“गंभीर चुनौतियों के बावजूद महत्वपूर्ण है भारत-ईरान संबंध” in Punjab Kesari

ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी का भारत दौरा नरेंद्र मोदी सरकार की परिपक्व और व्यावहारिक विदेश नीति का उदाहरण है। हाल ही में सुन्नी इस्लामिक देशों ओमान, यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) और फिलिस्तीन के दौरे से लौटे प्रधानमंत्री मोदी ने जिस खुले दिल से दुनिया के सबसे बड़े शिया इस्लामिक देश के राष्ट्रपति का स्वागत किया और इस यात्रा की जो उपलब्धियां रहीं, वो भारत के लिए निःसंदेह संतोषजनक और उत्साहवर्धक हैं। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं और व्यापारिक संपर्क मार्गों की दृष्टि से भी यह दौरा बेहद लाभदायक रहा। ये सही है कि जमीनी हकीकत, कागजी उपलब्धियों से बेहद अलग होती है। लेकिन ये भी सही है कि लंबे रास्ते की ओर भी पहले एक ही कदम बढ़ाया जाता है।

खाड़ी देशों में जैसे अंतर्विरोध हैं, वो किसी से छुपे नहीं हैं। एक तरफ तो सुन्नी सउदी अरब की शिया ईरान से दुश्मनी है तो दूसरी ओर उसने कतर पर शियाओें के प्रति नरम रवैया अपनाने के लिए प्रतिबंध लगा रखे हैं। सउदी अरब ने तो 34 देशों का ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिस्म कोआलिशन’ तक बना लिया है जिसके प्रमुख पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ हैं। सउदी अरब का आरोप है कि ईरान यमन, सीरिया, लेबनान आदि में शिया आतंकियों को समर्थन और हथियार दे रहा है। अब तक तो पाकी सेना संसद के प्रस्ताव के मुताबिक सउदी अरब अपने सैनिक भेजने से बच रही थी, परंतु कुछ दिन पहले सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने इसे दरकिनार करते हुए वहां सैनिक भेजने का फैसला भी कर लिया है। जाहिर से बात है ईरान इस कदम को आसानी से स्वीकार नहीं करेगा। इससे पाकिस्तान और ईरान के संबंध और बदतर होंगे।

वहींे दूसरी ओर इसराइल और ईरान की पुरानी दुश्मनी है। इसराइल तो एक बार ईरान के परमाणु ठिकानांे पर हमला भी कर चुका है। गत 10 फरवरी को दोनों देशों में तनाव अचानक फिर बढ़ गया जब इसराइल ने अपनी वायु सीमा में सीरिया से आए एक ड्रोन को धराशायी कर दिया। इस कार्रवाई में, 1982 के बाद पहली बार इसराइल का एक एफ 16 विमान भी निशाना बना। इसराइल ने इसके लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है और जवाबी कार्रवाई की धमकी भी दी है।

इन सबके बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान समझौते (ज्वाइंट काॅम्प्रीहैंसिव प्लान आॅफ एक्शन) से बाहर आने की धमकी है जिसे 14 जुलाई 2015 को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देशों, जर्मनी और ईरान के बीच अंजाम दिया गया। जाहिर है ओबामा जहां इस्लामिक दुनिया में तनाव कम करने की कोशिश कर रहे थे, वहां ट्रंप खुलेतौर पर सउदी अरब और इसराइल का पक्ष ले रहे हैं जहां से अमेरिका को बड़े पैमाने पर हथियारों के आॅर्डर मिलते हैं।

अमेरिकी ने चीन के बढ़ते प्रभाव पर लगाम लगाने के लिए इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में भारत को अपना रणनीतिक साझीदार बनाया है, पर भारत अमेरिका की नीति आंख मूंद कर मानने के लिए तैयार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनय में कोई दोस्ती या दुश्मनी स्थायी नहीं होती और सभी देश अपने हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं। वैस भी अमेरिका और चीन में काफी फासला है। चीन तो भारत का पड़ोसी है। अगर भारत स्थानीय स्तर पर अपने हितों की रक्षा नहीं करेगा तो वैश्विक स्तर पर वो उसका मुकाबल क्या करेगा। अमेरिका को अगर भारत के साथ रणनीतिक साझीदारी करनी है तो उसके हितों को भी समझना पड़़ेगा।

