‘नानक अनुयायियों से अपील – भावनाओं से ऊपर रखंे देश’ in Punjab Kesari

कुछ समय की स्थिरता और शांति के बाद पंजाब एक बार फिर अस्थिरता की कगार पर खड़ा नजर आ रहा है। एक तरफ तो राज्य में पाकिस्तान प्रायोजित खालिस्तानी आतंकी गतिविधियां बढ़ रहीं हैं तो दूसरी तरफ नवजोत सिंह सिद्धू अपनी बचकाना हरकतों से मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और राज्य सरकार को ही नहीं पूरे पंजाब को अपमानित और अस्थिर कर रहे हैं। वो मुख्यमंत्री की सलाह के खिलाफ कतरतारपुर काॅरीडोर के उद्घाटन समारोह में पाकिस्तान गए। लौट कर आने पर जब उनसे इस विषय में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उनके कप्तान तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी हैं और वो उनकी अनुमति से ही गए। हालांकि बाद में वो इस बयान से मुकर भी गए या शायद विवाद बढ़ने पर उन्हें मुकरने पर मजबूर होना पड़ा। पर ध्यान रहे, उन्होंने इस बयान का खंडन नहीं किया है कि पाकिस्तान से लौटने पर शशि थरूर, हरीश रावत, रणदीप सुरजेवाला जैसे शीर्ष नेताओं ने उनकी पीठ थपथपाई।

उनकी बेजा और किसी सीमा तक राष्ट्रद्रोही हरकतों और मुख्यमंत्री के खिलाफ उनके अनाप-शनाप बयानों से पंजाब मंत्रिमंडल में बहुत गुस्सा है। त्रिपत राजेंद्र सिंह बाजवा, सुखविंदर सिंह सरकारिया और राणा गुरमीत सिंह सोढी समेत 10 मंत्री उनसे इस्तीफा मांग चुके हैं। उनका स्पष्ट मत है कि अगर वो मुख्यमंत्री को अपना कप्तान नहीं मानते तो उन्हें मंत्रीपद से इस्तीफा दे देना चाहिए। सब जानते हैं कि सिद्धू पंजाब का मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और उन्होंने बड़े बेमन से अमरिंदर सिंह का नेतृत्व स्वीकार किया। अब वो राहुल गांधी की शह पर मुख्यमंत्री को चुनौती दे रहे हैं या उनका नाम इस्तेमाल कर रहे हैं, ये राहुल ही बेहतर जानते हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा उनकी ‘पीठ थपथपाना’ कहीं न कहीं ये रेखांकित अवश्य करता है कि इस खेल में राहुल का हाथ तो है ही।

राहुल गांधी के प्रति पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट का झुकाव किसी से छुपा नहीं है। मणिशंकर अय्यर जैसे अनेक कांग्रेसी नेताओं के पाकिस्तानियों से मधुर रिश्ते भी किसी से छुपे नहीं हैं। पाॅपुलर फ्रंट आफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों और नक्सलियों के प्रति राहुल की नरमी भी जगजाहिर है। ऐसे में ये सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि क्या पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट पंजाब को अस्थिर करने में राहुल की सहमति से सिद्धू का इस्तेमाल कर रहा है? दिल्ली भारतीय जनता पार्टी के एक नेता ने तो सिद्धू के खिलाफ बाकायदा एफआईआर कर दी है जिसमें उनसे ये मांग की गई है कि वो ये बताएं कि वो पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान और सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा के लिए अपने नेतृत्व का क्या संदेश लेकर गए और वहां से क्या संदेश लेकर आए। साथ ही वो ये भी बताएं कि वो पाकिस्तान में किस-किस से मिले और उन्होंने अपने कार्यक्रम का विवरण भारतीय उच्चायोग को क्यों नहीं दिया।

जैसे कि संकेत मिल रहे हैं, अगर राहुल वास्तव में इस खेल में शामिल हैं तो बहुत दुखद बात है। हम उन्हें याद दिलाना चाहेंगे कि उनकी दादी इंदिरा गांधी और चाचा संजय गांधी ने पंजाब में अकालियों को ठिकाने लगाने के लिए जो खेल खेला वो कितना महंगा पड़ा। उन्हें ऐसे नाजुक वक्त में कैप्टन अमरिंदर सिंह को अस्थिर नहीं करना चाहिए जो बड़ी बहादुरी से खालिस्तानी आतंकियों से लोहा ले रहे हैं।

