“मोदी नीतिः अस्त-व्यस्त, पस्त पाकिस्तान” in Punjab Kesari

मुस्लिम वोटों का सौदा करने वाले भारतीय राजनीतिक दलों का प्रिय विषय रहा है – पाकिस्तान। देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी तक, सबने पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध कायम करने के प्रयास किए। 10 साल शासन करने वाले मनमोहन सिंह भी इस कोशिश में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन सबके साथ समस्या ये रही कि इन्होंने पाकिस्तान में प्रत्यक्षतः सत्तासीन नेताओं से बात करने की कोशिश की और पर्दे के पीछे काम करने वाली असल सत्ता यानी सेना को नजरअंदाज किया।

जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो उन्होंने भी इसी लीक पर चलने की कोशिश की। तबके पाकी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को शपथग्रहण समारोह में बुलाया। अचानक उनके घर भी पहुंचे, तोहफों का आदान-प्रदान भी हुआ, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। जब भी भारत ने सद्भावना प्रदर्शित करने के लिए बड़ा कदम उठाया, पाकिस्तानी सेना ने उसका जवाब खून खराबे से दिया।

जल्द ही मोदी सरकार को समझ आ गया कि जिस नवाज शरीफ से वो बात करने की कोशिश कर रहे हैं, वो सेना की कठपुतली से अधिक कुछ नहीं हैं। वो सेना की अनुमति के बिना भारत से संबंध सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकते।

25 दिसंबर 2015 को मोदी शरीफ के निमंत्रण पर अचानक लाहौर पहुंचे। मकसद था नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन की बधाई देना और उनके परिवार के एक विवाह समारोह में भाग लेना। मोदी के स्वागत के लिए शरीफ स्वयं अल्लामा इकबाल एयरपोर्ट पहुंचे। इससे भारत और पाकिस्तान में सद्भावना की नई उम्मीद जगी, लेकिन पाकी सेना को ये रास नहीं आया। सेना समर्थक मीडिया ने शरीफ के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने व्यापारिक हितों के लिए पाकिस्तान के हितों को मोदी के हाथों बेच दिया। 10 दिन के अंदर ही यानी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयर फोर्स स्टेशन पर हमला हो गया। भारत ने इसके लिए जैश-ए-मौहम्मद को जिम्मेदार ठहराया और शरीफ ने इस हमले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के अधिकारी जांच के लिए पठानकोट भी आए, लेकिन मामला किसी सिरे तक नहीं पहुंचा।

पठानकोट मामले की जांच चल ही रही थी कि 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ जिसमें 19 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। भारत ने इसके लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने पाक सरकार से जांच की अपेक्षा करने की जगह, पाकिस्तान पर चहुंमुखी हमला करने की योजना बनाई। इसमें सैन्य, राजनयिक, रणनीतिक से लेकर सिंधु जल समझौते तक, हर क्षेत्र में पाकिस्तान को सबक सिखाने की नीति बनाई गई। मोदी सरकार ने एक झटके में पुरानी सरकारों के इस तर्क को कूड़ेदान में डाल दिया कि स्थिर पाकिस्तान, भारत के लिए जरूरी है। ये समझ लिया गया कि जब तक पाकिस्तान को उसकी हिमाकत की कीमत चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, वो बाज नहीं आएगा।

उड़ी हमले की अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन, जर्मनी, जापान, कनाडा, भूटान और यहां तक कि पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन ने भी निंदा की। इस हमले के बाद भारतीय सेना ने घोषणा की कि वो अपने सैनिकों की शहादत का बदला लेगी, लेकिन इसका समय और स्थान वो खुद तय करेगी। जाहिर है, मोदी सरकार ने अब भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना से अपनी तरह से निपटने की छूट दे दी थी।

उड़ी हमले के करीब 10 दिन बाद भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सर्जिकल स्ट्राइक की जिसमें वहां मौजूद आतंकियों के अनेक ठिकानों पर हमला किया गया। सर्जिकल स्ट्राइक भारत की नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। अब तक भारतीय सेना घुसपैठ करने वाले आतंकियों को देश की सीमा में ही मारती थी, यह पहली बार थी जब सेना ने लाइन आॅफ कंट्रोल (एलओसी) पार कर हमला किया। ये भारत की तरफ से स्पष्ट संकेत था कि अब वो रक्षात्मक नीति छोड़, आक्रामक नीति अपनाएगा और जरूरत पड़ने पर एलओसी पार करने में परहेज नहीं करेगा। अब तक पाकिस्तान अपने परमाणु बम की धमकी देता था, सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही भारत सरकार ने उसकी परमाणु धमकियों की भी धज्जियां उड़ा दीं।

सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद जब पाकिस्तानी सेना नहीं मानी तो भारतीय सेना ने आॅपरेशन अर्जुन शुरू किया। इसके तहत लंबी दूरी के हथियारों से एलओसी के परे आतंकी ठिकानों को ही नहीं, पाकी सेना को भी निशाना बनाया जाने लगा। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि पाकी सेना पर इसका असर नहीं पड़ा है और वो बदस्तूर घुसपैठिए भेज रही है। यदि गहराई में देखा जाए तो समझ आएगा कि इस दौर में भारतीय सेना ने एलओसी और अंतरराष्ट्ररीय सीमा पर जितने घुसपैठिए और पाकी सैनिक मार गिराए, उतने पहले कभी नहीं हलाक किए गए। यही नहीं भारतीय सेना ने देश की सीमा के भीतर भी जितने आतंकी अब मारे हैं, उतने पहले कभी नहीं मारे।

अगर आप पाक अधिकृत कश्मीर के न्यूज चैनलों को देखें तो आपको पता चलेगा कि भारतीय सेना की नई नीतियों का किस हद तक असर हुआ है। वहां लोग कहते हैं कि वो लगातार युद्ध जैसे हालात में जी रहे हैं और न तो पाकिस्तानी सेना और न ही सरकार उनके जान-माल के नुकसान की भरपाई कर रही है। वो चाहते हैं कि इससे पहले भारतीय सेना और कोई बड़ा कदम उठाए, पाकी सेना अपने आतंकी शिविर वहां से हटा ले। वो कहते हैं कि पाकी सेना की मूर्खता और हठधर्मी की वजह से उनका व्यापार और रोजगार चैपट हो गया है और भूखों मरने की नौबत आ गई है। जाहिर है इस समय पीओके निवासियों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और वो पाकी सेना की आतंकी नीति से मुक्ति पाना चाहते हैं।

इस बीच 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला भी उठा दिया। संकेत साफ था कि अगर पाकिस्तान बाज नहीं आएगा तो भारत, जम्मू-कश्मीर से परे भी संघर्ष के नए क्षेत्र खोलने के लिए तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान ने जहां-जहां कश्मीर का मुद्दा उठाया, भारत ने वहां-वहां बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला उठाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को बेनकाब और अलग-थलग करने का भूतो न भविष्यिति प्रयास शुरू कर दिया। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इन प्रयासों को बहुत बल मिला।

अमेरिका ने मोदी और ट्रंप की पहली मुलाकात से पहले ही, न सिर्फ भारत को रणनीतिक सहयोगी बनाने की बराक ओबामा की नीति का पुरजोर समर्थन किया, बल्कि सय्यद सलाहुद्दीन के आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहीदीन को अंतरराष्ट्रीय संगठन भी घोषित कर दिया जिसे पाकिस्तान ‘कश्मीरियों की आजादी की आवाज’ बताता रहा है। संदेश साफ था कि अमेरिका को कश्मीरियों की पाक समर्थित आजादी की मुहिम में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके बाद तो ट्रंप ने एक के बाद एक अनेक ऐसे कदम उठाए जिनसे पाकिस्तान को गहरा आघात लगा। 21 अगस्त 2017 को ट्रंप ने नई दक्षिण एशिया नीति का एलान किया जिसमें पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भारत को महत्वपूर्ण स्थान देने की घोषणा की गई। दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के समय ट्रंप ने पाकिस्तान को खुली चेतावनी दी कि अगर उसने अपनी धरती से आतंकी शिविर समाप्त नहीं किए तो उसे नतीजा भुगतना पड़ेगा।

पाकिस्तान ने आदतन अमेरिका की धमकी को हलके में लिया। वो भूल गया कि अब वाइट हाउस में बराक ओबामा नहीं डोनाल्ड ट्रंप बैठे हैं। ट्रंप ने पहले तो पाकिस्तान की करीब दो अरब डाॅलर की रक्षा सहायता बंद करने का एलान किया फिर ये सुनिश्चित किया कि उसे दुनिया में टेरर फंडिंग और हवाला कारोबार की निगरानी करने वाली ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ की ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल किया जाए। पाकिस्तान इस सदमे उभरा भी नहीं था कि अमेरिका ने परमाणु प्रसार का आरोप लगा कर पाकिस्तान की उन सात कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए जो उसके परमाणु हथियारोें के लिए सामान उपलब्ध करवाती हैं।

अमेरिका के नए विदेश मंत्री और सीआईए के पूर्व प्रमुख माइक पोमपेओ ने खुली धमकी दे दी है कि अगर पाकिस्तान नहीं चेता तो अमेरिका उससे मेजर नाॅन-नेटो अलाय (महत्वपूर्ण गैर-नैटो सहयोगी) का दर्जा वापसस ले लेगा, उसे आतंकी देश घोषित करेगा और उसके अधिकारियों के अमेरिका आने पर रोक भी लगाएगा। जाहिर है अमेरिका जो कदम उठाएगा, उसके सहयोगी भी उसका अनुसरण करेंगे।

