“रूमानियत और कागजी आदर्शवाद नहीं, अपने हितों को ध्यान में रखकर ही आरसेप में शामिल हो भारत” in Punjab Kesari

भारत और आसियान (एसोसिएशन आॅफ साउथईस्ट एशियन नेशंस) के संबंधों की रजत जयंती के अवसर पर मोदी सरकार ने आसियान के सभी दस देशों के राष्ट्राध्यक्षों को गणतंत्र दिवस के अवसर पर आमंत्रित किया। इन राष्ट्राध्यक्षों ने 26 जनवरी की परेड में तो भाग लिया ही, राजनयिक और व्यापारिक संबंधों के बारे में विस्तृत बातचीत भी की।

अन्य आसियान नेताओं के अलावा इंडोनशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदो और सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली हसेन लूंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ये सुनिश्चित करने के लिए खासतौर से आग्रह किया कि आरसेप (रीजनल काॅम्प्रीहेंसिव इकाॅनाॅमिक पार्टनरशिप) को लेकर चल रही वार्ता इस वर्ष अवश्य पूरी हो जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने इस विषय में अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन भारत को इसके कई पहलुओं पर गंभीर आपत्तियां भी हैं।
इस विषय में आगे बात करने से पहले आइए जान लेते हैं कि आखिर आरसेप है क्या। असल में ये आसियान के दस देशों और छह अन्य देशों (भारत, चीन, जापान, आॅस्ट्रेलिया, न्यूजी लैंड, और दक्षिण कोरिया) का एक प्रस्तावित आर्थिक समूह है जो आपस में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट चाहता है। इस समूह के बारे में सबसे पहले वर्ष 2011 में सुगबुगाहट शुरू हुई। हालांकि इस पर पहली औपचारिक बैठक वर्ष 2012 में कंबोडिया में आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान हुई। इस पर अब तक 17 बैठकें हो चुकी हैं। इसका पहला शिखर सम्मेलन पिछले वर्ष नवंबर में फिलीपींस की राजधानी मनीला में हुआ। आरसेप को अमेरिका नीत ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप (टीपीपी) का जवाब माना जा रहा है जिसमें अनेक अमेरिकी और एशियाई देश शामिल हैं पर भारत और चीन को इसमें जगह नहीं मिली है।

उम्मीद की जा रही है कि इस वर्ष सिंगापुर में होने वाले आसियान शिखर सम्मेलन के साथ ही आरसेप का शिखर सम्मेलन भी होगा जिसमें अंततः इस पर हस्ताक्षर हो जाएंगे।

आरसेप पर सिर्फ संबंधित देशों की ही निगाह नहीं है, दुनिया भर के देश इस पर नजर जमाए बैठे हैं क्योंकि ये अपनी तरह का अब तक का सबसे बड़ा व्यापारिक गठबंधन होगा। 2017 के आंकड़ों के हिसाब से अगर इसकी आर्थिक और डेमोग्राफिक क्षमताओं का आकलन करें तो पता चलेगा कि अगर ये बना तो इसमें 3.4 अरब लोग शामिल होंगे। इसके सदस्य देशों का सकल घरेलू उत्पाद (ग्राॅस डोमेस्टिक प्राॅडक्ट, जीडीपी) 45.9 ट्रिलियन डाॅलर होगा जो कि विश्व की कुल जीडीपी का 39 प्रतिशत होगा। ये दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेडिंग ब्लाॅक होगा जिसमें दुनिया की आधी अर्थव्यवस्था शामिल होगी। एक अनुमान के अनुसार 2050 तक इसकी जीडीपी 250 ट्रिलियन डाॅलर तक पहुंच जाएगी। और भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं को मिलाकर ये दुनिया की तीन चैथाई अर्थव्यवस्था पर काबिज होगा।

आरसेप के बारे में जैसा विचार किया जा रहा है, अगर सचमुच वैसा हो गया तो 21वीं सदी वास्तव मंे एशिया की ही होगी। दुनिया का अर्थ संतुलन पश्चिम से खिसक कर पूर्व में आ जाएगा। जाहिर है इसे लेकर आसियान देश ही नहीं, चीन भी काफी उत्सुक है। संभवतः यही कारण है कि उसने डावोस में वल्र्ड इकाॅनाॅमिक फोरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के तुरंत बाद उसका स्वागत किया। डावोस में मोदी ने अपने भाषण में विकसित देशों के बढ़ते हुए इकाॅनाॅमिक प्रोटेक्शिनिस्म (आर्थिक संरक्षणवाद) पर चिंता जताई थी और इसे दुनिया के सामने मौजूद सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक बताया था।
मोदी के भाषण पर चीन की उत्साही प्रतिक्रिया का विशेष कारण भी है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद संभालने और ‘अमेरिका फस्र्ट’ नीति लागू होने के बाद सबसे बड़ी चुनौती चीन के सामने ही खड़ी हुई है जिस पर अमेरिका अवैध डंपिंग और एकपक्षीय आर्थिक नीतियों का आरोप लगाता रहा है। वर्ष 1985 के बाद अमेरिका ने पहली बार पिछले वर्ष नवंबर में चीन के खिलाफ एल्यूमिनियम शीट्स की डंपिंग के मामले में जांच शुरू की। इसी वर्ष 23 जनवरी को अमेरिका ने चीन की वाशिंग मशीनों और सोलर पेनल्स पर आयात शुल्क बढ़ा दिया। उसने चीन पर आरोप लगाया कि वो इनके उत्पादन पर सबसिडी देता है और फिर सस्ते माल को उसके यहां डंप करता है।