चाहे पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट हो या राहुल या सिद्धू, सभी अपने निहित स्वार्थ के लिए करतारपुर का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन गुरू नानक देव जी के अनुयायियों के लिए ये भक्ति और आस्था का विषय है। उनके 550वें प्रकटोत्सव पर उनके दिल में ये इच्छा उठनी स्वाभाविक है कि वो करतारपुर स्थित दरबार साहिब में जा कर माथा टेकें जहां उन्होंने जीवन के अंतिम 18 वर्ष बिताए या ननकाना साहिब के दर्शन करें जहां उन्होंने जन्म लिया।

करतारपुर, जिसे ये नाम स्वयं गुरूनानक देव जी ने दिया था, भारतीय पंजाब की सीमा से स्पष्ट दिखाई देता है। बंटवारे के समय अंग्रेजों ने प्रमुख सिख नेता मास्टर तारा सिंह से जब ये पूछा कि वो भारत या पाकिस्तान में रहना चाहते हैं या अलग देश चाहते हैं, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वो भारत में ही रहना चाहेंगे क्योंकि हिंदुओं से सिखों के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। जब सिखों ने भारत को चुन लिया था तो कायदे से सिख धर्म के प्रवर्तक गुरू नानक देव जी के जन्मस्थान और अंतिम विश्रामस्थल को भारत में शामिल किया जाना चाहिए था। कम से कम करतारपुर को तो भारत में शामिल किया जाना चाहिए था जो सीमा से दिखाई देता है।

अफसोस, कांग्रेसी नेताओं ने सिखों की आस्था के केंद्रों की ओर ध्यान ही नहीं दिया। आजादी के तुरंत बाद से गुरू नानक देव जी के अनुयायी करतारपुर तक काॅरीडोर की मांग करते रहे हैं। स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जब बस लेकर लाहौर गए तब उन्होंने भी ये मांग की। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भी सिख संगठनों और खास तौर से शिरोमणि अकाली दल ने ये मांग कई बार सरकार के सामने रखी और इस संबंध में बार-बार ज्ञापन भी दिए। अगर 22 नवंबर को केबिनेट ने करतारपुर काॅरीडोर को मंजूरी दी तो स्वाभाविक है कि इसके बारे में तैयारी कई महीने से चल रही होगी। ये काॅरीडोर पंजाब में बनना है तो ये भी स्वाभाविक है कि इस विषय में पंजाब सरकार को भी विश्वास में लिया गया होगा। वैसे भी मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भी ये मुद्दा पाकिस्तान से उठाया गया था, लेकिन तब उसने कोई जवाब नहीं दिया।

जाहिर है करतारपुर काॅरीडोर खुलने का श्रेय नवजोत सिंह सिद्धू को तो हरगिज नहीं जाता जिन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख और भारत में आतंक के मुख्य षडयंत्रकारी कमर जावेद बाजवा से गले लगने के कुकृत्य के बाद करतारपुर का मसला उठाया ताकि वो सिखों की धार्मिक भावनाएं भड़का कर अपनी देशद्रोही गतिविधियां छुपा सकें। पाकिस्तानी इस्टैबलिशमेंट और मीडिया भी सिद्धू को करतारपुर के हीरो के रूप में पेश करने में लगा है। लाख टके का सवाल ये है कि जो पाकिस्तान पिछले 70 साल से काॅरीडोर खोलने के लिए तैयार नहीं हुआ, वो अब क्यों तैयार हो गया? इसकी असल में दो वजह हैं, पहली – पाकिस्तान भारतीय पंजाब में खालिस्तान की आग फिर भड़काना चाहता है। अगर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेंदर सिंह पर यकीन करें तो वहां पिछले डेढ़ साल में 15 आतंकी माॅड्यूल को नष्ट किया गया और राज्य में कश्मीरी आतंकियों की सक्रियता भी सामने आई है। करतारपुर काॅरीडोर के जरिए वो अपने मिशन में और तेजी ला सकता है। ये सर्वविदित है कि जब भी भारतीय तीर्थयात्री पाकिस्तानी गुरूद्वारों में जाते हैं तो उन्हें खालिस्तान के समर्थन में और ‘हिंदू भारत’ के विरोध में भड़काया जाता है और खालिस्तानी नारे लगवाए जाते हैं। जब पाकिस्तान स्थित भारतीय उच्चायोग के अधिकारी तीर्थयात्रियों से मिलने की कोशिश करते हैं तो उन्हें खदेड़ दिया जाता है। करतारपुर काॅरीडोर के जरिए पाकिस्तान अपनी इस मुहिम में और तेजी ला सकता है।

