“मोदी की विश्वदृष्टि की बानगी है उनकी विदेश नीति” in Punjab Kesari

काॅमनवेल्थ हेड्स आॅफ गाॅरमेंट मीटिंग (चोगम) में भाग लेने लंदन गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘भारत की बात सबके साथ’ नामक एक कार्यक्रम में अनेक विषयों पर लोगों के सवालों के जवाब दिए। ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित सेंट्रल हाॅल वेस्टमिंस्टर में आयोजित इस कार्यक्रम उन्होंने अपनी विदेशनीति के बारे में भी विस्तार से बात की।

मोदी ने कहा कि लोग आशंका जताते थे कि एक राज्य का मुख्यमंत्री भारत की विदेशनीति कैसे संभालेगा, लेकिन उन्होंने सभी आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया। 2014 में लोकसभा चुनावों के दौरान जब लोगों ने उनकी विदेश नीति के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वो किसी देश से न नजर नीची करके बात करने में विश्वास रखते हैं, न उठा कर, हम नजर मिला कर बात करने में यकीन रखते हैं। अब मोदी को सरकार में आए लगभग चार साल बीत गए हैं, और उनकी विदेश नीति में ये स्वाभिमान स्पष्ट तौर पर नजर आता है।

उनके नेतृत्व में भारत ने अपने हितों की बुनियाद पर सभी देशों से बात की, भले वो परस्पर दुश्मन ही क्यों न हों। मोदी एक ओर तो इस्राइल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने तो दूसरी ओर वो फिलिस्तीन भी गए। इसी प्रकार अगर फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मौहम्मद अब्बास भारत आए तो इस्राइल के राष्ट्रपति बेंजामिन नेतन्याहू भी आए। मोदी ने दोनों देशों को अलग-अलग करके देखा और दोनो के महत्व और अपेक्षाओं को स्वीकार किया। फिलिस्तीन के साथ भारत के संबंधों की बानगी तब देखने को मिली जब भारत ने पाकिस्तान में उसके राजदूत वलीद अबू अली के आतंकी हाफिज सईद के साथ मंच साझा करने पर आपत्ति जताई और फिलिस्तीनी राष्ट्रपति ने उन्हें एक झटके में पाकिस्तान से वापस बुला लिया।

मोदी ने ‘भारत की बात, सबके साथ’ कार्यक्रम में अपनी इस्राइल यात्रा का जिक्र करते हुए पूछा कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री पिछले 70 साल में वहां क्यों नहीं गया? तो इसका सीधा उत्तर है पहले की सरकारों द्वारा भारत की विदेशनीति को सांप्रदायिक रंग में रंगना। पूर्ववर्ती सरकारों ने इस्राइल से राजनयिक संबंध तो बनाए पर प्रधानमंत्रियों ने वहां जाने का साहस नहीं किया क्योंकि उन्हें आशंका थी कि इससे मुस्लिम नाराज हो सकते हैं। कहना न होगा इस मुस्लिम फैक्टर ने पाकिस्तान को भी शह दी जिसने भारत में आतंकी जाल फैलाया और सीमा पर हमारे हजारों जवान मरवाए।

बहरहाल, अगर मोदी अगर सउदी अरब गए तो ईरान भी गए। मुसलमानों के पवित्र धार्मिक स्थलांे मक्का और मदीना का घर होने के कारण सउदी अरब भारतीय मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन ईरान के साथ भी भारत के हजारों साल से सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं और वो भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी आवश्यक है। अमेरिका, सउदी अरब और इस्राइल, ईरान के जानी दुश्मन बने हुए हैं, लेकिन भारत ने वहां रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह का निर्माण किया है और जलअवरूद्ध अफगानिस्तान के लिए नए व्यापारिक और सामरिक रास्ते बनाए हैं। फिलहाल ईरान में भारत से ज्यादा चीन का निवेश है, लेकिन भारत ने भी तय कर लिया है कि वो सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस देश से हर हालत में संबंध कायम रखेगा जो मध्य एशिया के अनेक तेल और प्राकृतिक गैस समृद्ध देशों से व्यापार की महत्वपूर्ण धुरी है।

मोदी के आने से पहले सरकारें लगातार शक्तिशाली होते जा रहे चीन के खिलाफ बोलने से कतराती थीं। हालत ये हुई कि चीन ने धीरे धीरे हमारे सभी पड़ोसी देशों में घुसपैठ कर ली। आज ये कहा जाए तो ज्यादती नहीं होगी कि मालदीव, पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार पूरी तरह उसके कब्जे में हैं। मालदीव में जब चीन समर्थक ताकतों ने तत्कालीन राष्ट्रपति मौहम्मद नाशिद का तख्ता पलट किया तो भारत मूक दर्शक बना देखता रहा।

