“चुनाव घोषणापत्रः कांग्रेस का ‘हाथ’ देशद्रोहियों के साथ” in Punjab Kesari

कांग्रेस चुनाव घोषणापत्र – 2019 को लेकर काफी हंगामा बरपा है। कांग्रेस का कहना है कि विपक्षी दलों का काम है मीनमेख निकालना सो वो अपना काम कर रहे हैं। असल में घोषणापत्र में ऐसा कुछ नहीं है जिस पर आपत्ति की जाए। लेकिन क्या कांग्रेस की राय को आंख मूंद कर मान लेना चाहिए? हमारा मानना है कि इसका बारीकी से विश्लेषण होना चाहिए क्योंकि सारे अधोपतन के बावजूद वो अब भी देश की दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी है। कांग्रेस ने पिछले पांच साल के दौरान जैसी राजनीति की है, उसके कारण भी उसके घोषणापत्र के विश्लेषण की जरूरत बनती है। तो आइए एक पैनी निगाह डालते हैं कांग्रेस के घोषणापत्र के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर।

चाहे जवाहरलाल नेहरू और अन्य कई विश्वविद्यालयों में देशविरोधी नारे लगाने का मामला हो या भीमाकोरेगांव हिंसा का। पिछले पांच साल में कांग्रेस ने बेझिझक देशविरोधी तत्वों का साथ दिया है। विभिन्न कांग्रेसी नेताओं के नक्सलियों के साथ संबंधों के खुलासे हुए हैं। जिग्नेश मेवानी अब भी कांग्रेस के लिए प्रचार कर रहा है। यही नहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में अर्बन नक्सलियों का मुकदमा भी लड़ रहे हैं। इसके बावजूद ‘आंतरिक सुरक्षा’ के शीर्षक के तहत घोषणापत्र कहता है – “आंतरिक सुरक्षा को सबसे ज्यादा खतरा 1. आतंकवाद, 2. आतंकवादियों की घुसपैठ, 3. माओवादी नक्सलवाद, 4. जातीय, साम्प्रदायिक संघर्ष से है। कांग्रेस इन सभी खतरों से अलग-अलग तरीके सेनिपटेगी। हम आतंकवाद और आतंकी घुसपैठ को रोकने के लिए स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ कठोरतम उपाय करेंगे। माओवादीनक्सलवाद: माओवाद और नक्सलवाद से निपटने के लिए कांग्रेस दोहरी रणनीति अपनाएगी। हिसंक गतिविधियों को रोकने के लिए जहां एक तरफ कठोर कार्यवाही की जायेगी, वहीं दूसरी तरफ नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्य किये जायेंगे, जिससे कि प्रभावित क्षेत्र की जनता के साथ-साथ माओवादी कार्यकर्ताओं का दिल जीत कर उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सके।“

ध्यान दीजिए, पार्टी माओवादी आतंकियों को ‘कार्यकर्ता’ बता रही है और उनका दिल जीतने की बात कर रही है। सवाल ये है कि क्या पार्टी का नक्सली आतंकियों के खिलाफ वही रवैया होगा जो उसकी छत्तीसगढ़ सरकार का है या यूपीए सरकार का था? अगर ऐसा हुआ तो देश में नक्सलवाद के विस्तार का खतरा फिर से पैदा हो जाएगा। हम कैसे भूल सकते हैं कि एक तरफ तो मनमोहन सिंह नक्सलवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते थे तो दूसरी तरफ सोनिया गांधी की नेशनल एडवाइजरी काउंसिल में नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले लोगों की भरमार थी। हम कैसे भूल सकते हैं कि यूपीए के जमाने में कैसे कुख्यात अरूंधती राॅय और कश्मीरी आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी खुलेआम संवाददाता सम्मेलन करते थे। आज भी नक्सलियों के अनेक संदिग्ध सहयोगीछत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के बड़े पदों पर पहुंच चुके हैं। भीमाकोरेगांव मामले की चार्जशीट में कांग्रेस और नक्सलियों के संबंधों का विस्तार से विवरण दिया गया है। जाहिर है नक्सलियों के प्रति कांग्रेस का ढुलमुल रवैया अनेक चिंताओं को जन्म देता है।

