“आतंकवाद पर पाक फिर बेनकाब” in Punjab Kesari

ब्रिक्स घोषणापत्र में पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों का उल्लेख भारत की महत्वपूर्ण कूटनीतिक विजय के रूप में देखा जा रहा है। सही मायनों में ये जीत है भी। लेकिन इस घोषणापत्र में आतंकवाद और बहुत से अन्य विषयों में भी और बहुत सी महत्वपूर्ण बातें हैं जो भारत के पक्ष में हैं और अनेक अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भारत के रूख को सही साबित करती हैं।

घोषणापत्र में आतंकवाद से संबंधित हिस्सों पर विचार करने से पहले आइए देखते हैं कि कैसे भारत के कंधे पर बंदूक रख कर चीन ने अपने विश्वसनीय सदाबहार सहयोगी पाकिस्तान को आतंकी संगठनों के खिलाफ चेतावनी दी। आमतौर से माना जाता है कि चीन संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने का विरोध करता है। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर चीन न चाहता तो जैश ए मौहम्मद को संयुक्त राष्ट्र के प्रावधानों के तहत वर्ष 2001 में अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन नहीं घोषित किया जाता। आजकल जैश प्रमुख मौलाना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किए जाने को लेकर मामला गर्म है क्योंकि चीन बैठक दर बैठक इसका विरोध करता आ रहा है। लेकिन ये समझना आवश्यक है कि मसूद अजहर मामले में पाकिस्तान का पक्ष लेने का ये मतलब ये नहीं कि चीन उसका समर्थन करता है।

इसी वर्ष जून में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अफगानिस्तान और फिर पाकिस्तान का दौरा किया। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी से वार्ता में यी ने आश्वासन दिया कि वो पाकिस्तान को अपने यहां चल रहे आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने के लिए कहेंगे। पाकिस्तान पहुंचने पर यी ने अपने वादे के मुताबिक पाकिस्तान को अच्छी तरह लताड़ लगाई। कहा जाता है कि यी ने पाकिस्तानी अधिकारियों से ये तक पूछा कि चीन कब तब उनकी लड़ाई लड़ेगा। असलियत ये है कि चीन भी आतंकवादियों को लेकर पाकिस्तानी हठधर्मिता से तंग आ चुका है। चीन पाकिस्तान में 46 अरब डाॅलर की लागत से आर्थिक गलियारा (चीन-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरिडोर, सीपैक) बना रहा है और उसका विस्तार अफगानिस्तान में भी करना चाहता है। लेकिन चीन को चिंता है कि यदि पाकिस्तान में आतंकवादियों का ऐसे ही बोलबाला रहा तो वो इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर कैसे बनाएगा और यदि बना भी लिया तो चलाएगा कैसे और कब तक?
ब्रिक्स घोषणापत्र में पाकिस्तानी आतंकी संगठनों का उल्लेख कर चीन ने सीधे सीधे पाकिस्तान को चेतावनी दी है और पाकिस्तानी हुक्मरान और मीडिया ये समझ भी गए हैं। वहां के मशहूर पत्रकार रऊफ क्लासरा कहते हैं – ”हमने आतंकवादी संगठनों पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकी को हलके में लिया पर अब तो चीन अपनी धरती से हमें चेतावनी दे रहा है और उसके साथ रूस भी है। ये सभी सुपर पावर हैं, पाकिस्तान को अब तो जाग जाना चाहिए। ये भारत की बड़ी जीत है, लेकिन पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी भी है।”

पाकिस्तान में आतंकवादी सीधे सेना के नीचे काम करते हैं और उन्हें तथाकथित चुनी हुई सरकारें सेना के निर्देश पर समर्थन देती हैं। चीन की धरती से आई ये चेतावनी सीधे पाकिस्तानी सेना के लिए है। लेकिन सवाल ये है कि क्या इसका कोई असर होगा? फिलहाल पाकिस्तान पर इसका भले ही कोई असर न हो पर घोषणापत्र में सीधे पाकिस्तानी संगठनों पर हमला करके चीन ने खुद को अवश्य ही दुविधा में डाल लिया है। चीनी विदेशनीति विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन पाकिस्तान को समझाने की कोशिश जरूर करेगा, लेकिन क्या वो आगामी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में मसूद अजहर मामले में भारत का समर्थन करेगा? ये अभी स्पष्ट नहीं है। वैसे भी घोषणापत्र में जिन संगठनों का जिक्र हुआ है वो पहले ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित हैं। लंबे अर्से में इस घोषणापत्र का चाहें जो असर हो, लेकिन ट्रंप की चेतावनी के तुरंत बाद ब्रिक्स में बदनामी, पाकिस्तान को थोड़ा मुश्किल में जरूर डालेगी।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पहले डोकलाम और फिर पाक स्थित आतंकी संगठनों पर अपने रवैये में परिवर्तन का संकेत देकर निसंदेह भारत को सकारात्मक संकेत दिए हैं। ब्रिक्स सम्मेलन के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय वार्ता में भी दोनों देशों ने पुरानी बातें छोड़ कर आगे बढ़ने की बात कही। वैसे भी भारत के साथ तनाव घटाना चीन के सामरिक हित में भी है। साउथ चाइना सी से लेकर उत्तरी कोरिया तक, चीन अनेक विवादों में फंसा है। अगर भारत के साथ तल्खी बढ़ती तो चीन के लिए एक और मोर्चा खुल जाता। अब देखना होगा कि चीन अपनी बातों पर कब तक और कहां तक टिकता है? वो पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया जैसे बदनाम सहयोगियों को कब तक ढोता है? वैसे भारतीय विशेषज्ञ सरकार को यही सलाह देंगे कि भले ही चीन के साथ तनाव कम हो गया हो, पर भारत अपनी सामरिक तैयारियों में ढील न आने दे।

