“कब तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति करेंगी ममता बनर्जी?” in Punjab Kesari

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में लंबे अर्से तक नंबर दो स्थान पर रहे पार्टी के मुख्य रणनीतिकार मुकुल राय हाल ही में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए। इसे लेकर काफी टीका टिप्पणी हुई। ये मामला लंबे समय तक ट्वीटर पर ट्रेंड भी करता रहा। ये सही है कि उनका व्यक्तित्व टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी जैसा करिश्माई नहीं है, लेकिन ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ममता की सफलता में उनका बड़ा हाथ रहा है और उनकी सोच को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। कुछ लोग मानते हैं कि उनका भाजपा में शामिल होना उतना ही ऐतिहासिक है जितना ममता बनर्जी का कांग्रेस से अलग होकर 1997 में टीएमसी बनाना। लेकिन क्या टीएमसी का ये भेदी ममता की लंका ढहा पाएगा? ये तो वक्त ही बताएगा। लेकिन भाजपा को उम्मीद अवश्य है कि जैसे ममता ने हत्यारे कम्युनिस्टों की सत्ता की दौड़ पर लगाम लगाई, वैसे ही मुकुल भी ममता के इस्लामिक सांप्रदायिक शासन पर लगाम लगाएंगे।

भाजपा की उम्मीद संभवतः उत्तर प्रदेश और बिहार के अनुभवों पर टिकी है जहां उसने मुसलमान-यादव की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी सांप्रदायिक पार्टियों पर लगाम लगाई। भाजपा के 11 प्रतिशत वोट के मुकाबले, 45 प्रतिशत वोट के साथ टीएमसी इस समय निःसंदेह अजेय दिखाई देती है, लेकिन गत वर्षों में जैसे भाजपा ने कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों को दरकिनार किया है, उससे यह स्पष्ट हो चुका है कि राज्य में वो अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है और सही रणनीतियों के साथ वह अवश्य ही आगे बढ़ेगी, भले ही इसमें कुछ समय लगे।

बेशर्मी की हद तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति करने वाली ममता समझती हैं कि जब तक मुसलमान उनके साथ हैं, उन्हें कोई हरा नहीं सकता। लेकिन लंबे अर्से में उनकी यही इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति उनका वाटरलू भी साबित हो सकती है। लगभग 32 साल के कम्युनिस्ट शासन के बाद जब ममता ने कमान संभाली तो लगा था कि राज्य राजनीतिक हत्याओं, अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता और आर्थिक पिछड़ेपन से बाहर आएगा, लेकिन अफसोस, ऐसा हो न सका। वर्ष 2011 के बाद 2016 में ममता दोबारा मुख्यमंत्री भी चुनी गईं, लेकिन हालात बद से बदतर होते गए।

ममता बनर्जी का सिरफिरापन, सनकीपन, देश से अलग खुद को बंगाल की महारानी समझने का भ्रम, सब अपनी जगह, लेकिन सबसे अधिक जो खतरनाक है, वो है उनकी अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता। कई बार तो केंद्र और भाजपा के विरोध में ममता इतनी अंधी हो जाती हैं कि संवैधानिक मर्यादाओं को भी पार कर जाती हैं। जब वो ये दिखाने की कोशिश करती हैं कि ‘इस्लामिक पश्चिम बंगाल सरकार’, ‘हिंदू केंद्र सरकार’ का बड़ी दिलेरी से सामना कर रही है, तो स्थिति विस्फोटक हो जाती है। ममता की अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता और मानसिक दिवालिएपन पर दया आती है, लेकिन चिंता भी होती है कि उन्होंने ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चटर्जी, रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी महान विभूतियों की जन्म और कर्मभूमि को आज कैसे नरक में बदल दिया है।

ममता की इस अंधी इस्लामिक सांप्रदायिकता की वजह आखिर क्या है। इसे समझने के लिए बंगाल की जनसंख्यकी (डेमोग्राफी) और राजनीतिक इतिहास को समझना होगा। वहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। 2011 की जनगणना के अनुसार वहां करीब 27 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। राजधानी कोलकाता में ही उनकी आबादी करीब 21 प्रतिशत है। बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर देश में सर्वाधिक है। देश में अगर मुस्लिम आबादी 0.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है तो बंगाल में ये दर 1.77 प्रतिशत की दर से। इसके मुकाबले देश भर में जहां हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर 0.7 प्रतिशत गिरी है, वहीं बंगाल में यह 1.94 प्रतिशत की दर से कम हुई है।

