“इस्लामिक उम्माह की मरीचिका” in Punjab Kesari

 

भारत में इस्लामिक कट्टरवादियों का मानना रहा है कि उनके लिए देश बाद में और इस्लाम पहले है। इसलिए किसी भी गैरइस्लामिक व्यक्ति से पहले उनका फर्ज इस्लामिक बिरादरी या इस्लामिक उम्माह के प्रति है। ये सोच कोई नई नहीं है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान (1919 – 1922) भी देश में इस्लामी उम्माह के नाम पर खिलाफत आंदोलन चलाया गया। शौकत अली, मुहम्मद अली और अबुल कलाम अजाद द्वारा चलाए गए इस आंदोलन का मकसद था ब्रिटिश साम्राज्य पर तुर्की में खिलाफत (खलीफा का शासन) न खत्म करने के लिए दबाव डालना। दुर्भाग्य की बात ये है कि कांग्रेस और महात्मा गांधी ने इसका समर्थन किया क्योंकि इसकी एवज में उन्हें असहयोग आंदोलन में मुस्लिम नेताओं का साथ मिला।

बहरहाल तुर्की में खलीफा के पतन और आधुनिक सरकार के गठन के साथ भारत का खिलाफत आंदोलन तो अपनी मौत मर गया, लेकिन इस्लामिक बिरादरी को अलग मानने का ये विचार किसी न किसी रूप में लगातार जारी रहा। आगे चलकर भारत के विभाजन में भी इसका अहम हाथ रहा। आश्चर्य नहीं कि आजकल पाकिस्तान में जो इतिहास पढ़ाया जा रहा है उसमें पाकिस्तानी अपनी पहचान अपनी धरती में ढूंढने की जगह सउदी अरब में ढूंढ रहे हैं। उधर आजाद भारत में भी जब संविधान बनाया जाने लगा तो उसमें भी मुसलमानों को उनकी ‘अलग पहचान’ के नाम पर आधुनिक मूल्यों और कानूनों के तहत लाने की कोशिश नहीं की गई।

अस्सी के दशक में भारत में इस्लामिक उम्माह के जिन्न ने एक बार फिर सिर उठाया जब विदेश सेवा के अफसर से नेता बने सय्यद शहाबुद्दीन ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को ‘इंडियन मुस्लिम’ कहना गलत है, उन्हें तो ‘मुस्लिम इंडियन’ कहना चाहिए क्योंकि उनके लिए अपनी धार्मिक पहचान और इस्लामिक बिरादरी भारत से पहले है। शहाबुद्दीन ने बढ़-चढ़ कर शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि भारतीय अदालतें इस्लामिक कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकतीं।

आपको ध्यान होगा कि तीन तलाक मामले में गैरसरकारी संगठन आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड ने भी सबसे पहले यही कहा था कि सुप्रीम कोर्ट मुसलमानों के कानूनों में दखलअंदाजी नहीं कर सकता। तीन तलाक के खिलाफ लोकसभा में विधेयक पारित होने के बावजूद इस्लामिक कट्टरवादी अपने रूख पर कायम हैं। इनके लिए उन अधिकारों का कोई मतलब नहीं है जो भारतीय संविधान ने भारतीय नागरिक होने के नाते मुस्लिम महिलाओं को दिए हैं।

‘भारत के अस्तित्व’ को मान्यता न देने और इस्लामिक उम्माह की सर्वोच्चता का ये विकृत विचार अब भी जारी है। इंटरनेट जैसे विकसित संचार माध्यमों के साथ ही यह और बढ़ गया है। अगर आजादी से पहले खिलाफत आंदोलन चलाया गया तो आज हम देखते हैं कि अनेक कट्टरवादी इस्लामिक संगठन आईएसआईएस का समर्थन कर रहे हैं जो दुनिया में इस्लामिक खिलाफत का झंडाबरदार है। आश्चर्य नहीं कि ये संगठन भोले भाले भारतीयों को फुसला कर उन्हें इराक, सीरिया और अफगानिस्तान में ‘जिहाद’ के लिए भेज रहे हैं।

भारत की प्रमुख आतंकवाद विरोधी संस्था नेशनल इनवेस्टीगेटिव एजेंसी (एनआईए) ने हाल ही में भारत से आईएसआईएस में शामिल होने गए लोगों की सूची जारी की है। आश्चर्य नहीं कि इसमें सबसे ज्यादा लोग केरल से हैं जहां यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकारों ने ‘सेक्युलरिज्म’ के नाम पर लंबे अर्से तक पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे अतिवादी संगठनों को प्रश्रय दिया।

