“परमाणु बम की व्यर्थता और सीमा का भान हो रहा है पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया को” in Punjab Kesari

डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभालने के बाद जिन दो देशों – पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया, के खिलाफ सबसे बड़ा मोर्चा खोला, वो दोनों ही चीन के बगल बच्चे या कहें लोकल गुंडे हैं और दोनों ही परमाणु ताकत भी हैं। एक तरफ पाकिस्तान दक्षिण एशिया में चीन के इशारों पर भारत को ‘बांधने और परेशान’ करने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ उत्तरी कोरिया, अमेरिका और पूर्व एशिया में उसके सहयोगियों को ‘औकात’ बताता रहता है। दोनों देशों के परमाणु बमों के पीछे कैसे चीन का हाथ है, ये गोरखधंधा कब से चल रहा है और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आंखें तरेरने वाला अमेरिका पाकिस्तान के परमाणु बम बनाते समय क्यों चुप रहा, इसका विश्लेषण फिर कभी। लेकिन अभी जो सवाल हमारे सामने है वो ये कि क्या परमाणु बम की आड़ में पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया जैसे कपटी देश दादागिरी कर सकते हैं? क्या परमाणु बम ने उन्हें अजेय बना दिया है?

पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम की शुरूआत यूं तो 1974 से मानी जाती है जब तबके प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने कहा था कि हम घास खाएंगे पर एटम बम बनाएंगे, लेकिन वो असल में परमाणु ताकत बना 28 मई 1998 को प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के कार्यकाल में। अक्तूबर 2017 में अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान के पास 140 और भारत के पास 130 न्यूक्लिर वाॅरहेड थे। उधर उत्तरी कोरिया अब तक 11 न्यूक्लियर धमाके कर चुका है। उसका दावा है कि हर धमाका पहले से कहीं अधिक ताकतवर था। वर्ष 2016 में तो उसने दावा किया कि उसने धमाके में हाइड्रोजन बम का इस्तेमाल किया। हालांकि दुनिया भर में विशेषज्ञों ने इस दावे को खारिज कर दिया। माना जाता है कि उसके पास फिलहाल 17-20 बम हैं जो 2020 तक 100 तक पहुंच जाएंगे।
चाहे उत्तरी कोरिया हो या पाकिस्तान, दोनों ने अपनी परमाणु ताकत का भरपूर या यों कहें बचकाना और बड़बोला प्रदर्शन किया और इसके जरिए अंतरराष्ट्रीय राजनय में मोल-तोल की कोशिश की। दोनों ने उम्मीद की कि इसके जरिए वो अपने घातक मंसूबों को पूरा कर लेंगे और दुश्मन को ठिकाने लगा देंगे। लेकिन अफसोस, ऐसा हुआ नहीं और ऐसा हो भी नहीं सकता।

पहले बात पाकिस्तान की। पाकिस्तान के परमाणु ताकत बनने के बाद वहां के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और भारतीय प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने 21 फरवरी 1999 को लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए और दोनों देशों के विवादों को बातचीत के जरिए सुलझाने का प्रण लिया। लेकिन सेना प्रमुख परेवज मुशरर्फ को ये भा नहीं रहा था, वो तो गुपचुप कारगिल में घुसपैठ करवा रहा था। जब घुसपैठ की खबर सामने आई तो भारत ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए कारगिल से पाकी सैनिकों को बाहर करने में देर नहीं लगाई। मुशरर्फ को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के खिलाफ भारत कोई कार्रवाई करने की जुर्रत भी करेगा। लेकिन भारत ने सिर्फ अपनी सीमा के भीतर कार्रवाई कर ये जता दिया कि पाकिस्तान की न्यूक्लियर ताकत भी उसे अपनी जमीन खाली करवाने से नहीं रोक सकती और उसके परमाणु बम के बावजूद भारत सीमित कार्रवाई कर सकता है। ध्यान रहे कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान द्वारा परमाणु बम सीमा की ओर ले जाने की खबर भी आई इसपर अमेरिकी ने सख्त एतराज किया और राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने नवाज शरीफ को अमेरिका बुलाकर क्लास भी लगाई।

