“कर्नाटकः भाजपा का अतिविश्वास और पिछलग्गू कांग्रेस कीे दोहरी हार” in Punjab Kesari

कर्नाटक में मची उठा-पटक ने नेताओं को कई सबक सिखाए। भारतीय जनता पार्टी के लिए सबक ये था कि अगर सुप्रीम कोर्ट सक्रिय हो जाए तो जोड़-तोड़ से सरकार बनाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाता है। राज्यपाल वजू भाई वाला ने येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी और बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का समय भी दे दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित सुनवाई के बाद बहुमत साबित करने के लिए सिर्फ 24 घंटे का समय दिया। इस सीमित समय में येदियुरप्पा संख्याबल नहीं जुटा पाए और उन्होंने भावुक भाषण के बाद इस्तीफा दे दिया। इस्तीफे के बाद उन्होंने कहा कि कुछ विपक्षी विधायक उनके संपर्क में थे, लेकिन अंततः उन्होंने साथ नहीं दिया।

येदियुरप्पा को आमंत्रित करके वजू भाई वाला ने कोई असंवैधानिक काम नहीं किया। असल में कांग्रेस की ओर से राष्ट्रपति बने विधि विशेषज्ञ शंकरदयाल शर्मा ने ब्रिटिश संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए इसे सही ठहराया था। लेकिन सोचने की बात ये है कि क्या भाजपा दिल्ली के उदाहरण को नहीं दोहरा सकती थी, जब उसने सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनने दिया। अगर ऐसा किया जाता तो कम से कम भाजपा विजय का नैतिक दावा तो कर सकती थी। वैसे भी इस पूरे प्रकरण में भाजपा बार-बार कांग्रेस से 19 साबित हुई। जैसी की खबर है, कांग्रेस ने मतदान के बाद ही जनता दल, सेक्युलर (जेडी,एस) से संपर्क साध लिया था। कांग्रेस ने बिना वक्त गंवाए वकीलों की बड़ी फौज के साथ आधी रात को ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया। यही नहीं उसने अपने वरिष्ठतम नेताओं, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, वीरप्पा मोईली आदि, की बड़ी टीम बेंगलूरू में तैनात की और पूरी सतर्कता से अपने विधायकों की रखवाली की।

लगता है, इस बार भाजपा कहीं न कहीं अतिविश्वास के कारण शहीद हुई। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रैलियों में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडी, एस सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा की भरपूर तारीफ की। लेकिन क्या वजह है कि तारीफों के आदान-प्रदान के बावजूद दोनों दलों में बातचीत आगे न बढ़ सकी? भाजपा को पूर्व एनडीए सहयोगी तेलुगु देशम की नाराजगी भी भारी पड़ी। तेलुगु देशम प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा को हराने की अपील जारी की। ध्यान रहे कर्नाटक में करीब 15 प्रतिशत तेलुगु भाषी हैं। राज्य के 12 जिलों में इनकी अच्छी खासी तादाद है। इस बार के लहरहीन चुनाव में जब एक-एक मत महत्वपूर्ण था, ऐसे में तेलुगु मतों की भी अपनी अहमियत थी। आपको याद दिला दें की 2013 के चुनाव में 49 सीटों पर विजय का अंतर 5,000 मतों से भी कम था। इसी तरह 2008 में 64 सीटों में ये अंतर 5,000 से कम था। इस बार के चुनाव में 11 सीटें ऐसी थीं जहां भाजपा 3,000 से भी कम मतों से हारी। देवरहिप्पारगी सीट पर तो भाजपा के प्रत्याशी सोमनगौड़ा बी पाटिल सिर्फ 90 मतों से हारे। अगर भाजपा को दक्षिण में पैर पसारने हैं तो स्पष्ट है उसे इस क्षेत्र में अपने राजनीतिक सहयोगियों को संभाल कर रखना होगा।

भाजपा की हार-जीत का विश्लेषण तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेता करेंगे ही। लेकिन एक बात तो साफ है कि वो इस चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और उसने सिद्धारमैया को सत्ता से हटाया। लेकिन बूथ स्तर तक चुनाव प्रबंधन करने वाले अमित शाह को इस ओर ज्यादा ध्यान देना होगा कि कैसे लहरहीन चुनाव में अपनी जीत सुनिश्चित की जाए।

अब बात कांग्रेस की। येदियुरप्पा के इस्तीफे के बाद अपने संक्षिप्त संवाददाता सम्मेलने में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसे लोकतंत्र की जीत बताया। हालांकि एक दिन पहले ही वो येदियुरप्पा के शपथग्रहण को लोकतंत्र की हत्या बता रहे थे और भारतीय सुप्रीम कोर्ट की तुलना पाकिस्तानी अदालतों से कर रहे थे। कर्नाटक में जो हुआ, वो भले ही लोकतंत्र की जीत हो, यहां असल में कांग्रेस की दोहरी हार हुई। एक तरफ तो सिद्धारमैया सरकार की विदाई हो गई तो दूसरी तरफ जेडी,एस से लगभग दोगुने विधायक होने के बावजूद कांग्रेस को जेडी, एस का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ा। समझा जाता है कि कुमारास्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला स्वयं राहुल ने किया। क्या अच्छा नहीं होता कि तुरत-फुरत फैसला करने की जगह वो पार्टी हित में कुमारास्वामी और उनके पिता एचडी देवेगौड़ा से स्थानीय नेताओं के साथ बात करते। भाजपा को बाहर रखने की जल्दी में उन्होंने अपने दल के हितों को ही कुर्बान कर दिया। चुनाव परिणाम आने से पहले ही उन्होंने राज्य में पांच साल शासन करने वाले सिद्धारमैया को दरकिनार कर दिया और सारी कमान दिल्ली के नेताओं को सौंप दी। अब सत्ता के बंटवारे में कांग्रेस को क्या मिलता है, ये देखना दिलचस्प होगा, लेकिन सियासी फैसले इतनी जल्दबाजी में नहीं लिए जाते। कुमारास्वामी ने एक बात तो बिल्कुल साफ कर दी है कि मुख्यमंत्री पद पर कोई समझौता नहीं हो सकता, पांच साल वो ही इस पद पर रहेंगे