‘कानून नियम और विनियमों की पुनःपरख’ शीर्षक के अंतर्गत घोषणापत्र कुछ विस्फोटक बातंे करता है। ये कहता है कि भारतीय आपराधिक संहिता की धारा 499 को हटा कर मानहानि को एक दिवानी अपराध बनाया जाएगा। क्या इसका अर्थ ये नहीं कि कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस प्रकार बिना सबूत प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाए हैं, वो उससे बचने के लिए सुरक्षा कवच तैयार कर रहे हंै। ध्यान रहे उद्योगपति अनिल अंबानी पहले ही राहुल गांधी पर बेसिरपैर के आरोप लगाने के लिए 5,000 करोड़ रूपए का मानहानि का मुकदमा ठोक चुके हैं। यही नहीं संघ को महात्मा गांधी का हत्यारा बताने पर भी उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा चल रहा है। क्या राहुल चाहते हैं कि सार्वजनिक जीवन में पूरी अराजकता फैल जाए और जिसके मुंह में जो आए वो बके और उसे सजा भी न मिले?

इसी शीर्षक के तहत कांग्रेस आगे कहती है – “भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (जो की देशद्रोह के अपराध को परिभाषित करती है) जिसका कि दुरूपयोग हुआ, और बाद में नए कानून बन जाने से उसकी महत्ता भी समाप्त हो गई है, उसे खत्म किया जाएगा।“ देशद्रोह कानून समाप्त करना क्या देशविरोधियों को खुलीछूट देना नहीं है। हम देख चुके हैं कि कैसे यूपीए सरकार कश्मीरी आतंकियों और नक्सलियों को खुली छूट देती थी। सवाल ये है कि इसे देश तोड़ने की दिशा में पहला कदम क्यों न माना जाए? मजे की बात तो ये है कि जो कांग्रेस पार्टी देशद्रोह कानून समाप्त करने की बात करती है, उसी ने इसका सबसे ज्यादा दुरूपयोग किया लेकिन वास्तविक देशद्रोहियों के नहीं, बल्कि अपने विरोधियों के खिलाफ। तमिलनाडु में जब नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने जब कुंडनकुलम न्यूक्लियर प्लांट का विरोध किया तो यूपीए सरकार ने 55,795 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, 23,000 को गिरफ्तार किया और करीब 9,000 के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया। उनपर आरोप था कि वो देश की सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ रहे थे। अन्ना आंदोलन के दौरान कार्टुनिस्ट असीम त्रिवेदी का मामला भी अभी यादों में ताजा है। यूपीए सरकार ने उनके एक कार्टून से चिढ़कर उनपर देशद्रोह का मुकदमा ठोक दिया था।

यूपीए सरकार ने वास्तव में देशद्रोह करने वाले नक्सलियों या कश्मीरी आतंकियों के खिलाफ देशद्रोह का कोई मुकदमा नहीं ठोका। उन्हें तो ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर वीआईपी ट्रीटमेंट दिया गया। अपनी पुरानी नीति को कायम रखते हुए कांग्रेस के कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम जैसे बड़े नेता जेएनयू में देशद्रोही नारे लगाने वालों को बचा रहे हैं और देशद्रोह कानून को ही समाप्त करने की बात कर रहे हैं। जाहिर है भारत में जैसे हालात हैं उनमें जरूरी ये है कि इस कानून का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया जाए जो वास्तव में देश तोड़ने की बात करते हैं, न कि सरकार से किसी विषय पर अपनी असहमति जताते हैं।

‘कानून नियम और विनियमों की पुनःपरख’ शीर्षक में ही पार्टी मानवाधिकारों की बात करती है – “उन कानूनों को संशोधित करेंगे जो बिना सुनवाई के व्यक्ति को गिरफ्तार करते हैं और जेल में डालकर संविधान की आत्मा के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार मानकों का भी उल्लघंन करते है।“ पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून – 1989 के ऐसे ही प्रावधानों को गलत ठहरा दिया था। यह कानून कांग्रेस के ही एक पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी लाए थे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके प्रावधानों पर प्रश्नचिन्ह लगाने पर तो कांग्रेस ने काफी हल्ला मचाया। लेकिन आज पार्टी कह रही है कि वो ऐसे कानूनों को समाप्त करेगी जो बिना सुनवाई के लोगों को गिरफ्तार करने की अनुमति देते हैं। क्या कांग्रेस अनुसूचित जाति/ जनजाति कानून के ऐसे प्रावधानों को समाप्त करेगी? हिंदुओं का मुंह बंद करने के लिए यूपीए सरकार ‘कम्युनल वाॅयलेंस बिल’ लाई थी। इसमें हिंदुओं को भी बिना सुनवाई के गिरफ्तार करने का प्रावधान था। क्या कांग्रेस पार्टी ये वादा कर सकती है कि यदि वो सŸाा में आई तो हिंदुओं के खिलाफ कोई ऐसा कानून नहीं बनाएगी?

