“नवाज शरीफ की वापसी, इमरान को नहीं, सेना को चुनौती है” in Punjab Kesari

स्तानी संसद के निचले सदन कौमी असेम्बली या नेशनल असेम्बली के ताजा चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं जब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को हराने के लिए करोड़ों रूपए बांटे थे। तबके आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी ने स्वयं फरवरी, 2012 में एक मुकदमे के दौरान सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख मिर्जा असलम बेग ने उन्हें इसका आदेश दिया था। इस योजना के लिए धन जुटाने वाले बैंकर युनुस हबीब ने बताया कि राष्ट्रपति गुलाम इसहाक खान ने इस योजना के लिए 34 करोड़ रूपए मंजूर किए थे। सेना के जनरल जब बेनजीर को राजनीति से बाहर नहीं कर सके तो उन्होंने उनकी हत्या ही करवा दी। 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर एक चुनावी रैली के दौरान मारी गईं। उन्हें इसकी आशंका थी और मरने से पहले उन्होंने अपने करीबियों से अंदेशा जताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ उनकी हत्या करवा सकते हैं।

हम लौट कर ताजा चुनावों पर आते हैं। ये चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं क्योंकि इस बार भी सेना नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज को हराने और इमरान खान को प्रधानमंत्री पद की गद्दी पर बिठाने के लिए पूरी जोड़-तोड़ कर रही है। पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां जब भी कोई राजनेता सेना को चुनौती देता है या चुनौती देने लायक शक्तिशाली बन जाता है तो उसके पर कतर दिए जाते हैं। 1953 में गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने ख्वाजा नजीमुद्दीन की सरकार बरखास्त कर दी। 1954 में जनरल अयूब खान की मदद से उन्होंने संविधान सभा को ही भंग कर दिया ताकि वो उनके अधिकारों में कटौती न कर पाए। 1958 में राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को हटा कर अयूब खान को मुख्य मार्शल लाॅ प्रशासक बना दिया। 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने जुल्फीकार अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया और बाद में तो उन्हें फांसी ही दे दी। जुल्फीकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर की भी हत्या करवा दी गई। 1999 में नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर मुशर्रफ न कमान संभाली तो 26 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी को एक मामले में फंसा कर चलता कर दिया गया।

नवाज शरीफ ने जब इस बार, यानी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली तो उन्होंने सेना को तुष्ट करने की पूरी कोशिश की। विदेश और रक्षा नीति खुद सेना संभालती है, इसलिए उन्होंने चार साल तक स्वयं विदेश मंत्रालय की कमान संभाली ताकि सामंजस्य में कोई कोताही न हो। लेकिन शरीफ ने दृढ़तापूर्वक ये भी सुनिश्चित करने की कोशिश की कि लोकतांत्रिक सरकार सम्मानपूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे और सेना की पिछलग्गू न हो कर रह जाए। संभवतः इसी वजह से सेना को शुरू से ही लगने लगा कि अगर नवाज शरीफ के पर नहीं कतरे गए तो वो आगे चलकर पाकिस्तान में सेना के प्रभुत्व और श्रेष्ठता को समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और आखिरकार सेना को सिर्फ दिखावे के लिए ही नहीं, वास्तव में भी चुने हुए प्रतिनिधियों के मातहत काम करना पड़ेगा।

भारत में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के प्रमुखों का बुलाया। शरीफ को भी न्यौता भेजा गया। पाकी सेना ने उन्हें भारत न जाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी ने गर्मजोशी से इसका जवाब भी दिया और उनके जन्मदिन पर पाकिस्तान भी गए। दोनों प्रधानमंत्री रिश्तों में बेहतरी चाहते थे, लेकिन भारत के विरोध के नाम पर रोजी-रोजी चलाने वाली पाकी सेना को ये मंजूर नहीं हुआ। नवाज शरीफ का कद छांटने के लिए कठपुतली इमरान खान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को तैयार किया गया। उन्होंने नवाज शरीफ के कथित ‘भ्रष्टाचार’ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन तक धरना दिया। इसके बाद नवाज शरीफ जो दबाव में आए तो उभर नहीं सके। कुछ समय बाद इमरान खान ने पनामा पेपर केस में नवाज शरीफ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया और सेना-अदालत की मिलीभगत से नवाज को पहले चुनाव लड़ने और फिर अपनी पार्टी की अध्यक्षता करने के भी अयोग्य करार दे दिया गया।

क्योंकि शरीफ के खिलाफ शिकायत सीधे सुप्रीम कोर्ट में की गई थी, कोर्ट ने सारे मामले नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (नैब) को भेज दिए जिसे भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए बनाया गया है। नैब ने सबसे पहले उन्हें लंदन के पाॅश इलाके में बने एवनफील्ड हाउस में चार लक्जरी फ्लैट खरीदने के मामले में 10 साल कैद और आठ मिलियन पाउंड जुर्माने की सजा दी। इसी मामले में उनकी बेटी मरियम और दामाद रिटायर्ड कैप्टन सफदर को भी सजा सुनाई गई। लंदन में रह रहे शरीफ के दो बेटों हसन और हुसैन को इस मामले में पहले ही भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।

जब सजा सुनाई गई तब शरीफ लंदन में अपनी बीमार पत्नी की देखभाल कर रहे थे जो कई दिनों से कोमा में है। सेना ने काफी कोशिश की कि वो वापस नहीं आएं। बकौल शरीफ, उन्हें धमकाया गया, लंदन में उनके घर और परिवार वालों पर हमले भी किए गए, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान वापस लौटने का फैसला किया। शरीफ का कहना है कि उन्होंने लौटने का निर्णय लिया क्योंकि वो कानून का पालन करने वाले शहरी हैं जो लोकतंत्र और वोट की ताकत में यकीन रखता है। लौटते समय उन्होंने एक जुमला उछाला – वोट को इज्जत दो। लेकिन कयास लगाने वाले कयास भी लगा रहे हैं। कानून के जानकारों के मुताबिक अगर शरीफ और उनकी बेटी नियत समय सीमा में सपर्पण नहीं करते तो उन्हें जमानत भी नहीं मिलती। कुछ लोग कह रहे हैं कि वो लौटे क्योंकि उन्हें अपने से ज्यादा अपनी बेटी के राजनीतिक भविष्य की चिंता है जो इस दफा पहली बार चुनाव मैदान में उतरीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शरीफ को अयोग्य करार देने के बाद बड़े पैमाने पर उनके कार्यकर्ता इमरान खान की पार्टी में शामिल हुए। शरीफ की मानें तो उनकी पार्टी में सेना के इशारे पर तोड़-फोड़ की गई और कार्यकर्ताओं को डरा-धमका कर दल बदलने को मजबूर किया गया। कभी उनके बहुत खास माने जाने वाले और सेना के साथ उनके संपर्कसूत्र रहे चैधरी निसार तक ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शरीफ के अयोग्य करार दिए जाने के बाद पार्टी की कमान उनके छोटे भाई शाबाज शरीफ के हाथ में आई, लेकिन वो हिचकोेले खाती पार्टी को संभाल नहीं सके। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि नवाज शरीफ की वापसी से लोगों में उनके प्रति सहानुभूति की लहर पैदा होगी और उनके समर्थकों में नया जोश। वो अब चुनाव मैदान में खम ठोक कर दावा कर सकते हैं कि उनका नेता जनरल परवेज मुशर्रफ जैसा भगोड़ा नहीं है जो अनगिनत अदालती आदेशों के बावजूद पाकिस्तान वापस आने के लिए तैयार नहीं है। शरीफ की पार्टी का देश के सबसे बड़े प्रांत पंजाब में वर्चस्व रहा है। उनके आने से समर्थकों में उम्मीद जगी है कि वो सेना की सारी तिकड़मों के बावजूद पंजाब में सम्मानजनक संख्या में सीटें जीत पाएंगे।

शरीफ की वापसी के पीछे लोग चाहे जितने कारण गिनाएं, लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये है कि शरीफ जानते हैं कि यदि आज वो सेना के वर्चस्व को चुनौती नहीं देंगे तो आने वाले लंबे समय तक देश में कोई और नेता सेना के खिलाफ सीना तान के खड़ा होने लायक नहीं बचेगा। उन्हें पता है कि उनका मुकाबला इमरान खान से नहीं, उसकी आका यानी सेना से है। उनका लौटना इमरान के लिए नहीं, सेना के लिए चुनौती है। वो हारें या जीतें, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वो सेना को चुनौती देते रहेंगे। उनके विरोधी उनके खिलाफ चाहें जो बोलें, सेना के प्रतिबंधों से मजबूर मीडिया भले ही उनका मजाक उड़ाए, लेकिन सब जानते हैं उन्होंने पाकिस्तान लौट कर साहस का परिचय दिया है। उनका अतीत भले ही पाक-साफ न रहा हो, भले ही उन्होंने बार-बार सेना से समझौते किए हों, अयोग्य घोषित किए जाने के बाद भले ही उन्होंने सेना का विरोध उसे ‘डील’ के लिए मजबूर करने के लिए किया हो, लेकिन अब लंदन से लौटने का अर्थ यही है कि उन्होंने सेना से संघर्ष का रास्ता चुन लिया है।

अभी तो सिर्फ एक मामले में उनके खिलाफ फैसला आया है, अभी कई मामले बकाया हैं जिनमें उनके विरूद्ध और भी सख्त फैसले आ सकते हैं। 68 बसंत देख चुके शरीफ कब तक अपनी टेक पर कायम रहेंगे, ये देखना दिलचस्प होगा। लेकिन ये लड़ाई उनकी व्यक्तिगत नहीं है, ये देश में लोकतंत्र के जीवन-मरण का प्रश्न है, इसमें उनके परिवार वालों और कार्यकर्ताआंे को ही नहीं, विपक्षी दलों और देश की जनता को भी समझदारी से उनका साथ देना होगा। आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और लंदन में जलावतनी झेल रहे अल्ताफ हुसैन की मुŸााहिदा कौमी मूवमेंट जैस बड़ी पार्टियां ही नहीं, अनेक छोटी पार्टियां भी चुनाव प्रचार में रोक-टोक और मीडिया पर पाबंदी के आरोप लगा रही हैं। सेना की ज्यादतियां झेल रहे शरीफ और सभी विपक्षी दल अगर इमरान खान की पीटीआई के खिलाफ कोई साझा मोर्चा खोल सकें तो ये निश्चित ही पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।

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