“न्याय योजना“ से नहीं पार लगेगी राहुल की नैया in Punjab Kesari

राहुल गांधी द्वारा न्याय योजना (न्यूनतम आय योजना) की घोषणा के बाद कांग्रेसी पालतू मीडिया ओवरड्राइव पर है। वो चारों तरफ ऐसा हाइप बना रहे हैं जैसे अब तो कांग्रेस जीती ही जीती और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बने ही बने।

न्याय योजना के विषय में जनता के विचार जानने से पहले एक नजर डालते हैं अर्थशास्त्रियों की राय पर। जहां कांग्रेस के पालतू अर्थशास्त्री और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहते हैं कि इसे लागू करना संभव है और इसकी लागत देश के सकल घरेलू उत्पाद की करीब दो प्रतिशत होगी। वहीं नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया कहते हैं कि इस योजना में झोल ही झोल हैं। ये भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है, ये जनता को आलसी और अनुत्पादक बनने के रास्ते पर ले जाने वाली है। इसे लागू करने के लिए नियम बनाना और इसे निष्पक्ष तरीके से लागू करना लगभग असंभव है।

पनगढ़िया कहते हैं कि इस योजना के मुताबिक देश के पांच करोड़ परिवारों को हर माह छह हजार रूपए दिए जाएंगे और हर परिवार को प्रतिमाह 12,000 रूपए की आमदनी की गारंटी दी जाएगी। वो कहते हैं कि अगर एक परिवार 4,000 कमाता है और दूसरा 8,000 तो क्या सरकार पहले परिवार को 8,000 और दूसरे को 4,000 रूपए देगी? अगर सब परिवारों को 12,000 रूपए प्रतिमाह की आमदनी घर बैठे मिलेगी तो कोई काम ही क्यों करेगा? पनगढ़िया आगे कहते हैं कि ये योजना संबंधित परिवार को हर माह 6,000 रूपए देने की बात करती है, ऐसे में हर माह 6,000 से कम कमाने वाले को 12,000 रूपए प्रतिमाह कैसे दिए जाएंगे?

जाने-माने आर्थिक पत्रकार स्वामीनाथन एस अंकलेश्वर अय्यर इस योजना को ‘घातकरूप से दोषपूर्ण’ बताते हैं। वो कहते हैं भारत में आय आधारित सर्वेक्षण नहीं होते ऐसे में वास्तविक लाभार्थी तय करना लगभग असंभव है। जैसे कांग्रेस की ‘गरीबी हटाओ’ योजना असफल हो गई वैसे ही ये इस योजना का फुस्स होना निश्चित है। एक मोटे अनुमान के अनुसार इस पर करीब 3,60,000 करोड़ रूपए खर्च होंगे। इतनी महंगी योजना के नाकाम रहने से जो भ्रष्टाचार और नुकसान होगा, वो बेहद खतरनाक होगा।

जाहिर है योजना में किंत- परंतु बहुत हैं। पर एक बड़ा सवाल ये भी है कि राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए करदाताओं के खरबों रूपए क्यंू कर अनुत्पादक योजनाओं में बहाए जाएं? यहां सवाल ये भी उठता है कि आखिर एन चुनावों से पहले ही राहुल ने ये शिगुफा क्यों छेड़ा? इसका जवाब ये है कि कांग्रेस पहले भी ऐसे लोकलुभावन नारों के दम पर चुनाव जीतती रही है। कभी उसने ‘समाजवाद’ का नारा दिया तो कभी ‘गरीबी हटाओ’ का, कभी बैंकों के राष्ट्रीयकरण को चुनावी मुद्दा बनाया तो कभी किसानों की कर्ज माफी को।

अर्थशास्त्री अगर आंकड़ों के अनुसार बात करते हैं तो आम जनता अपने अनुभव के आधार पर। जनता से बात करो तो वो कहती है कि अन्य जुमलों की तरह ये भी राहुल गांधी का एक चुनावी जुमला है। वो चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके वादों से सरकार को कितना आर्थिक नुकसान होगा। उन्हें तो सिर्फ सŸाा से मतलब है। कुछ समय पूर्व हुए विधान सभा चुनावों में उन्होंने किसानों की कर्ज माफी का वादा कर दिया। लेकिन ये वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। कर्ज माफी के लिए राज्य सरकारों ने इतनी शर्तें लगा दी हैं कि 99 प्रतिशत किसान तो उन्हें पूरा ही नहीं कर पा रहे। विधानसभा चुनावों के बाद तो राहुल ने पूरे देश के किसानों के कर्ज माफ करने का ही एलान कर दिया था।

लोग कहते हैं कि कांग्रेस अगर गरीबी हटाने के बारे में वास्तव में इतनी गंभीर है तो उसने अपने 60 साल के प्रत्यक्ष-अप्रत्क्ष शासन में गरीबी क्यों नहीं हटा दी। गरीबों को दान देकर उनकी गरीबी नहीं हटाई जा सकती। आवश्यक है उन्हें सक्षम बनाना, न कि सरकारी दान पर आश्रित बनाना। लोग राहुल को यूपीए के दस साल का शासन याद दिलाते हैं जब देश ने सबसे बड़े घोटाले देखे जिनमें स्वयं वो और उनका समस्त परिवार भी आकंठ डूबा है।

