारों देश जापान की अध्यक्षता में इस विषय पर विचार करने बैठे। इसके बाद चारों देशों ने अलग-अलग बयान जारी किए लेकिन किसी ने भी अपने बयान में चीन का उल्लेख नहीं किया। बयानों से पता लगा कि बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में कानून सम्मत व्यवस्था, कनेक्टीविटी (संयोजकता), समुद्री सुरक्षा, नाॅर्थ कोरिया और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई। लेकिन अलग-अलग बयानों से साफ है कि चारों देशों को एक साझी कार्यसूची पर पहुंचना अभी बाकी है। बहरहाल भारत ने स्पष्ट किया कि वो अपनी एक्ट ईस्ट पाॅलिसी को भारतीय-प्रशांत क्षेत्र मंे अपनी नीति का मूल आधार बनाना चाहता है। भारत चाहता है कि इस क्षेत्र में आसियान देशों की केंद्रीय भूमिका बनी रहे। यहां दो बातें बताना चाहेंगे। एक – जब फिलीपींस में क्वाड पर बातचीत हो रही थी तब चारों देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी वहां मौजूद थे। दो – भारत ने 26 जनवरी की परेड में आसियान देशों के प्रमुखों को निमंत्रित किया है और उन्होंने निमंत्रण स्वीकार भी कर लिया है।

यदि चीन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए क्वाड बन गया तो इसका स्वरूप क्या होगा, इसका अधिकार क्षेत्र क्या होगा, जापान से अफ्रीका और अमेरिका तक विभिन्न देश इससे कैसे जुड़ेंगे, ये चीन के आर्थिक उपनिवेशवाद का कैसे जवाब देगा, ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनपर मंथन जारी है। ध्यान रहे जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे इस वर्ष सितंबर में भारत आए थे। उनकी यात्रा के दौरान भारत और जापान ने जो संयुक्त घोषणापत्र जारी किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि दोनों देश भारतीय-प्रशांत क्षेत्र को समृद्ध और उदार बनाने के लिए एक ऐसी मूल्य आधारित साझेदारी के प्रति समर्पित हैं जिसमें संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान किया जाता हो, विवादों को बातचीत से सुलझाया जाता हो, जहां छोटे और बड़े सभी देशों को बेरोकटोक समुद्री और हवाई यात्रा की छूट हो और वे टिकाऊ विकास और निद्र्वंंद्व, खुले, निष्पक्ष व्यापार और निवेश व्यवस्था का लाभ उठा सकें। भारत-जापान संयुक्त घोषणापत्र में जापान और अफ्रीका के बीच व्यापार मार्ग ढूंढने के प्रयासों का भी स्वागत किया गया।

ध्यान रहे कुछ दिनों बाद यानी 12 नवंबर को भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया त्रिपक्षीय समूह की बैठक भी हो रही है। इस समूह की पिछली तीन बैठकों में संयुक्त समुद्र व्यापार परियोजनाओं, सहयोग, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन आदि पर बातचीत हुई। आगामी बैठक में भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा वातावरण की समीक्षा तो होगी ही, साथ ही नाॅर्थ कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम के मद्दे नजर परमाणु विस्तार, समुद्र के जरिए फैलाए जा रहे आतंकवाद और इस क्षेत्र में समुद्री सीमा विवाद आदि पर भी चर्चा होगी।

भारत-जापान-आॅस्ट्रेलिया की वार्ता से ठीक एक दिन पहले रिक (रूस, इंडिया, चीन) की मंत्री स्तरीय बैठक भी होगी। यह बैठक इस वर्ष के आरंभ में ही होनी थी, लेकिन दलाई लामा के अरूणाचल यात्रा के विरोध में चीन ने इसे टाल दिया।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की दोनों बैठकों पर निगाह रहेगी। नई परिस्थितियों में भारत को भी संतुलन बनाकर चलना होगा। भारत का चीन के साथ लगभग सौ अरब डाॅलर का व्यापार है, पर ये भी हकीकत है कि पड़ोसी और विशाल बाजार होने के नाते चीन से सबसे ज्यादा खतरा भी भारत को ही है। भारत ने चाइना-पाकिस्तान काॅरीडोर के पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरने पर आपत्ति जताई है। आगामी रिक बैठक को देखते हुए चीन ने कहा है कि यदि भारत इसमें शामिल होता है तो वो इसका नाम बदल सकता है। भारत को ये प्रस्ताव मंजूर नहीं है क्योंकि चीन नाम बदलने के लिए भले तैयार दिखता हो, पर पाक अधिकृत कश्मीर से हटने के लिए नहीं।

जवाहरलाल नेहरू ने ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए गुटनिरपेक्षता की अवधारणा पर चलने का फैसला किया। लेकिन आज टकराव वैचारिक नहीं बल्कि व्यापारिक और सामरिक है। चीन आज अपनी विचारधारा के बल पर नहीं, पैसे के बल पर दुनिया का शोषण करना चाहता है। अच्छी बात है कि ऐसे समय में नरेंद्र मोदी हमारे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंनेे विदेशनीति को अधिक व्यावहारिक, सुदृढ़, धारदार, निर्णयात्मक और किन्हीं अर्थों में अधिक उदात्त, निर्भीक और स्पष्टवादी तथा पूरी तरह राष्ट्रसापेक्ष बना दिया है। अब विदेशनीति का आधार व्यक्तिगत सनक, राजनीतिक विचारधारा या किसी समुदाय का तुष्टिकरण नहीं बल्कि राष्ट्रहित है। अब विदेशनीति देश के आर्थिक, सामरिक विकास का औजार है। यह औजार है भारत के अंतरराष्ट्रीय अभ्युदय की बुनियाद तैयार करने का। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वो क्वाड्रीलेटरल में अवश्य शामिल हों लेकिन अपनी शर्तों पर।

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