पार्टी घोषणापत्र आगे कहता है – “हिरासत और पूछताछ के दौरान थर्ड-डिग्री तरीकों का उपयोग करने और अत्याचार, क्रूरता या आम पुलिस ज्यादतियों के मामलों को

रोकने के लिए अत्याचार निरोधक कानून बनायेंगे। आम्र्ड फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट 1958 को संशोधित किया जाएगा ताकि सुरक्षा बलों के अधिकारों और नागरिकों के मानवाधिकारों में संतुलन बनाया जा सके और जबरदस्ती लोगों को गायब करने, यौन हिंसा और प्रताड़ना के मामलों में सुरक्षा बलों की इम्युनिटी (प्रतिरक्षा) समाप्त की जा सके।“

आफस्पा मामले में कांग्रेसी घोषणाओं का विŸा मंत्री अरूण जेटली और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कड़ा विरोध किया है। निर्मला सीतारमण कहती हैं कि ये सेना और सुरक्षा बलों के मनोबल को कम करने का षडयंत्र है। अगर कांग्रेसी घोषणाएं लागू कर दी जाएं तो कोई भी आतंकी यौन हिंसा, प्रताड़ना आदि मामलों में सुरक्षा बलों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा सकेगा और वो आतंकियों से लड़ने की जगह अदालतों के चक्कर काटते फिरेंगे। वो आगे कहती हैं कि केंद्र और राज्य दोनों आपसी सहमति से ही ही किसी क्षेत्र को ‘डिस्टब्र्ड एरिया’ घोषित कर सकते हैं। अकेले केंद्र सरकार इस विषय में निर्णय नहीं ले सकती।

उधर विŸा मंत्री अरूण जेटली कहते हैं कि ऐसा लगता है कि कांग्रेस का घोषणापत्र किसी नक्सली ने बनाया है। ये कहता है कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड और संबंधित कानूनों को संशोधित किया जाए ताकि ये सिद्धांत सुनिश्चित किया जा सके कि ‘बेल नियम है और जेल अपवाद’। जेटली कहते हैं कि इसके चलते तो किसी भी देशद्रोही से निपटना, उसकी जांच-पड़ताल करना मुश्किल हो जाएगा।

मानवाधिकारों के प्रति कांग्रेस का दुराग्रह कई आशंकाएं पैदा करता है। ये ठीक है कि सुरक्षा बलों या पुलिस को किसी पर अत्याचार करने की छूट नहीं दी सकती, लेकिन क्या ये उनके विवेक पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए कि वो किसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं? क्या तथाकथित ‘अत्याचार विरोधी’ कानून लाना सुरक्षा बलों के हाथ बांधने जैसा नहीं है? क्या इससे दुर्दांत नक्सलियों और इस्लामिक आतंकियों को ही सुरक्षा नहीं मिलेगी? अगर पुलिस के हाथ बंधे होंगे तो वो ऐसे देशद्रोही तत्वों से सच कैसे उगलवाएगी?

वैसे कांग्रेस के घोषणापत्र की ऐसी सोच आश्चर्यचकित नहीं करतीं। पंजाब में आतंक की पृष्ठभूमि में राजीव गांधी ने देश का पहला आतंकविरोधी कानून ‘टैररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टीविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट’ (टाडा) बनाया था जिसे कांग्रेस के ही एक अन्य प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने 1995 में समाप्त कर दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने देश में हो रहे आतंकी हमलों को देखते हुए 2001 में एक अन्य आतंकविरोधी कानून प्रिवंेशन आॅफ टैररिज्म एक्ट (पोटा) बनाया, लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसे निरस्त कर दिया। टाडा और पोटा को निरस्त करते समय कांग्रेस ने बहाना तो मानवाधिकारों का बनाया लेकिन असल मकसद था इस्लामिक और नक्सली आतंकियों का संरक्षण। कथित पुलिस अत्याचारों को रोकने के बहाने क्या अब कांग्रेस पुलिस के रहे-सहे अधिकारों को भी खत्म करने का षडयंत्र तो नहीं कर रही। हम देख चुके हैं कि कैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने अफजल गुरू को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष किया और कैसे राहुल गांधी जेएनयू में देशविरोधी नारे लगाने वालों के साथ जा कर खड़े हो गए। वायनाड में पर्चा भरने के दौरान राहुल गांधी ने जैस खुलेआम देश तोड़ने वाली मुस्लिम लीग का समर्थन लिया, क्या वो स्पष्ट नहीं करता कि आखिर कांग्रेस को मानवाधिकारों की इतनी चिंता क्यंू है?

