”तानाशाह शी” और ”लोकतांत्रिक भारत” के समक्ष विकल्प in Punjab Kesari

चीनी संसद ने 17 मार्च को एकमत से शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बने रहने के प्रस्ताव को पारित कर दिया। शी के साथ ही उनके निकटतम सहयोगी और कट्टर राष्ट्रवादी वांग कीशान को उपराष्ट्रपति बनाने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया गया। जाहिर है इसकी तैयारी लंबे अर्से से चल रही थी। इन खबरों के मद्दे नजर भारत में चीन के प्रति रवैये में निश्चित ही बदलाव नजर आया। भारत सरकार ने दलाई लामा के प्रति अपने अति उदारवादी रवैये को थोड़ा नियंत्रित किया और साथ ही दोनो देशों के संबंधों का दूरगामी विश्लेषण भी आरंभ किया। चीन की वैश्विक भूमिका को लेकर शी की महत्वाकांक्षी योजनाओं और अमेरिका के साथ ट्रेड वाॅर के बढ़ते खतरे के आलोक में समयानुसार भारत के लिए नीतिगत समायोजन (एडजस्टमेंट) आवश्यक भी है।
शी को आजीवन राष्ट्रपति पद सौंपने का चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का मकसद क्या है? इसका भारत के लिए क्या अर्थ है और उसके समक्ष क्या विकल्प हैं? इसे समझना आवश्यक है। भारत में कम्युनिस्ट, राष्ट्रवाद और देशप्रेम को गाली मानते हैं, लेकिन चीन में शी इन्हीं विशेषताओं के कारण आजीवन राष्ट्रपति पद पर कब्जा जमा कर बैठ गए हैं। उन्होंने चीन के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य विकास के लिए नया समाजवादी विचार प्रस्तुत किया है जो कट्टरवादी साम्यवाद से बहुत अलग है और राजनीतिक विचारधारा में चीन के इतिहास तथा वर्तमान विशेषताओं और आवश्यकताओं के समायोजन में विश्वास रखता है। संक्षेप में कहें तो इसका मकसद साम्यवाद का विकास नहीं, चीन का विकास है। पिछले साल 18 से 24 अक्तूबर के बीच हुई चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं नेशनल कांग्रेस में पार्टी के संविधान में शी की इस नई मार्गदर्शक विचारधारा को शामिल किया गया। इसे ”नए युग के लिए समाजवाद का चीनी अभिलक्षणों वाला शी जिनपिंग विचार“ कहा गया। माओ के बाद यह पहली बार था जब किसी जीवित नेता के विचारों को उसके नाम के साथ पार्टी के संविधान में शामिल किया गया।
कांग्रेस के पहले दिन यानी 18 अक्तूबर को अपने उद्घाटन भाषण में शी ने चीन को विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का खाका पेश किया। चीनी सेना को विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बनाने के बारे में उन्होंने कहा, ”हम अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि 2020 तक सेना का मेकेनाइजेशन पूरा हो जाए…हम हर तरह से अपनी सेना को आधुनिक बनाएंगे, चाहें वो सैद्धांतिक स्तर पर हो, सांगठनिक ढांचा हो, सैनिक हों या हथियार। हम एक मिशन के तौर पर ये सुनिश्चित करेंगे कि 2035 तक हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना का आधुनिकीकरण पूर्ण हो जाए और 21वीं सदी के मध्य तक हमारी सेना विश्व स्तरीय सेना में बदल जाए।“
शी ने अपने भाषण में साफ तौर से तो नहीं कहा मगर उनका इरादा साफ था कि वो चीन को अमेरिका की टक्कर की आर्थिक और सैन्य शक्ति या कहें सुपर पावर बनाना चाहते हैं। शी की अब तक की उपलब्धियों को देखते हुए पार्टी को लगता है कि वो इसे हासिल भी कर सकते हैं। संभवतः यही कारण है कि पार्टी ने उन्हें आजीवन राष्ट्रपति पद पर बिठाने का निर्णय लिया ताकि देश निर्विघ्न चहुंमुखी विकास की दिशा में आगे बढे़ और हर दृष्टि से सर्वाधिक शक्तिशाली होने का लक्ष्य हासिल