“सेनेट में शांति प्रस्ताव, सीमा पर खूनखराबा बेनकाब हो चुकी है जनरल बाजवा की भारत नीति” in Punjab Kesari

पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने सुरक्षा, पड़ोसी देशों से संबंधों, अपनी विदेश यात्राओं और बहुत से अन्य महत्वपूर्ण मसलों पर दिसंबर 19 को सेनेट के सामने अपना पक्ष प्रस्तुत किया और सांसदों के सवालों के जवाब दिए। अपेक्षा की गई थी कि सांसद इस बैठक के बारे में मीडिया से चर्चा नहीं करेंगे, लेकिन कुछ लोगों ने फिर भी इस विषय में बातचीत की। इसके मुताबिक बाजवा ने सांसदों से कहा कि वो भारत के साथ शांतिवार्ता के पक्षधर हैं। अगर सरकार, भारत के साथ संबंध सामान्य बनाने की पहल करेगी तो वो उसे समर्थन देंगे।

पाकी सेना परंपरागत रूप से भारत को दुश्मन नंबर एक मानती रही है। हालांकि आठवें सेना प्रमुख जनरल अशफाक परवेज कयानी (29 नवंबर 2007 से 29 नवंबर 2013) ये तक कह चुके हैं कि पाकिस्तान का असली दुश्मन भारत नहीं, बल्कि देश के भीतर पल रहे आतंकी संगठन हैं, फिर भी सेना का रवैया नहीं बदला है। ऐसे में बाजवा का यह बयान ऐतिहासिक माना जा रहा है। उनके इस बयान का एक अर्थ ये भी माना जा सकता है कि आज पाकिस्तान की भारत नीति दोराहे पर आ गई है। इसमें संभवतः पहले जैसी कट्टरता नहीं बची है और वो इसमें परिवर्तन के बारे में भी सोच सकता है। आपको ज्ञात ही होगा कि वहां भारत, अन्य पड़ोसी देशों तथा अमेरिका के बारे में विदेशनीति सेना ही तय करती है। विदेश मंत्रालय की औकात कुल मिलाकर स्टेनो से अधिक नहीं होती। संभवतः यही कारण है कि पदच्युत प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पूरे चार साल तक किसी विदेश मंत्री की नियुक्ति नहीं की और ये विभाग खुद ही संभालते रहे ताकि सेना और चुनी हुई कठपुतली सरकार में कोई गलतफहमी न पैदा हो।

पाकिस्तान में शाहिद खकान अब्बासी की लचर सरकार और गहरे आर्थिक संकट के मद्दे नजर वहां बार-बार कयास लगाए जा रहे थे कि सेना एक बार फिर कमान संभाल सकती है। बाजवा के सेनेट के सामने पेश होने और नीति निर्माण में संसद को खुद वरीयता देने के बाद समझा जा रहा है कि सेना फिलहाल किसी तख्तापलट का इरादा नहीं रखती। लेकिन यहां हम चर्चा सिर्फ भारत के संबंध में उनके बयान तक सीमित रखेंगे।

बाजवा के बयान पर भारत प्रतिक्रिया देता, इससे पहले पाकिस्तान में ही उसपर सवाल उठने लगे। सबसे पहला प्रश्नचिन्ह तो इसी बैठक में उनके जमात उद दावा (लश्कर ए तौएबा) प्रमुख हाफिज सईद वाले बयान पर उठा। इसमें उन्होंने कहा कि कश्मीर समस्या के समाधान में सईद की महत्वपूर्ण भूमिका है और आम पाकिस्तानी की तरह उसे भी कश्मीर मुद्दा उठाने का हक है। मुंबई हमलों के आरोपी और अंतरराष्ट्रीय आतंकी सईद के बारे में उनके बयान को बिला शक उसकी आतंकी नीतियों का समर्थन समझा गया। आम राजनीतिक दलों ने इसे सईद की राजनीतिक पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग के समर्थन के तौर पर लिया। ध्यान रहे वहां सेना, जमात को राजनीतिक पार्टी का रूप देकर मुख्यधारा में लाने और संवैधानिक वैधता दिलवाने की पूरी कोशिश कर रही है। सेना को इसमें दो खास फायदे दिखाई दे रहे हैं, एक – लगातार कमजोर हो रहे पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज जैसे मुख्यधारा के दलांे के बीच सेना को अपना प्राॅक्सी राजनीतिक दल खड़ा करने का अवसर मिलेगा जो पूरी तरह उसके कब्जे में होगा और दो – जमात जैसे दुर्दांत आतंकी संगठन को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचाया जा सकेगा। सनद रहे कि पाक सरकार इसका विरोध कर रही है। दिसंबर 24 को सरकार ने इस्लामाबाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर जमात की उस याचिका का औपचारिक रूप से विरोध भी किया जिसमें उसने मिल्ली मुस्लिम लीग को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने की मांग की है।