इस समय करतारपुर काॅरीडोर का मसला उठाने का एक और मकसद है सिखों में फूट डालना और मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रधानमंत्री मोदी को सिखों के दुश्मन के तौर पर पेश करना और उन्हें उनसे दूर करना। ये अभी अस्पष्ट है कि नवजोत सिंह सिद्धू इस षडयंत्र में मर्जी से शामिल हुए, या उन्हें राहुल गांधी ने आज्ञा दी या उन्हें आईएसआई ने किसी तरह ट्रैप कर लिया, लेकिन सिद्धू की हरकतों, बयानों और पाकिस्तान में करतारपुर काॅरीडोर के उद्घाटन के समय हुई घटनाओं से इतना तो स्पष्ट हो गया कि वो पाकिस्तानी बिसात के प्रमुख मोहरे तो बन चुके हैं। उद्घाटन समारोह में उनकी सेना प्रमुख बाजवा से नजदीकी लेकिन सोची-समझी दूरी, खालिस्तानी आतंकी गोपाल सिंह चावला के साथ फोटो खिंचवाना और फिर चावला द्वारा इसे अपने फेसबुक अकाउंट पर प्रदर्शित करना, पाकिस्तान द्वारा कैबिनेट मंत्री हरसिमरत कौर बादल और हरदीप सिंह पुरी को भाषण देने वालों की सूची में न शामिल करना फिर भारतीय पक्ष द्वारा विरोध करने पर उन्हें अवसर देना। उद्घाटन समारोह के ठीक दूसरे दिन पाकिस्तानी विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी द्वारा करतारपुर काॅरीडोर खोलने के कदम को इमरान की गुगली बताना, पाकिस्तानी मीडिया द्वारा बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत सिद्धू की तारीफ करना और उन्हें कैप्टन अमरेंदर सिह के बरक्स खड़ा करना और कैप्टन को असहाय और अलग-थलग पड़े नेता के रूप में चित्रित करना…ये सब साफ करते हैं कि पाकिस्तान और उनके मोहरे सिद्धू के लिए करतारपुर आस्था का सवाल नहीं है वो तो इसे महज एक ‘चाल’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

उद्घाटन समारोह में पाकिस्तान ने कोशिश की कि भारत की ओर से सिर्फ सिद्धू ही बोलें और उन्हें ही पूरा महत्व और श्रेय मिले, लेकिन भारत के विरोध की वजह से ये नहीं हो पाया। लेकिन जैसे सिद्धू ने इमरान खान की शान में कसीदे काढ़े और और इमरान खान ने उनकी हौसला अफजाई की और उन्हें भारत के भावी प्रधानमंत्री तक के रूप में पेश किया, वो देखने में भले ही कितना हास्यास्पद लगे, लेकिन है एक गहरे खेल का हिस्सा जिसका असली मकसद है पंजाब में सिखों और हिंदुओं में फूट डालना। लेकिन पाकिस्तानी की ये साजिश नई नहीं है। कुछ समय पहले एक टीवी चैनल ने लंदन में रहने वाले खालिस्तानियों का स्टिंग आॅपरेशन किया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि उन्होंने पिछले विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी को पैसा दिया क्योंकि वो राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल चाहते थे।

ये भारत में रहने वाले गुरूनानक देव जी के अनुयायियों की भी परीक्षा की घड़ी है। पाकिस्तानी खालिस्तानी षडयंत्रकारी और भारत में उनके मोहरे करतारपुर साहिब को लेकर भावनाएं भड़का रहे हैं। सारे अनुयायियों को संयम और विवेक से काम लेना होगा और पाकिस्तान के बिछाए हुए खालिस्तानी जाल में नहीं फंसना होगा। पाकिस्तान को ये बताना होगा कि वो भारतीय पहले हैं और कोई भी ताकत उन्हें भारत से अलग नहीं कर सकती।

इमरान खान भले ही कितने ही लुभावने भाषण दें और ‘दोस्ती के इरादे’ जताएं लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि पाकिस्तान अपनी डूबती अर्थव्यवस्था के बावजूद भारत से दुश्मनी छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वो न सिर्फ लगातार कश्मीर में आतंक भड़का रहा है, पंजाब को सुलगाने की भी कोशिश कर रहा है। ऐसे में भारत सरकार को करतारपुर काॅरीडोर खोलते समय एहतियाती उपाय करने होंगे।

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