“10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं के उद्धार बिना भारत की आजादी अधूरी” in Punjab Kesari

हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के साथ ज्यादतियों के अनेक खौफनाक मामले सामने आए। बरेली के मशहूर आला हजरत खानदान की बहु रह चुकीं निदा खान ने जब तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई तो आला हजरत दरगाह के दारूल इफ्ता ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से ही बाहर कर दिया। उनका हुक्का पानी बंद कर दिया गया और एलान कर दिया गया कि कोई मुसलमान उनसे संबंध नहीं रखेगा। वो बीमार होंगी तो कोई मुस्लिम डाॅक्टर उनका इलाज नहीं करेगा। उनके मरने पर न तो कोई मौलवी नमाज-ए-जनाजा पढे़गा और न ही उन्हें कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा।

बरेली की ही शबीना नाम की महिला को हलाला के नाम पर पहले उसके ससुर और फिर देवर के साथ सोने के लिए मजबूर किया गया। शबीना ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनके पूर्व ससुराल वालों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ अपील दायर करने वाली सिकंदराबाद की फरजाना ने पुलिस से सुरक्षा मांगी है क्योंकि उनके पूर्व पति ने उन्हें धमकी दी है कि अगर वो याचिका वापस नहीं लेंगी तो वो उन्हें जान से मार देगा और उनका शरीर बोरे में बंद कर नाले में बहा देगा।

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ ज्यादतियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आश्चर्य की बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद छोटी-छोटी बातों पर तीन तलाक दिए जाने का सिलसिला जारी है और अनेक मुल्ला-मौलवी इसे बढ़ावा भी दे रहे हैं।

पहले मुस्लिम महिलाएं ज्यादतियों को अपना नसीब और अल्लाह का फरमान समझ खून का घूंट पी कर रह जाती थीं, लेकिन मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अन्याय के विरूद्ध स्पष्ट रवैया अपनाने से उनका हौसला निःसंदेह बढ़ा है। अगर उनमें अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने का साहस बढ़ा है तो प्रतिगामी और दकियानूसी ताकतों द्वारा उनका दमन भी बढ़ा है। कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय में आलोड़न तेज गति से बढ़ा है। इसके राजनीतिक अभिप्राय भी हो सकते हैं, लेकिन हम इसे मुस्लिम महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में देखते हैं। आजादी के 70 साल बाद ही सही, आज इस मुहिम ने जो रूप-रंग अख्तियार किया है, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि और चाहे जो हो, मुस्लिम महिलाएं पुराने ढर्रे पर लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कठमुल्लों की हरकतों से परेशान हो कर उन्होंने अपने लिए अलग पर्सनल लाॅ बोर्ड ही नहीं बनाया, अब अपने लिए अलग शरीया अदालत भी बना ली है।

लेकिन सवाल ये है कि ये मुहिम क्या फिर इस्लाम के नाम पर एक बार फिर दलदल में फंस कर रह जाएगी या मुस्लिम महिलाओं को भारतीय संविधान और आधुनिक मूल्यों के अनुसार अधिकार मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वो किसी ऐसी धार्मिक प्रथा को मान्यता नहीं देगा जो धर्म के नाम पर महिलाओं के संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करती हो। लेकिन सवाल सिर्फ अदालत द्वारा फैसला सुनाने का नहीं है, उसे लागू करने का भी है। तीन तलाक मामले में हम देख चुके हैं कि मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस और अन्य प्रतिगामी पार्टियों ने कैसे तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा में पारित नहीं होने दिया और मुस्लिम महिलाओं की पीठ में छुरा घोंपा। स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पूर्व ही राज्य सभा में पेश किए गए इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को बहुत उम्मीद थी। उन्हें लगा थी कि अबकी बार वो भी सही मायनों में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मना पाएंगी। लेकिन कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि पहले शाहबानो और फिर तीन तलाक मामले में मुस्लिम महिलाओं को नीचा दिखाने वाली कांग्रेस को आजकल एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक की याद आ रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पूरी तरह अज्ञानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर संघ का नाम लेकर महिलाओं को डराने में लग गए हैं। उन्हें लगता है कि महिला आरक्षण की बात करके और संघ का हौवा दिखा कर वो महिलाओं के वोट बटोरने में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ये ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं है। संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को आरक्षण तो मिलना ही चाहिए, लेकिन क्या करोड़ों-करोड़ मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक अधिकार और प्रतिष्ठा दिलवाने का मसला आरक्षण से बड़ा नहीं है? क्या भारत की आजादी मुस्लिम महिलाओं की आजादी के बिना अधूरी नहीं है?

