सही नीयत और नीति से मोदी ने रखी कृषि विकास की नींव in ‘Punjab Kesari’

सही नीयत और नीति से मोदी ने रखी कृषि विकास की नींव

विपक्षी दलों ने कृषि मोर्चे पर मोदी सरकार को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। नक्सली और साम्यवादी पार्टियों ने किसानों की परेशानियां दिखाने के लिए दिल्ली में फर्जी किसानों की परेड भी करवाई। आश्चर्य नहीं पार्टी लाइन से परे सभी विपक्षी नेता इस जमावड़े पर टोपी रखने के लिए हाजिर हो गए। यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल भी सभी गिले-शिकवे छोड़ कर एक मंच पर आ गए। कहना न होगा, इन दलों से जुड़े मीडिया चाटुकारों ने इसे लंबे अर्से तक भुनाया।

ये बात सही है कि पिछले चार साल में किसानों की हालत में चमत्कारी परिवर्तन नहीं आया है, लेकिन ये बात भी सही है कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमत्री पद संभालने के बाद किसानों की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है और कांग्रेस सरकारों ने जो अपने साठ साल के कार्यकाल में नहीं किया, वो मोदी सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में कर दिखाया है। किसानों के लिए घड़ियाली आंसू बहाने वाली कांग्रेस उनकी दुर्दशा के लिए कैसे जिम्मेदार है और उसने वो क्या कुछ नहीं किया जो उसे करना चाहिए था, हम इसके विवरण में नहीं जाएंगे।

लेकिन हम विपक्षी दलों के झूठ का पर्दाफाश अवश्य करेंगे और बताएंगे कि मोदी सरकार ने किसानों की दशा और दिशा सुधारने के लिए क्या ठोस उपाय किए। कांग्रेसी सरकारों ने किसानों की हालत में सुधार के लिए कर्ज माफी जैसे काॅस्मेटिक उपाय अपनाए जिनसे किसानों से ज्यादा उनके पार्टी कार्यकर्ताओं को लाभ हुआ, पर किसानों की परेशानियों और आत्महत्याओं में कोई कमी नहीं आई। देश भर में किसानों की आत्महत्याओं को देखते हुए मनमोहन सरकार ने 18 नवंबर 2014 को प्रसिद्ध कृषि विशेषज्ञ प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन आॅन फारमर्स का गठन किया। इसका मकसद था किसानों के समग्र विकास के लिए मध्यावधि के सुधार सुझाना। कमीशन से अपेक्षा की गई कि वो खेती को लाभदायक, स्थायित्वपूर्ण, टिकाऊ बनाने के साथ-साथ किसानों की खाद्य और पोषण सुरक्षा आदि सुनिश्चित करने के बारे में सुझाव देगा। उसेे न सिर्फ किसानों की ऋण समस्या, शिक्षा, तकनीकी विकास, जीवनस्तर में सुधार के बारे में सिफारिशें करनी थीं, कृषि उपज की खरीद के लिए लाभदायक फार्मूला भी सुझाना था। अगस्त, 2005 से अक्तूबर 2006 के बीच इस आयोग ने किसानों के त्वरित और समावेशी विकास के लिए चार रिपोर्ट प्रस्तुत की। अफसोस मनमोहन सरकार ने इन पर कोई कार्रवाई नहीं की।

मोदी सरकार ने इस आयोग की सिफारिशों पर अमल करने का फैसला किया ताकि किसानों का जीवन स्तर सुधारा जा सके। सरकार ने इसके लिए 2.11 लाख करोड़ रूपए का प्रावधान किया। किसानों को उनकी लागत से 50 प्रतिशत अधिक समर्थन मूल्य देने का फैसला किया गया। माॅडल एग्रीकल्चरल लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 प्रस्तुत किया गया जिसे कृषि सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया। फिलहाल देश में 585 कृषि मंडियां और 22,000 ग्रामीण बाजार हैं जिनमें छोटे किसान अपनी उपज बेच सकते हैं। सरकार ने कृषि बाजारों में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही ई-नेशनल एग्रीकल्चरल मार्केट (ई-नाम) भी आरंभ किया जिसके माध्यम से कृषि बाजारों को जोड़ा गया।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने फसलों की 795 ऐसी किस्में विकसित की हैं जो न केवल उपज बढ़ाएंगी बल्कि किसानों में कुपोषण की समस्या पर भी किसी सीमा तक लगाम लगाएंगी। इनमें से 495 किस्में ऐसी हैं जिनपर मौसमी उतार-चढ़ाव का असर नहीं होता। ये सभी किस्में किसानों को सौंप दी गईं हैं ताकि वो उनका अधिक से अधिक लाभ उठा सकें।