भारत आरसेप का प्रबल समर्थक है और इस संबंध में एक बैठक तो भारत में भी हो चुकी है, लेकिन अमेरिका की तरह भारत को भी चीन की आर्थिक नीतियों पर सख्त एतराज है। चीन की डंपिंग नीतियों का असर भारत के मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र पर व्यापक रूप से पड़ा है। भारत में अशिक्षित या अल्पशिक्षित बेरोजगार युवाओं की बड़ी तादाद है और ‘मेक इन इंडिया’ नीति के तहत मोदी सरकार इन्हें मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में रोजगार देना चाहती है क्योंकि इन्हें उच्चस्तरीय कौशल वाले सर्विस सेक्टर में काम देना लगभग असंभव है। अगर भारत अपने हितों को सुनिश्चित किए बिना आरसेप में शामिल होता है और आयात शुल्क घटा देता है तो उसका मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तबाह होने की कगार पर पहुचं जाएगा।

समझा जाता है कि रजत जयंती समारोह के दौरान होने वाली चर्चाओं में भारत पर आयात शुल्क घटाने का दबाव भी डाला गया। लेकिन भारत आनन-फानन में कोई फैसला लेने के लिए तैयार नहीं है। पहले ही व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में है, भारत चीन को और माल डंप करने की अनुमति देने का जोखिम नहीं उठा सकता।

आरसेप को लेकर भारत की दूसरी बड़ी आपत्ति सर्विस सेक्टर में आसियान देशों के कड़े नियमों को लेकर है। भारत चाहता है कि आरसेप पर हस्ताक्षर से पहले ये देश अपने नियमों को सरल और उदार बनाएं ताकि ज्यादा तादाद में भारतीय भी वहां काम कर सकें। भारत चाहता है कि आरसेप में फ्री-ट्रेड से जुड़े जो भी समझौते हों वो न्यायसंगत हों। जाहिर है सिर्फ कागजी आदर्शवाद और रूमानियत से काम नहीं चलता। भारत जो भी समझौता करेगा, वह दीर्घकालिक हितों के बारे में सोच कर ही होगा। वैसे भी भारत के प्रति चीन का जो रवैया है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शीत युद्ध के बाद अमेरिकी एकाधिकारवाद और दादागिरी को रोकने के लिए चीन, भारत और रूस ने रिक (रशिया-इंडिया-चाइना गठबंधन) और एससीओ (शंघाई काॅओपरेशन आॅर्गनाइजेशन) जैसे अनेक गठबंधनों की परिकल्पना की। लेकिन अब हालात ये हैं कि दुनिया अमेरिकी दादागिरी से ज्यादा विस्तारवादी चीनी दादागिरी से चिंतित है। चीन अब दुनिया का बेताज बादशाह बनना चाहता है और इसके लिए सही, गलत हर पैंतरा आजमाने के लिए तैयार है। उसके बाद विदेशी मुद्रा के बड़े भंडार हैं जिनके बल पर वो गरीब देशों को बंधक बनाना चाहता है। उसकी तानाशाही शासन व्यवस्था में मजदूरों से मध्ययुग से भी बदतर हालात में कम से कम मजदूरी पर काम करवाया जाता है। इनके दम पर वो बहुत कम कीमत पर सामान तैयार करवाता है और दुनिया भर में डंप करता है और विदेशी मुद्रा कमाता है। चीन के साथ एक और परेशानी ये है कि वो अपने हितों के आगे किसी अंतरराष्ट्रीय कानून या समझौते का पालन नहीं करता। पाक अधिकृत कश्मीर में चाइना-इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर की परियोजनाएं और साउथ चाइना सी के कृत्रिम द्वीप इसके ताजा उदाहारण हंै। चीन के इसे रवैये के कारण भारत को अब जापान, आॅस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ मिल कर क्वाड्रीलेटरल (चार भुजाओं वाला) बनाना पड़ रहा है।

अभी जो हालात है, अगर उनमें आरसेप बनेगा तो निःसंदेह भारत की अपेक्षा आसियान देशों को ज्यादा लाभ मिलेगा। इसके अनेक कारण हैं। उनकी अर्थव्यवस्थाएं भारत से कहीं पहले ग्लोबलाइसेशन और लिबरलाइसेशन (वैश्वीकारण और उदारवाद) की राह पर चल पड़ी थीं। उनका क्षेत्रफल और आबादी कम हैं और अर्थव्यवस्थाएं अधिकतर निर्यात आधारित हैं। भारत में उन्हें बड़ा बाजार मिलेगा, लेकिन इस पूरी कवायद में भारत को क्या मिलेगा?

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय नरसिम्हा राव ने ‘लुक ईस्ट’ नीति की नींव रखी, प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ‘एक्ट ईस्ट’ कर दिया और इसके साथ भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को जोड़ दिया। अगर भारत न्यायसंगत, तार्किक, दूरगामी नीतियों के साथ आरसेप से जुड़े तो पड़ोसी म्यांमार से लेकर जापान तक, भारत के लिए भी असंख्य संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं, लेकिन बहुत कुछ निर्भर करेगा हमारे वार्ताकारों के कौशल और बुद्धिमत्ता पर। वो आखिरकार किन शर्तों के साथ इसमें शामिल होते हैं। कहना न होगा नए नए आर्थिक गुटों की सदस्यता के साथ ही भारत को आंतरिक अर्थव्यवस्था पर भी पहले से कहीं अधिक ध्यान देना होगा।
आखिर में सिर्फ एक बात – भारत अपने हितों के खिलाफ आरसेप में शामिल न हो। सदाशयता के आभाव में क्षेत्रीय गठबंधनों का क्या हश्र होता है ये हम सार्क (साउथ एशियन एसोसिएशन फाॅर रीजनल काॅओपरेशन) में देख चुके हैं जिसे पाकिस्तान की हठधर्मी और शत्रुता ने एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने दिया।

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