“कितने जिन्ना, कितने पाकिस्तान, और सहेगा हिंदुस्तान?” in Punjab Kesari

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में मौहम्मद अली जिन्ना तस्वीर प्रकरण ने एक बार फिर भारत के विभाजन की यादें ताजा कर दीं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से आजादी के नारे लगाते एएमयू के छात्रों को देख कर लगा जैसे वक्त ठहर गया है। ऐसा लगा जैसे 1943 की तरह एक बार फिर एएमयू के छात्र रेलवे स्टेशन से जिन्ना की बग्घी को खुद घसीट कर ला रहे हैं। एक बार फिर पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री और एएमयू के पूर्व छात्र लियाकत अली खान यहां लौट आए हैं और एक बार फिर छात्र उन्हें कंधे पर उठा कर जश्न मना रहे हैं, एक बार फिर पाकिस्तानी सरकार ने फौज में भर्ती के लिए एएमयू में शिविर लगाया है….।

अगर बिना लागलपेट के कहा जाए तो एएमयू छात्रों का संघ विरोधी रवैया डराने वाला है। आजादी के 71 साल होने को आए, लेकिन इस विश्वविद्यालय के छात्रों के मनोविज्ञान में रत्ती भर भी फर्क नहीं आया। इनके लिए संघ हिंदुओं और भारत का प्रतीक है। संघ के खिलाफ नारों का अर्थ भारत और हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत प्रदर्शित करना ही है।

आश्चर्य नहीं कि संघ के खिलाफ नफरत भरे नारे लगाते इन लोगों के समर्थन में जल्द ही विभाजनकारी विचारधारा वाले अनेक तथाकथित छद्म बुद्धिजीवी और तुष्टिवादी नेता सामने आ गए। ये वही तुष्टिवादी लोग हैं जिन्होंने मुसलमानों की ‘पहचान’ की राजनीति को बढ़ावा दिया और उनसे ये कहने की हिम्मत नहीं की कि वो लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं और उन्हें इस देश के संविधान के हिसाब से ही चलना होगा। ये लोग ‘लोकतांत्रिक अधिकारों’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर इनका समर्थन कर रहे हैं, लेकिन हम सब जानते हैं कि इन लोगों ने हमेशा भारतीय लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लामिक कटट्टरवाद और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है। एएमयू के छात्रों की तरह ये भी भारत को एक राष्ट्र नहीं मानते। ये बात अलग है कि एएमयू के छात्रों के विघटनवादी रवैये के पीछे धर्म है तो इनके अलगाववाद के पीछे राजनीतिक विचारधारा।

इन छात्रों के पक्ष में सामने आए लोगों ने बिना शर्म जिन्ना का समर्थन किया। कुछ लोगों ने तो जिन्ना को महान बता दिया। समाजवादी पार्टी के गोरखपुर से नवनिर्वाचित सांसद परवीन निषाद ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में जिन्ना का योगदान गांधी-नेहरू से कम नहीं है। इसी तरह बहुजन समाज पार्टी से भारतीय जनता पार्टी में आए स्वामीप्रसाद मौर्य ने जिन्ना को महापुरूष बता दिया। उन्होंने कहा, “जिन भी महापुरूषों का योगदान इस राष्ट्र के निर्माण में रहा है यदि उन पर कोई उंगली उठाता है तो बहुत घटिया बात है।“ भारत से ज्यादा पाकिस्तान में मशहूर कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने जिन्ना को ‘कायदे आजम’ बता कर उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। कुल मिलाकार इन नेताओं ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि ये मुसलमानों को विघटनकारी मानते हैं और अगर उनके वोट लेना है तो उनकी इस प्रवृति को सही ठहराना होगा, उनका तुष्टिकरण करना होगा।

