“विश्वपटल पर आज फिर मौका है भारत के लिए, याद दिला रहे हैं लैरी प्रेस्लर” in Punjab Kesari

हाल ही में पूर्व अमेरिकी सेनेटर लैरी प्रेसलर अपनी नई किताब ‘नेबर्स इन आम्र्स’ (हथियारों की दौड़ में उलझे दो पड़ोसी) के प्रचार के सिलसिले में भारत आए। उनकी किताब में नेबर्स यानी पड़ोसी और कोई नहीं, भारत और पाकिस्तान हैं। प्रेसलर अमेरिका ही नहीं दुनिया भर में परमाणु निरस्त्रीकरण के पुरोधा के रूप में जाने जाते हैं। अमेरिकी सेनेट की आम्र्स कंट्रोल सबकमेटी (शस्त्र नियंत्रण उपसमिति) के चेयरमेन के तौर पर उन्होंने सुप्रसिद्ध प्रेसलर अमेंडमेंट्स (संशोधन) प्रस्तुत किए जिन्हें 1990 में लागू किया गया। इन संशोधनों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति किसी देश को तभी मदद दे सकता है जब वो इसका प्रमाणपत्र दे कि कथित देश परमाणु अस्त्र नहीं बना रहा।

इन संशोधनों के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जाॅर्ज एच डब्लू बुश ये प्रमाणित नहीं कर सके कि पाकिस्तान परमाणु अस्त्र नहीं बना रहा। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका ने पहली बार न केवल पाकिस्तान की आर्थिक मदद रोकी, बल्कि एफ-16 युद्धक विमानों की प्रस्तावित बिक्री भी रोक दी। इन संशोधनों ने अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों की शक्ल और सूरत हमेशा के लिए बदल दी। उन्हें पाकिस्तान में एक विलेन के रूप में देखा जाने लगा जबकि भारत में उन्हें हीरो माना गया।

उनकी किताब में विस्तार से बताया गया है कि जब प्रेसलर संशोधन लागू थे तब कैसे अमेरिका, पाकिस्तान और भारत में राजनयिक, औद्योगिक और सैन्य हलकों में उठापटक हुई। वो बताते हैं कि अमेरिका में सैन्य और औद्योगिक गठबंधन (इसे वहां आॅक्टोपस के नाम से जाना जाता है) कितना शक्तिशाली है और भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ी नीतियों पर ये कैसे असर डालता है। इस पुस्तक में वो असल में भारतीय उपमहाद्वीप के बारे में 1974 से अब तक की अमेरिकी विदेश नीति की विस्तार से चर्चा करते हैं और कहते हैं कि अमेरिका और भारत का मौजूदा गठबंधन, अमेरिका और उसके सहयोगियों के संबंधों के लिए एक आदर्श स्थापित कर सकता है। ध्यान रहे भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण 18 मई 1974 को किया था जिसके बाद पूरी दुनिया में उथल-पुथल मच गई थी।

ये संयोग है कि लैरी प्रेसलर भारत तब आए जब अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस अपने पहले भारतीय दौरे पर थे। प्रेसलर ने 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में हिलेरी क्लिंटन को समर्थन दिया, लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बारे में वो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का पुरजोर समर्थन करते हैं। भारत में अपने विभिन्न साक्षात्कारों में उन्होंने कहा कि लंबे अर्से में ट्रंप पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने पाकिस्तान और ‘आॅक्टोपस’ को आईना दिखाने की हिम्मत की है…जिन्होंने पहली बार विदेश नीति की दृष्टि से असल में भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग रखा है और पाकिस्तान को स्पष्ट कर दिया है कि अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी उसकी सुरक्षा के लिए कोई खतरा नहीं है जैसा कि वो सारी दुनिया में गाता फिरता है। वो तो यहां तक कहते हैं कि अगर अमेरिकी प्रशासन गंभीर होता तो पाकिस्तान परमाणु बम नहीं बना पाता। वो इसके लिए ‘आॅक्टोपस’ और अमेरिकी नेताओं और राजनयिकों के ढुलमुल रवैये को दोष देते हैं जिसे लाॅबिंग के माध्यम से प्रभावित किया जाता रहा है।

प्रेसलर कहते हैं कि पिछले राष्ट्रपतियों से अलग, ट्रंप पाकिस्तान के मामले में अधिक संजीदा हैं और अफगानिस्तान के बारे में उनकी नई नीति इसका सबूत है। ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान कहा था कि वो वाइट हाउस (अमेरिकी राष्ट्रपति का निवास स्थान) में भारत के सच्चे मित्र साबित होंगे। प्रेसलर इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं देखते। वो कहते हैं कि दुनिया भर में ट्रंप की भले ही कैसी भी छवि प्रचारित की जा रही हो, लेकिन इस मामले में वो वास्तव में भारत के सच्चे मित्र साबित होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन इस विषय में भारत को भी ‘सुस्पष्ट नीति’ अपनानी होगी।