यही हाल नेपाल में हुआ, जब चीन समर्थक माओवादी हजारों की तादाद में नेपाली लोगों की हत्या कर रहे थे, भारत अहस्तक्षेप की नीति के तहत चुप रहा जिसका नतीजा ये हुआ कि आज नेपाल में उनकी सरकार है और भारत समर्थक नेपाली कांग्रेस हाशिए पर है। ये बात अलग है कि मोदी ने इस सरकार के साथ भी कामकाज करने का फैसला किया है। इसके पीछे मुख्यतः तीन कारण हैं – 1) नेपाल भारत का पड़ोसी देश ही नहीं, घनिष्ठ सांस्कृतिक सहयोगी भी है, नेपाल के लाखों लोग भारत में काम करते हैं, भारत और नेपाल का रोटी-बेटी का रिश्ता है, 2) उससे सुरक्षा की दृष्टि से भी बातचीत जरूरी है क्योंकि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने वहां ठिकाने बना रखे हैं जिनका भारत के विरूद्ध इस्तेमाल होता है, कल को अगर चीन, नेपाल का सैन्य उद्देश्य से इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, तो भारत को भी नेपाल में सहयोगियों के साथ रणनीति बनाने और विरोध जताने की आवश्यता होगी 3) चीन सार्क देशों का इस्तेमाल भारत में अपने माल की डंपिंग के लिए कर रहा है, इसे रोकने के लिए भी भारत को नेपाल के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना होगा।

ध्यान रहे कुछ दिन पहले नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भारत आए थे और अब मोदी भी नेपाल जाने वाले हैं। इस बीच नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप कुमार चीन गए जहां चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने भारत-नेपाल-चीन आर्थिक गलियारे का प्रस्ताव किया। भारत ने हिमालय निकलने वाले इस गलियारे पर अभी कोई सहमति नहीं दी है। भारत, पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करता रहा है क्योंकि वो पाक अधिकृत कश्मीर को अपना हिस्सा मानता है और इस गलियारे को अपनी संप्रभुता में दखलअंदाजी। जाहिर है ऐसे में इस नए प्रस्ताव के सभी पहलुओं और परिणामों पर सोच विचार करके ही कोई निर्णय लिया जाएगा।

उधर पाकिस्तान और म्यांमार में चीन किस हद तक घुसपैठ कर चुका है, ये किसी से छुपा नहीं है। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के साथ ही म्यांमार में भी संतुलन स्थापित करने की कोशिश की है। चीन बांग्लादेश में भी जगह बनाने की भरपूर कोशिश कर रहा है, लेकिन मोदी सरकार वहां भी सामंजस्य कायम करने की पूरी कोशिश कर रही है। बांग्लादेश में तो विपक्षी नेता खालिदा जिया का पुत्र तारिक जिया चीनी हथियारों के साथ पकड़ा गया था जिन्हें पूर्वोत्तर भारत के आतंकियों को सप्लाई किया जाना था।

जहां तक स्वयं चीन की बात है, मोदी सरकार ने उसे भी स्पष्ट कर दिया है कि वो उसके दबाव में नहीं आएगी। डोकलाम विवाद पर भारत की दृढ़ता इसका सबूत है। मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अनौपचारिक बातचीत के लिए 27-28 अप्रैल को चीन में होंगे। समझा जाता है कि इससे डोकलाम विवाद के बाद दोनों देशों के रिश्तों में आई तल्खी को कम करने में मदद मिलेगी और सीमा विवाद सहित अन्य आपसी मुद्दों को हल करने की दिशा में नए कदम उठाए जाएंगे। बातचीत अच्छी बात है, लेकिन भारत को जमीन वास्तविकताओं को भी नजरअंजदाज नहीं करना चाहिए। आज चीन के पास बेशुमार पैसा है। वो विभिन्न देशों में अपनी हित सिद्धी के लिए पैसे के दम पर स्थानीय नेताओं को खरीदता है और सरकारों का तख्ता पलट करवाने की कोशिश करता है और अक्सर कामयाब भी होता है। भारत में भी कुछ नेताओं की चीन से करीबी को संदिग्ध दृष्टि से देखा जाना चाहिए। हम भले ही चीन के साथ नजर मिला कर बात करें पर ये भी ध्यान रखें – घर का भेदी लंका ढाए। भारत में कम्युनिस्टों-नक्सलियों और विभिन्न आतंकी संगठनों को चीनी मदद को कतई नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

