“नेपालः सदभावना के साथ सतर्कता भी आवश्यक” in Punjab Kesari

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी ने हाल ही में नेपाल का दौरा किया। अब्बासी भले ही कठपुतली प्रधानमंत्री हों, पर उनका दौरा और उनके वक्तव्य कई सवाल खड़े करते हैं। ये दौरा असल में नेपाल के नए प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल, यूएमएल के नेता केपी ओली की भारत से खंुदक, चीन से नजदीकी और भविष्य में उनकी नीतियों की एक बानगी है।

आमतौर से नेपाल के प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद सबसे पहले भारत का दौरा करते हैं, लेकिन ओली ने सबसे पहले नेपाल-चीन सीमा का दौरा किया और वहां चीन का गुणगान किया। उनके यहां जो पहला राष्ट्राध्यक्ष आया है, वो पाकिस्तानी है। अब्बासी नेपाल के दौरे पर तो गए ही, वहां उन्होंने ओली के साथ मिलकर भारत को चिढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कश्मीर में तथाकथित मानवाधिकार हनन का मुद्दा उठाया और जल्द से जल्द सार्क सम्मेलन करवाने की बात की। अब्बासी के दौरे का संकेत ये था कि भारत भले ही सार्क में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश करे और इस्लामाबाद में प्रस्तावित शिखर सम्मेलन का बहिष्कार करे, लेकिन नेपाल, पाकिस्तान को अपना रहा है और चीन की सरपरस्ती में दक्षिण एशिया में नए समीकरण उभर रहे हैं। अब्बासी ने चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना की जम कर तारीफ की जिसके तहत पाकिस्तान में चाइना पाकिस्तान काॅरीडोर (सीपेक) बनाया जा रहा है जो पाक अधिकृत कश्मीर से गुजरता है जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है। ज्ञात हो नेपाल भी चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना में हिस्सेदारी के लिए सहमति दे चुका है।

जाहिर है चीन के करीबी ओली, उसकी शह पर उसके एक अन्य पिट्ठू पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को मुंह चिढ़ा रहे थे। अब्बासी ने वहां जा कर कहा, “पाकिस्तान, नेपाल की एकता, संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता को प्रमुखता से महत्व देते हुए इसका समर्थन देता है।” ये और कुछ नहीं ओली के विचारों की ही प्रतिध्वनि है जो किसी भी कीमत पर भारत को नेपाल से दूर करने पर तुले हैं और इसके लिए उन्होंने नेपाली स्वाभीमान और राष्ट्रवाद का सहारा लिया है। कहने की आवश्यकता नहीं उन्होंने चुनावों में जी भर कर भारत के खिलाफ विषवमन किया और उस पर नेपाल की संप्रभुता और प्रादेशिक अखंडता से खेलने का आरोप लगाया। भारत पर नेपाल के मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाने वाले ओली अब खुद अपने देश को चीन को बेचने के लिए तैयार बैठे हैं, लेकिन अब उन्हें देश की अखंडता और संप्रभुता का ध्यान क्यों नहीं आ रहा? सीपेक के नाम पर चीन जैसे पाकिस्तान पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है और जिसका पाकिस्तान के सभी बुद्धिजीवी आजकल एक स्वर से विरोध कर रहे हैं, क्या वो ओली को नहीं दिखता? क्या ओली ये बताने का कष्ट करेंगे कि नेपाल में अभूतपूर्व रक्तपात करने वाले उनके माओवादी सहयोगी किसकी मदद से उनके देशवासियों का खून बहा रहे थे? उन्हें हथियार और पैसा कहां से मिल रहा था?

कुछ भारतीय कम्युनिस्ट पत्रकार ओली के भारत विरोधी रवैये के लिए मोदी सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। ये आधा सच है, जबकि पूरा सच ये है कि ओली चीन के पिट्ठू हैं। भारत उनकी कितनी ही लल्लो-चप्पो करले वो भारत के साथ नहीं आएंगे। इसके सबूत के तौर पर हम कुछ तथ्य रखना चाहेंगे।

ओली जब अक्तूबर 2015 से अगस्त 2016 के बीच पहली बार नेपाल के प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने चीन के साथ अनेक समझौते किए जिनका साफ मकसद था नेपाल से भारत को बाहर करने के लिए चीन को कमान सौंपना और व्यापार के लिए भारत पर निर्भरता समाप्त करना। इसमें ओली सफल भी हुए। आज नेपाल में चीन सबसे बड़ा निवेशक है। ओली ने चीन से नजदीकी बढ़ाने के लिए ट्रांसिट ट्रीटी (पारगमन संधि) पर हस्ताक्षर किए ताकि नेपाल और चीन को सड़क और रेल मार्ग से जोड़ा जा सके।

