“दिवालिया होने वाला है पाकिस्तान: तीन महीने का आयात बिल चुकाने के लिए भी पैसा नहीं है” in Punjab Kesari

दुनिया में आतंकवाद का केंद्र होने के कारण अमेरिका से जापान तक पाकिस्तान को राजनयिक स्तर पर जो लताड़ पड़ रही है, वो तो हमें साफ नजर आती है, लेकिन पाकिस्तान जिस गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, उस पर हमारी निगाह नहीं जाती।

पाकिस्तान में आर्थिक हालात कितने गंभीर हो चुके हैं, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि खुद सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा इस विषय में चिंता जता चुके हैं। सोवियत संघ के बिखरने का उदाहरण देते हुए उन्हांने कहा कि देश की सैन्य सुरक्षा के लिए आर्थिक स्थिति मजबूत होना जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि दक्षिण एशिया में सभी देश आर्थिक रूप से या तो एक साथ आगे बढ़ेंगे या डूबेंगे।

पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर नजर डालने से पहले ये भी समझ लें कि जनरल बाजवा के बयान का क्या मतलब हो सकता है। इसका एक अर्थ तो ये है कि बाजवा सेना को देश का संरक्षक मानते हैं और इस लिहाज से अर्थव्यवस्था के हालात से खुश नहीं हैं और वहां की चुनी हुई सरकार को चेतावनी दे रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि सरकार को जिस गंभीरता से इस मसले को हल करना चाहिए, वो उसे उस गंभीरता से हल नहीं कर रही है। बाजवा जब ये कहते हैं कि अर्थव्यवस्था कि मजबूती के बिना सैन्य सुरक्षा नहीं हो सकती तो वो पाकिस्तान की “सिक्योरिटी स्टेट“ की अवधारणा को बरकार रखने के प्रति भी चिंतित नजर आते है जिसके मूल में विचार ये है कि भारत पाकिस्तान का दुश्मन नंबर एक है और उसे बचाने के लिए सेना की सुप्रीमेसी (सर्वोच्चता) जरूरी है। इस विचारधारा के कारण वहां हमेशा सेना को प्रमुखता दी गई और आर्थिक स्थायित्व और विकास को को हमेशा दोयम दर्जे पर रखा गया।

लेकिन जब जनरल बाजवा ये कहते हैं कि पाकिस्तान और इस इलाके की दूसरी अर्थव्यवस्थाएं एक साथ डूबेंगी या तरेंगी तो लगता है कि उन्हें इस बात का अहसास भी है कि “सिक्योरिटी स्टेट“ के नाम पर पाकी सेना ने पड़ोसी देशों से दुश्मनी का जो मिथ गढ़ा और फैलाया, उसकी निरर्थकता का भी उन्हें अहसास हो रहा है। बाजवा का ये बयान कहीं न कहीं अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स डब्लू टिलरसन के उस बयान को भी प्रतिध्वनित करता है जिसमें टिलरसन ने पाकिस्तानी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ को भारत के साथ दुश्मनी छोड़ कर व्यापार करने की सलाह दी थी ताकि पाकिस्तान ही नही,nअफगानिस्तान के हालात भी बेहतर हों। इसका कहीं न कहीं ये मतलब भी हो सकता है कि पाकी सेना जमीनी हालात के मुताबिक अपनी परंपरागत नीतियां बदलने के लिए तैयार है। अगर ऐसा हुआ तो ये पाकिस्तानी सैन्य अवधारणा को सर के बल खड़ा करने जैसा होगा। ये होगा भी या नहीं, होगा तो फौरी तौर पर होगा या स्थायी तौर पर, बाजवा के बाद आने वाले जनरल इसे मानेंगे या नहीं, अभी ये स्पष्ट नहीं है। वैसे भारत ने पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वल्र्ड ट्रेड आॅर्गनाइजेशन बनने के एक वर्ष बाद 1996 में ही दे दिया था, लेकिन पाकिस्तानी सेना के विरोध के कारण उसने भारत को अब तक ये दर्जा नहीं दिया है। आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के शासन के दौरान इस विषय में बातचीत काफी आगे पहुंच गई थी, लेकिन अंतिम क्षणों में इसे वापस ले लिया गया।

