“ट्रंप की अफगान-दक्षिण एशिया नीति में पलीता? सजा की जगह ‘मौका’ मिलेगा आतंकी पाकिस्तान को” in Punjab Kesari

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 21 अगस्त को बहुत जोर शोर से दक्षिण एशिया-अफगानिस्तान नीति की घोषणा की और अफगानिस्तान में चल रहे युद्ध के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। ट्रंप ने बिना लागलपेट पाकिस्तान को अपना रवैया सुधारने और आतंकवादियों के गढ़ समाप्त करने की चेतावनी दी। परंतु अब लगता है ट्रंप का यह प्रलाप महज गीदड़ भभकी ही था, इसके पीछे तुरंत कुछ करने की नीयत नहीं थी। ऐसा क्यों लगता है, इसके पीछे कुछ बहुत स्पष्ट कारण हैं।

दरअसल तीन अक्तूबर को सेनेट आम्र्ड सर्विस कमेटी की बैठक हुई जिसमें सेनेटरों (अमेरिकी सांसद) ने अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस और चेयरमेन, जाॅइंट चीफ आॅफ स्टाफ मेजर जनरल जोसेफ डनफोर्ड से दक्षिण एशिया क्षेत्र में उनकी नीतियों और कार्ययोजना के बारे में तीखे सवाल जवाब किए। इस अवसर पर अमेरिका के इन दो शीर्ष रक्षा पदाधिकारियों ने जो बातें कहीं उनसे स्पष्ट हुआ कि ट्रंप की घोषणा के बाद जो उम्मीदें बंधीं थीं, उन्हें फौरी तौर पर अमलीजामा पहनाने के लिए अमेरिका के पास न तो कोई योजना है और न ही ऐसी योजना बनाने की उसकी कोई मंशा है।

इस मौके पर अनेक सेनेटरों ने ट्रंप की अफगान-पाकिस्तान नीति की बखिया भी उधेड़ी। सेनेटर एलिजबेथ वारेन ने पेंटागन (अमेरिकी रक्षा मंत्रालय का मुख्यालय) की अगस्त की उस पे्रस विज्ञप्ति की याद दिलाई जिसमें कहा गया था कि हम अफगान सुरक्षा बलों की ताकत इस सीमा तक बढ़ा देंगे कि तालिबान समझ जाए कि वो जीत नहीं सकता और वार्ता के लिए मजबूर हो जाए। उन्होंने रक्षा सचिव जिम मैटिस से पूछा कि ऐसा कैसे और कब तक होगा जबकि पिछले 16 साल का इतिहास कुछ और ही गवाही दे रहा है। इसके जवाब में मैटिस ने कहा कि इस समय 16 साल में पहली बार अफगान सेना की सभी 6 कोर एक साथ काम कर रही हैं और बहुत कोशिशों के बावजूद तालिबान नए इलाकों पर कब्जा नहीं कर पा रहा है। इस पर वारेन ने उन्हें याद दिलाया कि अफगानिस्तान में अब तक 2,386 अमेरिकी सैनिक मारे जा चुके हैं, 20,000 से ज्यादा घायल हो चुके हैं, एक लाख से ज्यादा अफगानी मारे जा चुके हैं, ट्रिलियन डाॅलर (एक ट्रिलियन = 1,000 बिलियन, एक बिलियन मतलब एक अरब) खर्च किए जा चुके हैं, इसके बावजूद अफगान सुरक्षा बल अब भी अपने पाॅव पर नहीं खड़े हो पाए हैं, सरकार का 60 प्रतिशत हिस्से पर भी कब्जा नहीं है जिसमें लगभग एक तिहाई आबादी रहती है, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल अफीम का उत्पादन बढ़ा है, भष्टाचार घटने का नाम नहीं ले रहा, 50 प्रतिशत से भी कम लोग अफगान सरकार का समर्थन करते हैं। कुल जमा पिछली और नई नीति में अंतर सिर्फ यही है कि इस नीति में कोई समय सीमा नहीं है।