आजादी के बाद जब संविधान बना तो उसमें महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा दिया गया। मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 14 भारत के हर नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है। यानी संविधान की निगाह में स्त्री और पुरूष दोनों समान हैं। हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए वर्ष 1955-56 में हिंदु कोड बिल पारित किया गया। लेकिन प्रतिगामी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को छुआ तक नहीं गया और मुस्लिम महिलाओं को कट्टरवादी, पुरूषवादी मुस्लिम समाज के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया। ध्यान रहे कि संविधान के नीति निर्दशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में भारत सरकार से अपेक्षा की गई है कि वो देश में धर्म आधारित कानूनों की जगह संविधान सम्मत समान आचार संहिता लागू करेगी। लेकिन अफसोस इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने समान आचार संहिता को ही ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर दिया और इसे जानबूझ कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

‘प्रगतिशील’ होने का दावा करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ को क्यों नहीं बदला? मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को जानबूझ कर क्यों कुचला गया? इसका स्पष्ट उत्तर शायद ही किसी कांग्रेसी के पास हो। लेकिन ये तो साफ है कि आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति नेहरू की उदासीनता ने उनका जीवन नरक बना दिया। देश में ‘धर्म निरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ संविधान होने और लंबे अर्से तक स्वयं एक महिला (इंदिरा गांधी) के प्रधानमंत्री होने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार जारी रहा। इंदिरा गांधी ने तो मुस्लिम महिलाओं को गर्त में ढकेलने के लिए एक और इंतजाम किया – उन्होंने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड नाम का एक गैरसरकारी संगठन बनवा दिया। कांग्रेसी मौलानाओं के इस स्वयंभू संगठन ने देश में मुस्लिम कानूनों के संरक्षण और व्याख्या का काम खामखा अपने जिम्मे ले लिया। हद तो तब हुई जब इन मौलानाओं ने राजीव गांधी सरकार को शाहबानो गुजारा भत्त मामले में कानून बदलने के लिए मजबूर किया। तीन तलाक वाले मामले में भी इस स्वयंभू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जो शपथपत्र दायर किया वो विकृत मानसिकता को निकृष्टतम नमूना है।

मौलाना तो मौलाना, तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे मुस्लिम पुरूष, स्त्रियों के बारे में क्या सोचते हैं इसे तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के जज अब्दुल नजीर के फैसले से समझा जा सकता है जिन्होंने महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को मुसलमानों का मौलिक अधिकार बता दिया था।

इस्लामिक सांप्रदायिक कांग्रेस और अन्य मुस्लिम महिला विरोधी दलांे के सतत षडयंत्रों और घटिया वोट बैंक राजनीति के बावजूद मुस्लिम महिलाओं की हक की लड़ाई आज निर्णायक दौर में पहुंच गई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें भारत के नागरिक के रूप में संविधान प्रदत्त अधिकार मिलें और इस पुरानी रटंत को त्याग दिया जाए कि ‘मुस्लिम’ अपने मामले खुद हल करेंगे और अन्य समुदायों और संस्थाओं को उनके मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाला हर संगठन धर्म और जाति से ऊपर उठ कर मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में सामने आए। जो दल मुस्लिम महिलाओं से गद्दारी कर रहे हैं, उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए। एक अनुमान के अनुसार भारत में मुसलमानों की आवादी करीब 20 करोड़ है। इसमें आधी यानी करीब 10 करोड़ महिलाएं भी होंगी। क्या 10 करोड़ आबादी को अंधेरे में रख कर कोई देश तरक्की कर सकता है?

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