“फैटएफ की ग्रे लिस्ट और पाकिस्तान के समक्ष विकल्प” in Punjab Kesari

पाकिस्तान ने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (फैटएफ) की ग्रे लिस्ट से बचने के लिए पूरा दम लगा दिया, लेकिन बच नहीं पाया। 37 देशों के इस संगठन में जब निर्णायक मतदान हुआ तो सिर्फ तुर्की ने ही उसका साथ दिया। रूस, सउदी अरब, और ‘गल्फ कोआॅपरेशन काउंसिल’, जीसीसी (इसमें बहरीन, कुवैत, ओमान, कतार, सउदी अरब और युनाइटेड अरब अमीरात शामिल हैं) ही नहीं, उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी उसका साथ नहीं दिया। खाड़ी के देशों को जहां अमेरिका ने संभाला, वहीं रूस को भारत ने समझा लिया। वर्तमान अध्यक्ष इटली के बाद चीन इस संगठन की कमान संभालना चाहता है। इस लिए ‘महज एक पाकिस्तान’ के लिए उसने अन्य सदस्यों से टकराव मोल न लेने और अपने हितों को लफड़े में न डालने का फैसला किया। वैसे भी चीन को लगता है कि अगर फैटएफ के फैसले के बाद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में गिरावट आएगी तो उसे वहां पांव और पसारने का मौका मिलेगा।

आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि फैटएफ एक अंतरराष्ट्रीय निगरानी संस्था है जो दुनिया भर में टेरर फंडिंग और मनी लाॅंड्रिंग करने वाले देशों पर नजर रखती है। इसमें 37 सदस्य होते हैं। 35 राष्ट्र और दो क्षेत्रीय संगठन (गल्फ कोआॅपरेशन काउंसिल, जीसीसी और यूरोपियन कमीशन, ईसी)। ग्रे लिस्ट में आने के बाद पाकिस्तान का दूसरे देशों के साथ वित्तीय लेन-देन और मुश्किल हो जाएगा। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ग्रेडिंग एजेंसियां पाकिस्तान की ग्रेडिंग और गिरा सकती हैं। इससे उसे बाजार से कर्ज लेने में भी मुश्किल आएगी। इससे पहले से ही मुश्किल में पड़ी अर्थव्यवस्था और जर्जर हो सकती है। ग्रे लिस्ट संबधी प्रावधान आगामी जून में लागू होंगे। तब तक आतंकवाद से लड़ने के बारे में पाकिस्तान के दावों की समीक्षा की जाएगी। अगर वो फैटएफ को संतुष्ट नहीं कर पाया तो उसे ग्रे लिस्ट में डाल दिया जाएगा। ध्यान रहे वर्ष 2012-15 के बीच भी पाकिस्तान इस लिस्ट में शामिल था

कर्ज और आतंकवाद में आकंठ डूबा परजीवी पाकिस्तान, अमेरिका से तलाक के बाद विश्व राजनय में नए विकल्प या कहें कि दोस्त तलाश रहा था। ऐसे में फैटएफ ने उसे तगड़ा झटका दिया है। पाकिस्तानी सेना चीन को अपने सदाबहार दोस्त के रूप में आवाम के सामने पेश करती थी, लेकिन चीन ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वो पाकिस्तान के साथ दोस्ती को अपने हितों के आड़े नहीं आने देगा। वैसे भी चीन पाकिस्तानी सेना को बार बार संकेत देता रहा है कि वो उसके द्वारा चलाए जा रहे आतंकी नेटवर्क को अधिक समय तक समर्थन नहीं दे पाएगा।

वर्ष 2015 में जब पाकिस्तान ग्रे लिस्ट से बाहर आया तो उसके दो कारण थे। एक – अमेरिका का समर्थन और दो – उसने आतंकवाद से लड़ने के लिए लिए एक नेशनल एक्शन प्लान तैयार किया और दुनिया को भरोसा दिलाया कि वो इसके जरिए आतंकवाद के गढ़ों को नेस्तनाबूद कर देगा। लेकिन ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने जिस बारीकी से पाकिस्तान की हरकतों पर नजर रखनी शुरू की, उससे पाकिस्तान का बचना नामुमकिन हो गया। पता लगा कि नेशनल एक्शन प्लान के तहत सिर्फ उन कथित ‘आतंकवादियों’ का सफाया करने की कोशिश की गई जो सेना की मंशा के खिलाफ देश के भीतर मुहिम चला रहे थे। इसमें बलूची तथा पख्तून स्वतंत्रता सेनानियों और मुहाजिरों का कत्लेआम किया गया, लेकिन भारत और अफगानिस्तान में आतंक फैलाने वाले संगठनों (स्ट्रैटेजिक असेट्स) के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