दिन भर चली इस बैठक में अफगानिस्तान-पाकिस्तान के बारे में नई अमेरिकी नीति की जो रूपरेखा उभर कर आई उससे स्पष्ट हुआ कि अमेरिका इस क्षेत्र में लंबे समय तक टिकने का मन बना चुका है। अफगानिस्तान के विषय में अमेरिका की नई नीति मुख्यतः समस्या के हल में क्षेत्रीय ताकतों को शामिल करने, अधिक सुरक्षाबल तैनात करने, सुलह-सफाई के लिए वार्ता करने और हालात को स्थिर बनाए रखने की है। इस रणनीति में जिन वृहत्तर क्षेत्रीय ताकतों को शामिल करने की बात है उनमें पाकिस्तान के साथ भारत, चीन और रूस शामिल हैं। फिलहाल अफगानिस्तान में करीब 11,000 अमेरिकी और अफगान और अमेरिका के सहयोगी देशों के करीब 3,20,000 सैनिक हैं। नई नीति के तहत एक अरब डाॅलर सालाना की लागत से 3,000 और सैनिक तथा सुरक्षा सलाहकार अफगानिस्तान भेजे जाएंगे और ये सुनिश्चित किया जाएगा कि जो भी योजनाएं बनें वो टिकाऊ हों।

इस बैठक में मेजर जनरल डनफोर्ड से जब पूछा गया कि वो अफगानिस्तान में अपनी जीत को कैसे देखते हैं तो उन्होंने इसके चार आयाम गिनवाए। एक – अमेरिका चाहता है कि दक्षिण एशिया में सक्रिय अल कायदा, आईएस ओर 18 अन्य आतंकवादी समूहों को हराया जाए जो अमेरिका और उसके सहयोगियों पर हमला करते हैं। दो – अफगान सुरक्षाबल न्यूनतम अंतरराष्ट्रीय सहयोग से अपने देश को सुरक्षा प्रदान कर सकें। तीन – अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के इस लक्ष्य को हासिल किया जाए कि वहां की 80 प्रतिशत आबादी को अगले चार साल में देश के महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्रों तक लाया जाए। राष्ट्रपति ने इसके लिए योजना भी बनाई है। चार – अफगान नेतृत्व वाली सुलह-सफाई और शांति प्रक्रिया को समर्थन दिया जाए ताकि अभी युद्ध में उलझे सभी पक्ष बातचीत से समस्याएं हल कर सकें। इस शांति प्रक्रिया में अफगान सरकार के खिलाफ युद्ध लड़ रहा तालीबान भी होगा। लेकिन इसमें काफी समय लगेगा, तब तक प्रतीक्षा करनी होगी जब तक अफगान सुरक्षा बल खुद अपनी लड़ाई लड़ने में सक्षम नहीं होते।

अब बात अफगानिस्तान के संदर्भ में अमेरिका की नई पाकिस्तान नीति की जो इस बैठक से उभर कर सामने आई। बैठक में डनफोर्ड ने साफ तौर से माना कि पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई के आतंकवादियों से रिश्ते हैं और वो अपनी अलग विदेश नीति चलाती है। जब उनसे पूछा गया कि आप आतंकवादियों के प्रति पाकिस्तान के रवैये में बदलाव कैसे ला सकते हैं तो उन्होंने कहा कि इसके लिए बहुपक्षीय नीति अपनाई जानी चाहिए जिसमें एक तरफ 39 देशों का गठबंधन हो जो अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान में पहले से सक्रिय है और दूसरी तरफ चीन भारत और रूस जैसे पड़ोसी देश हों जिनके इस क्षेत्र से राष्ट्रीय हित जुड़े हैं। ये सब देश अगर पाकिस्तान पर अपना राजनयिक और आर्थिक प्रभाव इस्तेमाल करें तो पाकिस्तान के रवैये में बदलाव लाया जा सकता है लेकिन फिलहाल मुझे ये मुश्किल ही लगता है। बहरहाल उन्होंने पाकिस्तान में बैठे अफगान तालीबान के आकाओं को संदेश दे दिया कि अमेरिका उन्हें फिर अफगानिस्तान में जड़ जमाने की अनुमति नहीं देगा।

डनफोर्ड ने आगे कहा कि अफगानिस्तान में आतंकवाद रोकने के लिए पाकिस्तान और अफगानिस्तान में बेहतर सीमा प्रबंधन होना चाहिए जो अभी नहीं है, लेकिन वो कुछ दिन पहले हुई पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा की अफगानिस्तान यात्रा से उत्साहित हैं जिसमें उन्होंने वहां के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से बातचीत की। इस बातचीत में अमेरिकी भी शामिल थे। जाहिर है जनरल बाजवा की अफगानिस्तान यात्रा कहीं न कहीं इस बात का संकेत भी है कि अमेरिकी चेतावनी के बाद पाकी सेना दबाव कम करने के लिए फौरी तौर पर कुछ कदम उठा सकती है।

