बड़ी उपलब्धिः भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी का अभूतपूर्व अभियान in ‘Punjab Kesari’

बड़ी उपलब्धिः भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी का अभूतपूर्व अभियान

पिछले लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने विकास को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा दिया। लेकिन कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के महाघोटालों से त्रस्त जनता के लिए भष्टाचार भी बड़ा मसला था। 2जी, सीडब्लूजी, कोयला, सुरक्षा उपकरण खरीद, वीआईपी हैलीकाॅप्टर खरीद आदि घोटालों से परेशान लोगों को आशंका होने लगी थी कि क्या कभी घोटालों के इस दुष्चक्र का अंत होगा भी या नहीं। कितने ही घोटाले ऐसे सामने आए जिनमें गांधी परिवार और उसके दामाद का सीधे-सीधे नाम आया। कितने ही घोटालों में मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा और बड़े बेमन से उनपर मुकदमे भी दर्ज किए गए। ऐसे में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने गुड गवर्नेंस और दलाल व्यवस्था समाप्त करने का भरोसा दिया। उन्होंने घोषणा की – न खाउंगा न खाने दूंगा।

मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभालते ही भ्रष्टाचार समाप्त करने की मुहिम की शुरूआत कर दी। सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से कह रहा था कि विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के लिए सरकार विशेष जांच दल (स्पेशल इनवेस्टीगेटिव टीम, एसआईटी) बनाए। घोटालों से कलंकित यूपीए सरकार इसे नजरअंदाज कर रही थी। मोदी ने सत्तता संभालते ही सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्ति जज एमबी शाह के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया। इसमें सीबीआई, आईबी के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा वित्तीय और आर्थिक विभागों के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे।

आज विपक्षी दल बार-बार ये कटाक्ष करते हैं कि मोदी ने कहा था कि वो सत्तसमें आने के बाद विदेश से कालाधन लाएंगे और हर व्यक्ति को 15 लाख रूपए मिलेंगे, वो कहां हैं। तो उनकी जानकारी के लिए बता दें कि मोदी ने सत्तता में आते ही जिस एसआईटी का गठन किया था वो अब तब सुप्रीम कोर्ट को छह अंतरिम रिपोर्ट सौंप चुकी है। कालेधन पर लगाम लगाने के संबंध में इसकी अधिकांश सिफारिशें सरकार ने स्वीकार भी कर लीं हैं। इनके मुताबिक तीन लाख रूपए से अधिक का नकद लेन-देन गैरकानूनी करार दिया गया है। 15 लाख रूपए से अधिक नकद रखने को गैरकानूनी करार देने पर भी विचार चल रहा है। एसआईटी के गठन के बाद 70,000 करोड़ रूपए से अधिक के काले धन का पता लगाया जा चुका है जिसमें 16,000 करोड़ का विदेश में जमा कालाधन शामिल है। अगर 2जी और नेशनल हेरल्ड घोटाले का पर्दाफाश करने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता डाॅक्टर सुब्रमण्यम स्वामी पर यकीन करें तो गांधी परिवार ही नहीं, वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम सहित यूपीए के अनेक नेता कमीशन एजेंट के रूप में काम करते थे। ये तरह-तरह के हवाला रूटों के जरिए विदेशों में पैसा जमा करवाते थे और संकट पड़ने पर इस धन को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में भी माहिर थे। इनके विदेशी खातों में लाखों करोड़ों रूपए का काला धन जमा है। जाहिर है मोदी के आने के बाद इन्होंने अपना कालाधन कहीं न कहीं तो ठिकाने लगाया होगा। मोदी सरकार ने काले धन के स्वर्ग माने जाने वाले स्विटजरलैंड और माॅरीशस सहित अनेक देशों से भी काले धन की जानकारी हासिल करने के लिए समझौते किए हैं। जाहिर है, जांच जारी है और बहुत सी जानकारियां हासिल भी हुईं हैं। अगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सहयोग करें और ईमानदारी से अपना कालाधन घोषित कर दें तो मोदी सरकार हर भारतीय के खाते में 15 लाख तो क्या 20 लाख रूपए भी जमा करवा सकती है।