अब सवाल ये है कि ‘सुस्पष्ट नीति’ से प्रेसलर का क्या तात्पर्य है? इसके मोटे तौर पर दो आयाम हैं। एक तो ये कि भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बारे में भारत सुस्पष्ट और सुविचारित नीति बनाए और दूसरा ये कि वो समूचे एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बारे में अपनी दीर्घकालिक भूमिका तय करे।

पहले बात अफगानिस्तान के विषय में। राष्ट्रपति ट्रंप असल में अफगानिस्तान में पिछले 16 साल से चला आ रहा युद्ध जीतना चाहते हैं जो पाकिस्तानी डबलक्राॅस के कारण बार-बार हाथ से फिसलता रहा है। पाकिस्तान एक ओर तो अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में खुद को अमेरिका का सहयोगी बताता है और इस लड़ाई की कीमत वसूलता है तो दूसरी ओर अफगानिस्तान में हक्कानी नेटवर्क जैसे उसके प्राॅक्सी अमेरिकी सैनिकों पर जानलेवा हमला करते हैं।
पाकिस्तान ऊपरी तौर पर भले ही कोई भी दावा करता हो पर उसका असली मकसद है अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार को अस्थिर रखना और अंततः वहां अपने पिट्ठुओं की सरकार स्थापित करना। सनद रहे कि 1992 में अफगानिस्तान में पाक समर्थित तालीबान ने सरकार बनाई थी जिसे 11 सितंबर 2001 में न्यू याॅर्क में वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका ने गिरा दिया था। वल्र्ड ट्रेड संेटर के आतंकी हमले का मुख्य आरोपी ओसामा बिन लादेन भी आखिरकार 2 मई 2011 को पाकिस्तान में मारा गया था।

बहरहाल ट्रंप ने पहली बार सार्वजनिक रूप से इतने ऊंचे स्तर पर पाकिस्तान के ‘डबल गेम’ के खिलाफ टिप्पणी की है ओर अफगानिस्तान मसले के हल में उसे पूरी तरह दरकिनार कर दिया है। उन्हांेने तीन बातें स्पष्ट कर दी हैं। एक – अफगानिस्तान में अमेरिकी मौजूदगी की कोई समयसीमा नहीं होगी, दो – वहां अमेरिकी जनरल अपनी नीति खुद बनाएंगे, खुद फैसले लेंगे और इसमें वाशिंग्टन का कोई दखल नहीं होगा और तीन – अफगानिस्तान के आर्थिक, लोकतांत्रिक संस्थागत विकास में भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

स्पष्ट है कि ट्रंप चाहते हैं कि भारत अपनी ढुलमुल नीति छोड़, खुल कर अफगानिस्तान में सामने आए और वहां बड़ी भूमिका निभाए। समझा जाता है कि अमेरिकी रक्षा सचिव जिम मैटिस ने अपने हालिया भारत दौरे में इस विषय में विस्तार से चर्चा की। जिम मैटिस और भारतीय रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने औपचारिक बातचीत के बाद जब प्रेसवार्ता की तो निर्मला सीतारमन ने स्पष्ट कर दिया कि ‘फिलहाल’ भारत अफगानिस्तान में सैनिक नहीं भेजेगा। लेकिन समझा जाता है कि दोनों देशों ने अफगानिस्तान पर अपनी रणनीति पर मोहर लगा दी है और आने वाले समय में भारत वहां बड़े पैमाने पर विकास परियोजनाएं चालू करेगा।

अब हम बात करते हैं एशिया-प्रशांत क्षेत्र के बारे में। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत को इस क्षेत्र में अपना रणनीतिक सहयोगी माना था। उन्होंने न केवल अमेरिका और भारत की परमाणु संधि की गुत्थियां सुलझाने की कोशिश की, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ के स्वप्न को साकार करने के लिए अनेक रणनीतिक समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए। उन्होंने अपने कार्यकाल के अंतिम दिन तक भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में सदस्यता दिलवाने के लिए प्रयास किए। राष्ट्रपति ट्रंप ने भले ही ओबामा के ईरान समझौते और पर्यावरण से जुड़े पेरिस समझौते पर सवालिया निशान लगा दिया हो पर भारत के बारे में उनकी नीतियों को ही आगे बढ़ाया है। जाहिर है अमेरिका इस क्षेत्र में भारत को चीन के बरक्स खड़ा करना चाहता है ताकि चीन की विस्तारवादी और अराजकतावादी नीतियों पर लगाम लगाई जा सके। मामला चाहे साउथ चाइना सी का हो, पाकिस्तान और नाॅर्थ कोरिया जैसे अराजक देशों को परमाणु तकनीक देने का हो, मध्य एशिया के तेल समृद्ध देशों में पैर पसारने का हो या वन बेल्ट वन रोड की महत्वाकांक्षी परंतु संदेहास्पद परियोजना का, चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अराजकता ही फैलाई है और एक नई किस्म के साम्यवादी उपनिवेशवाद को बढ़ावा दिया है। भारत डोकलाम विवाद को भी अभी भूला नहीं है।