अब हम देखते हैं कि ब्रिक्स घोषणापत्र में कैसे पैरा दर पैरा ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद की भत्र्सना की, उससे निपटने क उपाय सुझाए और कैसे इस सबमें भारत के अनुभव की झलक मिलती है। शुरूआत करते हैं पैरा 47 से जिसमें इस क्षेत्र में आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित अफगानिस्तान की चर्चा है। इसमें भारत का दृष्टिकोण ही नहीं, चीनी विदेश मंत्री वांग यी का प्रत्यक्ष अनुभव भी झलकता है। ध्यान रहे इसका निशाना ओर कोई नहीं पाकिस्तान ही है। इस पैरा में अफगानिस्तान में आतंकवादी हमलों की कड़ी भत्र्सना की गई हैं। इसमें कहा गया है कि अफगानिस्तान में हिंसा तुरंत रोकने की आवश्यकता है। हम अफगानिस्तान के नेतृत्व में अफगानियों द्वारा अपनाए गए शांति और राष्ट्रीय सुलह सफाई के प्रयासों के पक्ष में हैं। हम अफगानिस्तान पर बातचीत के ‘माॅस्को फाॅर्मेट’ और ‘हार्ट आॅफ एशिया इस्तांबुल प्राॅसेस का समर्थन करते हैं। ज्ञात हो कि इन दोनों में ही भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। पाकिस्तान खुद को अफगानिस्तान समस्या का प्रमुख पक्ष मानता है, लेकिन इसमें कहीं भी उसकी भूमिका का अलग से उल्लेख नहीं हुआ। उलटे अफगानिस्तान पर आतंकवादी हमलों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से उसकी आलोचना ही की गई। ध्यान रहे अफगान समस्या के हल के लिए पाकिस्तान चैमुखी नीति का समर्थन करता है जिसमें उसके और अफगानिस्तान के अलावा चीन और अमेरिका शामिल हों। कहना न होगा इस घोषणापत्र के जरिए रूस ने भी अफगानिस्तान मसले में अपनी भूमिका को उजागर किया है।

घोषणपत्र के बहुचर्चित पैरा 48 में तालिबान, आईएसआईएल/ दाएश, अल कायदा, इनके सहयोगी इस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट आॅफ उजबेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर ए तोएबा, जैश ए मौहम्मद, टीटीपी और हिज्ब उत तहरीर के नाम दिए गए हैं।

इसके तुरंत बाद पैरा 49 में कहा गया है कि हम ब्रिक्स देशों सहित पूरे विश्व में आतंकवादी हमलों की निंदा करते हैं। हम मानते हैं कि जो लोग आतंकवादी गतिविधियां करते हैं, इनकी योजना बनाते हैं या ऐसे कृत्यों का समर्थन करते हैं, उन्हें जिम्मेदार ठहराया ही जाना चाहिए।

घोषणापत्र के पैरा 50 में सभी देशों से आहवान किया गया है कि वो आतंकवाद से लड़ने के लिए विस्तृत दृष्टिकोण अपनाएं जिसमें कट्टरवाद का विरोध, आतंकवादियों की नियुक्ति, विदेशी आतंकवादियों की आवजाही, आतंकियों के धन स्रोत पर रोक लगाना आदि शामिल हो।

पैरा 51 में बिल्कुल वही बात कही गई है जो प्रधानमंत्री मोदी आतंकवाद के विषय में दुनिया भर में कहते रहे हैं और जिसका उल्लेख उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में अपने संबोधन में भी किया था। इसमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आहवान किया गया है कि वो संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में व्यापक आतंकविरोधी गठबंधन तैयार करे। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत हो। इसमें आतंकी गुटों और आतंकवादियों को नामित करने आदि में संयुक्त राष्ट्र की प्रभावोत्पादकता बढ़ाने में पूरा समर्थन देने की बात कही गई है और सभी सदस्यों से कहा गया है कि वो बहुत लंबे अर्से से लटकी काॅम्प्रीहैंसिव कनवेंशन आॅन इंटरनेशनल टैररिज्म को आम सभा में पारित करवाएं ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद और आतंकवादी की परिभाषा स्पष्ट हो सके और इस पर अवसरवादी सुविधाजनक रवैया न अपनाया जा सके।

इन पैराग्राफ्स के अलावा, ब्रिक्स घोषणापत्र में और भी कई स्थानों पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवाद और मानवता पर इसके खतरे का उल्लेख है। ये पाकिस्तानी सेना और उसके द्वारा पाले पोसे जा रहे आतंकवादियों के लिए चेतावनी है। वो इसे जितना जल्दी समझ सकें, उनके लिए उतना ही बेहतर होगा।

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