इसके अलावा सरकार ने देश भर में साॅइल हेल्थ कार्ड स्कीम भी चलाई है ताकि किसानों का अपनी जमीन की सेहत की जानकारी रहे और वो उसके अनुसार ही फसल का चुनाव करें तथा खाद, बीज, पानी आदि का प्रयोग करें। अब तक 15 करोड़ किसानों को ये कार्ड दिया जा चुका है और उन्हें खेती के आधुनिक तौर तरीके अपनाने के लिए प्रेरित किया गया है। बरसों से करीब 100 सिंचाई परियोजनाएं अधूरी पड़ीं थीं, सरकार ने 80,000 करोड़ रूपए की लागत से इन्हें पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है और इनमें से अनेक योजनाएं तो पूरी भी हो चुकी हैं।

सरकार ने पशुपालन, मछली पालन, सहकारी संस्थाओं, कृषि मार्केट और लघु सिंचाई क्षेत्र की बेहतरी के लिए अलग से कोष भी बनाया है। कुल मिलाकर सरकार ने किसानों के लिए आय केंद्रित सोच अपनाई है ताकि फसलों का बेहतर और निर्विघ्न उत्पादन हो तथा कृषि, किसानों और उपभोक्ता सभी का कल्याण हो। कुल मिलाकर लक्ष्य ये है कि किसानों की आय 2022 तक दोगुनी की जाए।

ये मोदी सरकार की नीतियों का ही नतीजा है कि पिछले चार साल में देश मछली पालन के क्षेत्र में नीली क्रांति की ओर बढ़ा है। इस क्षेत्र में 26 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई है। पशुपालन क्षेत्र में 24 प्रतिशत विकास हुआ है। पहले यूरिया मुश्किल से मिलता था, लेकिन अब नीम कोटेड यूरिया हर जगह आसानी से उपलब्ध है, इसके लिए कोई मारामारी नहीं है।

मोदी सरकार ने 18 फरवरी 2016 को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आरंभ की। इससे अब तक 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश लाभ उठा चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसके तहत एक करोड़ 70 लाख किसान बीमा करवा चुके हैं। दो वर्ष के भीतर ही करीब 30 प्रतिशत किसान इस योजना के साथ जुड़े हैं। जैसे-जैसे लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ेगी, इससे जुड़ने वाले किसानों की संख्या भी बढ़ेगी।

मोदी सरकार ने सामान्य किसानों को ही लाभ नहीं पहुंचाया, जंगल उत्पादों पर बसर करने वाले आदिवासियों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए भी कदम उठाए। यूपीए सरकार ने आदिवासियों द्वारा जंगलों से एकत्र की जानी वाली और स्थानीय हाटों में बेची जाने वाली 24 किस्म की माइनर फाॅरेस्ट प्राॅड्यूस का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित किया था। मोदी सरकार ने इस सूची में 17 और उत्पाद जोड़े हैं और न्यूनतम समर्थन मूल्य में 200 प्रतिशत तक की वृद्धि की है। इस योजना के लिए 1,172 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। जमीनी स्तर पर आदिवासियों में संगठन और आंतरिक ढांचे के आभाव के कारण ये योजना परवान नहीं चढ़ सकी। उम्मीद की जानी चाहिए कि समर्थन मूल्य में समुचित बढ़ोतरी के बाद लोगों का रूझान इस ओर बढ़ेगा।

