“हिंदुओं को ‘आतंकवादियों’ के रूप में बदनाम करने की साजिश से धीरे धीरे हट रहा है पर्दा” in Punjab Kesari

हाल ही में गुजरात से आईएस के दो आतंकी – मौहम्मद कासिम स्टिंबरवाला और ओबेद अहमद मिरजा गिरफ्तार किए गए। पता लगा कि मौहम्मद कासिम कुछ दिन पहले तक अंकलेश्वर के एक अस्पताल में काम करता था जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के निकट सहयोगियों का है। पटेल कुछ समय पहले तक इस अस्पताल की प्रबंध समिति में भी थे। इस मामले पर जब हंगामा मचा और भारतीय जनता पार्टी ने पटेल को घेरा तो कांग्रेस ने इसे चुनावी राजनीति बता कर टरकाने की कोशिश की। पर वास्तव में क्या ये मामला इतना हलका है? क्या इससे पटेल का कोई लेना-देना नहीं है? जांच जारी है। असलियत क्या है, इस आतंकी को पटेल से जुड़े अस्पताल में किसने नौकरी दी, ठीक चुनाव से पहले इसने नौकरी क्यों छोड़ी, कौन कौन से धार्मिक स्थल इसके और इसके सहयोगी के निशाने पर थे, ये जांच के बाद ही सामने आ पाएगा।

गुजरात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने लंबे अर्से तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति की है। यही नहीं इस्लामिक आतंकियों के प्रति नरमी और सहानुभूति का भी कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है। इसे देखते हुए भाजपा का इस मुद्दे को गंभीरता से लेना जायज बनता है। कांग्रेस नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) सरकार ने बहुत ही सोचे समझे तरीके से हिंदुओं को आतंकवादियों के रूप में बदनाम करने की साजिश की, इसे कोई कैसे भूल सकता है। इस षडयंत्र की परतें भी अब धीरे धीरे खुलती जा रही हैं और साथ ही इस बात के संकेत भी मिलने लगे हैं कि इसमें कौन कौन शामिल थे। अब ये भी समझ में आने लगा है कि इस दुष्प्रचार का कारण सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक ही नहीं था, इसके पीछे संभवतः कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं की मजबूरियां भी थीं। संकेत ये भी मिल रहे हैं कि ये मामला सिर्फ हिंदूवादी नेताओं को फंसाने का ही नहीं था, ये किसी बाहरी ताकत के इशारे पर इस्लामिक आतंकवाद के बरक्स ‘हिंदू आतंकवाद’ का नेरेटिव खड़ा करने का भी था। बड़ा सवाल ये है कि क्या ये पूरी साजिश सोनिया और उनके सलाहकार अहमद पटेल की सहमति और शिरकत के बिना संभव थी?

इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बात सुधाकर चतुर्वेदी की। 2008 मालेगांव ब्लास्ट मामले में नौ साल सलाखों के पीछे रहने के बाद वो हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं। वो बताते हैं कि कैसे महाराष्ट्र एंटी टेरर स्क्वाड (एटीएस) ने उन्हें फर्जी तरीके से फंसाया। उन्हें देवलाली (नाशिक) में उनके घर से जबरदस्ती उठाया गया और मुंबई ले जाया गया। मुंबई में उन्हें थर्ड डिग्री टाॅर्चर दिया गया। एटीएस अफसरों ने उनके घर की चाबी छीन कर उनके घर में विस्फोटक पदार्थ आरडीएक्स रखा। उन्हें अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रखा गया, प्रताड़ित किया गया, फंसाने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए गए, उनके पास से पिस्तौल की बरामदगी दिखाई गई और फिर माटुंगा पुलिस स्टेशन में फर्जी मामला दर्ज करवाया गया जिसमें कहा गया कि उन्हें हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया।
चतुर्वेदी के खिलाफ कितने फर्जी पर मजबूत मामले बनाए गए और साजिश कितनी गहरी थी, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि उन्हें जमानत मिलने में ही नौ साल लग गए। ध्यान रहे इसी मामले में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित कई और लोगों को भी फंसाया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को पहले ही जमानत मिल चुकी है। कर्नल पुरोहित की पत्नी को तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।