भारत में कट्टरवादी संगठन ‘इस्लामिक उम्माह’ के नाम पर अर्से से आम मुसलमान को ठग रहे हैं। लेकिन एक बार तो इसकी जांच परख होनी ही चाहिए कि क्या दुनिया में वास्तव में कोई इस्लामिक उम्माह या बिरादरी जैसी कोई चीज है? शुरूआत करते हैं पड़ोसी देश पाकिस्तान से जिसे इस्लाम और ‘टू नेशन थ्योरी’ के नाम पर बनाया गया और जिसे आज दुनिया में आतंकवाद का सबसे घिनौना और क्रूर गढ़ माना जाता है। वहां अंदरूनी हालात आज विस्फोटक हैं, एक मत के मुसलमान दूसरे मत के मुसलमानों को मार रहे हैं। याद रहे पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली भी मुसलमान थे जिनपर पश्चिम पाकिस्तान के पंजाबी फौजियों ने अकथनीय जुल्म ढाए। इसका नतीजा अलग बांग्लादेश के रूप में सामने आया। सोचने की बात है कि अगर सारे मुसलमान एक बिरादरी होते तो बांग्लादेश अलग क्यों होता? पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों का नरसंहार करने वाली पाकी सेना अब भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। एक तरफ तो ये अपने आतंकियों के जरिए कश्मीर में हिंसा फैला रही है तो दूसरी तरफ इस्लामी उम्माह का वास्ता देकर फिलिस्तीन के नाम पर उन्माद भड़का रही है। हाल ही में आतंकी हाफिज सईद की रैली में फिलिस्तीनी राजदूत वलीद अबू अली के शामिल होने पर भारत ने सही एतराज जताया था। इस्लामी उम्माह की आड़ में आतंकियों को समर्थन कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है?

पाकिस्तान इस्लामिक देश है। लेकिन पड़ोसी मुस्लिम देशों अफगानिस्तान और ईरान से इसका छत्तीस का आंकड़ा चल रहा है। अफगानिस्तान में आए दिन पाकिस्तानी आतंकवादी विस्फोट करते हैं जिनमें निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं। इस्लामिक देश आपस में क्या सिर फुटव्वल कर रहे हैं इसपर बात करने से पहले ये बता दें कि दुनिया में इनका एक संगठन भी है – आॅर्गनाइजेशन आॅफ इस्लामिक काॅओपरेशन (ओआईसी) जिसके 57 सदस्य हैं। म्यांमार में इस्लामिक आतंकवाद की घटनाओं के बाद जब लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को घर छोड़ना पड़ा, तब ओआईसी ने गाल बजाने के अलावा कुछ नहीं किया। क्या रोहिंग्या मुसलमान कम मुसलमान थे जो दूसरे मुस्लिम देशों ने उनकी मदद नहीं की? वैसे भी अगर वास्तव में मुस्लिम उम्माह होती तो दुनिया में मुसलमानों के इतने देश ही क्यों होते?

अब नजर डालते हैं अन्य इस्लामिक देशों में चल रही उठा-पटक पर। कहने की आवश्यकता नहीं कि आज दुनिया में अगर सबसे विस्फोटक स्थिति किसी की है तो वो इस्लामिक देशों की ही है। सबसे पहले बात मुसलमानों के सबसे प्रिय देश सउदी अरब की जहां उनके सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थल मौजूद हैं। सुन्नी बहुल सउदी अरब, शिया बहुल ईरान को अपना दुश्मन नंबर एक मानता है। सउदी अरब को जहां शियाओं की भनक लगती है, वो वहां बदला लेने पहुंच जाता है। पड़ोसी देश यमन में भी उसने इसी वजह से 2015 में हस्तक्षेप किया। सउदी अरब ने कथित रूप से ईरान समर्थित शिया होउती विद्रोहियों को कुचलने और सुन्नी शासकों का समर्थन करने के लिए यमन में दखल दिया, लेकिन मामला हल नहीं हुआ, वहां लड़ाई अब भी जारी है। जून, 2017 में सउदी अरब के नेतृत्व में छह देशों ने कतर के बहिष्कार की घोषणा की क्योंकि कतर मिस्र के संगठन इस्लामिक ब्रदरहुड का समर्थन कर रहा था जिसे मिस्र आतंकवादी संगठन मानता है। यही नहीं सउदी अरब को इस बात से भी सख्त एतराज है कि कतर ईरान से व्यापार क्यों कर रहा है।