अपने ही लोगों का कत्लेआम करने के बाद पाकी सेना ने दुनिया में दावा किया कि उसने आतंकियों का सफाया करने के लिए ठोस कार्रवाई की है और अब दुनिया को उससे आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने का तकाजा बंद कर देना चाहिए। सेना के इशारे पर पाकी मीडिया ने इसका खूब प्रचार किया और जनता भी बहुत हद तक इसे सही समझ बैठी। पाकिस्तान ने दुनिया के गले ये बात उतारने की कोशिश की कि अब उसके यहां कोई आतंकवादी नहीं बचा, सभी आतंकवादी अफगानिस्तान में हैं। ये बात अलग है कि बहुत से सयानों ने इसे मानने से इनकार कर दिया और सेना को बार-बार सलाह दी कि वो पुरानी नीतियों से बाज आए।

ट्रंप प्रशासन ने भी आतंकवाद से लड़ने के पाकिस्तानी दावों को मानने से इनकार कर दिया। ट्रंप ने अपने एक ट्वीट पर पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि अमेरिका ने उसे अरबों डाॅलर दिए, लेकिन इसके बदले में उसने सिर्फ धोखा दिया। पेरिस में जब फैटएफ की बैठक चल रही थी, तब भी वाइट हाउस प्रवक्ता राज शाह ने कहा कि अमेरिका, आतंकवाद के सफाए के पाकिस्तानी दावों से संतुष्ट नहीं है। शाह की बात में दम भी था क्योंकि बैठक के दौरान ही पाकिस्तानी आतंकी भारत में घुसने की कोशिश कर रहे थे और युद्धविराम को ताक पर रख पाकी सेना उनकी सुरक्षा के लिए ताबड़तोड़ फायरिंग कर रही थी। अफगानिस्तान में भी हालात बेहतर नहीं थे।

जाहिर है दुनिया भर में रूसवा होने और खुद पाकिस्तान के तबाह होने के बावजूद, सेना अपने हितों के लिए आतंकवादियों का इस्तेमाल करने की नीति से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं है। इसकी बजाए वो आतंकी संगठनों को नया जामा पहनाने की कोशिश कर रही है। अफगान तालीबान को आईएसआईएस के रूप में पेश किया जा रहा है और दावा किया जा रहा है कि इनपर पाकी सेना का कोई नियंत्रण नहीं है। उधर लश्कर ए तैयबा को मिल्ली मुस्लिम लीग का नया नाम देकर राजनीति में उतारा जा रहा है। कहने को तो पाकिस्तान सरकार ने ठीक फैटएफ की बैठक से पहले अध्यादेश भी जारी किया जिसके तहत देश में हर वो आतंकी संस्था स्वतः प्रतिबंधित हो जाएगी जिसे संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंधित घोषित किया है। लेकिन इसमें भी अनेक किंतु-परंतु हैं। आगामी आम चुनावों को देखते हुए सत्तारूढ़ पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का एक बड़ा तबका इसे अमल में लाने के लाने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि भारत विरोधी सभी संगठनों का अड्डा पंजाब में है जो उसका सबसे मजबूत गढ़ है। पंजाब में फिलहाल अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई शाबाज शरीफ मुख्यमंत्री हैं।

शक्तिशाली पाकी सेना का एक बड़ा तबका भी इसके विरोध में है। इसका मानना है कि पाकिस्तान परंपरागत युद्ध में भारत और अमेरिका से नहीं जीत सकता, इसलिए उनके खिलाफ आतंकियों का इस्तेमाल और प्राॅक्सी वाॅर जायज है। ये जनता को समझा रहे हैं कि आतंकियों के सफाए से पाकिस्तान कमजोर हो जाएगा और फिर अमेरिका और भारत उसके साथ मनमानी करेंगे।