ओली को उम्मीद है कि जब चीन तिब्बत में शिगास्ते और क्यीरोंग तक रेल नेटवर्क ले आएगा तो उसे नेपाल तक लाना मुश्किल नहीं होगा। ध्यान रहे चीन अपने क्निघाई-तिब्बत रेेलवे को 2020 तक नेपाल सीमा तक ले जाना चाहता है और उसने इसे काठमांडू तक ले जाने की भी इच्छा जताई है। तिब्बत स्थित क्यीरोंग नेपाल के रासुवगाधी बाॅर्डर ट्रांसिट पाॅइंट से 25 किलोमीटर दूर है और यहां से काठमांडू मुश्किल से 50 किलोमीटर। इसके अलावा चीन और नेपाल को जोड़ने के लिए तीन सड़कों का निर्माण भी चल रहा है। ये दो वर्षों में पूरा हो जाएगा। यानी नेपाल के रेल, सड़क नेटवर्क और अर्थव्यवस्था पर पर चीन का पूरा कब्जा और भारत के जरिए होने वाले व्यापार को भी वाया चीन करने का जुगाड़।

जाहिर है ओली के रहते चीन के लिए राजधानी काठमांडू तक सीधी पहुंच बनाना और आसान हो जाएगा। चीन का ओली पर कितना प्रभाव है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि पिछली सरकारों ने चीन से जुड़ी जिन परियोजनाओं को नकारा था, वो उन्हें भी फिर से जीवित करने के लिए तैयार हैं। पिछली शेरबहादुर देउबा सरकार ने 2.5 अरब डाॅलर की बूढ़ी गंडक परियोजना को अनियमितताओं के चलते रद्द कर दिया था, लेकिन ओली ने उसे फिर से शुरू करने का ऐलान किया है। रेल, सड़क और इस बांध परियोजना के अलावा भी चीन नेपाल में अनेक महत्वपूर्ण परियोजनाएं चला रहा है। इनमें पोखरा इंटरनेशनल रीजनल एयरपोर्ट, काठमांडु रिंग रोड इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट, अपर त्रिशूल जल विद्युत परियोजना आदि भी शामिल हैं। यही नहीं नेपाल ने चीन की महत्वाकांक्षी और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण वन बेल्ट वन रोड परियोजना का हिस्सा बनने के लिए हस्ताक्षर भी किए हैं।

ओली की भारत के प्रति क्या नीति रहने वाली है? ये उनके चीन के प्रति बेहद उदार रवैये और अब्बासी के दौरे से काफी कुछ स्पष्ट हो चुका है। हाल ही में हाँगकाँग के अखबार ‘साउथ चाइना माॅर्निंग पोस्ट’ में उनका विस्तृत साक्षात्कार छपा है। चीन परस्त इस अखबार में वो भारत के बारे में बेलौस अपनी राय रखते हैं। भारत के साथ काम करने के सवाल पर वो कहते हंै, ”हमारे भारत के साथ सदैव बेहतरीन संबंध रहेे हैं, भारत में ‘कुछ लोगों’ ने गलतफहमी पैदा की, लेकिन भारतीय नेताओं ने मुझे आश्वासन दिया है कि भविष्य में कोई हस्तक्षेप नहीं होगा और हम एक दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करेंगे।”

आगे वो अपनी असली मंशा प्रकट करते हैं, ”हम बदलते समय के अनुसार भारत के साथ अपने रिश्ते ‘अपडेट’ करना चाहते हैं। दोनों देशों के रिश्तों के ‘हर विशेष प्रावधान’ की समीक्षा करना चाहते हैं जिसमें भारतीय फौज में नेपाली नागरिकों का काम करना भी शामिल है।” वो आगे कहते हैं, ”भारत के साथ हमारी अच्छी कनेक्टीविटी है, वो सब ठीक है, हम इसे और भी बढ़ाऐंगे, लेकिन हम नहीं भूल सकते कि हमारे दो पड़ोसी हैं। हम सिर्फ एक देश पर ही निर्भर रहना या सिर्फ एक ही विकल्प नहीं चाहते।”