बंगाल के तीन जिलों में तो मुस्लिम आबादी, हिंदू आबादी से आगे बढ़ गई है। ये जिले हैं मुर्शिदाबाद (हिंदू – 23 लाख, मुस्लिम 47 लाख), मालदा (हिंदू – 19 लाख, मुस्लिम – 20 लाख) और नाॅर्थ दिनाजपुर (हिंदू – 14 लाख, मुस्लिम – 15 लाख)। भारत में मुस्लिम आबादी के घनत्व के हिसाब से अगर अनंतनाग जिला (जम्मू एवं कश्मीर) सबसे आगे है, तो हैड काउंट के हिसाब से मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी (सीपीएम) और कांग्रेस जैसे इस्लामिक दल भले ही मुस्लिम जनसख्या विस्फोट के लिए बंगाल से सटे बिहार के मुस्लिम बहुल जिलों – पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार को जिम्मेदार ठहराते हों, लेकिन हकीकत तो यही है कि बंगाल में बड़ी संख्या में बांग्लादेश से मुस्लिम घुसपैठिएं आए हैं जिन्हें इस्लामिक दलों ने अपनी सांप्रदायिक राजनीति के कारण राज्य में बसने में सहायता की है।
लेकिन परेशानी मुस्लिम आबादी से नहीं है। परेशानी मुसलमानों के नाम पर की जाने वाली विघटनकारी राजनीति से है जिसे कहीं न कहीं मुसलमान (विशेषकर पुरूष) समर्थन और बढ़ावा भी देते हैं। इस्लामिक पहचान के नाम पर की जाने वाली ये राजनीति आजादी के पहले से चली आ रही है। पूर्वी बंगाल के पूर्वी पाकिस्तान बनने में भी इसका बड़ा हाथ रहा। अगर हम इतिहास के पन्ने खंगालें तो हमें पता लगेगा कि बंगाल वही जगह है जहां मुस्लिम लीग ने अंग्रेजों और कांग्रेस को अपना दम दिखाने के लिए 16 अगस्त 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन’ का एलान किया जिसके बाद हुए भीषण सांप्रदायिक दंगों में हजारों लोग मारे गए। ध्यान रहे मुर्शिदाबाद में आजादी के दो दिन बाद तिरंगा फहराया गया क्योंकि वहां के मुसलमानों ने ये मान लिया था कि उन्हें तो पूर्वी पाकिस्तान में शामिल होना है।

इस्लामिक राजनीति के कुछ खास लक्षण हैं – मुसलमानों को हिंदुओं के खिलाफ भड़काना, उनकी इस भावना को तुष्ट करना कि वो भारतीय बाद में हैं और मुसलमान पहले, उन्हें भारत के हितों से पहले मुस्लिम उम्मा ं(बिरादरी) के हित देखने चाहिए और ऐसा करना जायज भी है, उन्हें मनमाने ढंग से भारतीय संविधान की पक्षपाती व्याख्या करने का हक है, उन्हें कबीलाई सोच वाले और महिला विरोधी पर्सनल लाॅ का पालन करने का पूरा हक है, अगर कोई मुसलमान आतंकी घटनाओं में पकड़ा जाए, तब भी उसे छुड़ा लिया जाना चाहिए क्योंक ऐसा वो इस्लाम के नाम पर कर रहा है, मुसलमान का भारत से कोई कोई लेना देना नहीं है, ये तो उसका दुर्भाग्य है कि वो सउदी अरब में पैदा न हो कर यहां पैदा हुआ है। ये संभवतः इसी राजनीति का परिणाम है कि भारत में ज्यादातर मुस्लिम अलग बस्तियों में रहना पसंद करते हैं जहां दूसरे धर्म के लोगों का प्रवेश तक अक्सर वर्जित होता है।