भारतीय हितों के लिए अगर इसराइल और सउदी अरब महत्वपूर्ण हैं तो ईरान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। सच पूछा जाए तो इस क्षेत्र में अमेरिकी हितों के लिए भी कहीं न कहीं ईरान अहम है। संभवतः यही कारण है कि जब अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन भारत आए तो उन्होंने चाबहार बंदरगाह के मुद्दे पर भारत का यह कहते हुए समर्थन किया था कि अमेरिका, ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोधी है, उसके लोगों की भलाई के लिए निर्मित की जा रही परियोजनाओं का नहीं।

असल में अमेरिका अभी अफगानिस्तान से जाने के मूड में नहीं है, लेकिन वहां अपने साजो सामान की आपूर्ति के लिए पाकिस्तानी ब्लैकमेल से बाहर आने के विकल्प भी तलाश रहा है। ऐसे में चाबहार बंदरगाह अमेरिका को अफगानिस्तान तक पहुंचने का बेहतरीन विकल्प उपलब्ध करवा सकता है। भारत ने रोहानी के दौरे में ईरान समझौते का खुल कर समर्थन किया। ये ट्रंप प्रशासन के लिए भी एक इशारा है कि वो ईरान से टकराव के स्थान पर सामंजस्य का रूख अपनाए। रोहानी ने हैदराबाद की सुन्नी मक्का मस्जिद में अपने संबोधन में शिया और सुन्नी समुदायों को अपने मतभेद कम करने और आमजन की भलाई के लिए काम करने का संदेश दिया। जाहिर है ये संदेश सउदी अरब के लिए था। सउदी अरब और उसके सहयोगी देश इसका संज्ञान लेते हैं या नहीं, ये अलग बात है, लेकिन रोहानी ने तनाव कम करने की दिशा में अपनी तरफ से महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

रोहानी के बयान अमेरिका के लिए भी थे। उन्होंने ने सिर्फ सुन्नी देशों से तनाव कम करने की मंशा जताई, बल्कि ईरान समझौते के प्रति भी अपना समर्थन और समर्पण दोहराया। उम्मीद की जानी चाहिए कि सउदी अरब, उसके सहयोगी सुन्नी देश और अमेरिका इसका संज्ञान लेंगे। चीन अपने आर्थिक-राजनीतिक वर्चस्व को बढ़ाने के लिए जिस प्रकार दुनिया भर को धमका रहा है, रोहानी ने उसके खिलाफ भी भारत में आवाज उठाई और कहा है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार और राजनीतिक संबंध बराबरी और ईमानदारी के आधार पर होने चाहिए और देशों की संप्रभुता से समझौता नहीं होना चाहिए। जाहिर है ईरान का इशारा चीन की वन बेल्ट, वन रोड परियोजना की ओर था जिसकी आड़ में चीन दुनिया भर में सड़कों का जाल बिछा रहा है और बंदरगाहों पर कब्जा कर रहा है। इसके लिए वो साम, दाम, दंड, भेद हर तरह की नीति अपना रहा है।

ईरान मध्य एशिया में वन बेल्ट, वन रोड परियोजना का महत्यपूर्ण विकल्प उपलब्ध करवाता है। चाबहार बंदरगाह सिर्फ जल अवरूद्ध अफगानिस्तान को ही व्यापारिक मार्ग उपलब्ध नहीं करवाता, ये मध्य एशियाई देशों और रूस तक नया व्यापार मार्ग खोलता है। रोहानी की यात्रा में भारत ने चाबहार-जाहेदान रेल मार्ग के निर्माण के लिए अपना वादा फिर दोहराया। ध्यान रहे चाबहार पहले ही अफगानिस्तान-ईरान सीमा पर जाहेदान और मिलक/ जरंज क्षेत्र से सड़क मार्ग से जुड़ चुका है। इसके बाद जरंज-डेलाराम सड़क मार्ग का निर्माण भी किया जा चुका है जो अफगानिस्तान के गारलेंड हाइवे से जुड़ता है जो कंधार, काबुल और हेरात से जुड़ा हुआ है। चाबहार सिर्फ अफगानिस्तान से संपर्क के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, ये तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, तजाकिस्तान, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मध्य एशियाई देशों से संपर्क के लिए भी अहम है।