ओली का संकेत साफ है – समय बदल गया है यानी नेपाल में चीन युग आरंभ हो चुका है, नेपाल अपनी मर्जी के मुताबिक (या चीनी निर्देशानुसार) भारत से संबंध रखेगा, अब भारत को उस से कोई अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। ऐसे में भारत के लिए चिंतित होना स्वाभाविक है। भारत के लिए चिंता की बात इसलिए भी है कि भारत-नेपाल की मुक्त सीमा का लाभ उठाने के लिए पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने नेपाल में अनेक अड्डे बना रखे हैं। वहां आतंकवादियों का कितना बोलबाला है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि अनेक दुर्दांत आतंकवादी बिहार में भारत-नेपाल सीमा से पकड़े गए हैं। ओली की भारत विरोधी नीतियों को देखते हुए ये आशंका होना स्वाभाविक है कि ओली ऐसी गतिविधियों को रोकने में मदद करेंगे भी कि नहीं। भारत के लिए इस से भी बड़ी चिंता है नेपाल की राजनीति पर खूनी माओवादियों हिस्सेदारी। ध्यान दिला दें कि नेपाल में ओली के बाद दूसरे प्रमुख कम्युनिस्ट नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के भारतीय नक्सलियों से घनिष्ठ संबंध रहे हैं। प्रचंड के नेतृत्व में नेपाली माओवादियों ने खून की वीभत्स होली खेली है जिसका इतिहास भारतीय माओवादियों से भी अधिक भयावह है। भारत, नेपाल को व्यापार में अनेक सुविधाएं और छूट देता है। भारत में अपना सामान डंप करने के लिए चीन पहले ही इनका फायदा उठा रहा है। ओली के नेतृत्व में चीन की ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा नहीं मिलेगा, क्या वो इसकी गारंटी देंगे?

ऐसी स्थिति में भारत क्या नीति अपनाए? भारत के सामने क्या विकल्प हैं? जाहिर है इस विषय में कोई कदम उठाने से पहले भारत को राजनीति से इतर दोनों देशों के सैकड़ों साल पुराने रिश्तों का भी ध्यान रखना होगा। नेपाल के तराई इलाके में रहने वाले लोगों से भारत के रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। दोनों देशों के बीच धार्मिक पर्यटन और शैक्षिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की भी पुरानी परंपरा है, नेपाल के लाखों लोग भारतीय सेना और अन्य स्थानों में काम करते हैं, उन्हें भारतीयों जैसे यहां संपत्ति खरीदने की अनुमति भी है, उनकी मुद्रा भी हमारी मुद्रा पर आधारित है।

ऐसे में नेपाल के संबंध में भारत के विकल्प असीमित नहीं हैं। भारत के लिए सबसे पहला विकल्प तो है प्रतीक्षा और अहस्तक्षेप। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘पड़ोसी पहले’ की नीति अपनाई है। इसे ध्यान में रखते हुए ओली के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही विदेश मंत्री सुषमा स्वराज काठमांडु का दौरा कर चुकी हैं और नेपाल की नई सरकर को पूरा समर्थन जता चुकी हैं। अब खबर आई है कि ओली भी किसी अन्य देश में जाने से पहले भारत का दौरा करेंगे और आगामी महीनों में प्रधानमंत्री मोदी भी नेपाल जाएंगे। जाहिर है अपनी तरफ से सकारात्मक रहते हुए भारत को शांति से ये देखना चाहिए कि समय बीतने के साथ नेपाल में हालात क्या करवट लेते हैं और ओली का भारत विरोध और चीन प्रेम किस सीमा तक जाता है और इसे लेकर वहां अंदरूनी कशमकश किस हद तक बढ़ती है।

भारत के समक्ष दूसरा विकल्प है जैसे को तैसा। ओली अगर भारतीय सेना में नेपालियों की भर्ती, सीमा प्रबंधन आदि पर विवाद करते हैं तो भारत भी उचित कदम उठाने चाहिए, खास कर सीमा प्रबंधन के विषय में। भारत को अब वैसे भी सीमा पर बेहतर प्रबंधन और हर आने-जाने वाले व्यक्ति की कड़ी निगरानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

पिछले वर्ष विवादों के बावजूद भारत-चीन व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और ये 80 अरब डाॅलर के ऊपर जा पहुंचा। हाल ही में चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने कहा है कि भारत और चीन की दोस्ती को हिमालय भी नहीं रोक सकता। ऐसे में भारत को चीन को स्पष्ट कर देना चाहिए कि यदि उसे वास्तव में दोस्ती निभानी है तो पाकिस्तान, नेपाल और मालदीव में इसका सबूत भी देना होगा। दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और मालदीव के बाद नेपाल तीसरा ऐसा देश है जो इस समय सीधे चीन के असर में है। अगर चीन टकराव की नीति अपनाते हुए अपने बगलबच्चों के जरिए भारत को परेशान करने की कोशिश करेगा तो भारत निश्चय ही उचित कदम उठाएगा।

आखिर में भारत को भले इंसान और बड़े भाई के चरित्र से बाहर आना पड़ेगा। नेपाल सरकार के साथ ही नेपाली नागरिकों को भी अपनी सीमाओं और पसंद, नापसंद से अवगत करवाते रहना होगा ताकि वो भी अपनी सरकार पर दबाव बनाए रखें। 11 मार्च को ओली ने संसद में दो तिहाई सांसदों के साथ बहुमत साबित किया। नेपाल के नए संविधान के तहत उन्हें अब तानाशाहों जैसे अनेक विशेषाधिकार मिल गए हैं। वो इनका दुरूपयोग न करें, इसके लिए सबसे पहले जनता को ही अंकुश लगाना होगा।

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