अंतरराष्ट्रीय या राजनयिक स्तर पर हम बाजवा के बयान का जो भी अर्थ निकालें, असल बात तो ये है कि वर्तमान में पाकिस्तान की आर्थिक हालत बेहद नाजुक है। इसे हम कुछ आंकड़ों से समझ सकते हैं। पाकिस्तान पर इस समय कुल विदेशी कर्ज करीब 85 अरब डाॅलर का है और हर पाकिस्तानी पर लगभग 1,40,000 रूपए का कर्ज है। 85 अरब में से 35 अरब डाॅलर का कर्ज तो पिछले पांच साल में ही लिया गया। अंतरराष्ट्रीय व्यापार घाटा करीब 33 अरब डाॅलर का है जबकि विदेशी मुद्रा का भंडार महज 13 से 14 अरब डाॅलर का है। पाकिस्तान का मासिक आयात बिल करीब साढ़े पांच अरब डाॅलर का है। इस लिहाज से देखें तो उसके पास तीन महीने का आयात बिल चुकाने के भी पूरे पैसे नहीं हैं। मामला चाहे विदेशी मुद्रा भंडार का हो या अंतरराष्ट्रीय कर्जों और देनदारियों का, पाकिस्तान हर मोर्चे पर बुरी तरह फंसा हुआ है। उसका सबसे ज्यादा व्यापार चीन के साथ है लेकिन वहां भी हालत चिंताजनक है। चीन उसे 12 अरब डाॅलर का निर्यात करता है जबकि वो उसे महज 1.2 अरब डाॅलर का।

पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति को लेकर वल्र्ड बैंक और आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं गंभीर चिंता जता चुकी हैं। उनकी चिंता का कारण सिर्फ अंतरराष्ट्रीय व्यापार घाटा या सीमित विदेशी मुद्रा भंडार ही नहीं, अंदरूनी आर्थिक स्थिति भी है। पाकिस्तान की हालत को हम कुछ अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों के माध्यम से भी समझ सकते हैं। निर्यात के मामले में वो दुनिया में 155वें स्थान, विदेशी मुद्रा भंडार में 55वें स्थान, प्रतियोगी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में 122वें स्थान और नौजवानों में बेरोजगारी में 128वें स्थान पर है।

पाकिस्तान मुख्यतः कृषि प्रधान देश है। मुख्य फसल चावल और कपास हैं। खेती बड़े जमींदारों या वडेरां के हाथ में है जिन्हें आम किसानों और मजदूरों की कोई फिक्र नहीं है। पिछले 30 साल में कोई बड़ी परियोजना नहीं बनी है। मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री लगभग नादारद है, प्राॅडक्ट चेन तो दूर की बात है। सेफ्टी पिन तक आयात की जाती है। कृषि प्रधान होने के बावजूद पाकिस्तान बार बार खाद्य संकट से गुजरता है। 1997 और 2008 में तो आटे तक के लिए गृहयुद्ध की नौबत आ गई थी। भारत से आयात पर प्रतिबंध लगाने के बाद आजकल वहां सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। टमाटर 200 रूपए किलो बिक रहे हैं।

पेयजल के क्षेत्र में भी पाकिस्तान दुनिया के पांच सबसे ज्यादा संकटग्रस्त देशों में शामिल है। वहां वाटर रीसाइकिलिंग या हार्वेस्टिंग की कोई व्यवस्था नहीं है।
भविष्य में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और भी गंभीर होने का अंदेशा है क्योंकि आबादी सालाना 2.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। फिलहाल आबादी करीब 22 करोड़ है जिसमें 60 प्रतिशत की उम्र 30 वर्ष से कम है। साक्षरता दर 50 फीसदी से भी कम है जिसमें पिछले साल दो प्रतिशत की कमी आई है। देश में 2.3 प्रतिशत बजट शिक्षा पर खर्च होता है। पिछले साल जहां देश के रक्षा बजट में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई वहीं शिक्षा बजट में मात्र दशमलव एक प्रतिशत की। ध्यान रहे पिछले पांच साल में रक्षा बजट हर साल करीब 11 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। इसमें पूर्व सैनिकों की पंशन शामिल नहीं की जाती जो इस वर्ष करीब 178 अरब पाकिस्तानी रूपए के बराबर है। इसे सिविल बजट में शामिल किया जाता है। आजकल एक डाॅलर करीब 106 पाकिस्तानी रूपए के बराबर है। इस हिसाब से सिर्फ सेना का पेंशन बजट ही करीब 2 अरब डाॅलर का है और रक्षा बजट करीब 10 अरब डाॅलर के बराबर। रक्षा बजट में परमाणु कार्यक्रम और फाटा (फेंड्रली एडमिनिस्टरड ट्राइबल एरियाज) में चलाए जाने वाले सैन्य अभियानों का खर्च भी शामिल नहीं होता।