करे। पश्चिमी देश भले ही चीन की वैश्विक आकांक्षाओं को मान्यता देने में आनाकानी करें, लेकिन चीन ने महाशक्ति के तौर पर खुद को जताना अवश्य आरंभ कर दिया है। चाहे दुनिया भर में अपना व्यावसायिक और सामरिक वर्चस्व कायम करने की वन बेल्ट वन रोड परियोजना हो या साउथ चाइना सी में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की धज्जियां उड़ाना या दुनिया के अनेक गरीब देशों को अपनी दौलत के बल पर गुलाम बनाना, चीन ने बहुत व्यवस्थित और सोचे समझे तरीके से अपनी दूरगामी योजनाओं को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है।
ऐसे में अमेरिका समेत पश्चिम के विकसित देशों का ही नहीं, भारत में सुरक्षा और विदेशनीति के कर्णधारों और विशेषज्ञों का चिंतित होना भी स्वाभाविक है। हाल ही में विदेश सचिव विजय गोखले ने संसद की विदेशी मामलों की स्थायी समिति के सामने चीन के बारे मे अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन विदेशों में अपने हितों की रक्षा के लिए अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प है। ये जिबूती समेत कई देशों में सैन्य अड्डे बनाने और एशिया के लगभग हर देश में परियोजनाएं स्थापित करने से स्पष्ट है। ऐसे में भारत के लिए भी आवश्यक है कि वो भी अपने डिलीवरी मैकेनिज्म की गति बढ़ाए।
गोखले आगे कहते हैं, “चीन का उदय हमारे सामने अवसर और चुनौतियां दोनो पेश करता है, खासतौर से तब जब चीन का अंतरराष्ट्रीय पाॅस्चर अधिक आत्मविश्वासी और हठी हो गया है। ज्यादातर प्रमुख विश्व शक्तियां कनेक्टीविटी से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। जहां हम एशिया-अफ्रीका ग्रोथ काॅरीडोर और चाबहार पोर्ट के विकास पर काम कर रहे हैं, वहीं चीन ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना और चाइना पाकिस्तान इकाॅनोमिक काॅरीडोर पर काम की गति बढ़ा दी है। यहां चीन गंभीर खिलाड़ी है। वह पूंजी, तकनीक और आंतरिक ढांचे का बड़ा निर्यातक है।”
एक ओर जहां विदेश सचिव चीन की नीतियों को गंभीरता से लेते हैं और उनका तोड़ तलाशने की बात करते हैं, वहीं सेना के उपप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद चीन के बरक्स भारत की सैन्य तैयारियों पर गंभीर चिंता प्रकट करते हैं। संसद की रक्षा मामलों की स्थायी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए वो कहते हैं, “दो मोर्चों पर युद्ध की आशंका वास्तविक है। चीन और पाकिस्तान अपनी सेना का तेज गति से आधुनिकीकरण कर रहे हैं। भारत को भी अपनी सेना को सशक्त बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए। लेकिन मौजूदा बजट इस आवश्यकता को पूरी करने के लिए अपर्याप्त है। सेना के बजट में की गई मामूली बढ़ोतरी मुद्रास्फीति की ही भरपाई बामुश्किल कर पाएगी, इससे तो कर चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।”
लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद आगे कहते हैं, ”सेना को 10 दिन के सघन युद्ध के लिए हथियारों का जखीरा निर्मित करने के वास्ते जितना धन चाहिए उसमें 6,380 करोड़ रूपयों की कमी है। सरकार ने हथियारों की कमी पूरी करने के लिए जून 2018 का लक्ष्य रखा है, ये कमी पूरी करना सेना की लंबे युद्ध की तैयारी के लिए आवश्यक है। यह जरूरी है कि हम अपनी कमियों को दूर करने और आधुनिकीकरण की ओर ध्यान लगाएं। आज, इस बात की पहले से कहीं अधिक आवश्यता है कि हमारा देश अपनी सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करे और दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में जाना जाए।“ रक्षा मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्टों के अनुसार सेना के आधुनिकीकरण के लिए 21,338 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह मौजूदा 125 परियोजनाओं के 29,033 करोड़ के बजट से भी काफी कम है।