बाजवा ने भारत के साथ संबंधों के सामान्यीकरण की बात तो कही पर कश्मीर पर उनका मत बिल्कुल भी नहीं बदला। अगर सेना पहले जैसे ही ‘कश्मीरियों’ (हुर्रियत के आतंकियों और अन्य कश्मीरी आतंकियों) को नैतिक और राजनयिक समर्थन (सीमापार से आंतकी समर्थन) देती रहेगी तो कश्मीर में शांति कैसे होगी? जाहिर है बाजवा संबंधों का सामान्यीकरण नही, सिर्फ दिखावा चाहते हैं। यह तमाशा अगर हुआ तो बहुत कुछ पहले जैसा ही होगा जिसमें अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकने के लिए एक तरफ तो पाकिस्तान की चुनी हुई हुई सरकार (कठपुतली सरकार) भारत सरकार से बातचीत करती थी, तो दूसरी तरफ सेना अपना खेल खेलती रहती थी।

लेकिन एक महत्वपूर्ण सवाल ये भी है कि आखिर बाजवा भारत के प्रति ये बयान देने के लिए क्यों मजबूर हुए। इसके कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ी वजह है अमेरिकी दबाव। अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर पाकिस्तानी सेना ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह उसके खिलाफ हर संभव कदम उठाएगा। इसमें पाकिस्तान में घुस कर आतंकी ठिकानों का सफाया, आर्थिक सहायता रोकना और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी शामिल है। पाकी सेना एक तरफ तो सख्त बयानी के लिए अमेरिका से मुंहजोरी करती है तो दूसरी तरफ अंदरखाने में उसे मनाने की कोशिश भी करती है ताकि उसकी आर्थिक सहायता जारी रहे।

ध्यान रहे पाकिस्तान आजकल गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है और उसके पास तीन महीने के आयात के लिए भी विदेशी मुद्रा नहीं है। पाकिस्तानी हुक्मरानों ने बड़े गाजे-बाजे के साथ चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर की घोषणा की थी। अब साफ हो रहा है कि चीन ने इसके लिए सहायता नहीं बल्कि अरबों डाॅलर का उधार दिया है। इसे चुकाने में भी पाक सरकार की सांस फूल रही है। ऐसे में भारत से दुश्मनी की नीति और उसके नाम पर सेना पर हो रहे अरबों डाॅलर के खर्चे पर भी सवाल उठने लगे हैं। अर्थशास्त्री और बुद्धिजीवी सवाल उठाने लगे हैं कि क्या सेना पाक को चीन का उपनिवेश बनाना चाहती है? वो साफ-साफ कहने लगे हैं कि चीनी उपनिवेश बनने से अच्छा है, भारत से दोस्ती की जाए और उसके साथ व्यापार किया जाए…कश्मीर के चक्कर में पाकिस्तान को कंगाल नहीं किया जाए। लोग अब ये भी पूछ रहे हैं कि सेना विदेश नीति पर क्यों कब्जा जमाए बैठी है? क्यों पाकिस्तान के संबंध सिर्फ भारत से ही नहीं, ईरान और अफगानिस्तान से भी खराब हो रहे हैं?

