पिक्चर अभी बाकी है मेरे…..

पिक्चर अभी बाकी है मेरे…..

ललिता निझावन, समाजसेवी, शिक्षाविद्, राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित

फरवरी 26 की सुबह जब देश ने सर्जिकल स्ट्राइक – 2 की खबर सुनी तो उत्साह और उल्लास की एक लहर सी दौड़ गई। ये वायुसेना की पुलवामा के शहीदों के प्रति श्रद्धांजलि थी, जिसका क्रोध और आक्रोश से भरे कोटि-कोटि भारतवासियों ने भी खुले दिल से स्वागत किया।

पाकिस्तानी सेना ने जाने-पहचाने अंदाज में इसका मजाक उड़ाया और अपनी जनता को ये समझाने की कोशिश की भारतीय वायुसेना ने हमारी वायु सीमा में घुसने की हिमाकत की मगर हमने उन्हें धमका कर वापस कर दिया। पाकिस्तानी सेना, उसके इमरान खान, शाह महमूद कुरैशी जैसे बगल बच्चे भले ही कोई भी बड़कें मारें, लेकिन एक स्पष्ट संदेश उन्हें दे दिया गया है और उन्होंने समझ भी लिया होगा कि मोदी के नेतृत्व में ये नया भारत है जो ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता है। परमाणु बम की धमकी की आड़ में पाकी प्राॅक्सी वाॅर का तमाशा अब बहुत हुआ, अब भारत हर हिमाकत का जवाब देगा, पाकिस्तान को जो करना है कर ले।

लेकिन चाहे पहली सर्जिकल स्ट्राइक हो या दूसरी, ये कहना मुश्किल है कि कुŸो की दुम पाकिस्तान अपने रंग-ढंग बदलेगा या नहीं। इसलिए भारत को पाकिस्तान के खिलाफ एक सतत रणनीति अपनानी होगी। हमारा हमेशा मानना रहा है कि पाकिस्तान स्थायी समस्या है और इसका स्थायी समाधान ही होना चाहिए। ये दो ही सूरत में हो सकता है – या तो पाकिस्तान विखंडित हो जाए या उसकी असली शासक यानी उसकी सेना का मन बदल जाए। फिलहाल दोनों सूरतें नजर नहीं आ रहीं।

ऐसे में पाकिस्तान से स्थायी बदला लेने की क्या रणनीति हो? रणनीति पर बाद करने से पहले एक बात अवश्य कहना चाहेंगे – पाकिस्तान को लेकर हमारी एक स्थायी नीति अवश्य होनी चाहिएः पाकिस्तान हमारा स्थायी शत्रु है, इसके सर्वनाश तक हम शांत नहीं बैठंेगे। अगर पाकिस्तान का पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो भारत को हजार जख्म देने की नीति बना सकता है तो हमारी लाख जख्म देने की नीति होनी चाहिए और इसमें सततता और निरंतरता होनी चाहिए। इमरान खान भले ही शांति की भीख मांगे, लेकिन अब पाकिस्तान पर कतई एतबार नहीं किया जाना चाहिए।

पाकिस्तान से निपटने से पहले देश के भीतर बैठे आस्तीन के सांपों का सफाया भी जरूरी है। पाकिस्तान के खिलाफ रणनीति बनाते समय पड़ोस में बैठे चीन से कैसे निपटा जाना है, इसपर गंभीर विचार होना चाहिए क्योंकि असल में पाकिस्तान आजाद मुल्क न हो कर, चीन का बगलबच्चा है। चीन उसे भारत पर दबाव बनाने के लिए ‘बफर स्टेट’ की तरह इस्तेमाल करता है और पाकिस्तान के माध्यम से उसका प्रभाव क्षेत्र अफगानिस्तान तक फैला है जहां पाक समर्थित तालीबनी हर दूसरे दिन पुलवामा जैसे हमले करते रहते हैं।