ईरान सिर्फ चाबहार की दृष्टि से ही आवश्यक नहीं है, ‘इंटरनेशनल नाॅर्थ-साउथ ट्रांसिट काॅरिडोर’ (आईएनएसटीसी) की नजरिए से भी बहुत जरूरी है जो बंदर अब्बास से शुरू हो कर उत्तर में कैस्पियन सागर तक फैला है। ईरान की उत्तरी सीमा, बंदर अब्बास से विभिन्न रेल और सड़क मार्गों से जुड़ी है और अंतरराष्ट्रीय तनाव के बावजूद इसका इस्तेमाल मध्य एशियाई देशों, रूस और अफगानिस्तान के साथ व्यापार के लिए होता रहा है। ये ज्यादातर व्यापार दुबई के जरिए होता है।

हाल ही में एक रूसी कंपनी ने बंदर अब्बास से माॅस्को और सेंट पिटसबर्ग के बीच रेल सेवा भी आरंभ की। कुछ दिन पूर्व भारत ने इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट और ट्रांसिट से जुड़े अश्गाबात समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, ईरान और ओमान शामिल हैं। ये मध्य एशिया के देशों को खाड़ी के बाजारों से जोड़ता है। इसमें भी ईरान की केंद्रीय भूमिका है। आपको याद दिला दें कि कुछ ही दिन पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ओमान गए थे जहां भारत और ओमान ने दुक्मा बंदरगाह को लेकर दूरगामी समझौते किए जो व्यापारिक संपर्क और सामरिक दृष्टि से बहुत सराहे गए।

जाहिर है ईरान, पश्चिम और मध्य एशिया और अफगानिस्तान को जोड़ने में जैसी भूमिका निभा सकता है, उसे भारत अच्छी तरह समझता है। ईरान के साथ तनाव बढ़ाने की जगह, उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका भी इसे समझेगा और अपने सहयोगी सुन्नी देशों को समझाएगा। अमेरिका-भारत-ईरान संबंध न सिर्फ चीन के बदनीयत विस्तार को रोकने में भूमिका निभा सकते हैं बल्कि पश्चिम एशिया में तनाव पर भी लगाम लगा सकते हैं। इनसे आतंकवादी देश पाकिस्तान पर नियंत्रण करने में भी मदद मिलेगी।

ये संबंध अफगानिस्तान में भी नई इबारत लिख सकते हैं जो पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहा है। अमेरिका ने अपनी नई दक्षिण एशिया नीति में अफगानिस्तान में भारत को विशेष भूमिका दी है। जाहिर है इसका एक आयाम वहां आर्थिक विकास के लिए आंतरिका ढांचा तैयार करना और अफगान सैनिकों को प्रशिक्षण देना है, वहीं इसका दूसरा आयाम अफगानिस्तान की पाकिस्तानी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करना भी है। भारत ने इसमें बड़ी सफलता भी पाई है। पाकिस्तान के रास्ते होने वाले अफगानी व्यापार में पिछले एक वर्ष में 80 फीसदी गिरावट आई है। चाबहार-जाहेदान रेलमार्ग बनने के बाद तो ये लगभग समाप्त ही हो जाएगी। इसका साफ असर कराची में देखा जा सकता है, जहां अनेक बड़ी मिलें ठप्प हो गई हैं। हालत ये है कि आज कराची के व्यापार संगठन सरकार से अपील कर रहे हैं कि वो अपनी नीतियां बदले, नही ंतो उनके भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।

पाकिस्तान को अपनी ‘रणनीतिक स्थिति’ पर बड़ा नाज था। उसे लगता था कि वो दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के बीच सेतु की भूमिका निभा सकता है, लेकिन ईरान ने उसके सारे सपने तोड़ दिए। रही-सही कसर चाबहार ने पूरी कर दी जिसने भारत के लिए अफगानिस्तान तक ही नहीं, समूचे मध्य एशिया तक नए रास्ते खोल दिए। ध्यान रहे भारत लंबे अर्से तक पाकिस्तान की चिरौरी करता रहा कि वो अफगानिस्तान तक उसे सड़क मार्ग की सुविधा दे। भारत ने यहां तक कहा कि वो इसके लिए भी तैयार है कि भारतीय सीमा से अफगानिस्तान तक भारतीय माल पाकिस्तानी ट्रकों में जाए, लेकिन पाकिस्तान तैयार नहीं हुआ।