भारत तो सीधे पाकिस्तानी सेना प्रमुख से बात नहीं करता। लेकिन यहां ये याद दिलाना उचित होगा कि भारत के बारे में टिप्पणी करने से पहले, बाजवा अक्तूबर में अफगानिस्तान और नवंबर में ईरान के दौरे पर भी गए। वहां उन्होंने क्रमशः राष्ट्रपति अशरफ घनी और राष्ट्रपति हसन रोहानी से भी बात की। दोनों देशों के साथ बेहद खराब संबंधों के बीच हुई इन यात्राओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन इन उच्च स्तरीय दौरों के बावजूद दोनों देशों से संबंध रत्ती भर भी नहीं सुधरे। 22 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र में अफगान राजदूत महमूद सैकल ने एक बार फिर अपने देश में अस्थिरता के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया। उधर 22 दिसंबर को ही अफगानिस्तान के औचक दौरे पर आए अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने बिना लगालपेट के कहा कि पाकिस्तान लंबे समय से तालिबान और अन्य आतंकवादी समूहों को सुरक्षित पनाहगाह मुहैया करा रहा है, लेकिन अब दिन लद गए हैं, ट्रंप प्रशासन ने सैनिकों को आतंकियों के खिलाफ सीधी कार्रवाई का अधिकार दे दिया है।

स्पष्ट है बाजवा की दोगली विदेश नीति – बातचीत में आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा पर जमीनी स्तर पर उन्हें बढ़ावा – पूरी तरह बेनकाब हो गई है। अब सवाल ये है कि भारत को क्या करना चाहिए? भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने के लिए इस्लामाबाद को उसकी धरती से सक्रिय आतंकी समूहों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी। इसके साथ ही थल सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने भी दो टूक शब्दों में कह दिया है कि जब तक पाकिस्तान कश्मीर में आतंक फैलाता रहेगा, उसके साथ संबंध सामान्य नहीं हो सकते।

जहिर है भारत, बाजवा की कूटनीतिक चालों में फंसने और उन्हें शांति के मसीहा का प्रमाणपत्र देने के लिए तैयार नहीं है। वैसे भी उन्होंने अभी सिर्फ यही कहा कि वो भारत के साथ शांतिवार्ता के पक्षधर हैं। इस शांतिवार्ता से उनका क्या तात्पर्य है, शांति के लिए वो किस हद तक अपनी नीतियां बदलने के लिए तैयार हैं? ये अभी स्पष्ट नहीं है। 23 दिसंबर को जैसे पाकिस्तानी गोलीबारी में भारतीय सेना के एक मेजर और तीन जवान शहीद हुए, उससे साफ है कि जमीनी स्तर पर पाकी सेना के खूनी इरादों में कोई कमी नहीं आई है।

एक बार को अगर भारत, पाकिस्तान के साथ शांतिवार्ता के लिए तैयार हो भी जाए, तो सवाल ये उठता है कि भारत को खक्कान अब्बासी सरकार से बातचीत करके क्या हासिल होगा जबकि वो खुद चंद महीनांे की मेहमान है (वहां जुलाई 2018 में आम चुनाव होने हैं)। हालांकि ये संभव नहीं है, लेकिन फिर भी अगर भारत पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए सीधे पाकी सेना से बात करता है, तब भी क्या गारंटी है कि उसका कोई नतीजा निकलेगा? एक बार को मान लें कि बाजवा शांति के लिए समझौता करते हैं, तो क्या गारंटी है कि आने वाले जनरल उसका पालन करेंगे? सिर्फ बाजवा ही नहीं, पाकिस्तान के अधिकांश जनरल देश की भारत नीति पर वर्चस्व तो चाहते हैं पर उसे आम अवाम की भलाई के लिए नहीं, अपने फायदे के लिए चलाना चाहते हैं। जिस दिन पाकी जनरल जनता के नजरिए से सोचना शुरू कर देंगे, पाकिस्तान के रिश्ते, भारत ही नहीं, अफगानिस्तान और ईरान के साथ भी सामान्य हो जाएंगे।

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