मोदी ने न सिर्फ पड़ोसी देशों में चीन की बढ़ती ताकत पर लगाम लगाने की कोशिश की है, विश्व पटल पर भी नए शक्ति समीकरण तलाश किए हैं। उन्होंने न केवल अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड आदि के साथ रणनीतिक संबंधों को दृढ़ किया है, बल्कि उनके साथ रणनीतिक साझेदारी भी विकसित की है। उन्होंने आॅस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ मिल कर स्ट्रैटेजिक क्वाड्रिलेटरल (रणनीतिक चतुर्भज) बनाने की नींव रखी है। यही नहीं व्यापारिक दृष्टि से समृद्ध आसियान देशों के साथ संबंधों को पुनर्जीवित किया है। आपको याद होगा गणतंत्र दिवस समारोह में आसियान के दसों देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया गया था। मोदी ने भारतीय विदेश नीति में लंबे अर्से तक उपेक्षित रहे अफ्रीकी देशों पर भी ध्यान केंद्रित किया। चीन वहां लंबे अर्से से चुपचाप काम कर रहा था और जिबूती में तो उसने अपना सैन्य अड्डा भी बना लिया था। मोदी सरकार ने इन देशों के साथ भागीदारी की नए सिरे से नींव रखी और भारत में इनके राष्ट्राध्यक्षों के विशाल सम्मेलन भी किए।

मोदी सरकार ने प्रयास किए कि विदेशनीति को देश की समृद्धि और व्यापार वृद्धि का जरिया भी बनाया जाए। आपको याद होगा कि इस बार जब चेन्ई में डिफेंस एक्सपो हुई तो उससे पहले दुनिया भर में भारतीय दूतावासों के सुरक्षा संबंधी अधिकारियों को बुला कर खास ब्रीफिंग दी गई। उन्हें हथियार बनाने वाली भारतीय कंपनियों और संबंधित अधिकारियों से बातचीत करने के लिए प्रेरित किया गया ताकि वो जिन देशों में तैनात हैं वहां भारतीय हथियारों के लिए बाजार ढूंढ सकें। लेकिन यहां ये कहना आवश्यक है कि अगर व्यापार में चीन से टक्कर लेनी है तो उसके तौर तरीकों को समझना और जरूरत पड़े तो अपनाना भी होगा। व्यापार में कोरे आदर्शवाद और नैतिकता से काम नहीं चलता।

मोदी ने भारत के व्यापारिक, सामरिक और रणनीतिक हितों के संवर्धन के लिए जी-20, ब्रिक्स, एससीओ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भरपूर इस्तेमाल किया। यही नहीं लगभग मृतप्राय पड़े काॅमनवेल्थ में भी जान फूंकने की कोशिश की। इंग्लैंड में हुए ताजा काॅमनवेल्थ शिखर सम्मेलन में उन्होंने सदस्य देशों को प्रेरित किया कि वो इसके परंपरागत ढांचे से बाहर निकल इसे आपसी समृद्धि का औजार बनाएं। उन्होंने ब्रिटेन के साथ भी नौ समझौतों पर हस्ताक्षर किए और पहली बार इंडो-पैसेफिक क्षेत्र में सक्रिय रणनीतिक सहयोग और समुद्री आवाजाही की आजादी पर खुलकर चर्चा की। इसे दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी नीतियों के विरूद्ध सहयोग के लिए सहमति समझा जा सकता है।

अगर ये कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि मोदी ने भारत की विदेशनीति का सही मायनों में गुटनिरपेक्ष बनाया। इस गुटनिरपेक्षता का आधार राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि देशहित है। यही वजह है कि आज भले ही अमेरिका और रूस में तनातनी चरम पर हो, भारत के दोनों से बेहतर संबंध हैं, आज भले ही चीन हमें घेरने में लगा हो, हम उसके साथ फिर से सैन्य अभ्यास करने के लिए तैयार हैं, अमेरिका ने जब उत्तर कोरिया को अपना दुश्मन नंबर एक करार दिया तब भी हमने उससे अपने राजनयिक संबंध तोड़े नहीं। अच्छी बात ये है कि आज सभी बड़े देश ये समझ गए हैं कि मोदी सरकार वही करेगी जो उसके देशहित में होगा, इसलिए उसे अपने हिसाब से चलाने की जगह बेहतर है, भारत के उभरते बाजार में अपने पांव जमाओ और समृद्धि के रास्ते पर आगे बढ़ो।

मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में भारत ने दुनिया के लगभग सभी देशों से संबंधों को पुनर्जीवित और प्रगाढ़ किया है। संयुक्त राष्ट्र में भारतीय हितों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किए गए हैं। हर देश और हर प्रयास की चर्चा तो असंभव है, लेकिन संक्षेप में कहें तो ये मोदी की विश्वदृष्टि है जिसके कारण आज भारत किसी राजनीतिक विचारधारा के कारण नहीं, बल्कि व्यापारिक, सामरिक, रणनीतिक और सांस्कृतिक कारणों से तीसरी दुनिया की आवाज के तौर पर उभर रहा है। अंत में एक सवाल आपसे – आज दुनिया के कितने देश 21 जून को एक साथ योग दिवस मनाते हैं?

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