लेकिन एसआईटी का गठन तो सिर्फ शुरूआती कदम था। काले धन और दलालों को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था को समाप्त करना, नई पारदर्शी व्यवस्था का निर्माण करना अभी बाकी था। मोदी सरकार ने इसके लिए युद्धस्तर पर काम किया और एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जो न केवल सत्तता के गलियारों में दलालों का दखल रोकती थी, बल्कि ये भी सुनिश्चित करती थी कि पारदर्शी तरीके से सिर्फ ऐसे लोगों को काम मिले जो इसके काबिल हों। इसके लिए सरकार ने एक रणनीति अपनाई जिसके प्रमुख अंग थे – जनजागरण, तकनीक आधारित इ-गवर्नेंस, व्यवस्था आधारित नीति के अनुसार चलने वाली सरकार, कर प्रणाली का सरलीकरण, हर स्तर पर प्रक्रियाओं को सरल, व्यावहारिक और ग्राह्य बनाना, मौजूदा कानूनोें को संशोधित करना और आवश्यकता पड़ने पर नए कानून बनाना।

पिछले साढ़े चार साल में मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जितना काम किया है अगर हम उसका विस्तार से वर्णन करने लगें तो कई ग्रंथ लिखने पड़ेंगे, लेकिन हम यहां बहुत संक्षेप में बताना चाहेंगे कि इस क्षेत्र में सरकार का क्या योगदान रहा। सरकार ने काले धन और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अनेक विधायी, प्रशासनिक और तकनीकी कदम उठाए हैं। विधायी उपायों में शामिल हैं – ब्लैक मनी (अनडिस्क्लोस्ड फाॅरेन इनकम एंड असेट्स) इंपोसिशन एक्ट, बेनामी ट्रांसेक्शन (प्रोहीबिशन) अमेंडमेंट एकट, 2016, सिक्योरिटीज लाॅज़ (अमेंडमेंट) एक्ट, 2014, स्पेसीफाइड बैंक नोट्स (सीसेशनन आॅफ लाएबिलिटीज एक्ट), 2017, भगोड़े आर्थिक अपराधियों के खिलाफ फ्यूजिटिव इकोनाॅमिक आॅफेंडर्स एक्ट, 2018, चैकों के जरिए धोखाधड़ी रोकने के लिए नेगोशियेबल इंस्ट्रूमेंट (अमेंडमेंट) एक्ट, 2018 आदि।

संसद के शीतकालीन सत्र में 18 दिसंबर को सरकार ने एक सवाल के जवाब में बताया कि इकोनाॅमिक आॅफेंडर एक्ट के तहत सरकार ने सात आर्थिक भगोड़े अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की है। ये मामले कुल 27,969 करोड़ रूपए के हैं। ध्यान रहे भगोड़े हीरा व्यापारी नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के खिलाफ भी इस कानून के तहत मुकदमे दायर कर दिए गए हैं और विजय माल्या को देश का पहला भगोड़ा आर्थिक अपराधी घोषित भी किया जा चुका है।

यहां माल्या और मोदी की बात उठी है तो ये भी बताते चलें कि सीबीआई विवाद में जो नए तथ्य सामने आ रहे हैं, उनसे स्पष्ट हो रहा है कि सीबीआई के बर्खास्त प्रमुख ने कहीं न कहीं माल्या और मोदी जैसे आर्थिक अपराधियों को देश से भागने में मदद की जिन्हें मनमोहन सरकार की सिफारिश पर करोड़ों रूपए का कर्ज दिया गया। ध्यान रहे जब चयन समिति उन्हें हटाने पर विचार कर रही थी, तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने न केवल उनकी बर्खास्तगी का विरोध किया बल्कि ये सिफारिश भी की कि केंद्र सरकार के कहने पर उन्हें जितने दिन अवकाश पर रहना पड़ा, उतने दिन भी उनके सेवाकाल में शामिल किए जाएं। ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या माल्या और नीरव जैसे आर्थिक अपराधियों को भगाया जाना और फिर इस विषय में मोदी सरकार को घेरना किसी बड़ी साजिश का हिस्सा तो नहीं था?