सुधाकर चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्हें और अन्य लोगों को इस मामले में सिर्फ इसलिए फंसाया गया कि महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार और केंद्र की यूपीए सरकार मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदुओं को आतंकवादी साबित करना चाहती थी। हिरासत के दौरान एटीएस वाले उनसे लगातार योगी आदित्यनाथ, हिंदू युवा वाहिनी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके प्रमुख मोहन भागवत के बारे में पूछताछ कर रहे थे। सुधाकर कहते हैं कि वो मुझसे जिस तरह सवाल कर रहे थे, उससे साफ था कि अनेक वरिष्ठ हिंदूवादी नेता उनके निशाने पर थे और वो किसी भी हालत में उन्हें फंसाना चाहते थे।

ध्यान रहे तब केंद्र में पी चिदंबरम और महाराष्ट्र में आर आर पाटिल गृहमंत्री थे। मालेगांव मामले में हिंदुओं का पकड़ने और उनके खिलाफ षडयंत्र रचने वाले हेमंत करकरे को 2008 में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख (कांग्रेस) और आरआर पाटिल (एनसीपी) ने ही एटीएस प्रमुख बनाया था।

‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली का सबसे पहले प्रयोग एक वामपंथी पत्रिका ने 2002 में किया। ध्यान रहे 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। कांग्रेसियों ने इनके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को तो बहुत बदनाम किया पर गोधरा कांड को भुला दिया जिसके कारण दंगे शुरू हुए। गोधरा में मुस्लिम षडयंत्रकारियों ने बहुत सोचे समझे तरीके से अयोध्या से आ रही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगाई जिसमें 59 लोग जिंदा जल गए। इसकी जांच से पता चला कि इसके मास्टरमाइंड कराची में बैठे थे और इसे कश्मीरी आतंकवादियों की मदद से अंजाम दिया गया। गुजरात दंगों में पाकिस्तानी हाथ को कांग्रेस ने बहुत आसानी से अनदेखा कर दिया।

गुजरात में ही एक अन्य घटना में 2004 में इशरत जहां अपने तीन सहयोगियों (दो पाकिस्तानी – जीशान जौहर और अमजद अली अकबर अली राणा तथा एक भारतीय जावेद शेख) के साथ मारी गई। केंद्र सरकार की सूचना के बाद उनका एनकाउंटर हुआ। लेकिन बाद में कांग्रेस ने इसे भी हिंदू नरेंद्र मोदी द्वारा मुस्लिम अबला इश्रत की हत्या का मामला बना दिया। जबकि बाद में सीआईए और आईएसआई के डबल एजेंट जेम्स हेडली ने खुलासा किया कि वो लश्कर ए तौएबा की सदस्य थी। उसकी हत्या के बाद खुद लश्कर ने उसे अपनी वेबसाइट में शहीद बताया था। कांग्रेसियों ने इशरत की बात तो बहुत उछाली पर उन पाकिस्तानियों को भूल गए जो उसके साथ मारे गए।

इन घटनाओं के सहारे कांग्रेसियों ने मोदी को ‘हिंदू खलनायक’ के रूप में भारत ही नहीं विदेशों में भी बदनाम किया। उनके खिलाफ अमेरिका में ऐसी लाॅबिंग की गई कि उन्हें वीसा दिए जाने पर ही रोक लग गई।

‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली पहली बार भले ही 2002 में प्रयोग की गई, लेकिन इसे प्रचारित किया यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जिन्होंने 2008 के मालेगांव ब्लास्ट के संदर्भ में अगस्त 2010 में हिंदु या भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला। इस पर काफी बवाल मचा जिसके बाद तत्कालीन कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने स्पष्टीकरण जारी किया। इसके बाद 2013 में आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सत्र में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने बयान दिया कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कैंपों में ‘हिंदू आतंकवाद’ का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां आपको विकीलीक्स के उस खुलासे की भी याद दिला दें जिसमें राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से कहा था कि भारत को पाकिस्तान से आने वाले इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ा खतरा देसी हिंदू आतंकवाद से है। रोमर जुलाई 2009 से अप्रैल 2011 तक भारत में अमेरिका के राजदूत रहे।

