“दोगले पाकिस्तान को दोस्ती नहीं धक्के की दरकार” in Punjab Keasri

हाल ही में सउदी अरब के दौरे से भीख लेकर लौटे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान अब मलेशिया और चीन जाने की तैयारी में हैं। सउदी अरब में जब इमरान से भारत से रिश्तों के भारत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो भारत से अगले साल के लोक सभा चुनावों के बाद बात करेंगे। उन्हांेने कहा, ”भारत में पाकिस्तान को बुरा-भला कह कर वोट मिलते हैं। हमने भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया क्योंकि उन्हें वोट चाहिए।” जाहिर है इमरान ने ये बताने की जहमत नहीं उठाई कि भारत ने उनकी दोस्ती क्यों ठुकरा दी। आपको याद दिला दें कि लगभग जिस समय इमरान ‘दोस्ती’ की बातें कर रहे थे, लगभग उसी समय भारतीय विदेश मंत्रालय पाकिस्तानी उच्चायोग के अधिकारी को बुलाकर जम्मू-कश्मीर के सुंदरबनी सेक्टर में पाकिस्तानी सेना की बाॅर्डर एक्शन टीम द्वारा तीन भारतीय सैनिकों की हत्या पर विरोध जता रहा था।

इमरान ने भले ही रियाद में कश्मीर का नाम नहीं लिया, लेकिन उनके साथ दौरे पर गए विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने स्वदेश लौटने के बाद अपने सााक्षात्कार में कहा, ”पाकिस्तान भले ही भारत से दोस्ती चाहता है, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वो ‘कश्मीर में भारत की ज्यादतियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाएगा।” उन्होंने पाकिस्तान समर्थक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के पूर्व आयुक्त जैद राआद अल हुसैन की फर्जी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा, ”कश्मीर में ज्यादतियां हो रहीं हैं, ये हम नहीं, दुनिया कह रही है, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कह रही है, दुनिया को अब इसका संज्ञान लेना चाहिए।” उन्होंने कश्मीर में पाकिस्तान के द्वारा आतंक के निर्यात को झूठ ठहराते हुए कहा कि वहां तो लोग ‘आजादी की लड़ाई’ लड़ रहे हैं। 27 अक्तूबर को पाकिस्तान ने कश्मीर के भारत के विलय के विरोध में ‘काला दिन’ मनाया और दिन भर जमकर भारत के विरूद्ध दुष्प्रचार किया।

इमरान और कुरैशी के बयानों से कुछ बातें स्पष्ट होती हैं – इमरान को अब मोदी सरकार से उम्मीद नहीं है, वो 2019 में शायद राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद कर रहे हैं जो खुलेआम भारत विरोधी नक्सली और इस्लामिक आतंकी संगठनों को समर्थन देते हैं। वो भारत से बातचीत दुनिया को दिखाने के लिए करना चाहते हैं ताकि पाकिस्तान की आतंकवादी छवि के कलंक को साफ किया जा सके और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) द्वारा ग्रे लिस्ट में डाले जाने के असर को कम किया जा सके। ध्यान रहे एफएटीएफ आतंकी फंडिंग और हवाला पर निगाह रखने वाली अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था है।

इमरान और पाकी सेना की भारत और कश्मीर नीति में कोई अंतर नहीं आया है। इमरान सरकार ने जमात-उद-दावा सरगना हाफिज सईद और उसकी फर्जी समासेवी संस्था फलाह-ए-इंसानियत को देश की प्रतिबंधित संस्थाओं की सूची से बाहर कर भारत ही नहीं, अमेरिका को भी संदेश दिया है कि वो भले ही उसके सर पर करोड़ों डाॅलर का ईनाम रखे पर पाकिस्तान न तो उसे रोकेगा और न ही उसकी आतंकी गतिविधियों को। ज्ञात हो कि हाफिज सईद सिर्फ कश्मीरी ही नहीं, अनेक खालिस्तानी और रोहिंग्या आतंकियों की सरपरस्ती भी करता है।