पाकिस्तान में कुल मिलाकर हालात ये हैं कि विदेशी मुद्रा भंडार या शिक्षा बजट से भी बड़ा रक्षा बजट है। अगर पाकिस्तान को आर्थिक संकट से उबरना है तो उसे देश की बुनियादी आर्थिक नीतियों में ही नहीं, सैन्य नीतियों में भी सुधार करना होगा। देश को सनकी “सिक्योरिटी स्टेट“ की जगह वेलफेयर स्टेट (कल्याणकारी राज्य) बनाना होगा और सेना से ज्यादा मानव संसाधन के विकास पर ध्यान देना होगा। देश में जबरदस्त और त्वरित ढांचागत परिवर्तन करने हांेगे जिनमें जमींदारी प्रथा समाप्त करना भी शामिल है। इन सबसे पहले वहां सेना को देश के ‘संरक्षक’ की भूमिका छोड़नी होगी ताकि निर्वाचित सरकार पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी से आर्थिक नीतियां बदल सके। जब तक चुनी हुई सरकार ये सोच कर निश्चिंत रहेगी कि वो चाहे जो करे, आखिर में सेना तो है ही देश संभालने के लिए, तब तक पाकिस्तान का भला नहीं होगा।

लेकिन इन सबसे पहले पाकिस्तान को धार्मिक कट्टरवाद पर लगाम लगानी होगी जिसकी वजह से उसे बड़े पैमाने पर अंदरूनी आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है जिस पर नियंत्रण के लिए भी अरबों डाॅलर खर्च करने पड़ रहे हैं। अगर वो सउदी अरब के सलाफी इस्लाम की जगह, आधुनिक शिक्षा की राह पर चले तो उससे अर्थव्यवस्था ही नहीं, नागरिकों के हालात भी बेहतर होंगे। पाकिस्तानी कभी बांग्लादेश को हिकारत की निगाह से देखते थे और उस से पीछा छुड़ाना चाहते थे, लेकिन आज तेजी से तरक्की करते बांग्लादेश को वो अचरज से देखते हैं, लेकिन ये नहीं समझ पाते कि इस तरक्की के पीछे सही आर्थिक नीतियां ही नहीं, कट्टरवादी इस्लाम पर लगाम लगाना और भारत जैसे पड़ोसी देशों से बेहतर संबंध कायम करना भी शामिल है।

पाकिस्तान में हालात अगर ऐसे ही रहे तो आशंका है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं उसे अगले साल मार्च तक दीवालिया घोषित कर देंगी। पाकिस्तान मदद के लिए किस के आगे हाथ फैलाए, उसे समझ नहीं आ रहा है। ‘परम मित्र’ चीन मदद तो दे रहा है लेकिन बहुत ऊंची दरां पर। इससे चीन की गुलामी का खतरा भी पैदा हो गया है। पाकिस्तान कभी बहुत जोर-शोर से इस्लामी उम्मा (बिरादरी) की बात करता था, लेकिन आज आॅर्गनाइजेशन आॅफ इस्लामिक काॅंफ्रेंस (ओआईसी) के 57 देश उसकी मदद के लिए कतई तैयार नहीं हैं। सउदी अरब भले ही मदरसों को पैसा दे रहा हो पर पाकिस्तान की माली हालत सुधारने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। यूएई पहले ही हाथ खड़े कर चुका है। ओआईसी पर अमेरिका का गहरा प्रभाव है। पाकिस्तान को ये डर भी सता रहा है कि कहीं अमेरिकी इस पर अपना प्रभाव इस्तेमाल कर उसकी तेल आपूर्ति ही न रूकवा दे।

पाकिस्तान के पास एक विकल्प फिर से आईएमएफ जाने का भी है। लेकिन 21 अगस्त को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी फटकार के बाद वहां जाने में भी डर सता रहा है क्योंकि वहां अमेरिका का वर्चस्व है। ट्रंप की धमकी के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका को काफी आंखें दिखाईं थीं और रूस, चीन, तुर्की आदि के साथ वैकल्पिक गठबंधन बनाने की कोशिश भी की थी। अब आईएमएफ जाना, अमेरिकी शरण में जाने जैसा ही होगा। वहां जाने का सीधा मतलब है – अमेरिकी के आगे समर्पण। क्या पाकिस्तान अब थूक के चाटेगा?

पाकिस्तान के सामने एक अन्य विकल्प भारत के साथ तनाव कम करने और व्यापारिक संबंध सुधारने का भी है। अमेरिका बार-बार इसका सुझाव भी दे रहा है। अगर ऐसा हो तो भारत के सामने क्या विकल्प हैं?