पाकिस्तानी आतंकी फक्ट्रियों के लिए अमेरिका से एक और बुरी खबर हाल ही में तब आई, जब वहां के दौरे पर गए सउदी अरब के शहजादे मौहम्मद बिन सलमान ने घोषणा की कि वो धीरे-धीरे वहाबी इस्लाम के प्रचार-प्रसार की नीति समाप्त करेंगे जिसके तहत सउदी वित्तीय सहायता से दुनिया भर में वहाबी मदरसे खोले गए और आतंकी बनाए गए। इस नीति का सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान ने उठाया जहां 32,000 से ज्यादा ऐसे मदरसे चल रहे हैं। इन मदरसों में तैयार आतंकियों को पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करता है। जाहिर है शहजादे सलमान की घोषणा पाकिस्तान की आतंकी फैक्ट्रियों पर सीधे असर करेंगी। अमेरिका और सउदी अरब के फैसले उसकी विदेश नीति के दो प्रमुख स्तंभों – परमाणु बम और आतंकी नेटवर्क, दोनों को प्रभावित करेंगे।

अब तक के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि भारत ने सैन्य और राजनयिक दोनों स्तर पर पाकिस्तान को घेरा है। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के अंतरराष्ट्रीय अभियान का पश्चिमी देशों में ही नहीं, खाड़ी के मुस्लिम देशों में भी व्यापक असर हुआ है, जो पहले कभी पाकिस्तान के करीबी माने जाते थे। आज चाहे अफगानिस्तान हो या ईरान, पाकिस्तान के सभी पड़ोसी देश भी उसके खिलाफ हैं। उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी न केवल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उसके विरूद्ध आवाज उठाई, बल्कि ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ में भी उसके खिलाफ मत दिया। पाकी सेना अपनी जनता को भरमाती है कि चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पाकिस्तान की माली हालत बहुत बेहतर कर देगा, लेकिन चीन ने इसकी लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं से हाथ खींच लिए हैं। ध्यान रहे पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले इस काॅरीडोर का भारत विरोध करता रहा है क्योंकि भारत इसे अपना अटूट अंग मानता है।

भारत अब तक अपने बयानों और कामों से पाकिस्तान को ये स्पष्ट संदेश दे चुका है कि अगर उसने भारत में आतंक का निर्यात नहीं बंद किया तो वो सिंधु जल समझौते पर पुनर्विचार करने से नहीं हिचकेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान से इससे सबसे बड़ी खलबली मची है। वहां आम आवाम को बिजली, पेयजल, रोजगार, इंधन, शिक्षा कुछ भी हासिल नहीं है। ऐसे में अगर भारत ने पानी रोक लिया तो उसके खेत खलिहान सूख जाएंगे और भारत बिना कोई यु़द्ध किए ही युद्ध जीत जाएगा।

हाल ही में पाकी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने चुनींदा पत्रकारों के सामने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे जिसे उनके चमचे ‘बाजवा डाॅक्टरीन’ के नाम से प्रचारित कर रहे हैं। इसमें बाजवा कहते हैं कि भारत को आर्थिक कारणों से बातचीत की मेज पर आना पड़ेगा। वो डींगे मारते हुए कहते हैं कि उन्होंने कठोर अमेरिकी दबाव के बावजूद, परवेज मुशरर्फ की तरह घुटने नहीं टेके। हो सकता है वो पाकिस्तानियों को बहलाने के लिए ऐसी बातें कर रहे हों, लेकिन इन्हीं पाकिस्तानियों ने हाल ही में देखा कि कैसे एक अमेरिकी एयरपोर्ट पर उनके प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की खाना तलाशी ली गई और कैसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने उन्हें आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने की सलाह देकर बैरंग वापस कर दिया।

भारत में विपक्षी दल बिना सोचे समझे मोदी सरकार पर आरोप लगा देते हैं कि उसकी कोई पाकिस्तान नीति नहीं है। अब तक ये स्पष्ट हो गया होगा कि मोदी सरकार ने अपने अनुभवों और पाकिस्तान की वास्तविकताओं के आधार पर अपनी नीति न केवल तैयार की है, बल्कि उसे हर मोर्चे पर लागू भी कर दिया है। सबसे बड़ी बात – इसका आधार किसी वर्ग का तुष्टिकरण नहीं है, राष्ट्रहित है। संभवतः यही कारण है कि मोदी सरकार ने हुर्रियत के पाकिस्तानी दलालों पर भी हाथ डाल दिया है, जिन्हें पिछली सरकारें पवित्र गाय समझती थीं।

कुल मिलाकर मोदी सरकार ने पाकिस्तान के चुने हुए नेताओं से बातचीत का नाटक करने की जगह, सीधे उसकी सेना पर वार किया है। इसका दंश वो महसूस भी कर रही है। धीरे-धीरे उस पर शिकंजा कस रहा है। उसे स्पष्ट कर दिया गया है कि उसे अपनी हरकतों की कीमत चुकानी पड़ेगी। अब ये उसे तय करना है कि वो अभी सुधरने का संकल्प लेती है या नुकसान उठाने के बाद। ध्यान रहे इस बार सुधार का नाटक नहीं चलेगा।

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