फैटएफ ने भले ही पाकिस्तान को बहुत तगड़ा झटका दिया है। लेकिन इसकी बिना पर ये मानना भी गलती होगी कि चीन ने उसका साथ छोड़ दिया है। ध्यान रहे ये चीन ही था जिसने पिछले वर्ष जून में उसे शंघाई काॅआॅपरेशन आॅर्गनाइसेशन (एससीओ) में प्रवेश करनें मदद की। एससीओ मूलतः छह देशों का संगठन है जिसमें चीन और रूस के अलावा मध्य एशियाई देश उजबेकिस्तान, कजाकिस्तान, तजाकिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं। बता दें कि पाकिस्तान के साथ ही भारत को भी इसमें शामिल किया गया।

एसीओ में शामिल होने के बाद पाकिस्तान ने अपनी जनता को ये दिखाने की कोशिश की कि भारत-अमेरिका गठबंधन के बरक्स अब पाकिस्तान-चीन-रूस का गठबंधन उभर रहा है। जनता को ये भी बताने की कोशिश की गई भले ही अमेरिका मदद न दे, भले ही भारत उसे अलग-थलग करने की कोशिश करे, पर पाकिस्तान दुनिया में अकेला नहीं है। ंरूस और चीन के अलावा, सउदी अरब, तुर्की और ‘गल्फ काॅआॅपरेशन काउंसिल’ भी पाकिस्तान के साथ हैं।

फैटएफ में भले ही रूस ने पाकिस्तान का साथ न दिया हो, पर इसपर लाॅबिंग के लिए जब पाकी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ रूस गए तो उन्होंने वहां न केवल रूसी विदेश मंत्री सेरगेई लेवारोव के साथ मुलाकात की बल्कि संयुक्त घोषणापत्र भी जारी किया। भारतीय विदेश विभाग और विदेशनीति विशेषज्ञों को यह घोषणापत्र अवश्य पढ़ना चाहिए क्योंकि ये पाकिस्तानी आतंकवाद के प्रति भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका के नेरेटिव के बरक्स एक वैकल्पिक नैरेटिव पेश करता है जो असल में पाकिस्तान का नैरेटिव ही है। यह कहता हैः

”हमारी बैठक में अफगानिस्तान और उसके आसपास के इलाकों पर विशेष ध्यान दिया गया। हम दोनों अफगानिस्तान में सुरक्षा की बिगड़ति स्थिति, बढ़ती आतंकी कार्रवाइयों, नारकोटिक्स के खतरों और मजबूत होते आईएआईएस से चिंतित हैं। दुर्भाग्य से हमें यह कहना पड़ रहा है कि यहां बरसों से मौजूद अमेरिका और नैटो की सैन्य मौजूदगी अफगान लोगों को स्थायित्व और शांति प्रदान करने में असफल रही है। यही नहीं, हाल ही में अमेरिका द्वारा पेश की गई अफगान रणनीति सशस्त्र शत्रु के खिलाफ अधिक सेना और सैन्य दबाव बनाने की आवश्यकता पर बल देती है। माॅस्को और इस्लामाबाद इस नीति को दिशाहीन मानते है। हमारा मानना है कि अफगानिस्तान में अफगान लोगों के नेतृत्व और क्षेत्रीय राज्यों के हितों के सम्मान पर आधारित राष्ट्रीय सुलह-सफाई की प्रक्रिया जल्दी से जल्दी शुरू होनी चाहिए। “

जाहिर है रूस ने अफगानिस्तान में आतंकवाद पर पाािकस्तान की भूमिका और डबलक्राॅस को नकार कर आईएसआईएस और अमेरिका को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा दिया और अमेरिका की नयी दक्षिण एशिया नीति के औचित्य पर ही सवालिया निशान लगा दिया। यही नहीं ‘क्षेत्रीय राज्यों के हितों’ के नाम पर अफगानिस्तान मसले में पाकिस्तान को प्रमुख भूमिका देने की संस्तुति भी कर दी। इस घोषणापत्र में पाकिस्तान ने फिलिस्तीन और सीरिया पर रूस की भूमिका का समर्थन किया। जाहिर है रूस और पाकिस्तान का संयुक्त घोषणपत्र नए समीकरणों की ओर इशारा करता है। ये कहीं न कहीं ये भी बताता है कि दुनिया में एक बार फिर सुपर पावर बनने को लालायित रूस ये भूलने के लिए भी तैयार है कि कभी पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ मिलकर सोवियत संघ को तोड़ने में मदद की थी।