बहरहाल नेता तो छोटे-मोटे बयान देकर अलग हो गए, लेकिन तथाकथित अलगावादी और तुष्टिवादी बुद्धिजीवियों ने तो बाकायदा अंग्रेजी अखबारों में बड़े-बड़े लेख लिखकर जिन्ना का गुणगान शुरू कर दिया। एक सज्जन ने उनकी बढ़िया अंग्रेजी का हवाला देते हुए बताया कि “हमें जिन्ना से नफरत क्यों नहीं करनी चाहिए”। एक अन्य सज्जन के लेख का शीर्षक था – ”ये वक्त है जिन्ना को दोषमुक्त करने का“, वो कहते हैं – “विभाजन ने भारतीय मुसलमानों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया, लेकिन जिन्ना या मुस्लिम लीग पर आरोप लगाना इतिहास को सही विश्लेषण नहीं होगा।” एक महिला ‘चिंतक’ लिखती हैं – ”ये सप्ताह जिन्ना की विरासत के लिए सहानुभूतिपूर्ण नहीं रहा, न ही भारत में, न पाकिस्तान में“। एक स्वनामधन्य ‘कम्युनिस्ट इतिहासकार’ ने बंटवारे के लिए सावरकर और गोलवलकर को जिम्मेदार ठहरा दिया जैसे ‘भारत के मुसलमान’, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के नेता कभी विभाजन चाहते ही नहीं थे।

हिंदुओं और मुसलमानों में टकराव का सैकड़ों साल का इतिहास रहा है। भारत के विभाजन का इतिहास भी कम जटिल नहीं है। किसने दो राष्ट्र का सिद्धांत पहले दिया, इस पर भी विवाद है। किसने क्या कहा और उसकी व्याख्या क्यों और कैसे की गई, उसपर भी मतभेद है। लेकिन एक बात तो शीशे की तरह साफ है कि भारत के बंटवारे में तीन पक्ष थे – जवाहरलाल नेहरू (कांग्रस), मौहम्मद अली जिन्ना (मुस्लिम लीग) और वायसराय माउंटबेटन (ब्रिटेन)। इन तीनों ने मिल कर क्या किया, क्या खिचड़ी पकाई, इसमें न तो हिंदू महासभा का कोई हाथ था और न ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का। अगर बंटवारे के लिए कोई जिम्मेदार है, तो ये तीन पक्ष हैं। इसलिए अगर देश को तोड़ने में जिन्ना का हाथ है, तो नेहरू का भी और माउंटबेटन का भी।

साम्यवादी रूझान वाले नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने तो उनकी सरपरस्ती में कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने जो इतिहास लिखा गया, उसमें उन्हें कोमल हृदय वाला ‘बच्चों का चाचा’ बताया गया और उनके सारे गुनाह माफ कर दिए गए। अब विभाजन के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना था तो सारा दोष जिन्ना के मत्थे मढ़ दिया गया। अंग्रेजों के प्रति नेहरू का नरम रवैया भी किसी से छिपा नहीं है, नतीजतन आजादी के बाद हम काॅमनवेल्थ में शामिल हो गए और अंग्रेजों को माफ कर दिया गया। हमने खुद पर जुल्म की इंतेहा करने वाले अंग्रेजों की जगह एक नया दुश्मन ढूंढा – हिटलर और उसका नाजीवाद। भारत में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नाजीवाद का वंशज करार दिया गया और उसका घेराव शुरू हो गया। ये रणनीति देश में बचे विघटनकारी मुसलमानों को तुष्ट करने के लिहाज से भी लाभदायक थी। उन्हें हिंदुओं के प्रति अपनी नफरत निकालने के लिए एक ‘टारगेट’ दे दिया गया। संघ पर निशाना साधने वालों ने एक बार भी ये नहीं सोचा कि उसकी ‘राष्ट्र की अवधारणा’ हिटलर के ‘राष्ट्रवाद’ से कितनी और कैसे अलग है। भारत को एक ‘राष्ट्र’ मानने का विचार कितने हजार साल पुराना है?

संघ को निशाना बनाने की नीति कम्युनिस्टों के लिए भी मुफीद थी। अगर मुसलमान खूद को अंतरराष्ट्रीय उम्माह का हिस्सा पहले मानते हैं, तो कम्युनिस्ट भी खुद को अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन का अंग पहले मानते हैं। उनका ‘राष्ट्र’ से कोई लेना देना नहीं है। यही कारण रहा है कि इन्होंने हमेशा आजादी की लड़ाई, गांधी, सुभाषचंद्र बोस आदि का मजाक उड़ाया और सोवियत संघ और चीन का समर्थन किया।

आजादी के बाद नेहरू और उनके साम्यवादी चेलों ने इतिहास को जैसे विकृत किया, उसकी कहानी फिर कभी, हम लौट कर फिर जिन्ना पर आते हैं। ये ठीक है कि विभाजन के लिए नेहरू और माउंटबेटन को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, लेकिन क्या हम जिन्ना का वैसे महिमामंडन कर सकते हैं जैसे आजकल तुष्टिवादी लेखक या नेता कर रहे हैं? हरगिज नहीं।