जब एक सेनेटर ने जिम मैटिस से पूछा कि राष्ट्रपति टंªप ने कहा था कि वो अफगानिस्तान के संदर्भ में पाकिस्तान में नए दबाव डालेंगे तो इसका क्या अर्थ है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हम इसके लिए अंतराष्ट्रीय बिरादरी के साथ काम करेंगे जिसमें अफगानिस्तान में पहले से कार्यरत 39 देशों के साथ ही दक्षिण एशिया के देश, चीन और रूस आदि होंगे। ये बदलाव की रूपरेखा तय करेंगे। इसके बाद ऐसे राजनयिक और आर्थिक उपाय किए जाएंगे जिनका उपयोगी परिणाम निकले और पाकिस्तान को समझाया जा सके कि वो कैसे मौजूदा हालात से बाहर आ सकता हैं।

इस बैठक में मैटिस ने पाकिस्तान को एक और मौका देने की बात भी कही। जब सेनेटरों ने उनसे पूछा कि अगर इसका भी कोई असर नहीं हुआ तो फिर राष्ट्रपति ट्रंप क्या करेंगे? इसके उत्तर में उन्होंने गोलमाल जवाब दिया कि वो आतंकवाद समाप्त करने के लिए हर संभव कदम उठाएंगे। मैटिस ने ये भी स्पष्ट नहीं किया कि इस ‘मौके’ की समयसीमा क्या होगी? कहीं ये टंªंप का कार्यकाल खत्म होने तक तो चलता नहीं रहेगा?

इस बैठक में जो खास बातें उभर कर आईं उन्हें संक्षेप में इस प्रकार रखा जा सकता हैः एक – अमेरिका अफगान समस्या हल करना चाहता है, लेकिन इसकी जड़ में बैठे पाकिस्तान पर अभी कोई सीधी कार्रवाई के मूड में नहीं है, दो – कोई निर्णायक कदम उठाने से पहले वो पाकिस्तान को एक और अवसर देना चाहता है, इसकी समयसीमा भी तय नहीं है, तीन – अमेरिका को पता है कि आईएसआई के आतंकवादियों से रिश्ते हैं और वो अलग विदेशनीति चलाती है, चार – अमेरिका अभी अफगानिस्तान में तालीबान पर हमले की योजना नहीं बना रहा, वो अफगान सेना को मजबूत करना चाहता है ताकि वो खुद तालीबान से निपटे। अगर कोई आपातकाल हुआ तो बात अलग है, पांच – अमेरिका अफगानिस्तान में करीब 3,000 और सैनिक भेजेगा ताकि अफगान सुरक्षाबलों को अधिक सहयोग और प्रशिक्षण दिया जा सके, छह – अमेरिका पाकिस्तान के खिलाफ भारत, चीन समेत सभी क्षेत्रीय ताकतों को एकजुट करना करना चाहता है ताकि पाकिस्तान पर राजनयिक और आर्थिक दबाव डाला जा सके, सात – अमेरिका चाहता है कि भारत अफगानिस्तान के आर्थिक विकास में बड़ी भूमिका निभाए और इसमें वो पाकिस्तान की इस आपत्ति को सही नहीं मानता कि भारत अफगानिस्तान में दखलअंदाजी कर रहा है। मूलतः अमेरिका चाहता है कि भारत अफगानिस्तान के स्थायित्व में भूमिका निभाए। आठ – अमेरिका दक्षिण एशिया में आतंकवादी जमातों को समाप्त तो करना चाहता है लेकिन तालीबान से बातचीत में उसे कोई परहेज नहीं है बशर्ते वो अमेरिकी और अफगान शर्तों पर हो, नौ – तालीबान से क्या बात होगी, उसे सरकार और प्रशासन में हिस्सेदारी दी जाएगी या नहीं, ये अभी स्पष्ट नहीं है।