दोगला इमरान एक ओर तो बातचीत की पेशकश करता है, जबकि वास्तविकता ये है कि उसके आने के बाद पाकिस्तानी घुसपैठ और आतंकी कार्रवाइयां नियंत्रण रेखा से आगे बढ़, अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंच गई हैं। बदनाम पाकी खुफिया एजेंसी न केवल पंजाब में खालिस्तान के नाम पर हिंसा की साजिश रच रही है, बल्कि पंजाब, राजस्थान स्थित सीमा से घुसपैठिए और मादक पदार्थ भी भेज रही है। पाकिस्तान अब भी भारत के खिलाफ दुनिया को भड़काने की हर संभव कोशिश कर रहा है। चाहे खालिस्तान के लिए ‘रेफरेंडम 2020’ का मामला हो या कश्मीर के विलय के खिलाफ ‘काला दिवस’ मनाने का, वो अमेरिका सहित अनेक पश्चिमी देशों में भारत के खिलाफ सक्रिय अभियान चला रहा है। उसे अफगानिस्तान में भारत का दखल अब भी मंजूर नहीं है और वो वहां अपनी नाक कटवा कर भी भारत का शगुन बिगाड़ने की इच्छा रखता है।

पाकिस्तान दीवालिया होने की कगार पर है और इमरान प्रधानमंत्री निवास की लक्जरी गाड़ियां और भैंसे बेचने पर मजबूर हो गए हैं, ऐसे में सहज ये सवाल उठता है कि जब देश की हालत इतनी पतली है तो वो आखिर भारत के विरोध के लिए संसाधन कैसे जुटा रहा है? इसका सीधा सा जवाब ये है कि आर्थिक तंगी के बावजूद पाकिस्तानी संसद ने सेना के बजट में कटौती की हिम्मत नहीं दिखाई है। ‘देश की सुरक्षा’ के नाम पर सेना अब भी भूखी-नंगी जनता का पेट काट कर ऐश कर रही है और दुनिया भर में आतंक फैला रही है। पाकी सेना ने विश्व में मादक पदार्थों की तस्करी का बड़ा जाल बिछाया हुआ है। भारत में हम तो सिर्फ ये जानते हैं कि कुख्यात आतंकी दाउद इब्राहिम उसके लिए काम करता है, लेकिन दुनिया में दाउद जैसे न जाने कितने तस्कर और आतंकी पाकी सेना की छत्रछाया में पलते हैं, ये कम ही लोग जानते होंगे। आखिर दुनिया में आतंकी फंडिंग और हवाला पर निगाह रखने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने उसे ऐसे ही तो ‘ग्रे लिस्ट’ में नहीं डाला। अपनी आतंकी हरकतों के लिए पैसा जुटाने के लिए पाकी संस्था देश में अनेक उद्योग चलाती है और सेना के अफसरों के परिवार वाले ही नहीं, खुद वो भी ठेकेदारी करते हैं।

बहुत दिन नहीं बीते जब अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए भी आईएसआई की काली करतूतों में सक्रियता से सहयोग करती थी। अमेरिका के वर्तमान विदेश सचिव माइक पाॅम्पिओ सीआईए के पूर्व डायरेक्टर हैं, उन्हें पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क और ठिकानों की पूरी जानकारी है। शायद यही वजह है कि पाकिस्तान द्वारा अपने यहां आतंकी ठिकानों की बात झुठलाने के बावजूद, वो बार-बार पाकिस्तान से इन्हें समाप्त करने की बात करते हैं। पाकिस्तान की आतंकी फंडिंग में चीन भी उसकी खासी मदद करता है। भारत में चल रही देश-विरोधी गतिविधियों में चीन और पाकिस्तान दोनों का ही सहयोग रहता है। हाल ही में जब चीनी गृह मंत्री झाओ केझी भारत आए तो गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उनसे जैश-ए-मौहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने में मदद करने के लिए तो कहा ही, साथ ही यूनाइटेड लिबरनेशन आॅफ असम के प्रमुख परेश बरूआ को भी चीन में शरण न देने के लिए कहा। बात चाहे भारत के भीतर की हो या मालदीव, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार या बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों की, चीन और पाकिस्तान भारत को अस्थिर करने और घेरने में एक दूसरे का पूरा सहयोग करते हैं।