रक्षा मामलों की स्थायी समिति के प्रमुख मेजर जनरल बीसी खंडूरी, सेवानिवृत्त अपनी रिपोर्ट में कहते हैं, ”हम इस निराशाजनक स्थिति से दुखी हैं। सेना के प्रतिनिधि स्वयं सेना की तैयारियों के लिए अपर्याप्त धन आवंटन के नकारात्मक प्रभाव के बारे में खुल कर बता रहे हैं, ऐसे में इस समस्या का जल्द से जल्द निराकरण होना आवश्यक है।”
जाहिर है मोदी सरकार, चीन को लेकर सजग ही नहीं चिंतित भी है। पिछले 70 वर्षोंं में चीन के संबंध में सुरक्षा के जो उपास किए जाने चाहिए थे, वो नहीं किए गए। आजादी के शुरूआती दौर में नेहरू सरकार ने कुछ भयंकर कूटनीतिक गलतियां भी कीं जिनका परिणाम देश अब तक भुगत रहा है। बहरहाल, मौजूदा सरकार नौसेना की बेहतरी से लेकर सीमा पर आंतरिक ढांचा विकसित करने तक अनेक प्रयास कर रही है। लेकिन कमजोरियों के बावजूद भारत घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं है। ये हम डोकलाम विवाद में देख चुके हैं। कूटनीति के क्षेत्र में भी भारत, अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस आदि के साथ रणनीतिक संबंध बना रहा है। भारत ने आसियान देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ किए हैं और मध्य एशिया से लेकर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका तक अपने पांव पसारे हैं। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक महाशक्ति बनने की इच्छा रखता है और अमेरिका, जापान, फ्रांस, रूस जैसे देश इसके लिए पूरा सहयोग करने के लिए तैयार भी हैं, लेकिन भारत को अपनी आकांक्षाओं और संसाधनों में संतुलन बिठाना होगा। बहुत से देश अपने हितों के लिए भारत को आगे तो बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए पैसा नहीं देना चाहते। पर्याप्त संसाधनों के आभाव में ये कैसे संभव होगा? इस पर विचार करना होगा।
भारत को अगर चीन के बरक्स खड़ा होना है तो उसे अपनी आंतरिक स्थिति भी सुधारनी होगी। चीन से सबक लेते हुुए देश को जोंक की तरह चूस रहे आंतरिक दुश्मनों से भी सख्ती से निपटना होगा। एक तरफ चीन ‘तानाशाही व्यवस्था’ के तहत दुनिया में महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहा है तो वहीं भारत में उसके पिट्ठु हमारी सेना पर ही निशाना साध रहे हैं और विघटनकारी ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं। एक ओर चीन जहां अपनी संप्रभुता और अखंडता के लिए हर खतरे को जड़ से समाप्त करने का संकल्प करके बैठा है, वहीं हमारे यहां राष्ट्रविरोधी तत्वों को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में भारत आक्रामक शी जिनपिंग का मुकाबला कैसे करेगा? क्या हम फिर से चीन से पंगा न लेने और देश में उसके पिट्ठुओं को खुली छूट देने की मनमोहन सरकार की नीति की ओर लौट जाएंगे या सख्ती से ऐसे तत्वों का समूल नाश करेंगे? हमें सुनिश्चित करना होगा कि चीन हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली का दुरूपयोग हमारे ही खिलाफ न कर पाए। चीन पर भारत में अलगाववादियों और नक्सलियों की मदद करने और उन्हें हथियार देने का भी आरोप है। चीन से इस विषय में भी दो टूक बात करनी होगी।

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