भारत को सिर्फ चीन का ध्यान ही नहीं रखना होगा। देश के भीतर चीनी एजेंटों को भी चिन्हित कर ठिकाने लगाना होगा। पुलवामा हमले के बाद हमने देखा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जब सभी देश पाकिस्तान की निंदा कर रहे थे तब चीन कैसे उसकी ढाल बनकर खड़ा था। हम ये नहीं कहते की कांग्रेस अध्यक्ष चीनी एजेंट हैं, लेकिन जैसे डोकलाम विवाद के समय वो विदेश मंत्रालय को विश्वास में लिए बिना चीनी अधिकारियों से मिले और जैसे मानसरोवर यात्रा के बहाने वो चीनी मंत्रियों और अधिकारियों से मिले वो चिंताजनक तो है ही। चीन को लेकर भारतीय वामपंथियों और नक्सलियों पर शक करना भी जायज बनता है। बहरहाल कूटनीतिक चुनौतियों उतनी बड़ी नहीं हैं जितनी अंदरूनी एजेंटों की संेध, पुरानी कहावत है – घर का भेदी लंका ढाए।

जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी एजेंटों का बोलबाला रहा है। जाने-अनजाने कारणों से इन्हें कांग्रेसी सरकारों ने बहुत तरजीह दी। मोदी सरकार ने इनका सर कलम करने और इनकी जड़ों में मट्ठा डालने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इनकी सुरक्षा वापस लेने से लेकर इन्हें जेल में डालने तक, सरकार सही कदम उठा रही है। अच्छा होगा कि सरकार इस राज्य के नागरिकों को विशेष दर्जा देने वाला अनुच्छेद 35 ए भी समाप्त कर दे ताकि देश के अन्य नागरिक भी वहां बस सकेें। इससे कश्मीर में फैल रहे इस्लामिक कट्टरवाद पर तो लगाम लगेगी ही, खुद कश्मीरियों को भी देश के दूसरे हिस्सों के नागरिकों को समझने का अवसर मिलेगा। एक विशेष बात, पाकिस्तान कुछ कश्मीरियों को पश्चिमी देशों में ले जाकर मानवाधिकारों का नाटक भी करना चाहता है। सरकार को इस विषय में सतर्क रहना चाहिए। अगर भारत सरकार चाहे तो सिंधी, बलूची, मुहाजिर, पठान ही नहीं, पाक अधिकृत कश्मीर के ज्यादातर लोग भी पाकिस्तान के खिलाफ आवाज उठाने के लिए तैयार हैं। भारत को उनका पूरा सहयोग लेना चाहिए।

पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने के लिए आर्थिक विकल्प पर गहराई से विचार किया जाना चाहिए। पाकिस्तान इस समय अपने वजूद के सबसे गहन आर्थिक संकट से गुजर रहा है। भारत ने मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापस लेकर और उसके उत्पादों पर 200 प्रतिशत आयात शुल्क लगाकर उसकी कमर तोड़ने का आगाज तो कर दिया है। भारत के किसानों, कपड़ा, चमड़ा व्यापारियों आदि ने पाकिस्तान के साथ संपर्क तोड़ने का एलान कर दिया है जिसका वहां साफ असर दिखाई भी देने लगा है। लेकिन ये पर्याप्त नहीं है, भारत को इस विषय में अफगानिस्तान और ईरान के साथ मिलकर रणनीति बनानी होगी ताकि आर्थिक नाकेबंदी पूरी तरह से हो सके। ईरान में चाबहार पोर्ट बनने के बाद भारत ने अफगानिस्तान को अन्य वस्तुओं के साथ खाद्य सामग्री का सीधा निर्यात भी आरंभ कर दिया है। इससे कराची की आटा मिलों और अन्य वस्तुओं के व्यापार को अरबों का घाटा हुआ है।

चीन, पाकिस्तान में चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर बना रहा है जो दक्षिण चीन के शिनजियांग प्रांत शुरू होता है और पाक अधिकृत कश्मीर गुजरता हुआ बलूचिस्तान के ग्वादर में खत्म होता है। भारत पाक अधिकृत कश्मीर को अपना हिस्सा मानता है, लेकिन हमने इसका विशेष विरोध नहीं किया। अब आवश्यकता है कि भारत इस विषय में मुखर हो और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में इसका विरोध करे। पाकिस्तान में चीन की दखलअंदाजी रोकने की दृष्टि से भी ये महत्वूपर्ण है। इसी तरह ग्वादर, बलूचिस्तान का हिस्सा है जबकि बलूची खुद को पाकिस्तानी नहीं मानते। वहां बलूची, पाकिस्तानियों के साथ चीनियों के जुल्मों के शिकार भी हो रहे हैं। बलूची दुनिया भर में चीनी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं, भारत को उनकी आवाज में आवाज मिलानी चाहिए।