मोदी सरकार ने पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने की नीति अपनाई थी, लेकिन पाकिस्तानी सेना ने इसकी काट इमरान खान में ढूंढी। सेना को लगता है कि इमरान एक अपेक्षाकृत ईमानदार, आधुनिक खिलाड़ी के रूप में जाने जाते हैं। उनके कंधे पर बंदूक रखकर वो विश्व में अपनी छवि को बदलने का अभियान चला सकती है। नवाज शरीफ के कुछ बेबाक बयानों के कारण पाकी सेना को तगड़ा झटका लगा, लेकिन इमरान के आने के बाद उसने अपना जनसंपर्क अभियान बहुत तेजी से शुरू कर दिया है। इमरान तो अपने विदेशी दौर अब शुरू कर ही रहे हैं, सेना प्रमुख कमर जावदे बाजवा उनसे पहले ही अनेक यूरोपीय और अरब देशों के दौरे भी कर आए हैं।

बाजवा, इमरान और उनकी टीम अब दुनिया भर में घूम घूम कर ये भ्रम फैला रहे हैं कि हम तो बात करना चाहते हैं, लेकिन भारत ही तैयार नहीं होता। 24 अक्तूबर में दुनिया ने संयुक्त राष्ट्र दिवस मनाया। इस अवसर पर पाकिस्तान ने अपने यहां मौजूद विदेशी प्रतिनिधियों को बुला कर एक बार फिर कश्मीर का मुद्दा उठाया और बातचीत तोड़ने के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया। जाहिर है अब इमरान ‘शांति के मसीहा’ बनने की कोशिश कर रहे हैं।

जाहिर है, इमरान के प्रधानमंत्री बनने के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बार फिर सक्रिय होने की कोशिश कर रहा है और सउदी अरब, तुर्की, चीन जैसे पुराने दोस्तों से गिले-शिकवे दूर करने की कोशिश कर रहा है। भारत भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का बहिष्कार करे, लेकिन नई परिस्थितियों में इतने से काम नहीं चलेगा। भारत को दुनिया में पाकिस्तान विरोधी अभियान एक बार फिर सक्रियता से आरंभ करना होगा। कश्मीर और भारत में पाकिस्तानी आतंकी गतिविधियों की जानकारी दुनिया को नियमित रूप से और आवश्यक हो तो पूरी तैयारी के साथ देनी होगी। जहां-जहां इमरान या बाजवा जाते हैं, वहां अपना दूत भी भेजना होगा। सिर्फ पाकिस्तानी अधिकारियों को विदेश मंत्रालय में बुलाकर विरोध प्रकट करने से काम नहीं चलेगा।

भारत के कुछ राजनीतिक दल अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वाथों और वोट बैंक की राजनीति के चलते, भारत विरोधी ताकतों को हवा देते हैं और उनके हर कुकृत्य को ‘लोकतंत्र’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर सही ठहराने की कोशिश करते हैं। ऐसी ताकतें भले ही कितना उत्पात करें, इनसे सख्ती से निपटना होगा। आईएसआई आज सिर्फ घुसपैठिए ही नहीं भेजती, उसकी सोशल मीडिया आर्मी युवाओं में भीतर तक घुसपैठ कर चुकी है। ये लोग लगातार एक फर्जी नेरेटिव को हवा दे रहे हैं जो कहता है, ‘देश में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं, उनमें भारी नाराजगी और असंतोष है’, ‘भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार कर रहे हैं और इनका मुकाबला करने के लिए दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को एक हो जाना चाहिए’। कुल मिलाकर पाकिस्तान भारत के चुनावों को भी प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।

संक्षेप में कहें तो भारत को पाकिस्तानी चुनौती को हलके में नहीं लेना चाहिए। चाहे गृह मंत्री राजनाथ सिंह हों या थलसेना प्रमुख जनरल रावत, पाकिस्तान को बार-बार चेतावनी तो देते हैं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नजर नहीं आती। पाकिस्तान की सारी भुखमरी और मुफलिसी के बावजूद उसकी सेना का आतंकी नेटवर्क चाक-चैबंद है और उसे भारत में भी समर्थन देने वालों की कमी नहीं है। मजबूत पाकिस्तान भारत के हित में नहीं है। भारत सरकार को चाहिए कि वो पाकिस्तान पर पैनी निगाह रखे और देश की बाहर ही नहीं भीतर भी उसके हर षडयंत्र का जवाब दे।

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