यहां एक बात और बताना जरूरी है – स्वतंत्र भारत में 2008 तक 18 लाख करोड़ रूपए के बैंक ऋण दिए गए, लेकिन 2008 से 2014 के बीच 52 लाख करोड़ रूपए के कर्जे बांटे गए। अगर प्रधानमंत्री मोदी की मानें तो इसमें से अधिकांश वो ऋण थे जो कांग्रेसी नेताओें की सिफारिश पर दिए गए जिनका डूबना लगभग तय था। लेकिन इसे मोदी सरकार की उपलब्धि ही माना जाएगा कि हर कठिनाई के बावजूद वो तीन लाख रूपए उगाहने में सफल रही है।

मोदी सरकार का एक मास्टर स्ट्रोक नोटबंदी का रहा। जिसने भष्ट लोगों को अपना कालाधन बाहर लाने के लिए मजबूर किया। नोटबंदी के बाद न सिर्फ आयकर दाताओं की संख्या कई गुना बढ़ी, बल्कि सरकार को लाखों की तादाद में ऐसे लोगों की जानकारी भी मिली जो वर्षों से कालेधन का कारोबार कर रहे थे। नोटबंदी से मिली जानकारी के बाद सरकार ने कालेधन के कारोबार में लगी 1.63 लाख फर्जी कंपनियों का पंजीकरण रद्द किया। नोटबंदी के बाद देश में डिजीटल लेन-देन अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ा है जिससे निसंदेह पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है।

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बड़ी जोर-शोर से लड़ाकू विमान रफेल की खरीद में कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। उन्हें लगा कि बोफोर्स और अन्य घोटालों में घिरी कांग्रेस के दाग इससे धुल जाएंगे। उनके वकील इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक गए पर वहां भी मोदी सरकार को क्लीन चिट मिली। खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए अब वो इस मामले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से करवाने की मांग को लेकर व्यर्थ में हंगामा कर रहे हैं। मोदी सरकार ने उचित ही इस मांग को ये कहते हुए अस्वीकार कर दिया है कि जब सुप्रीम कोर्ट इसके हर पक्ष की जांच कर चुका है तो फिर संयुक्त समिति में इसे ले जाने का कोई तुक नहीं बनता।

लंबे अर्से तक कांग्रेस का अनर्गल प्रलाप झेलने के बाद मोदी ने भाजपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में कांग्रेस पर रफेल सहित अनेक मुद्दों पर पलट वार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस रफेल की आपूर्ति करने वाली दासो कंपनी की प्रतिद्वंद्वी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए विवाद पैदा कर रही है। अगुस्ता वेस्टलैंड मामले में भारत लाए गए दलाल क्रिश्चियन मिशेल से हो रही जांच का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि वो दासो की प्रतिद्वंद्वी कंपनी के लिए लाॅंबिंग कर रहा था। याद रहे मिशेल, गांधी परिवार का करीबी माना जाता है। वैसे ये भी याद दिलाते चलें कि ये मोदी सरकार ही है जो आजाद भारत के इतिहास में हथियारों के किसी दलाल को भारत लाई है।

कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल भले ही मोदी को घेरने की कितनी ही कोशिश करें, लेकिन भ्रष्टाचार के विरूद्ध युद्ध में उनकी उपलब्धियां बताती हैं कि इस क्षेत्र में उनकी सरकार ने जितना काम किया है, वो पिछले 70 साल में नहीं हुआ। उन्होंने स्वच्छ और निष्पक्ष प्रशासन की नींव रख दी है। अब ये जनता को तय करना है कि वो इन प्रयासों को आगे ले जाना चाहेगी या फिर जाति और धर्म के दलदल में फंस कर भ्रष्ट लोगों को चुनेगी।

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