चीन अपने दक्षिण इलाके शिनजियांग से पाकी बलूचिस्तान में ग्वादर तक ‘चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर’ का निर्माण कर रहा है। इसके लिए ग्वादर में अरब सागर के तट पर विशाल बंदरगाह भी बनाया जा रहा है। चीन चाहता है कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देश भी ग्वादर से जुड़ें लेकिन पाकिस्तानी हठधर्मिता और आतंकवाद के कारण ग्वादार बंदरगाह के औचित्य पर ही सवालिया निशान लग गया हैै।

भारत ने सदा बहुत ईमानदारी और संजीदगी से ईरान का साथ दिया है। ये सही है कि वर्ष 2009 में भारत ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम के विरूद्ध इंटरनेशनल एटाॅमिक एनर्जी एजेंसी के एक प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था। लेकिन ये भी सच है कि अनेक अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद भारत ने कभी उससे संबंध नहीं तोड़े। लेकिन 2015 के समझौते के बाद उसने भारत को हलके में लेना शुरू कर दिया। अब ट्रंप की नई नीतियों, धमकियों और सुन्नी देशों की चुनातियों के मद्दे नजर ईरान को भारत के साथ संबंधों के स्थायित्व का महत्व समझ में आ रहा है। आज ईरान भारतीय मुद्रा में व्यापार करने की संभावनाएं तलाशने और ऊर्जा क्षेत्र में नए समझौतों के लिए भी तैयार हो गया है। इसमें खटाई में पड़़ी फरजाद बी गैस फील्ड भी शामिल है जिसकी खोज एक भारतीय समूह ने की थी जिसमें ओएनजीसी विदेश और इंडियन आॅयल काॅरपोरेशन शामिल थे।

पिछले वर्ष जून में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्ला खमनेई ने ईद-उल-फितर पर अपने संबोधन में यमन, बहरीन के साथ कश्मीर का सवाल भी उठाया जिसका भारत ने भरपूर विरोध किया। ईरान के बलूच और सिस्तान इलाकों में पाकिस्तान-सउदी अरब समर्थित सुन्नी आतंकी गुट जैश-उल-अद्ल (न्याय की सेना) के ईरानी सेना पर लगातार हमलों के बाद उसने न सिर्फ पाकिस्तानी सेना को खुलेआम धमकी दी है, बल्कि कश्मीर का मुद्दा भी ठंडे बस्ते में डाल दिया है। स्पष्ट है अब भारत की तरह ईरान को भी लगने लगा है कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए जरूरी है कि उसकी पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर दोतरफा दबाव बनाया जाए।

रोहानी की यात्रा के दौरान भारत और ईरान ने नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें चाबहार बंदरगाह के एक हिस्से का परिचालन 18 महीने के लिए भारत को सौंपने, दोहरे कराधान-वित्तीय चोरी रोकने, राजनयिक पासपोर्ट धारकों को वीजा अनिवार्यता से छूट देने, व्यापार बेहतरी के लिए विशेषज्ञ समूह बनाने आदि से जुड़े समझौते शामिल हैं। ईरान और भारत आपसी व्यापार अपनी-अपनी करंसी में करने पर विचार करने के लिए भी सहमत हो गए हैं। जाहिर है ये समझौते दोनों के संबंधों में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं बशर्ते दोनों एक दूसरे के हितों और सीमाओं को ईमानदारी से समझें, आपसी संबंधों में यदा-कदा पेश होने वाली नाखुशगवार घटनाओं को प्रतिष्ठा का सवाल बनाए बिना और उनसे विचलित हुए बिना दूरगामी लक्ष्य पर निगाह रखें।

अंत में एक महत्वपूर्ण बात। दुश्मनी से दुश्मनी बढ़ती है। ईरान को अगर अपने हालात बेहतर करने हैं और दुनिया को साथ लेना है तो उसे पहले से कहीं अधिक संयम बरतना होगा।

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