दुखद बात तो ये है कि पाकिस्तान बनने के बावजूद, कांग्रेस जैसी इस्लामिक पार्टियों ने बांग्ला मुसलमानों में ऐसी भावनाओं को भड़काया और बढ़ाया, इन्हें जायज ठहराया। असल बात तो ये है कि उन्हें भारतीय बनना सिखाया ही नहीं गया। न ही इस बात की कभी उनसे अपेक्षा ही की गई। उन्हें ये कहने तक की हिम्मत नहीं की गई कि वो राष्ट्रगान के समय खड़े हों या राष्ट्रगीत का सम्मान करें। कांग्रेस के सत्ताच्युत होने के बाद कम्युनिस्टों ने इस राष्ट्रविरोधी राजनीति को ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ के नाम पर आगे बढ़ाया। लेकिन चिंता की बात ये है कि अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद के इस दौर में टीएमसीे हालात सुधारने की जगह इस्लामिक सांप्रदायिकता और अलगाववाद को नई सीमाओं तक ले जा रही हैं। ममता राज्य में 40 बड़े और सैकड़ों छोटे-मोटे सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं। उनकी पुलिस मुस्लिम दंगाइयों को हाथ लगाने के लिए तैयार नहीं है। कानून व्यवस्था घास चरने चली गई है। मुस्लिम तुष्टिकरण की हालत ये है कि अगर दुर्गा पूजा और मोहर्रम एक साथ पड़ जाएं तो ममता विसर्जन का समय और दिन बदलने का आदेश दे देती है। अपने त्यौहार इज्जत और हक से मनाने के लिए हिंदुओं को बार-बार अदालत जाना पड़ता है। अदालत भी बार-बार ममता के आदेशों को अवैध बताती है, पर ममता है कि मानती ही नहीं।

ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण की एक और मिसाल है मौलाना नूर-उर-रहमान बरकती जिसे उन्होंने अपना धर्म भाई बनाया हुआ है। ये हजरत लंबे समय तक कोलकाता की मशहुर टीपू सुलतान मस्जिद के इमाम रहे। ये वही मौलाना है जिसने नोटबंदी का विरोध करते हुए 8 जनवरी 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बेहद शर्मनाक फतवा जारी किया। इसने टीएमसी सांसद इदरीस अली के साथ एक संवाददाता सम्मेलन में एलान किया कि वो उस व्यक्ति को 25 लाख रूपए का इनाम देगा जो प्रधानमंत्री का सिर मुड़ा कर और दाढ़ी साफ कर उनके मुंह पर कालिख पोतेगा। जब केंद्र सरकार ने लाल बत्ती पर रोक लगाने का आदेश जारी किया तो इसने उसे भी मानने से इनकार कर दिया। इसने कहा कि मैं तो सिर्फ राज्य सरकार का आदेश मानता हूं जिसने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। बरकती ने अनेक राष्ट्रविरोधी बयान भी दिए। इसके शर्मनाक और अराजक बयानों से परेशान होकर 17 मई 2017 को वक्फ ट्रस्टी बोर्ड ने इसे टीपू सुलतान मस्जिद के इमाम पद से बर्खास्त करने की घोषणा कर दी। वक्फ ने तो इसे हटा दिया पर ये अब भी ममता की नाक का बाल बना हुआ है और प्रधानमंत्री ही नहीं देश विरोधी बयानों के बावजूद आज तक इसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई है। याद रहे सुप्रसिद्ध गायक सोनू निगम के खिलाफ आपत्तिजनक फतवा जारी करने वाला मौलवी सय्यद शाह अतेफ अली भी इसका चेला है।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के बाद अब राज्य में रोहिंग्या मुसलमानों को पनाह देने की तैयारी की जा रही है। म्यांमार में इस्लामिक रोहिंग्या आतंकवादियों ने सेना और पुलिस पर सैकड़ों हमले किए। इनके बाद हुई जवाबी कार्रवाई के कारण लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को देश छोड़ना पड़ा। केंद्र सरकार इन्हें देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानती है लेकिन राज्य में इस्लामिक संगठन टीएमसी की सरपरस्ती में सरेआम इनके समर्थन में रैलियां निकाल रहे हैं जिनमें केंद्र सरकार के खिलाफ ही नहीं, हिंदुओं के खिलाफ भी आपत्तिजनक और भड़काऊ भाषण दिए जा रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छोटे से छोटे कार्यक्रम को कानून व्यवस्था का बहाना बना कर रोकने वाली ममता सरकार इन्हें खामोशी से देख रही है।

बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को भारत में निर्विघ्न सुविधाएं मिलें, इसके लिए राज्य सरकार ‘आधार’ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। ये बात अलग है कि अदालत ने उसे याद दिलाया कि राज्य सरकारें केंद्रीय कानूनों के खिलाफ मुकदमा नहीं कर सकतीं। यदि ममता को परेशानी हो तो वो स्वयं अदालत का दरवाजा खटखटा सकती हैं।

