“प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ उत्तर भारतीयों को भड़काने की साजिश” in Punjab Kesari

गुजरात में कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल कांग्रेस का वीभत्स दंगाई चेहरा एक बार फिर उजागर हुआ है। लेकिन इस बार कांग्रेस ने सांप्रदायिक दंगे नहीं करवाए, उसने गुजरात में 14 माह की मासूम बच्ची के घृणित बलात्कार का बहाना बना उससे भी घृणित काम किया – वहां दूसरे राज्यों, विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार 1⁄4ध्यान रहे दोनों राज्यों में एनडीए की सरकार है1⁄2 से आए मजदूरों-कामगारों पर हमला बोल दिया और उन्हें पलायन के लिए मजबूर किया। इस पूरे षडयंत्र के पीछे अगर कोई है तो वो है राहुल गांधी का खास आदमी अल्पेश ठाकोर। बच्ची क्योंकि ठाकोर समुदाय की थी, तो इस वहशी को अपनी दरिंदगी दिखाने का और भी मौका मिल गया और इसकी ‘ठाकोर सेना’ 1⁄4पालतू गुंडों 1⁄2 ने बाहर से आए मजदूरों पर कहर बरपा कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं, कांग्रेस के अनेक विधायकों और कार्यकर्ताओं ने भी इस जघन्य कांड में अल्पेश का साथ दिया।

प्रवासियों को घरों में घुस कर धमकाया गया, ईंट, पत्थर, सरिया, तलवार, जो हाथ आया, उसका इस्तेमाल किया गया। आदमियों को तो छोड़िए, महिलाओं और छोट-छोटे बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। मजबूरन हजारों की तादाद में लोगों ने पलायन किया। जब अल्पेश ठाकोर से लोगों ने इस विषय में पूछा तो वो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए घड़ियाली आंसू बहाने लगा और राजनीति छोड़ने के दावे करने लगा। अन्य राज्यों के लोगों को लग सकता है कि बाहरी लोगों के प्रति अल्पेश और उसकी सेना की हिंसा बच्ची के बलात्कार का नतीजा थी, लेकिन असल में ऐसा नहीं है। अल्पेश के अनेक पुराने वीडियो सामने आए हैं जिनमें वो स्थानीय लोगों को बाहरी मजदूरों के खिलाफ भड़का रहा है और हिंसा की न केवल धमकी दे रहा है, बल्कि लोगोें को उसके लिए उकसा भी रहा है।

राज्य पुलिस ने कथित बलात्कारी को जल्द ही पकड़ लिया, लेकिन अल्पेश और उसके गुंडों ने फिर भी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ हिंसा का नंगा नाच शुरू कर दिया। स्पष्ट है कि इसके पीछे कोई ‘आक्रोश’ काम नहीं कर रहा था। यह सोची-समझी साजिश थी जिसका असल मकसद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पशोपेश में डालना था जो स्वयं गुजराती हैं, लेकिन काशी से चुनाव लड़ कर लोकसभा पहुंचे हैं। इसका दूसरा और खास मकसद था उत्तर भारत के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काना। जाहिर है, इस कांड के शुरू होते ही काशी में प्रधानमंत्री को धमकी देने वाले पोस्टर लगने शुरू हो गए जिसमें उन्हें चेताया गया था कि आखिर तो उन्हें चुनाव लड़ने यहीं आना पड़ेगा।

अल्पेश के आका राहुल गांधी ने अपनी चुनावी सभाओं में इस मुद्दे को उछालना शुरू कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री को उलाहना देना शुरू कर दिया कि पहले तो वो खुद लोगों को रोजगार नहीं दे पा रहे, और जब युवा अपना घर-बार छोड़ कर दूसरे राज्यों में रोजीरोटी ढूंढने जा रहे हैं तो उनकी रक्षा भी नहीं कर पा रहे। कहना न होगा, आलाकमान का आदेश मिलते ही, कांग्रेसी गिद्धों की पूरी टोली ने इस मसले पर डिजीटल मीडिया में मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। ये तो उसी कहावत को चरितार्थ करने जैसा है – उलटा चोर कोतवाल को डांटे। स्पष्ट है कांग्रेसियों ने इस साजिश को पूरी मेहनत और तैयारी से लागू किया। गुजरात में अल्पेश और उसके गुंडों से लेकर दिल्ली में आलाकमान और मीडिया में कांग्रेसी पिट्ठुओं तक सबने अपना फर्ज बखूबी निभाया और पूरे देश में विशेष कर उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को मोदी के खिलाफ भड़काने की पूरी कोशिश की गई। महाराष्टं में मोदी के खिलाफ नफरत फैलाने की कमान संभाली मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरूपम ने जो खुद मूलतः बिहार से हैं।

उत्तर प्रदेश और बिहार की समाजवादी पार्टी 1⁄4सपा1⁄2, बहुजन समाज पार्टी 1⁄4बसपा1⁄2, राष्ट्रीय जनता दल 1⁄4राजद1⁄2 जैसी सीआईसी पार्टियों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने शुरू कर दिए। आग लगाने वाले अल्पेश ठाकोर के खिलाफ तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं फूटा, वो सीधे मोदी पर गोले दागने लगे – मोदी और उनकी पार्टी की राज्य सरकार बाहरी लोगों की रक्षा में असफल रही है…मोदी अब उत्तर प्रदेश और बिहार में किस मुंह से जाएंगे जहां के लोगों को सबसे ज्यादा शिकार बनाया गया है। इस पूरे खेल में