अमेरिका चाहता है कि चीन की निरंकुश और अदम्य व्यापारिक और सामरिक हसरतों पर लगाम लगाने के लिए आॅस्ट्रेलिया, जापान भारत और अमेरिका मिलकर काम करें और इसमें पूर्व एशिया से अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका तक के समान विचारधारा वाले देश भी सहयोग करें। संभवतः यही कारण है कि जापान भी भारत के साथ परमाणु संधि के लिए तैयार हो गया और उसने भारत के सहयोग से जापान -अफ्रीका काॅरीडोर की योजना भी बनाई। उधर अमेरिका भी भारत को सुदृढ़ बनाने के लिए अपेक्षित सैन्य सहायता और तकनीक देने के लिए इच्छुक है, हालांकि इसमें कुछ बाधाएं भी हैं। ध्यान रहे भारत, जापान और अमेरिका छोटे-मोटे युद्धाभ्यासों के अलावा हर वर्ष बंगाल की खाड़ी में बड़े पैमाने पर ‘मालाबार युद्धाभ्यास’ भी कर ही रहे हैं।

असल में प्रेसलर जब कहते हैं कि भारत ‘सुस्पष्ट नीति अपनाए’ तो उनका मतलब यही होता है कि इन दोनों क्षेत्रों में भारत अपनी परंपरागत झिझक और गलतफहमियां छोड़ कर साफतौर से अमेरिका के साथ आए। पूर्ववर्ती भारतीय सरकारें पाकिस्तान की तथाकथित चुनी हुई सरकारों से गलबहियां करती रही हैं। यहां बहुत से घटक अब भी वहां की सरकार से बातचीत का समर्थन कर रहे हैं। लेकिन प्रेसलर कहते हैं कि पाकिस्तान में असल में सेना और आईएसआई का शासन होता है और चुनी हुई सरकार की हैसियत कठपुतली से अधिक नहीं होती। वो पाकिस्तान के प्रति सख्त और निर्णायक रवैये के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा करते हैं। वो मानते हैं कि मोदी ने वास्तव में पाकिस्तान की असली सत्ता को चुनौती दी है जो अब तक ‘चुनी हुई सरकार’ के पर्दे के पीछे नापाक खेल खेल रही थी।

उधर पाकिस्तानी सेना ऊपरी तौर पर भले ही कितने तेवर दिखाए पर वो ट्रंप की चेतावनी समझ गई है। यही वजह है कि पाकिस्तान अब चीन, रूस और तुर्की जैसे देशों के साथ एक वैकल्पिक गुट बनाने की जुगत में लग गया है। हालांकि न तो रूस अब अमेरिका के खिलाफ पाकिस्तान के साथ खुलकर आने के लिए तैयार है और न ही चीन अब लंबे समय तक उसके आतंकवादियों को संरक्षण देने के लिए। संयुक्त राष्ट्र आम सभा में जिस तरह सिर्फ भारत ही नहीं, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान और खुद अमेरिका और चीन ने उसकी बखिया उधेड़ी, उससे उसे अहसास हो गया होगा कि आने वाले वक्त में उसकी क्या दुगर्ति होने वाली है।

जाहिर है अगर भारत वास्तव में पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहता है, चीन पर लगाम लगाना चाहता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जनसंख्या और आर्थिक शक्ति के अनुरूप स्थान चाहता है तो यही वक्त है जब वो पहले की रोमांटिक और किसी हद तक इस्लाम परस्त सांप्रदायिक विदेशनीति छोड़कर एक नई और लचीली नीति अपनाए जिसके केंद्र में सिर्फ और सिर्फ भारत के हित हों। यह सही है कि भारत को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर विदेशनीति के पथ से नहीं डिगना चाहिए लेकिन ये भी याद रखना चाहिए कि अगर सही समय पर सही निर्णय न लिया जाए तो वो लंबे अर्से तक दुख देता है। जरा सोचिए अगर पचास के दशक में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपना साम्यवादी रूझान छोड़ कर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और परमाणु तकनीक के अमेरिकी प्रस्ताव स्वीकार कर लेते तो आज अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की स्थिति क्या होती? सेनेटर प्रेसलर भारत को याद दिला रहे हैं कि आज फिर ‘मौका’ है…भारत सही निर्णय ले तो सिर्फ उसकी ही नहीं, समूचे एशिया की तस्वीर बदल सकती है। ये सही है कि आज विश्व में किसी भी देश की विदेशनीति की पूछ तभी होती है, जब उसके पास आर्थिक और सैन्य ताकत हो पर ये भी सही है आज भारत इस स्थिति में है कि वो उचित विदेशनीति के जरिए अपने अपने आर्थिक विकास के लक्ष्य को और ऊंचाई तक ले जा सकता है। जब साम्यवादी चीन पैसा कमाने के लिए पूंजीवादी अमेरिका को गले लगा सकता है तो फिर भारत के सामने क्या बाधा है?

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