अमेरिका के दबाव में फैटएफ में भले ही पाकिस्तान पर फंदा कस गया हो पर ध्यान रहे, रूस और चीन समेत कुछ देश हैं जो अब भी पाकिस्तान से सहानुभूति रखते हैं। भारत को ऐसे देशों पर निगाह बनाए रखनी होगी। रूस तो भारत का पुराना और विश्वस्त सहयोगी है। जब भारत ने पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी तो रूस ने पूरा समर्थन दिया था। भारत को रूस को लगातार वस्तुस्थिति से अवगत कराते रहना चाहिए। रूस को समझाना पड़ेगा कि पाकिस्तानी आतंकवाद भारत और अफगानिस्तान के लिए ही नहीं अततः उसके लिए भी खतरा साबित होगा। बजाए पाकिस्तान का नैतिक समर्थन करने के वो उसे अपनी नीतियां बदलने के लिए तैयार करे।

बहरहाल जून तक की समीक्षा अवधि के बावजूद पाकिस्तान का ग्रे लिस्ट से बचना असंभव लग रहा है। इसका सबसे बड़ी वजह पाकिस्तानी सेना है जो अपने रंग-ढंग बदलने के लिए तैयार नहीं है। पहले उसके झूठे आश्वासनों के आधार पर अमेरिका उसे उबार लेता था, लेकिन अब भले ही चीन फैटएफ का अध्यक्ष बन जाए, वो उसकी मदद नहीं कर पाएगा। पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका मानता है कि अब वक्त आ गया है जब सेना सुरक्षा और विदेश नीति के मामलों को पूरी तरह निर्वाचित सरकार के हाथों मंे सौंप दे और कश्मीर और अफगानिस्तान को छोड़ सारा ध्यान और संसाधन देश के आम नागरिकों के भले में लगाए।

कुछ पाकिस्तानी बातवीर सलाह दे रहे हैं कि सरकार फैटएफ के अस्तित्व को ही नकार दे। कोई उनसे पूछे कि क्या फैटएफ के सदस्य और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके बावजूद उन्हें छोड़ दंेगे?

पाकिस्तान पर आर्थिक शिंकजा धीरे-धीरे कस रहा है…अभी ग्रे लिस्ट, फिर ब्लैक लिस्ट। इनके प्रावधानों की वजह से वल्र्ड बैंक और इंटरनेशनल माॅनिटरी फंड जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से सस्ता कर्ज मिलना मुश्किल हो जाएगा। वैस भी इनमें अमेरिका का दबदबा है जो स्वयं पाकिस्तानी वित्तीय सहायत पर लगाम लगा चुका है। अगर पाकिस्तान अब भी बाज नहीं आया तो अगला कदम सैन्य बल के इस्तेमाल का ही होगा जो पाकिस्तान की रही सही कमर भी तोड़ देगा।

जाहिर है पाकिस्तान आज दोराहे पर है। एक तरफ शांति और विकास की राह है तो दूसरी तरफ कश्मीर और अफगानिस्तान पर कब्जे का सपना जो सिर्फ विनाश की ओर ही ले जाता है। असली फैसला, जैसा कि हम जानते हैं, पाकी सेना को करना होगा। अगर पाकी सेना को याद न हो तो याद दिला दें – कश्मीर में कबाइलियों के भेष में सैनिक भेजने से लेकर कारगिल तक, हर बार हमला खुद पाकिस्तान ने किया है, भारत ने नहीं। भारत तो परमाणु हथियार तक पहले न प्रयोग करने की घोषण कर चुका है। पाकिस्तान का दुश्मन भारत नहीं खुद सेना है। अगर वो अपनी नीतियां बदल ले तो पाकिस्तान बदल सकता है।

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