लोकसभा की 542 सीटों में से सिर्फ 55 ऐसी हैं जहां सारे मतदाता शहरी हैं, बाकी की 487 सीटों पर ग्रामीण मतदाता अहम भूमिका निभाते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार आगामी लोक सभा चुनावों से पहले किसानों के लिए कुछ और महत्वपूर्ण और उपयोगी योजनाओं की घोषणा भी कर सकती है। सूत्रों के मुताबिक आगामी बजट किसानों के लिए शुभ समाचार लेकर आएगा। सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में संशोधन कर सकती है ताकि अधिक से अधिक किसान इससे जुड़ें और दावों का निपटारा भी जल्दी से जल्दी हो सके। बजट में किसान क्रेडिट कार्ड योजना में कोलेटरल फ्री कर्ज की सीमा दोगुनी कर दो लाख रूपए तक की जा सकती है। समझा जाता है कि नीति आयोग कृषि और वित्त मंत्रालय के साथ कृषि क्षेत्र  में ढांचागत सुधारों के साथ ही कर्ज माफी की व्यवहार्यता (फीजिबिलिटी) पर भी विचार कर रहा है। हालांकि इसके बारे में फैसला तो राजनीतिक स्तर पर ही किया जाएगा।

सरकार छोटे, मझोले और बंटाई पर खेती करने वाले किसानों को राहत देने के लिए भी तैयारी कर रही है ताकि बंटाई किसानों को भी बैंकों से कर्ज मिल सके। ऐसे किसानों को राहत देने के लिए उनके मंडी रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट और बैंक ट्रांजेक्श्न हिस्ट्री को आधार बनाया जा सकता है।

सूत्रों की मानें तो सरकार कर्ज माफी से भी एक कदम आगे जा सकती है। वो न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार दर के अंतर की भरपाई करने पर भी विचार कर रही है। ये राशी सीधे उनके बैंक खाते में जमा करवाई जा सकती है। ये योजना मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की भावांतर योजना पर आधारित है। सरकार झारखंड सरकार की उस योजना को भी राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने पर विचार कर रही है जिसमें तय सबसिडी सीधे किसानों के खाते में जमा करवा दी जाती है।

कृषि क्षेत्र के विस्तृत क्षेत्रफल, करोड़ों-करोड़ किसानों, मौसमी अनिश्चितताओं और इस क्षेत्र की विविधिताओं और जटिलताओं को देखते हुए ये स्पष्ट है कि इसमें तुरंत सुधार संभव नहीं है। लेकिन मोदी सरकार ने खेत-खलिहान से लेकर भंडारण और फिर खाद्य प्रसंस्करण से लेकर बाजार तक एक नई व्यवस्था की नींव तो रख दी है जिसके परिणाम आने भी शुरू हो गए हैं।

कहना न होगा कि भाजपा की राज्य सरकारों ने भी किसानों की सहायता के लिए अनेक व्यावहारिक और प्रभावी योजनाएं लागू की हैं जिनकी सूची काफी लंबी है। उनकी उपलब्ध्यिों के बारे में विस्तार से चर्चा के लिए यहां स्थान कम है, लेकिन इतना तो याद दिलाना होगा कि किसानों को सिर्फ मोदी सरकार की कृषि संबंधी योजनाओं का लाभ ही नहीं मिला, अन्य योजनाओं का फायदा भी मिला है। सरकार ने हर गरीब को घर देने और हर घर में  बिजली और गैस पहुंचाने की जो योजनाएं बनाईं हैं, उनसे भी किसानों को लाभ पहुंचा है। यही नहीं हर गांव को सड़क से जोड़ने और नए स्वास्थ्य केंद्र खोलने की योजना से भी गरीब किसानों को लाभ हुआ है। यह पहली बार है जब गरीबी रेखा से नीचे हर परिवार को आयुष्मान भारत योजना के तहत पांच लाख रूपए सालाना का बीमा दिया गया है।

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