आपातकाल के दौरान प्रेस संेसरशिप लागू करने वाली कांग्रेस ने घोषणापत्र में मीडिया के प्रति भी आपत्तिजनक टिप्पणी की है। यह कहता है – “हाल के दिनों में मीडिया के कुछ हिस्से ने या तो अपनी स्वतंत्रता का दुरूपयोग किया है या आत्मसमपर्ण। आत्मनियंत्रण/ स्वनियंत्रण मीडिया की स्वतंत्रता के दुरूपयोग को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है, कांग्रेस प्रेस काउंसिल ऑफ इण्डिया एक्ट-1978 में उल्लेखित स्वनियमन की प्रणाली को मजबूत करने, पत्रकारों की स्वतंत्रता की रक्षा करने, संपादकीय स्वतंत्रता को बनाये रखने और सरकारी हस्तक्षेप के खिलाफ रक्षा करने का वायदा करती है।“ सवाल ये है कि कांग्रेस को सिर्फ वहीं मीडिया क्यों पसंद है जो सिर्फ उसके गुणगान करे या उसके प्राॅपागैंडा को आगे बढ़ाए? मीडिया पर कांग्रेस की टिप्पणी खतरे की घंटी है। इससे पत्रकारों को सावधान रहना होगा।

कांग्रेस घोषणापत्र महिलाओं के सशक्तीकरण के लंबे-चैड़े वादे करता है और कहता है कि कांग्रेस विवाह के पंजीकरण को आवश्यक बनाने के लिए कानून बनाएगी और बालविवाह निरोधक कानून सख्ती से लागू करेगी। लेकिन ये बड़ी सफाई से मुस्लिम महिलाओं के सशक्तीकरण तथा तीन तलाक, बहुविवाह, हलाला जैसे मुद्दों को दरकिनार कर जाता है। क्या कांग्रेस मुस्लिम जोड़ों के लिए भी विवाह पंजीकरण अनिवार्य करेगी। मुसलमानों में पर्सनल लाॅ की आड़ लेकिर छोटी बच्चियों की शादी की जाती है। क्या कांग्रेस उनपर भी बालविवाह निरोधक कानून सख्ती से लागू करेगी?

कांग्रेस ने घोषणापत्र में अपनी महत्वाकांक्षी ‘न्यूनतम आय योजना,’ (न्याय) को काफी जगह दी है। इसका प्रचार भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। पर पार्टी ने ये कहीं नहीं बताया कि इसे लागू करने के लिए तीन लाख करोड़ रूपए कहां से आएंगे? हाल ही में राहुल के सलाहकार सैम पित्रोदा ने कहा कि गरीबों को ‘न्याय’ दिलवाने के लिए मध्य आय वर्ग को बलिदान के लिए तथा अधिक कर देने के लिए तैयार रहना चाहिए। अमेरिका निवासी पित्रोदा के बयान से सोशल मीडिया पर तूफान आ गया है। क्या कांग्रेस अब न्याय के लिए मध्य आय वर्ग की जेब काटेगी जो पहले ही करों के बोझ से दबा हुआ है?

स्थान का आभाव है, वर्ना घोषणापत्र में और भी कई ऐसे विषय हैं जिनपर विस्तार से गंभीर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन चलते-चलते एक अहम बात – घोषणापत्र का हिंदी संस्करण बहुत खराब है। उसमें अक्सर समझ ही नहीं आता कि पार्टी कहना क्या चाहती है। लगता है अपने अंग्रेजी संस्कारों के चलते कांग्रेस ने पहले अंग्रेजी का घोषणापत्र बनवाया होगा और फिर उसका हिंदी में अनुवाद करवाया होगा। राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों में सरकार चलाने वाली कांग्रेस को हिंदी के प्रति और सजग तथा संवेदनशील होना पड़ेगा।

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