राहुल, चिदंबरम और शिंदे कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं में से हैं। यूपीए शासन में इनके शब्द पत्थर की लकीर समझे जाते थे। जाहिर है सरकारी महकमे और कांग्रेस नीत राज्य सरकारें इनकी सोच के हिसाब से ही काम करते थे और उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश करते थे। क्या ये लोग सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की सहमति के बिना ‘हिंदू विरोधी’ राजनीति कर सकते थे? क्या इनकी सहमति के बिना विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गए इस्लामिक संदिग्धों को छोड़ा जा सकता था? मालेगांव में 2008 से पहले सितंबर 2006 में भी धमाके हुए। एटीएस ने पहले तो इन धमाकों के लिए स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया (सिमी) के नौ लोगों को गिरफ्तार किया पर 2013 में चार्जशीट दाखिल करते समय हिंदूवादी संगठन अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया।
इसके बाद 29 सितंबर 2008 को गुजरात के मोडासा और महाराष्ट्र के मालेगांव में एक साथ धमाके हुए। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बता दें कि सितंबर धमाकों से पहले इसी वर्ष जयपुर, बेंगलूरू, फरीदाबाद और अहमदाबाद में भी धमाके हुए। तत्कालीन सरकार ने बाकी के धमाकों की जांच को तो दरकिनार कर दिया पर मालेगांव धमाकों के आरोप में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण सिंह कलसांगरा, और भंवरलाल साहू आदि को गिरफ्तार किया और इसे जोर शोर से ‘हिंदू आतंकवादी’ घटना के रूप में प्रचारित किया गया। सुधाकर चतुर्वेदी के बारे में हम पहले ही बता चुके हैं।

इस से पहले फरवरी 2007 में भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में धमाके हुए। एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने इसके लिए पाकिस्तानी नागरिक और लश्कर ए तौएबा के सदस्य आरिफ कसमानी को जिम्मेदार ठहराया और उसे संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी भी घोषित किया। धमाकों के बाद एक संदिग्ध पाकिस्तानी को गिरफ्तार भी किया गया परंतु उसे 14 दिन के भीतर उसे छोड़ दिया गया। कांग्रेस सरकार ने इसके लिए एक बार फिर इस्लामिक आतंकवादियों को छोड़ कर अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहराया और कर्नल पुरोहित का नाम भी उछाला गया जबकि चार्जशीट में उनका नाम तक नहीं था।
जांच एजेंसियों ने इस मामले में सिमी नेता सफदर नागौरी, कमरूद्दीन नागौरी और आमिल परवेज पर नारको टेस्ट भी किए। इसमें एक शख्स अब्दुल रज्जाक का हाथ होने की बात सामने आई और ये भी साफ हुआ कि उसने इस विषय में सफदर नागौरी को बताया भी था। लेकिन सिमी और उनके पाकिस्तानी हैंडलर्स पर कार्रवाई करने की जगह कांगे्रस सरकार ने अपने ही देश के लोगों को ही इसके लिए बदनाम किया।

बात अगर इन धमाकों तक ही रह जाती तब भी गनीमत थी। राहुल गांधी के राजनीतिक गुरू दिग्विजय सिंह ने तो नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के लिए भी आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा दिया। एक पत्रकार अजीज बर्नी ने ‘26/11 – आरएसएस की साजिश’ नाम से किताब तक लिख डाली जिसका 6 दिसंबर 2010 को खुद दिग्विजय सिंह ने विमोचन किया। इस अवसर पर अन्य इस्लामिक कट्टरवादियों के साथ फिल्म निर्माता महेश भट्ट भी मौजूद थे। इस मौके पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि हमले से दो घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फोन करके कहा कि उन्हें मालेगांव मामले में जांच से खफा ‘हिंदू अतिवादियों’ से जान का खतरा है। ज्ञात हो कि इस हमले में करकरे मारा गया था। ये बात अलग है कि बाद में करकरे की पत्नी ने कहा कि दिग्विजय उसके पति की लाश पर राजनीति कर रहे हैं। खुफिया एजेंसियों के कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि मुंबई हमले सत्तारूढ़ पार्टी की मिलीभगत से हुए। सभी हमलावरों ने हिंदू नामों के पहचान पत्र लिए हुए थे और मौली पहनी हुई थी। अगर कसाब जिंदा न पकड़ा जाता तो बड़ी आसानी से इसके लिए ‘हिंदुओं’ को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता। बहरहाल ये वहीं दिग्विजय सिंह हैं जिन्हें दुर्दांत इस्लामिक आतंकवादी भी सम्मानीय नजर आते हैं। ये ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ और हाफिज सईद को ‘हाफिज साहब’ कहते हैं।