अर्थशास्त्रियों और जनता की राय निःसंदेह महत्पवूर्ण है, लेकिन उतना ही मायने रखता है चुनावी गणित। अब तक जो हालात बन रहे हैं वो राहुल गांधी और कांग्रेस के पूरी तरह खिलाफ हैं। दिल्ली में बैठे पालतू कांग्रेसी पत्रकार भले ही कितनी हवाबाजी कर लें, लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस के पैरों तले जमीन खिसक चुकी है। हालात ये हैं कि राहुल को अमेठी में ही अपनी हार नजर आ रही है और वो अब केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ने की सोच रहे हैं। अमेठी में राजीव गांधी और सोनिया गांधी के प्रस्तावक रहे हाजी सुल्तान खान के बेटे हाजी हारून रशीद ने ही उनके खिलाफ बगावत कर दी है। रशीद कहते हैं कि राहुल ने अमेठी में लगातार मुसलमानों और उनके विकास की उपेक्षा की है। यहां 6.5 लाख मुसलमान हैं और अबकी बार सब राहुल के खिलाफ वोट देंगे। स्मृति ईरानी तो राहुल को हराने के लिए जी जान से कोशिश कर ही रहीं हैं।

आखिर राहुल को वायनाड सीट ही क्यों भा रही है? वहां ईसाई और मुस्लिम जनसंख्या बहुमत में है। राहुल को लगता है कि यदि अमेठी की जनता उन्हेें नकार देती है तो वायनाड के ईसाई और मुस्लिम उनकी इज्जत अवश्य बचा लेंगे। दसियों मंदिरों के लगातार दर्शन करने के बावजूद राहुल गांधी का हिंदुओं के प्रति ये अविश्वास बड़े सवाल खड़े करता है। ये कांग्रेस के सांप्रदायिक राजनीतिक दर्शन को भी रेखांकित करता है। यहां आपको बताते चलें कि वायनाड सीट पर राहुल इस्लामिक आतंकी संगठन पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) से भी समर्थन लेने के लिए तैयार हैं जिसे कई राज्यों में प्रतिबंधित किया जा चुका है। खुफिया एजेंसियों के अनुसार पीएफआई और कुछ नहीं, आतंकी संगठन सिमी का ही नया नाम है जिसे स्वयं यूपीए सरकार ने प्रतिबंधित किया था। वायनाड के चर्चों ने भी राहुल की ईसाई पृष्ठभूमि के कारण उन्हें पूरा समर्थन देने का एलान किया है।

पिछले पांच साल के दौरान राहुल ने दलितों, मुस्लिमों, ईसाईयों, जनजातियों का संयुक्त वोट बैंक बनाने की हरसू कोशिश की और इस चक्कर में देशद्रोही नक्सलियों और टुकड़े-टुकड़े गैंग तक को समर्थन दिया। लेकिन आज न तो मुस्लिम उनके साथ हैं और न ही दलित। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी गठबंधन मुस्लिम-दलित वोटों पर दावा ठोक रहा है तो बिहार में राष्ट्रीय जनता दल। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी खुद को मुसलमानों को खैरख्वाह मानती हैं और किसी भी कीमत पर कांग्रेस से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने तो 50 साल के राहुल को ‘बच्चा’ तक बता दिया है। यही हाल अन्य राज्यों में भी है। दलित वोटों के आस में राहुल ने बाबा साहब भीम राव अंबेदकर के पौत्र प्रकाश अंबेदकर से भी पींगें बढ़ाईं थीं, लेकिन वहां भी उनकी दाल नहीं गली। सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों में मनमुटाव हो गया। राहुल को उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश में बसपा-सपा के साथ गठबंधन हो जाएगा जिसका लाभ उन्हें दूसरे राज्यों में भी मिलेगा। बसपा के वोटर उन्हें वोट देंगे। लेकिन मायावती ने उनका पत्ता ही काट दिया। वो तो अब अमेठी और रायबरेली में भी अपना उम्मीदवार उतारने की धमकी दे रहीं हैं। जाहिर है चुनाव प्रक्रिया आरंभ होने से पहले विपक्षी एकता के बड़े-बड़े दावे हवा हो गए हैं। पहले जहां राहुल प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे थे, वहीं क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अब उन्हें उनकी औकात बता दी है। हार थक कर राहुल ने तुरूप के पŸो के तौर पर अपनी बहन प्रियंका वाड्रा को मैदान में उतारा है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका भी कोई असर नजर नहीं आ रहा। अब तक कांग्रेसियों को लगता था कि प्रियंका के आने से उनके सब दुख दूर हो जाएंगे, इस बार उनका ये मुगालता भी दूर हो जाएगा।

न्याय योजना के तौर पर राहुल ने अपना ब्रह्मास्त्र चल दिया है। लेकिन हालात बता रहे हैं कि इसका फुस्स होना तय है। आज चैबीसों घंटे चलने वाले चैनलों और डिजीटल मीडिया का जमाना है। पब्लिक नेताओं की एक-एक हरकत पर निगाह रखती है। वो सिर्फ जुमलों से संतुष्ट नहीं होती। उसे जमीनी स्तर पर विकास चाहिए। सड़कें, बेहतर शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार चाहिए। उसे एक ऐसा नेता चाहिए जो देश की छवि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चमका सके और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दे न कि उनके साथ अंडरहैंड डीलिंग करे। जाहिर है मोदी ने अपनी उपलब्धियों से चुनावों का रूपरंग बदल दिया है, लोगों की अपेक्षाएं बढ़ा दी हैं। राहुल के लिए उनका मुकाबला करना नामुमकिन है।

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