कारगिल में मुंह की खाने के बावजूद सीमा पर पाकिस्तान की गुस्ताखियां जारी रहीं। लेकिन लंबे अर्से बाद बाद सितंबर 2016 में मोदी सरकार ने पाक अधिकृत कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक की और ये स्पष्ट संकेत दिया कि वो सीमापार से निर्यातित आतंकवाद पर मौन नहीं रहेगी। अगर पाकिस्तान की बेजा हरकतें जारी रहीं, तो भारत भी जवाब देगा।

सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारतीय सेना ने आॅपरेशन अर्जुन शुरू किया। इसका सीधा सा सिद्धांत है – जैसे को तैसा। इसके तहत भारतीय सेना ने अपेक्षाकृत अधिक दूरी से मार करने वाले हथियारों से पाकिस्तान की उन चैकियों पर हमले शुरू किए जहां से आतंकियों की कश्मीर में घुसपैठ कराई जाती है। इससे पाकी चैकियों और सैनिकों को भारी क्षति पहुंची। पिछले साल जितने सैनिक हमारे मारे गए हैं, उससे चार गुना नुकसान पाक को हुआ। आॅपरेशन अर्जुन के अच्छे नतीजे सामने आए। लेकिन पाकिस्तान अभी अपनी पुरानी हरकतें छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। पाकिस्तानी सेना संभवतः अब भी अपने परमाणु कार्यक्रम पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर रही है।

पाकिस्तान भारत की कोल्ड स्टार्ट स्ट्रेटेजी (दुश्मन के इलाके में परंपरागत हथियारों से त्वरित और प्रबल आक्रमण) के खिलाफ अपनी छोटी दूरी की नस्र (हत्फ-प्ग्) न्यूक्लियर मिसाइलों की धमकी देता रहता है। इसके जवाब में भारतीय सेना प्रमुख विपिन रावत ने 12 जनवरी को सालाना संवाददाता सम्मेलन में साफ चेतावनी दी कि अगर उसने युद्ध किया तो हम उसकी परमाणु धमकी की हवा निकाल देंगे। अगर हमें आदेश मिला तो हम ये नहीं कहेंगे कि पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है इसलिए हम सीमा नहीं पार कर सकते। जाहिर है भारत का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व अब पाकिस्तान के परमाणु बमों से डरने और इसके साये में अपनी सुरक्षा नीति ढालने की मानसिकता से बाहर आ चुका है। ये बात पाकिस्तान को जितनी जल्दी समझ में आ जाए, उसके लिए उतना ही अच्छा होगा। लेकिन जनरल रावत पर जैसे पाकिस्तानी सेना और विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया दी उससे तो यही लगता है कि उनके मुगालते कायम हैं।
जनरल रावत ने पाकिस्तान को कोई धमकी नहीं दी थी। लेकिन पाकिस्तानी मीडिया ने इसे धमकी के तौर पर पेश किया। पाक सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा कि पाकिस्तान के पास भारतीय धमकी के खिलाफ विश्वसनीय न्यूक्लियर डेटेरेंस है। पाकिस्तान के पास व्यावसायिक सेना है और वो जिम्मेदार और लचीला परमाणु राष्ट्र है और भारत को किसी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। पाकिस्तान के पूर्व रक्षा और वर्तमान विदेश मंत्री और बात-बात पर न्यूक्लियर बम की धमकी देने वाले ख्वाजा आसिफ ने जनरल रावत के बयान को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहा कि वो तो परमाणु युद्ध के लिए निमंत्रण दे रहे हैं। अगर उनकी यही इच्छा है तो वो हमारे संकल्प की परीक्षा ले सकते हैं। उनकी शंकाएं आसानी से दूर हो जाएंगी।