सीआईसी मीडिया की जितनी निंदा की जाए वो कम है। अल्पेश ठाकोर और उसके गुंडों की हरकतें वीडियो में कैद हैं, प्रत्यक्ष को प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन ये लोग बजाए कांग्रेस की ओछी हरकतें दिखाने के, बड़ी फरमाबरदारी से राहुल गांधी के अजीबो-गरीब बयान दिखाने में लगे रहे। इनमें से एक ने भी राहुल से अल्पेश के बारे में सवाल नहीं पूछा उलटे राज्य में हिंसा के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया।

इस कांड से एक बात साफ हो गई है कि राहुल गांधी सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पिछले गुजरात विधानसभा में चुनाव में हमने देखा कि कैसे उन्होंने अल्पेश ठाकोर के साथ ही हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी जैसे लोगों से हाथ मिलाया। अल्पेश के साथ ही हार्दिक और जिग्नेश का इतिहास भी संदिग्ध और विवादास्पद है। हार्दिक ने 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद के जीएमडीसी मैदान में पटेल आरक्षण की मांग पर रैली की। रैली के बाद जब वो उपवास पर बैठने लगे तो पुलिस ने उन्हें हटाने की कोशिश। इस पर उनके समर्थकांे ने हिंसा और तोडफोड़ शुरू कर दी। हिंसा इतनी अधिक बढ़ गई की सरकार को कफ्र्यु लगा कर सेना बुलानी पड़ी। जिग्नेश मेवानी की नक्सल पृष्ठभूमि भी जगजाहिर है। गुजरात चुनाव और बाद में भीमा कोरेगांव आदि में उसके भड़काऊ भाषण किसी से छुपे नहीं हैं। अर्बन नक्सल रोना विल्सन के लैपटाॅप से महाराष्टं पुलिस को जो दस्तावेज मिले उनसे स्पष्ट है कि उसने कांग्रेस नेतृत्व और नक्सलियों के बीच संपर्कसूत्र की भूमिका भी निभाई। इन्हीं दस्तावेजों से ये भी पता चला था कि कांग्रेस दंगा फैलाने और समाज को तोड़ने के लिए नक्सलियों को आर्थिक और कानूनी सहायता देने के लिए भी तैयार है। इसका सबूत हमें तब मिला जब वरवर राव, गौतम नवलखा, वरनन गोंजालविस, अरूण फरेरा और सुधा भारद्वाज जैसे दुर्दांत नक्सलियों की पैरवी करने कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी स्वयं सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए और उनके समर्थन में लेख लिखते पाए गए। यहां चलते-चलते एक बात और बता दें, गुजरात चुनाव में इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया और उसकी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया 1⁄4एसडीपीआई1⁄2 ने कांग्रेस और जिग्नेश की पूरी मदद की। यही नहीं कर्नाटक चुनाव में भी एसडीपीआई ने कांग्रेस का पूरा साथ दिया।

गुजरात सरकार को अल्पेश ठाकोर द्वारा प्रायोजित दंगों को चेतावनी के तौर पर लेना चाहिए। भले ही कांग्रेसियों को गुजरात में सिर्फ वर्ष 2002 के दंगे याद रहते हों जब नरेंद्र मोदी वहां के मुख्यमंत्री थे, लेकिन राज्य में कांग्रेसी हिंसा का बहुत लंबा और क्रूर इतिहास रहा है। आपको जानकर आश्यर्च होगा कि 2002 के दंगों में अनेक कांग्रेसी नेताओं के खिलाफ भी मुकदमे दर्ज किए गए। कांग्रेसी शासन में साठ के दशक से नब्बे के दशक तक सैकड़ों दंगे हुए। वर्ष 1969 1⁄4हितेंद्रभाई देसाई, कांग्रेस1⁄2, 1985 1⁄4माधवसिंह सोलंकी, कांग्रेस1⁄2, 1987 1⁄4अमरसिंह चैधरी, कांग्रेस1⁄2, 1990 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 और 1992 1⁄4चिमनभाई पटेल, कांगे्रस1⁄2 में राज्य में बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें हजारों लोग मारे गए। हफ्ता दर हफ्ता चलने वाले ये दंगे इतने बड़े और विकराल थे कि 2002 के दंगे तो इनके सामने कुछ भी नहीं थे। भले ही मोदी ने लंबे अर्से तक राज्य में दंगों पर लगाम लगाई, लेकिन ताजा हिंसा बताती है कि राज्य में कांग्रेस की दंगा मशीनरी पूरी तरह चाक-चैबंद है। अगर सरकार सचेत नहीं रही, तो लोक सभा चुनावों से पहले ऐसी घटनाएं फिर हो सकती हैं।

राहुल गांधी आज बेशर्मी से प्रधानमंत्री मोदी से इस्तीफा मांग रहे हैं, लेकिन वो अपनी गिरेबान में झांक कर देखने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर उन्हें थोड़ी सी भी शर्म होती तो क्या वो अल्पेश ठाकोर को पार्टी से बाहर नहीं करते? लेकिन वो ऐसा कभी नहीं करेंगे क्योंकि कांग्रेस की नीति ही अब देश को जाति और धर्म के नाम पर तोड़ने तथा हिंसा और अराजकता फैलाने की है। मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के जवाब में उनका एक ही नारा है – ‘सबका विनाश, सबका सत्यानाश’।

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