इस्लामिक तुष्टीकरण के कारण पूर्ववर्ती कांग्रेसी सरकारें लगातार ये रट लगाती थीं कि स्थिर पाकिस्तान भारत के हित में है। इस नीति के कारण हम वहां की चुनी हुई कठपुतली सरकार से गलबहियां करते थे जबकि वहां की असली सरकार यानी सेना अंदर ही अंदर हमारी जड़ंे काटती रहती थी। वर्तमान मोदी सरकार ने शुरूआत तो इसी नीति से की पर जल्दी ही समझ गई कि अगर पाकिस्तान को सबक सिखाना है तो वहां कि असली सरकार यानी सेना को सबक सिखाना पड़ेगा और इसके लिए पाकिस्तान को राजनयिक तौर पर ही नहीं आर्थिक तौर पर भी अलग-थलग करना पड़ेगा।

कुछ पाकिस्तान की अपनी कारगुजारियों और कुछ भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के आक्रामक रवैये के कारण आज पाकिस्तानी सेना दबाव में आ गई है। आज वहां के पत्रकार और बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि हमसे कहा गया था कि परमाणु बम बनाने के बाद हमारी सुरक्षा का मसला हल हो जाएगा, फिर आज, इतने बम बनाने के बावजूद सेना पर इतना खर्च क्यों किया जा रहा है? भारत से 70 साल तक दुश्मनी करके पाकिस्तान ने क्या हासिल किया? पाकिस्तान के लिए देश की जनता बड़ी है या कश्मीर का मसला जिसके नाम पर सेना अरबों रूपए डकार रही है? पाकिस्तानी सेना अफगानिस्तान में हस्तक्षेप क्यों नहीं बंद करती? आज वहां तथाकथित ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ (रणनीतिक गहराई) ‘स्ट्रैटेजिक डेथ’ (रणनीतिक मृत्यु) साबित हो रही है।

इसे अनुभव कहिए या हालात की मार, आज पाकिस्तान का आम बुद्धिजीवी और पत्रकार भारत के सामान्य पढ़े लिखे मुस्लिम से ज्यादा समझदारी दिखा रहा है और इस्लामिक कट्टरवाद के खिलाफ आवाज भी उठा रहा है, लेकिन भारत को इससे प्रभावित होने और अपनी नीति बदलने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तानी सेना का पिछले 70 साल का इतिहास बताता है कि उसने भारत की पीठ पर बार बार छुरा घोंपा है। अगर भारत, पाकिस्तान को इस बार आर्थिक संकट से उबरने में मदद करे तो भी कोई गारंटी नहीं है कि वो फिर भारत पर हमला नहीं करेगा। वैसे भी भारत में कश्मीर से लेकर केरल तक आईएसआई समर्थित इस्लामिक सांप्रदायिक तंजीमें सक्रिय हैं जिन्हें कांग्रेस और सीपीएम जैसी इस्लामिक पार्टियों का सक्रिय समर्थन हासिल है। ये तंजीमें अपने रवैये में बदलाव लाएंगी, ऐसा भी दिखाई नहीं देता। बल्कि इस्लामिक पार्टियां तो वोट बैंक की राजनीति के चलते इन्हें बढ़ावा ही दे रही हैं।

ऐसे में भारत के पास पहला विकल्प तो ये है कि वो अपनी सीमा पर चैकसी बढ़ा कर पाकिस्तान को उसके हाल पर छोड़ दे। अमेरिका बार बार पाकिस्तान को भारत के साथ व्यापार और आर्थिक संबंध बढ़ाने के लिए समझा रहा है। जनरल बाजवा का बयान इस ओर संकेत भी दे रहा है, लेकिन भारत को इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए। अगर अमेरिकी इस विषय में भारत से बात करे तो उसे इस विषय मं अपनी शर्तों के साथ ही आगे बढ़ना चाहिए। इनमें सबसे पहली शर्त होनी चाहिए दाउद इब्राहिम, हाफिज सईद, मौलाना मसूद अजहर, सय्यद सलाउद्दीन, अफगान तालीबान और हुर्रियत के आतंकियों को फांसी और भारत में आईएसआई नेटवर्क का सफाया। अगर पाकिस्तान ये कदम उठाता है तो भारत उसे आर्थिक संकट से बाहर निकालने के बारे में सोच सकता है।

28 replies
  1. आचार्य राजीव
    आचार्य राजीव says:

    जिस देश की सोच जेहादी और धर्मान्धतापूर्ण होगी उसका यही प्परिणाम होगा, कहा भी

    अपूज्या यत्र पूजयन्ते पूज्यानां तु व्यतिक्रमः ।
    त्रीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ।।

    अर्थात जहां असेवनीय जनों जैसे कि हाफिज़ सईद, दाऊद जैसों का सत्कार होता है और योग्यजनों जैसे कि तारिक फतेह आदि का असत्कार , ऐसे स्थानों पर दुर्भिक् दरिद्रता, अकाल मृत्यु, , भय जैसी तीन अनपेक्षित परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं

    आपने बहुत अच्छा लिखा

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  2. cyncjoft
    cyncjoft says:

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