हमारा साफ मत है कि किसी व्यक्ति को उसकी कथनी के आधार पर नहीं, करनी के आधार पर तौलना चाहिए। ये सही है कि जिन्ना ने अपनी राजनीति कांग्रेसी नेता के रूप में शुरू की। अंग्रेजों ने जब 1916 में बालगंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया, तो जिन्ना ने उनका मुकदमा लड़ा और जीत हासिल की। ये सही है कि 11 अगस्त 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा मंे अपने मशहूर भाषण में जिन्ना ने ‘धर्म निरपेक्षता’ का समर्थन किया। ये भी सही है कि पाकिस्तान जाने के बावजूद उनका दिल उनके मुंबई वाले बंगले (भारत के लिए नहीं) के लिए धड़कता था, लेकिन इन सबके बावजूद जिन्ना का एक घिनौना सांप्रदायिक चेहरा भी था।

जिन्ना ने हिंदुओं और अंग्रेजों को मुसलमानों की ताकत दिखाने के लिए 16 अगस्त, 1946 को कोलकाता में ‘डायरेक्ट ऐक्शन डे’ की घोषणा की। इसके बाद सप्ताह भर भीषण दंगे हुए जिसमें हजारों बेगुनाह मारे गए। इस सप्ताह को ‘वीक आॅफ लांग नाइव्स‘ कहा जाता है। इसके बाद मुस्लिम लीग ने पूरे देश में हिंसा का खेल खेला। जब माउंटबेटन ने आजादी की घोषण की तो एक बार फिर भयानक खून खराबा हुआ। एक अनुमान के अनुसार इसमें 20 लाख लोग मारे गए और तीन करोड़ से ज्यादा विस्थापित हुए। इस हिंसा के दौरान जिन्ना ने एक बार भी शांति की अपील नहीं की। 11 अगस्त 1947 को ‘धर्म निरपेक्षता’ का भाषण देने वाले जिन्ना ने मुसलमानों को एक बार भी नहीं कहा कि हिंदुओं का कत्ले आम न करें। इसके विपरीत जिन्ना ने अपने सेना प्रमुख को कश्मीर में सेना भेजने का आदेश दिया ताकि उसपर कब्जा किया जा सके। 20 अगस्त 1947 को पाकिस्तानी सेना ने जम्मू-कश्मीर पर कबाइलियों के हमले के बारे में ‘आॅपरेशन गुलमर्ग’ तैयार किया। सितंबर की शुरूआत में ही तबके पाकी प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने सेना को अधिकृत किया कि वो कश्मीर में बगावत शुरू करवाए और चार सितंबर को 400 सैनिक कश्मीर में घुस गए। जाहिर है जिन्ना बंगाल में अपनाई गई ‘डायरेक्ट एक्शन’ की रणनीति कश्मीर में अपनाना चाहते थे।

इधर कश्मीर में पाकी सैनिक उत्पात मचा रहे थे, उधर जिन्ना ने बलूचिस्तान को हड़पने की रणनीति भी बना ली थी। ध्यान रहे जिन्ना बलूचिस्तान के राजा खान आॅफ कलात अहमद यार खान के वकील रह चुके थे और उन्होंने बलूचिस्तान की आजादी के लिए उनके प्रतिनिधि के तौर पर अंग्रेजों से बात भी की थी। इसकी एवज में खान आॅफ कलात ने उन्हें उनके वजन के बराबर सोना दिया था। लेकिन जिन्ना ने उनसे गद्दारी करने में कोई वक्त बर्बाद नहीं किया और 28 मार्च 1948 को उनकी रियासत को जबरदस्ती पाकिस्तान में शामिल कर लिया या कहें हड़प लिया। बहुत कम लोगों को ज्ञात होगा कि मार्च 1946 में खान आॅफ कलात ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य समद खान के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल तबके कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम अजाद के पास स्वतंत्र बलूचिस्तान के लिए अपना पक्ष रखने के वास्ते भेजा था, लेकिन आजाद ने उन्हें ये कह कर टरका दिया कि आजाद बलूचिस्तान ब्रिटिश अड्डे के रूप में काम करेगा जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए हानिकारक होगा। आजाद को बलूचिस्तान के ब्रिटिश पिट्ठू बनने की आशंका थी, मगर क्या उन्हें जिन्ना की असलियत और  षडयंत्र नहीं मालूम था? अगर कांग्रेस नेतृत्व बलूच प्रतिनिधिमंडल को गंभीरता से लेता तो शायद इतिहास कुछ और ही होता।