भारत और चीन के बीच करीब 85 अरब डाॅलर का व्यापार होता है। इसमें चीन करीब 52 अरब डाॅलर का निर्यात करता है जबकि भारत मात्र 32 अरब डाॅलर का। यानी भारत से व्यापार में चीन अधिक लाभ कमाता है। भारत को चीन से पाकिस्तान के संबंध में स्पष्ट रूप से बात करनी चाहिए और अपनी पसंद-नापसंद से उसे सार्वजनिक रूप से अवगत करवाना चाहिए। चीन ने लंबे अर्से तक अमेरिका को मूर्ख बना फायदा उठाया। डोनाल्ड ट्रंप अब उसे समझौते के लिए मजबूर कर रहा है कि नहीं? भारत को भी चीन से बात करनी ही चाहिए।

दुनिया में हवाला और आतंकी फंडिंग की निगरानी करने वाली फाइंनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने हाल ही पाकिस्तान की ये अपील ठुकरा दी कि वो सुधर गया है और उसे संदिग्ध देशों की ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर कर दिया जाए। भारत ने टास्क फोर्स को पुलवामा के बारे में समय से जानकारी दे ये सुनिश्चित किया कि पकिस्तान ‘ग्रे लिस्ट’ से बाहर न आने पाए। अब पाकिस्तान के पास अक्तूबर तक का समय है। अगर वो टास्क फोर्स द्वारा पेश की गई 27 शर्तों को पूरा नहीं कर पाया तो उसे ‘ब्लैक लिस्ट’ में डाल दिया जाएगा। भारत को हर हाल में ये सुनिश्चित करना चाहिए क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो उसे वल्र्ड बैंक और इंटरनेशनल माॅनिटरी फंड जैसी अंतरराष्ट्रीय विŸाीय संस्थाओं से कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा।

लेकिन इतना काफी नहीं है। भारत ने पाकिस्तान को जाने वाला पानी रोकने का एलान भी किया है। हालंाकि इसमें समय लगेगा, लेकिन अच्छी बात ये है कि इस विषय में निर्णय लेने के बाद सरकार ने संबंधित परियोजनाओं को पूरा करने में भी तत्परता दिखानी शुरू कर दी है।

भारत आई-टी क्षेत्र में दुनिया के सबसे उन्नत देशों में गिना जाता है। चीन साइबर क्षेत्र में युद्ध के लिए अपनी सेना तैयार कर चुका है। हमें देखना होगा कि हम इस क्षेत्र में कितने तैयार हैं। हम साइबर वल्र्ड मंे पाकिस्तान और उसके आका चीन को कितना नियंत्रित कर सकते हैं।

आज भारत के पास आधुनिकतम सैटेलाइट हैं जिनसे हम पाकिस्तान के चप्पे-चप्पे पर निगाह रख सकते हैं। क्या हम एक दीर्घकालिक नीति के तहत पाकिस्तान में अपने एजेंटों का जाल नहीं बिछा सकते जो जमीनी और तकनीकी सूचनाओं के आधार पर पाकिस्तान में जब चाहें भीतराघात कर सकें? पाकिस्तान से बदला लेने का अंततः तरीका तो यही है कि हम उसे उसके ही तरीके यानी प्राक्सी वाॅर से परास्त करें।

अंत में हम अनुरोध करेंगे कि पाकिस्तान से दुश्मनी होश में रह कर ही की जाए। आज भारत पाकिस्तान से हर क्षेत्र में बहुत-बहुत आगे है। हम कोई ऐसा काम न कर बैठें जो हमारी तरक्की और विकास को आघात पहंुचाए क्योंकि आखिर पाकिस्तान ही नहीं, चीन भी यही चाहता है।

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