ध्यान रहे कुछ समय पूर्व सउदी अरब ने ‘इस्लामिक मिलिट्री काउंटर टेररिजम कोआलिशन’ बनाया जिसका प्रमुख पाकिस्तान का पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ है। इस संगठन में 41 देश हैं और इसका मकसद दुनिया से आतंकवाद को उखाड़ फेंकना है। ये कहीं न कहीं हास्यास्पद लगता है क्योंकि दुनिया भर में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम फैलाने में सबसे बड़ा हाथ सउदी अरब का रहा है और आतंकवाद फैलाने में पाकिस्तान की क्या भूमिका है, ये बताने की तो कोई जरूरत ही नहीं है। सउदी अरब ने कागजी स्तर पर ये संगठन बना तो लिया है लेकिन इसे जमीन पर उतारना अभी बाकी है। बहरहाल राहिल शरीफ को इसका प्रमुख बनाए जाने से ईरान, पाकिस्तान से और कुपित हो गया है। ईरान का मानना है कि ‘आतंकवाद’ तो सिर्फ बहाना है, ये संगठन तो असल में उसे नीचा दिखाने के लिए बनाया गया है।

चाहे सउदी अरब हो या यमन, मिस्र, सीरिया, लीबिया, इराक या ईरान, पूरे इस्लामिक जगत में मारकाट मची हुई है। उधर सउदी अरब में युवा मोहम्मद बिन सलमान को युवराज (क्राउन प्रिंस) घोषित करने के बाद देश के अंदर भी कोहराम मचा हुआ है। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के नाम पर उन्होंने अनेक राजकुमारों और बड़े व्यापारियों को सलाखों के पीछे भेज दिया है। सलमान ने हाल ही में जैसे लेबनान के प्रधानमंत्री साद हरीरी को बंदूक की नोक पर इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया, उससे भी सिर्फ खाड़ी देशों में ही नहीं, पश्चिम देशों में भी चिंता की लहर दौड़ गई। हरीरी ने अपने कथित इस्तीफे में कहा था कि वो लेबनान में ईरान समर्थित हिजबोल्ला के बढ़ते प्रभाव के कारण इस्तीफा दे रहे हैं। ध्यान रहे उनके पिता और पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी 2005 में कार धमाके में मारे गए थे जिसके लिए हिजबोल्ला पर शक किया गया था।

वर्तमान में इस्लामिक दुनिया में मोटे तौर पर दो गुट नजर आते हैं। एक तो सउदी अरब के नेतृत्व वाला सुन्नी गुट जिसे अमेरिका समर्थन दे रहा है तो दूसरी तरफ शिया गुट है जिसे रूस का समर्थन हासिल है। इस्लामिक देशों के बढ़ते आपसी मतभेदों के बीच आईएसआईएस का उल्लेख करना आवश्यक है जिसने इराक और सीरिया के बड़े भूभाग पर कब्जा कर खिलाफत स्थापित करने की घोषण कर दी। पहले तो अपने-अपने स्वाथों के हिसाब से इस्लामिक देश इसका इस्तेमाल करते रहे और अंदर ही अंदर इसे मदद देते रहे पर जब इसके अत्याचारों और क्रूरताओं के वीभत्स किस्से सामने आने लगे तो महाशक्तियों को होश आया और इसकी सत्ता को उखाड़ फेंका गया। इसकी सत्ता भले ही समाप्त हो गई हो, पर इसके हजारों आतंकवादी अब भी जिंदा हैं और कुछ तो अफगानिस्तान में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि बहुत से विशेषज्ञ मानते हैं कि अफगानिस्तान में आईएसआईएस नेटवर्क वास्तव में पाकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का खेल है। अफगानिस्तान का जिक्र आया है तो वहां तालिबान और मुल्ला उमर की सरकार भी आपको याद होगी जिसे अमेरिका ने वल्र्ड ट्रेड संेटर पर अल कायदा के हमले के बाद उखाड़ फेंका।

दुनिया में इस्लामिक देशों में जो भीषण युद्ध और सिर फुटव्वल है, उसे देख कर सहज ही सवाल उठता है कि भारत में इस्लामिक कट्टरवादी किस ‘उम्माह’ की बात कर रहे हैं? जब दुनिया में ऐसी कोई चीज है ही नहीं तो ये भारतीय मुसलमानों को क्यों भरमा रहे हैं? आखिर इनका मकसद क्या है? ये क्यों नहीं चाहते कि भारतीय मुसलमान अपनी मिट्टी से जुड़ें, देश का संविधान मानें और दकियानूसी सोच छोड़ आधुनिकता और विकास की राह पर आगे बढ़ें? जाहिर है, इसके पीछे सिर्फ राजनीति ही नहीं, अनेक अंतरराष्ट्री षडयंत्र भी हैं।

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