जाहिर है अमेरिका की पुरानी और नई अफगान-पाकिस्तान नीति में ज्यादा अंतर नहीं है, सिवाए इसके कि अब वो पाकिस्तान की हरकतों को लेकर ज्यादा आक्रामक और मुखर हो गया है और इस मसले में अन्य संबंधित देशों को भी शामिल करना चाहता है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये शाब्दिक आक्रामकता कोई गुल खिलाएगी। फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता। 21 अगस्त को अपनी दक्षिण एशिया और अफगानिस्तान नीति की घोषणा करते समय ट्रंप ने जो तेवर दिखाए थे वो तीन अक्तूबर तक आते आते निःसंदेह ठंडे हो चुके हैं। इसके पीछे पाकिस्तान की दौड़-भाग का हाथ भी साफ नजर आता है। ट्रंप की नई नीति की घोषणा के साथ ही पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय हरकत में आ गया। उसके विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने ताबड़तोड़ चीन, सउदी अरब, तुर्की आदि की यात्रा की। अमेरिका में तो उन्होंने बाकायदा हफ्तों तक अभियान चलाया और छोटे-बड़े थिंक टैंकों के अलावा विदेश सचिव रेक्स टिलरसन से भी मुलाकात की। ये बात अलग है कि टिलरसन ने उन्हें ज्यादा भाव नहीं दिया और दक्षिण एशिया में शांति लाने के लिए उपाय करने की सलाह दी। विशेष बात ये कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने आसिफ को भारत के साथ व्यापार करने के फायदे भी गिनवाए।

अमेरिका की नई नीति खुद उसके लिए और भारत के लिए कितनी कारगर होगी इसके लिए उसे हमें कई कसौटियों पर कसना होगा।
पहली कसौटी तो ये कि क्या अमेरिका आतंकवादियों और विशेषकर भारत के खिलाफ लड़ने वाले आतंकवादियों के खिलाफ सीधे कार्रवाई के लिए तैयार है? इसका उत्तर है नहीं। ये सही है कि अमेरिका अब आतंकवादी पनाहगाहों को लेकर पाकिस्तानी तर्क मानने के लिए तैयार नहीं है। लेकिन ये भी सच है कि अगस्त में ट्रंप की घोषणाओं ने पाकिस्तान और आतंकवादी कैंपों में जो खौफ पैदा किया था उसका असर अब खत्म कर चुका है। अमेरिका मानता है कि पाकिस्तान में आतंकियों की पनाहगाहें हैं, लेकिन उनके खिलाफ उसका कोई सैन्य एक्शन प्लान नहीं है। वो अपने सहयोगियों और क्षेत्रीय ताकतों को साथ लेकर पाकिस्तान पर राजनयिक और आर्थिक दबाव डालने की बात करता है। इन क्षेत्रीय ताकतों में भारत के अलावा रूस और चीन भी हैं जिनसे फिलहाल पाकिस्तान के खिलाफ किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। भारत में आतंक फैलाने वाली आतंकी तंजीमों का अमेरिका उल्लेख तो करता है और उनके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लगाने की कार्रवाहियों में भारत का सहयोग भी करता है, लेकिन इसका पाकिस्तान पर कोई खास असर नहीं होता दिखता। अब तो हालात ये हो गए हैं कि पाकिस्तानी सेना इन तंजीमों को राजनीतिक दलों में बदल कर इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलवाने का षडयंत्र करने लगी है। हाल ही में पाकिस्तान में डायरेक्टर जनरल, आईएसपीआर (इंटर सर्विस पब्लिक रिलेशंस), मेजर जनरल आसिफ गफूर से जब हाफिज सईद द्वारा राजनीतिक दल बनाए जाने के बारे में सवाल पूछा गया तो उसने दो टूक जवाब दिया कि पाकिस्तान में हर व्यक्ति को चुनाव लड़ने की आजादी है। उसने खुलेआम ये भी माना है कि आईएसआई के आतंकी गुटों से संपर्क हैं।

दूसरी कसौटी ये है कि क्या अमेरिका अभी या निकट भविष्य में उस अफगान तालीबान के खिलाफ सीधी कार्रवाई के लिए तैयार है जिसने अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रखा है और जिसके आका पाकिस्तान में रहते हैं और आईएसआई से निर्देश लेते हैं? इसका उत्तर भी है नहीं। इसके विपरीत अमेरिका पाकिस्तान के उस तर्क से सहानुभूति रखता नजर आता है कि खुद पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है। वो तो पाकिस्तान को एक और मौका भी देना चाहता है। पाकिस्तान दुनिया भर में ये कहता फिरता है कि उसने अफगानिस्तान में अमेरिका के साथ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जबकि सच तो ये है कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में जो लड़ाई लड़ी, उसका असली मकसद अमेरिका का समर्थन करना या उसके हाथ मजबूत करना नहीं बल्कि अफगानिस्तान में अपनी मनपंसंद की कठपुतली सरकार स्थापित करना था। जब अफगानिस्तान में रूसी सेना घुसी तो पाकिस्तान ने उसे बाहर करने में बढ़ चढ़ कर अमेरिका का साथ दिया और इसमें उसका साथ दिया तालीबान ने। ध्यान रहे, रूसी सेना के पलायन के बाद अफगानिस्तान में तालीबान की सरकार बनी जिसे सबसे पहले पाकिस्तान ने ही मान्यता दी।