देश में अनेक आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार सिमी पर 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन ये अब भी दक्षिण भारतीय राज्यों में पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के नाम से चल रही है। इस पर भारतीय मुस्लिम युवकों का बे्रनवाश कर आईएस भेजने के आरोप हैं। पर कांग्रेस इस मसले में चुप है। पीएफआई पर हिंदू लड़कियों का धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप है लेकिन कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ऐसे मामलों में अदालत में पीएफआई की वकालत कर रहे हैं। धर्म के नाम पर घृणा फैलाने वाले जाकिर नायक को भी कांग्रेस सरकार ने पूरा बढ़ावा दिया जबकि अनेक देशों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। दिग्विजय सिंह ने तो उसे शांतिदूत करार दिया और उसकी हर तरह से मदद की। हाल हीे में एनआईए ने जाकिर नायक के खिलाफ चार्जशीट दायर की जिसमें उसके सारे आतंकी संपर्कों का कच्चा चिट्ठा दिया गया है। जब सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है तो उसे समर्थन और बढ़ावा देने वाले नेताओं को क्यों बख्शा जा रहा है?

कश्मीर से केरल तक पाकिस्तानी आतंकियों और इस्टैबलिशमेंट के प्रति कांग्रेस की नरमी की यूं तो अनेक कहानियां हैं। लेकिन हाल ही में इस संबंध में कुछ और तथ्य सामने आए हैं जो वास्तव में सनसनीखेज हैं। एक न्यूज चैनल ने अपने खुलासे में बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने बदनाम पाकिस्तानी बैंक – बैंक आॅफ क्रेडिट एंड काॅमर्स इंटरनेशनल (बीसीसीआई) के जरिए बोफोर्स सौदे के घूस की रकम को ठिकाने लगाया। आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में जब इस बैंक की मुंबई ब्रांच को ताला लगाया गया तो इसके प्रमुख ने घूस देकर इसे फिर खुलवा लिया। देश-विेदेश में बदनामी के बाद इसे 1991 में बंद कर दिया गया। यहां समझने की बात ये है कि एक तरफ तो भारत और पाकिस्तान की कथित दुश्मनी थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रमुख नेता इस बैंक के जरिए घूस के पैसे को ठिकाने लगा रहे थे। क्या ये संवेदनशील जानकारियां इस बैंक के अधिकारियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं दी हांगी?
एक अन्य मामला हवाला व्यापारी मोइन कुरैशी का है। इसके पारिवारिक और व्यापारिक रिश्ते अनेक पाकिस्तानियों से हैं। भारत में ये प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की नाक का बाल समझा जाता है। यूपीए सरकार के दौरान सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों में इसका दबदबा चलता था। ये मोटी रकम की एवज में मामले ‘रफा-दफा’ कराने का काम भी करता था। इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि कुरैशी देश की महत्वपूर्ण जानकारियां पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं देता होगा?

मामला चाहे आतंकवादी गतिविधियों का हो या मुस्लिम तुष्टिकरण का या संवेदनशील आर्थिक जानकारियों का, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस की गतिविधियों में पाकिस्तान का हाथ दिखाई देता है। ऐसे में बहुत संभव है भारत में हिंदुओं को आतंकवादी के रूप में बदनाम करने के पीछे भी पड़ोसी देश की कोई सोची समझी रणनीति हो जिसे कांग्रेस चाहे-अनचाहे अंजाम दे रही हो। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने पी चिदंबरम पर कश्मीर मामले में पाकिस्तानी जुबान बोलने का आरोप लगाया। कोई तो कारण होगा जो उन्होंने इतना गंभीर आरोप लगाया। बहरहाल बहुत से मामले अभी अदालत में हैं और बहुत से फाइलों में दबे हैं। माले गांव से लेकर मोइन कुरैशी तक के उदाहरण बताते हैं कि जो दिखता है वो सत्य नहीं होता। लेकिन हम सत्य का अनुमान अवश्य लगा सकते हैं। आप भी स्वतंत्र हैं इस विषय में अपनी राय बनाने के लिए।

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