स्पष्ट है कि नए भूराजनीतिक समीकरणों के चलते चारों ओर से घिरा पाकिस्तान अब भी गीदड़भभकियां देने से बाज नहीं आ रहा है। पूर्वी सीमा पर भारत ने उसके आतंकी रवैये के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है, तो पश्चिमी सीमा पर उसकी दोगली नीतियों के कारण पिछले 16 साल से अफगानिस्तान में फंसे अमेरिका ने भी उसे सबक सिखाने की ठान ली है। पिछले राष्ट्रपतियों से अलग टंªप ने बिना लागलपेट साफ कर दिया है कि वो उसका दोगलापन और नहीं सहेंगे। ये बात अलग है कि अंदरखाने में पाकी सेना और अमेरिकी प्रशासन में अब भी बातचीत जारी है और पाकी सेना अफगानिस्तान में ‘स्ट्रैटेजिक डेप्थ’ की नीति से धीरे-धीरे पीछे हटती नजर आ रही है जिसके तहत उसने अफगानिस्तान को आतंकी अड्डा बना दिया था। पाकी रक्षा विशेषज्ञों को अब ये समझ आता जा रहा है कि एक तो अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलने की कोई जल्दी नहीं है और दूसरे उसने इस इलाके में भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी चुन लिया है। चीन भले ही उसके साथ दोस्ती की दुहाई दे, पर जरूरत पड़ने पर वो काम नहीं आएगा। वैसे भी उसके यहां आतंकी पनाहगाहों के खिलाफ सिर्फ अमेरिकी और भारत ही नहीं, स्वयं चीन भी आपत्ति जता चुका है। अब तो उसकी माली हालत भी इतनी खराब हो चुकी है कि अगर समय रहते उसे नहीं संभाला गया तो देश के टूटने का खतरा पैदा हो जाएगा। यं भी बलूचिस्तान, सिंध आदि में अलगाववादी आंदोलन चल ही रहे हैं और गाहे बगाहे पाक अधिकृत कश्मीर से भी विरोध की आवाज उठती रहती है।

अमेरिका विरोध में पागल हुए कुछ पाकी बातवीर अमेरिकी पर परमाणु बम फेंकने की बात करते हैं, लेकिन ये सोच कर मन मसोस कर रह जाते हैं कि उनके पास इतनी दूर तक मार करने वाली मिसाइल नहीं है। फिर वो उत्तरी कोरिया की मिसाल देते हैं कि कैसे वहां किम जोंग उन अमेरिका का डट कर मुकाबला कर रहा है। आगे बढ़ने से पहले याद दिलाते चले की केरल के कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी किम जोंग उन के मुरीदों में हैं। वो कई बार उसकी तारीफ कर चुके हैं। यही नहीं केरल के कई हिस्सों में कम्युनिस्ट उसके पोस्टर और होर्डिंग भी लगा रहे हैं।

क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा? धीरे धीरे किम जोंग उन भी लाइन पर आता दिखाई दे रहा है। उसे समझ आ गया है कि ट्रंप का न्यूक्लिर बटन न केवल उसके बटन से बड़ा है, बल्कि ज्यादा शक्तिशाली भी है और काम भी करता है। सनकी और बददिमाग किम को समझ आ गया है कि गरीबी, बदहाली और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे उसके देश को न्यूक्लियर बम की शेखी बघारने से कुछ हासिल नहीं होगा। परमाणु युद्ध हुआ तो अमेरिकी से पहले उसका और उसके देश का वजूद मिट जाएगा। चीन और रूस के बीच-बचाव और दक्षिण कोरिया के सकारात्मक और सहयोगात्मक रूख के बाद हाल ही में उत्तरी और दक्षिणी कोरिया के बीच लंबी बातचीत हुई जिसके बाद तनाव काफी कम हुआ और उत्तरी कोरिया, दक्षिणी कोरिया में होने वाले विंटर ओलंपिक्स में भाग लेने और चीयर लीडर्स भेजने के लिए तैयार हो गया है।

चाहे पाकिस्तान हो या उत्तरी कोरिया, धीरे धीरे ही सही, चीन के दोनों गरीब और बदहाल बगल बच्चों को परमाणु ताकत की सीमा और व्यर्थता का बोध हो रहा है। रस्सी जल गई, पर बल नहीं गए। दोनों के पूरी तरह बदलने में अभी समय अवश्य लगेगा। अब चीन को भी ये सोचना चाहिए कि गुंडे पालने और दादागिरी करने से दुनिया उसे महाशक्ति नहीं मान लेगी। अगर उसे वास्तव में अंतरराष्ट्रीय ताकत बनना है तो उसे व्यापार और राजनय की दुनिया में ईमानदारी से आगे बढ़ना होगा। सम्मान कमाना पड़ता है, किसी को डरा कर आप इसे हासिल नहीं कर सकते।

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