अपनी विघटनकारी-सांप्रदायिक राजनीति के कारण ममता ने लगातार केंद्र सरकार के साथ टकराव का वातावरण बनाया हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में सभी राज्य सरकारों और शैक्षिक संस्थाओं को सरदार वल्लभ भाई पटेल जन्म जयंती (31 अक्तूबर) को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्देश दिया, लेकिन ममता ने बड़ी ढिठाई से इसे मानने से मना कर दिया। याद रहे ये वही ममता हैं जिन्होंने पाकिस्तान के प्रबल समर्थक अल्लामा इकबाल के पोते वलीद इकबाल को पाकिस्तान से बुलाकर सम्मानित किया। वलीद पाकिस्तान की बदनाम सेना की समर्थक माने जाने वाली इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ का नेता भी है। वलीद का सम्मान समारोह 30 मई 2015 को कोलकाता में हुआ। लेकिन केंद्र सरकार के निर्देशों की अवहेला का यह पहला किस्सा नहीं है। इससे पहले ममता ने अध्यापक दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बारे में भी केंद्र सरकार के निर्देशों को ठेंगा दिखाया। एक बार तो ममता ने सैनिक वाहनों की आवाजाही को लेकर केंद्र पर उनका तख्ता पलट करने का आरोप तक लगा दिया और सारी रात सचिवालय में डटी रहीं। नोटबंदी पर वो किस तरह मोदी सरकार पर बिफरीं और कैसे उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों में आकंठ डूबे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ मोर्चा बनाया, वो भी आपको अवश्य याद होगा।

चलते चलते एक महत्वपूर्ण बात – बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद आजकल पूरी ताकत से आईएसआई समर्थित इस्लामिक कट्टरवादियों का सफाया करने में लगी हैं। उनके देश के अनेक आतंकवादी भाग कर पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों में छुप रहे हैं, कैंप बना रहे हैं। ममता को इस विषय में देशहित का ध्यान रखते हुए सतर्कता बरतनी चाहिए और उनकी उपस्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उनकी पार्टी के अनेक पदाधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों पर बांग्लादेश में मवेशियों और अन्य वस्तुओं की तस्करी के आरोप भी लगे हैं। उन्हें इनकी जांच करवानी चाहिए और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के पालन में भारत ही नहीं बांग्लादेश सरकार का भी सहयोग करना चाहिए।

अनुभव बताता है कि इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति जनविरोधी और विकासविरोधी रही है। बंगाल की अधिसंख्य हिंदु आबादी कब तक इसके कारण गरीबी और बेरोजगारी के दलदल में फंसी रहेगी? धीरे-धीरे लोग समझने लगे हैं कि इस्लामिक कट्टरवाद-अलगाववाद को पालना-पोसना और अराजकता को बढ़ावा देना ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘जनवाद’ नहीं होता। मुसलमानों को पोटने के चक्कर में जिस तरह ममता, मोदी सरकार की विकासोन्मुखी-जनोन्मुखी नीतियों और कार्यक्रमों का विरोध कर रहीं हैं, उससे जनता का अहित ही हो रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने देश भर में विकास के मुद्दे को सबसे ज्यादा महत्व दिया है। भाजपा को मुकुल के समर्थन से इसे घर घर तक पहुंचाना चाहिए।

राजनीतिक दृष्टि से फिलहाल ममता भले ही सुरक्षित दिखती हों, पर सही नीतियों और रणनीतियों से भाजपा उनका पासा पलट भी सकती है। मुकुल राय का भाजपा प्रवेश तो सिर्फ एक चेतावनी है। वैसे भी राज्य में उनके अलावा मुसलमान वोटों के अन्य सौदागर भी हैं। अगर उन्हें याद न हो तो हम याद दिला दें – कांग्रेस और कम्युनिस्ट दल। अगर उन्होंने समय रहते अपना रवैया नहीं बदला तो राज्य के धर्मनिरपेक्ष हिंदू उन्हें समझा देंगे कि असली धर्मनिरपेक्षता क्या होती है।

1 reply
  1. आजाद भरद्वाज
    आजाद भरद्वाज says:

    सुंदर सुंदर सुंदर भाई
    बहन जी बहुत सुंदर

    Reply

Leave a Reply

Want to join the discussion?
Feel free to contribute!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *