“देशद्रोही नक्सल आतंकियों के सफाए के लिए सेना तैनात की जाए” in Punjab Kesari

हाल ही में खबर आई कि छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ इलाके के धूरबेड़ और पिनका में पुलिस दल ने एक महिला नक्सली समेत छह नक्सलियों को मार गिराया और उनके पास से बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद किए। यह कार्रवाई छह नवंबर को शुरू किए गए आॅपरेशन प्रहार के दूसरे चरण के तहत  हुई। यह संभवतः पहली बार है जब नक्सलियों को दक्षिण बस्तर के बीहड़ांे में उनके इलाके में घुस कर खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है। इस इलाके के ‘भयावह जंगलों ओर दुर्गम पहाड़ियों’ में नक्सलियों ने अपना ठिकाना बनाया हुआ है। इससे पहले दो दशक तक तक पुलिस और अन्य सुरक्षा बल इनके आस-पास भी नहीं पहुंच पाए थे। इसलिए यहां पहुंच पाना ही बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

आपके और मेरे मन में स्वाभिवक ही सवाल उठता है कि जिन ‘भयावह और बीहड़’ जंगलों में नक्सली आराम से अड्डा बना सकते हैं, वहां पुलिस या अन्य बल अब तक क्यों नहीं पहुंच सके? वहां जाना वास्तव में मुश्किल था या जाने की इच्छाशक्ति ही नहीं थी? इतने वर्ष बाद, अिखर अब ही क्यों पुलिस वहां पहुंच पाई है?

इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें भारत में खूनी नक्सलियों के इतिहास पर नजर डालनी होगी। लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि इतने साल बाद आज अगर पुलिस इन ‘दुर्गम’ इलाकों में जाने की हिम्मत जुटा रही है तो इसका एक बहुत बड़ा कारण केंद्र और छत्तीगढ़ की भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं जिन्होंने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति और दृढ़ता दिखाई है।

येन केन प्रकारेण सत्ता प्राप्ति और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए हिंसा और हत्या को वैध मानने वाली नक्सली मुहिम की शुरूआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी के दो सदस्यों कानू सन्याल और चारू मजूमदार  ने पचास साल पहले 1967 में पश्चिम बंगाल में की। यह नक्सलबाड़ी गांव से आरंभ हुई, इसलिए इसे नक्सलवाद के रूप में जाना गया। कानू और चारू ने अपने हत्यारे दर्शन के अनुसार ये खूनी सिलसिला जमींदारों के खिलाफ भूमिहीन किसानों को न्याय दिलवाने के नाम पर आरंभ किया था। ध्यान रहे नक्सलवादियों को माओवादी भी कहा जाता है क्योंकि ये चीन के बदनाम सिरफिरे कम्युनिस्ट तानाशाह माओ त्से तुंग के हिंसक राजनीतिक दर्शन को मानते हैं जो कहता है कि सत्ता बंदूक की नोक से आगे बढ़ती है। माओ ने अपनी कुख्यात और सनकी ‘सांस्कृतिक क्रांति’ के दौरान करोड़ों चीनियों को मरवाया।

ये संयोग की बात है कि माओ की मूर्खतापूर्ण सांस्कृतिक क्रांति (1966) और भारत में नक्सलवाद (1967) लगभग एक साथ ही  शुरू हुए। भूमिहीन किसानों, आदिवासियों और गरीबों को हक दिलवाने के नाम पर शुरू किए गए हत्यारे नक्सलवाद का असली लक्ष्य भारत सरकार को उखाड़ फेंकना और साम्यवादी शासन स्थापित करना था। जैसे जैसे समय बीता, हत्यारे नक्सलियों की मंशा भी स्पष्ट होती चली गई। वर्ष 2007 तक ये खूनी दरिंदे अपने पंजे 14 राज्यों तक फैला चुके थे। 2009 में 10 राज्यों के 180 जिलों में इनका प्रभाव था, जबकि 2011 में सरकार ने दावा किया कि इन्हें नौ राज्यों के 83 जिलों तक सीमित कर दिया गया था। वर्ष 2016 में जारी एक सरकारी विज्ञप्ति के मुताबिक नक्सली अब भी 10 राज्यों के 106 जिलों में फैले थे। आपको ज्ञात ही होगा कि नक्सल हिंसा में हजारों लोग मारे जा चुके हैं। इनमें सुरक्षा बल, आम नागरिक और खुद नक्सली भी शामिल हैं।

भारत में कम्युनिस्टों के अलग-अलग गुट या कहें पार्टियां भले ही जाहिर तौर पर नक्सलवाद से किनारा करती रहीं हों, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि इन्होंने अंदर ही अंदर इन्हें भरपूर समर्थन और संसाधन उपलब्ध करवाए। जहां मुख्य धारा की तथाकथित कम्युनिस्ट पार्टियां बैलेट (मतपत्र) के जरिए सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिश करती रहीं, वहीं नक्सली इनकी सैन्य इकाई बन कर बुलेट (गोली) के जरिए देश के बड़े भूभाग पर अपना विस्तार करते रहे।

कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा और कौन सी ताकतें थीं जिन्होंने नक्सलियों को अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में मदद की? कैसे ये नक्सली जंगलों और बीहड़ों से निकलकर विश्वविद्यालयों, सरकारी दफ्तरों, मीडिया संस्थानों, अदालतों आदि तक पहुंच गए? कैसे इन्होंने विश्वविद्यालयों में अपनी छात्र इकाइयां और स्लीपर सेल स्थापित किए? कैसे इन्होंने गैर सरकारी संगठनों का बड़ा नेटवर्क बना और देश-विदेश से चंदा उगाह,  छोटे बड़े शहरों में जनता को उकसाने और भड़काने के लिए कार्यकर्ता और नेटवर्क तैयार किए? कैसे ये संगठन विदेशी इशारों पर भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे? कैसे इनके वकील इनकी देशद्रोही गतिविधियों को कानूनी संरक्षण देने के लिए अदालतों में उतर गए?

इसके लिए कांग्रेस सीधे तौर पर जिम्मेदार है जिसके राज में इन्हें न केवल भौगोलिक विस्तार मिला बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी इन्होंने घुसपैठ बनाई। यूपीए सरकार में सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को रिमोट से चलाने के लिए एडवाईजरी काउंसिल बनाई थी। इसके ज्यादातर सदस्य इसी नेटवर्क से संबंध रखते थे। इससे इनकी पहुंच और प्रभाव का अंदाज लगाया जा सकता है और सोनिया गांधी की मानसिकता को भी समझा जा सकता है जिन्होंने ‘आईडिया आॅफ इंडिया’, ‘अभिव्यक्ति की आजादी’, ‘विविधता’, ‘धर्मनिरपेक्षता’ आदि जैसे मोटे-मोटे जुमलों की आड़ में इन्हें फलने फूलने और देश विरोधी गतिविधियां करने का मौका दिया।

वैश्विक स्तर पर भले ही इस्लामिक आतंकवादी और कम्युनिस्ट अलग अलग नजर आते हों लेकिन भारत को तोड़ने के साझे लक्ष्य के चलते यहां इन्होंने हाथ मिला लिए हैं। आज ये सिर्फ गरीब किसानों और मजदूरों के लिए ही लड़ने का नाटक नहीं करते, ये बाकायदा इस्लामिक आतंकवादियों के लिए भी संघर्ष करते हैं। संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू की फांसी रूकवाने के लिए अदालत से मीडिया तक कैसे पूरा नक्सली गैंग सक्रिय हो गया था, ये हमने अपनी आंखों से देखा और कानों से सुना है। कैसे अरूंधती राय हुर्रियत के आतंकवादी सय्यद अली शाह गिलानी के साथ संवाददाता सम्मेलन करती थी, ये भी बहुत पहले की बात नहीं है। हैदराबाद विश्वविद्यालय के जिस ‘दलित’ अराजकतावादी रोहित वेमूला के लिए नक्सलियों ने आसमान सिर पर उठा लिया, वो मुंबई हमलों के दोषी आतंकवादी याकूब मेमन के समर्थन में जिंदाबाद के नारे लगाता था और जुलूस निकालता था। यही नहीं वो राष्ट्रवादी छात्र संगठनों के सदस्यों के साथ मार पिटाई भी करता था। ये सब भी हम जानते हैं।

नक्सलियों और कम्युनिस्टों की राजनीति का अगर हम ध्यान से अध्ययन करें तो हमें पता लगेगा कि अब इनका पूरा जोर मुसलमानों और दलितों को अपने साथ लाने पर है। कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने पिछले 70 साल में जैसे मुसलमानों में अलगावाद और आतंकवाद का जहर बोया, ऐसे में ये नक्सलियों के लिए आसान टारगेट हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय से लेकर जादवपुर विश्वविद्यालय तक इस्लामिक आतंकवादियों की बरसी मनाना, राष्ट्रविरोधी सेमीनार आयोजित करना, ‘दलित’ रोहित वेमूला के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालना, खुद लोगों की बेरहमी से हत्या करने के बावजूद मोदी सरकार पर ‘असहिष्णुता’ का आरोप लगाना, ये सभी इनकी विघटनकारी रणनीति के ही हिस्से हैं।

सड़क से संसद तक नक्सलियों के इस एजेंडा को कांग्रेस ने कैसे समर्थन दिया, कैसे राहुल गांधी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लेकर हैदराबाद विश्वविद्यालय तक इनके समर्थन में चक्कर मारे, कैसे कांग्रेसी वकीलों ने इनके मुकदमे लड़े, ये किसी से छुपा नहीं है।

अब ये स्पष्ट हो चुका है कि भूमिहीनों और गरीबों की लड़ाई लड़ने का ढोंग करने वाले खूनी नक्सली वास्तव में विकास विरोधी हैं। जब भी सरकारों ने इनके प्रभाव वाले इलाकों में कोई विकास कार्य करने की कोशिश की, इन्होंने पलीता ही लगाया। ये नहीं चाहते कि इनके प्रभाव वाले इलाकों में लोग बाहरी दुनिया से जुडं़े या उसके बारे में जानें। इसीलिए ये बिजली के खंभे, सरकारी स्कूल, रेलवे स्टेशन, हर वो चीज जला देते हैं जो नक्सल इलाके के लोगों को बाहर से जुड़ने का अवसर देती है या इसकी संभावना पैदा करती है। इन्होंने अपने इलाकों में अपने स्कूल खोले हैं जहां इनकी पाठ्य पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं जो बच्चों के दिमाग में भारत के खिलाफ जहर भरने और उन्हें ब्रेनवाश्ड हत्यारा बनाने का काम करती हैं।

अब सवाल ये उठता है कि नक्सलियों के पास पैसा और हथियार कहां से आते हैं? कैसे ये जंगलों में अपनी हुकूमत चलाते हैं। इसका स्पष्ट उत्तर है कि इन्हें पाकिस्तान और चीन की खुफिया एजेंसियों से पैसा और हथियार मिलते हैं। इसके अलावा ये अपने इलाकों में चलने वाली फैक्ट्रियों और खानों के मालिकों से हफ्ता वसूलते हैं, शहरों में चलने वाले इनके एनजीओ देश-विदेश में इनके लिए पैसा जुटाते हैं। ये अपने इलाकों में अफीम उगाते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मादक पदार्थों का धंधा करते हैं। ये समय समय पर पुलिस थानों पर हमले करते हैं जहां से इन्हें बड़े पैमाने पर हथियार मिलते हैं। खुफिया जानकारियों के मुताबिक अब तो इन्होंने खुल कर हथियारों का उत्पादन शुरू कर दिया है। इनमें से कुछ हथियार ये देश के दूसरे हिस्सों में असामाजिक तत्वों को भी बेचते हैं। ये सुपारी किलिंग का काम भी करते हैं। आज नक्सली अलग इकाई के रूप में काम नहीं करते, इनके कश्मीरी आतंकवादियों से लेकर नगालैंड और असम के अलगाववादियों तक सबसे संपर्क और लेनदेन है और ये बेधड़क भारत में चल रहे अलगाववादी षडयंत्रों का समर्थन करते हैं।

अब सवाल ये है कि इस समस्या से कैसे निपटा जाए? अक्सर ये सवाल उठता है कि जब नक्सली घने जंगलों में रह सकते हैं और वहां से समानांतर सरकार चला सकते हैं तो केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के सुरक्षा बल वहां क्यों नहीं पहुंच सकते? क्यों नहीं सरकार इनके खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान चलाती और इन्हें एक झटके में समाप्त करती? इसका दो टूक उत्तर है कि अब तक विभिन्न राजनीतिक दलों ने इसके खिलाफ पर्याप्त इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। ये भी देखने में आया कि कुछ पार्टियों ने इन्हें बढ़ावा दिया और इन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। जातिवाद और इस्लामिक संप्रदायवाद के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियों ने लगातार विघटनकारी भावनाओं और संगठनों को प्रोत्साहित किया और राष्ट्रवादी ताकतों का मजाक उड़ाया। ऐसे में इनसे नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई की कैसे अपेक्षा की जा सकती है?

नक्सलियों से सहानुभूति रखने वाले कहते हैं कि सरकार को उनसे बात करनी चाहिए और शातिपूर्वक तरीके से इस समस्या को हल करना चाहिए। लेकिन अनुभव बताता है कि ‘शांतिपूर्वक तरीका’ सिर्फ इन हत्यारों को अधिक संगठित और दृढ़ होने का ही अवसर और समय प्रदान करता है। एक अन्य तबका है जो कहता है कि नक्सल क्षेत्रों में विकास कर इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों ने नक्सल प्रभावित इलाकों के विकास के लिए भी बहुत जतन कर लिए हैं। अब ये साफ हो चुका है कि इनका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। जब तक नक्सलियों की निरंकुश सत्ता  समाप्त नहीं की जाती, इनके प्रभाव वाले इलाकों में विकास की कोई किरण नहीं पहुंचेगी।

पिछले पचास साल का अनुभव बताता है कि नक्सलियों का लक्ष्य भारत को तोड़ना है, और ये किसी भी सूरत में इससे पीछे नहीं हटेंगे। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि सरकार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में नक्सलियों के समर्थकों से डरे बिना इनके खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़े। जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए आॅपरेशन चला रही है, लेकिन ऐसी कार्रवाइयों से ये मसला हल नहीं होगा। ये काननू व्यवस्था का कोई मामूली मसला नहीं है, जिसे राज्य सरकारें स्थानीय स्तर पर हल कर सकें। केंद सरकार को रेड काॅरीडोर (नक्सल प्रभावित इलाके को इस नाम से भी जाना जाता है) को सीधे अपने कब्जे में लेकर इनके खिलाफ बाकायदा सैनिक कार्रवाई करनी चाहिए और इससे पहले कोई चेतावनी भी नहीं दी जानी चाहिए। अब तक नक्सलियों के खिलाफ अलग बल बनाने की कवायद होती रही है। भारत की थल सेना और वायु सेना आधुनिकतम हथियारों से सुसज्जित है। ऐसे में अलग बल पर पैसा व्यर्थ करने की जगह अब केंद्र सरकार को अपने सैन्य बलों का इस्तेमाल करना चाहिए। आवश्यकता लगे तो उन्हें इसके लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

अब ये रेटोरिक बंद होना चाहिए कि नक्सली भी भारतीय नागरिक हैं और इनके खिलाफ सेना का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। हकीकत तो ये है कि ये देश के उतने ही बड़े दुश्मन हैं जितनी बड़ी पाकिस्तानी सेना। हम उठते बैठते कश्मीर में आतंकवाद की बात करते हैं और हमने उसके सफाए के लिए सेना भी तैनात कर रखी है। कश्मीर का कुल क्षेत्रफल मात्र 15,948 वर्ग किलोमीटर है, जबकि रेड काॅरीडोर 90,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है। जब सेना कश्मीर में आतंकवादियों के सफाए के लिए अभियान चला सकती है, तो इतने बड़े इलाके को खूनी नक्सली आतंकवादियों से मुक्त करवाने के लिए उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता? एक बात और, अब नक्सलियों के लिए ‘लेफ्टविंग एक्ट्रीमिस्ट’ जैसे शब्द नहीं इस्तेमाल होने चाहिए। ये देशद्रोही आतंकवादी हत्यारे हैं। इन्हें और इनके समर्थकों को इसी नाम से बुलाया जाना चाहिए।

लेकिन समस्या सिर्फ जंगलों से ही नक्सलियों को खदेड़ने की नहीं है। हमने देखा है कि कैसे अनेक विश्वविद्यालय के शिक्षक, छात्रों को इस ओर धकेल रहे हैं, कैसे मीडिया और अदालतों में बैठे इनके लोग पूरा गैंग बनाकर इनके हितों को आगे बढ़ा रहे हैं और देश का समर्थन करने वालों का मजाक उड़ा रहे हैं और उन्हें ही खलनायक बना रहे हैं। अब इनके खिलाफ शहरों में भी कार्रवाई आरंभ होनी चाहिए। मीडिया और अदालत में इनके एजेंटों, गली मोहल्लों में इनके गैर सरकारी संगठनों, विश्वविद्यालयों में इनके समर्थक शिक्षकों, छात्र संगठनों, स्लीपर सेलों, विदेशों में बैठे इनके सरपरस्तों की पहचान कोई मुश्किल नहीं है

सरकार को चाहिए कि इस समस्या के उन्मूलन के लिए निश्चित समय सीमा के लिए एक अलग समन्वय मंत्रालय का गठन करे जो जंगलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक राष्ट्रदोहियों के खिलाफ कार्रवाई की रूपरेखा तैयार करे और उसे अमली जामा पहनाए। इसके साथ ही संविधान में संशोधन भी किए जाएं ताकि नक्सली आतंकवादी मानवाधिकारों के नाम पर छूटने न पाएं। सरकार अपने यहां नौकरी और आर्थिक सहायता सिर्फ उन्हीं लोगों, संगठनों और संस्थानों को दे जो देश के प्रति वफादारी का लिखित हलफनामा दें। इस हलफनामे का उल्लंघन करने वाले को न सिर्फ सेवा से हटाया जाए, बल्कि उसे सख्त से सख्त सजा भी दी जाए। जब तक देश से नक्सली आतंकियों का जड़ मूल से सफाया न हो जाए, विश्वविद्यालयों में राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया जाए।

 

 

 

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  1. essayforme says:

    write an essay for me http://dekrtyuijg.com/

    This is nicely expressed! .

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