आज विभाजन के लिए असली खलनायकों को जिम्मेदार ठहराने की जगह संघ पर निशाना साधने वाली कांग्रेस ने असल में विभाजन के दौरान संदिग्ध भूमिका निभाई। विभाजन के समय पंजाब प्रांत में गवर्नर सर इवान जेनकिंस को शासन था। इसके पीछे कहानी ये है कि 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग को 175 में 73 सीटें मिलीं, लेकिन सरकार बनाई यूनियनिस्ट पार्टी के गठबंधन ने जिसमें कांग्रेस और अकाली दल शामिल थे। मुस्लिम लीग ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया। आखिरकार गठबंधन के मुख्यमंत्री सर खिजर टिवाना ने 2 मार्च 1947 को इस्तीफा दे दिया, लेकिन मुस्लिम लीग सरकार नहीं बना पाई और वहां सर जेनकिंस का शासन हो गया जो विभाजन तक चला। जाहिर है पंजाब में कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों का अच्छा खासा असर था, लेकिन इसने क्यों इतनी सरलता से पंजाब का विभाजन होने दिया? इसी तरह नाॅर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राॅविंस में भी कांग्रेस की सरकार थी। 1946 के चुनावों में उसे 50 में से 30 सीटें मिलीं थीं जबकि मुस्लिम लीग को सिर्फ 17। इतने प्रबल बहुमत और खान अब्दुल गफ्फार खान जैसा नेता होने के बावजूद कांग्रेस ने इस इलाके को जिन्ना के हवाले क्यों कर दिया? खान मुस्लिम लीग से नफरत करते थे और धार्मिक आधार पर बंटवारे के खिलाफ थे। अपनी इच्छा के विरूद्ध पाकिस्तान का हिस्सा बनाए जाने पर उन्होंने कांग्रेसी नेताओं को कहा था – ”आपने हमें भेड़ियों के हवाले कर दिया है”। बलूचिस्तान के राजा ने भी कांग्रेसी नेताओं के पास अपने दूत भेजे थे, उन्होंने उनके प्रस्तावों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया?

आज जब जिन्ना का सवाल उठता है तो कांग्रेसी और कम्युनिस्ट नाथूराम गोडसे पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगते हैं, जबकि हकीकत ये है कि गोडसे उस समय देश के हालात से दुखी और कांग्रेसी नेताओं के संदिग्ध और समझौतावादी रवैये से नाराज एक युवक था। गोडसे ने गांधी की हत्या कर निश्चित ही अपराध किया, परंतु गोडसे ने तो सिर्फ एक व्यक्ति को मारा, विभाजन में जो लाखों लोग मारे गए उसके लिए जिन्ना और माउंटबेटन के साथ नेहरू और उसके सहयोगी क्यों जिम्मेदार न माने जाएं?

कांग्रेस, मुस्लिम लीग और अंग्रेजों में विभाजन को लेकर कैसे क्या बात हुई, कौन-कौन से समझौते हुए और क्यों हुए, कांग्रेसी नेताओं ने इतनी आसानी से हथियार क्यों डाल दिए, खान अब्दुल गफ्फार खान से दगा क्यों किया गया, बलूचिस्तान के राजा की क्यों उपेक्षा की गई? कश्मीर पर नेहरू मंत्रीमंडल की सहमति के बिना संयुक्त राष्ट्र क्यों चले गए? अनगिनत सवाल हैं, अगर कोई निष्पक्ष इतिहास लिखे, तो संभव है इनके जवाब भी मिलें। लेकिन जिन्ना को महिमामंडित करने के लिए गोडसे का तिरस्कार अब बंद होना चाहिए।

एएमयू में जिन्ना की तस्वीर रहे या जाए, ये मुद्दा बहुत छोटा है, बड़ा मुद्दा तो ये है कि भारत से जिन्ना की विभाजनकारी मानसिकता जानी चाहिए और इसके लिए निर्भीकता से आवाज उठाई जानी चाहिए। भारत अब एक और विभाजन सहन नहीं कर सकता।

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