राहुल के फैसले ने देश भर में कांग्रेस की छवि पिछलग्गू की बना दी। लगता है वो आगामी लोकसभा चुनावों तक जेडी,एस की मिन्नतें और चिरौरी कुछ वैसे ही करेंगे जैसे उत्तर प्रदेश में बबुआ अखिलेश यादव, बुआ मायावती की कर रहे हैं। बहुत से जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का पिछलग्गू बनने का फैसला राजनीतिक कारणों से कम और आर्थिक कारणों से ज्यादा था। एक अनुमान के अनुसार इस बार कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 7,000 से 10,000 करोड़ रूपए खर्च हुए, अगर ऐसे ही चला तो लोकसभा चुनावों में तो खर्च एक लाख करोड़ से ऊपर चला जाएगा। ऐसे में कांग्रेस को भी आय के स्थायी स्रोत की आवश्यकता होगी। भाजपा पहले ही आरोप लगाती रही है कि सिद्धारमैया और डी के शिवकुमार कांग्रेस के बैंक के तौर पर काम कर रहे थे। शिवकुमार के लेनदेन की तो एक डायरी भी सामने आ चुकी है, जिसकी जांच जारी है। इस डायरी में पार्टी के शीर्षस्थ नेताओं के नाम लिखे हैं।

बहरहाल कुमारास्वामी का पिछलग्गू बनने के राहुल गांधी के फैसले के राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दुष्परिणाम हो सकते हैं। इससे उनकी बारगेनिंग पाॅवर निश्चय ही कम हुई है। कर्नाटक में समर्पण के बाद क्षेत्रीय दल उन्हें गंभीरता से नहीं लेंगे। तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव तो उन्हें पहले ही कह चुके हैं कि वो विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व करने के योग्य नहीं हैं। कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान राहुल ने संकेत दिया कि अगर 2019 में कांग्रेस बड़े दल के रूप में उभरती है तो वो भी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। सवाल ये है कि अगर कर्नाटक में बड़ा दल होने के बावजूद वो मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं ले सके तो प्रधानमंत्री पद कैसे लेंगे?

कांग्रेस के कुछ नेता राज्य में पार्टी की दोहरी हार के बावजूद गाल बजाने में जुटे हैं कि इसने 2019 के घटनाक्रम का संकेत दे दिया है और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने ही बने। उन्हें समझना पड़ेगा कि भले ही भाजपा राज्य में सरकार न बना पाई हो, वो वहां सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है और उसका वोट प्रतिशत भी सुधरा है। भाजपा के लिए असली चुनौती कर्नाटक में नहीं थी जहां उसके पास खोने को कुछ नहीं था, भाजपा की असली अग्नि परीक्षा तो मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में होगी जहां उसकी सरकारें हैं। अगर भाजपा यहां हारी तो ये कहना उचित होगा कि भाजपा की चुनौतियां बढ़ गईं हैं।

कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों और सुविधाभोगी पत्रकारों को राहुल को चने के झाड़ पर चढ़ाना बंद करना चाहिए। ये लोग गुजरात के बाद भी राहुल की ‘नैतिक जीत’ का दावा करने लगे थे, जबकि हकीकत ये है कि नक्सलवाद, जातिवाद, इस्लामिक सपं्रदायवाद के भरपूर इस्तेमाल के बावजूद वो वहां हारी थी। कांग्रेस ने लगभग यही नीतियां कर्नाटक चुनाव में भी अपनाईं। अलग झंडे के जरिए कन्नड़ स्वाभीमान जगाने की कोशिश की गई तो लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जा देकर हिंदुओं को विभाजित करने का प्रयास हुआ। यही नहीं आतंकवादी संगठन पापुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के राजनीतिक संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसडीपीआई) का भी भरपूर इस्तेमाल हुआ। एसडीपीआई ने मुस्लिम मतों का विभाजन रोकने और कांग्रेस को जिताने के लिए अपने उम्मीदवार वापस लिए। यही नहीं मस्जिदों से फतवे जारी किए गए कि इस्लाम खतरे में है, इसे बचाने के लिए कांग्रेस को वोट दें। कांग्रेस के पक्ष में चर्च की तरफ से अपील जारी की गई।

कर्नाटक चुनाव से स्पष्ट है कि कांग्रेस इस्लामिक सांप्रदायिकता और तुष्टिवाद छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। राहुल भाजपा को रोकने के लिए इतने डेस्परेट हो गए हैं कि अपनी पार्टी का भविष्य भी दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। स्पष्ट है कि कांग्रेस को अपनी नीतियों के बारे में फिर से विचार करना पड़ेगा नहीं तो इस्लामिक ध्रुवीकरण की नीति उसे अगले लोकसभा चुनावों में फिर भारी पड़ेगी, भले ही वो कितना ‘टेम्पल रन’ खेल लें।

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