आज भारत में बहुत कम लोगों को तालीबान का इतिहास याद होगा और उन्हें शायद ही स्मरण होगा कि स्वर्गीय बेनजीर भुट्टो को ‘तालीबान की मां’ के रूप में जाना जाता है। पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार अहमद राशिद की किताब ‘द तालिबानः आॅयल एंड द न्यू ग्रेट गेम इन संेट्रल एशिया’ में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है।

डोनाल्ड ट्रंप की नई दक्षिण एशिया – अफगान नीति के बारे में अंततः यही कहा जा सकता है कि उनकी मंशा तो सही है और वो इसके लिए सालाना एक अरब डाॅलर अतिरिक्त खर्च करने के लिए भी तैयार हैं लेकिन वो आखिरकार अमेरिकी आॅक्टोपस (अमेरिका में सैन्य और औद्योगिक गठबंधन को आॅक्टोपस कहा जाता है), सउदी अरब और पाकिस्तान के पुराने त्रिकोण में फंस कर रह गए हैं जिसमें अब चीन भी जुड़ गया है। अगर ट्रंप वास्तव में पाकिस्तान से आतंकी पनाहगाहों को हटाने को लेकर गंभीर होते तो अपने सभी वरिष्ठ सहयोगियों की राय के खिलाफ ईरान समझौते को तोड़ने की आत नहीं करते। बल्कि इसकी जगह भारत की मदद से चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान के लिए नए सप्लाई रूट ढूंढ रहे होते। दुनिया में और विशेषकर पाकिस्तान में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए सउदी अरब ने सबसे ज्यादा धन लगाया है। लेकिन उस पर उंगली उठाने की जगह वो उसे अरबों डाॅलर के हथियार बेच रहे हैं और ईरान को आंखें दिखा रहे हैं। ये अजीब बात है कि जो पाकिस्तान 200 से ज्यादा परमाणु बम और घातक मिसाइलों बना चुका है, उसे तो ट्रंप प्रशासन एक और ‘मौका’ देने की बात कर रहा है और जिस ईराने ने अभी एक बम भी नहीं बनाया, उसे तबाह करने की धमकी दी जा रही है। लश्कर ए तौएबा, जैश ए मौहम्मद और हिजबुल मुजाहीदीन जैसी भारत विरोधी आतंकी तंजीमों के खिलाफ भी उनका रवैया जबानी जमाखर्च से ज्यादा नहीं है। जाहिर है भारत को आतंकवाद के खिलाफ अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। भारत को भी ट्रंप को अफगानिस्तान में मुफ्त समर्थन नहीं देना चाहिए, अपनी शर्तें साफ कर देनी चाहिए।

ट्रंप द्वारा नई नीति की घोषणा के बाद पाकिस्तान ने इस नीति की शिल्पकार मानी जाने वाली एलिस वेल्स की यात्रा रद्द कर दी थी। वो अमेरिकी विदेश विभाग में अफगानिस्तान और पाकिस्तान क्षेत्र के लिए विशष प्रतिनिधि के रूप में कार्यरत हैं। अक्तूबर के अंत तक अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और फिर रक्षा मंत्री जिम मैटिस पाकिस्तान की यात्रा पर जाएंगे। कहा जा रहा है कि वो पाकिस्तान को ‘सख्त संदेश’ देंगे। लेकिन अब तक के हालात से तो ऐसा नहीं लगता। दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद फैलाने वाले जिस पाकिस्तान को तुरंत सजा दी जानी चाहिए थी, उसे जिम मैटिस एक और ‘मौका’ देने की बात कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान फिर बच जाएगा? क्या अमेरिका सिर्फ गाल बजा कर रह जाएगा?

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