“आतंकियों और आईएसआई के साए में पाकिस्तानी आम चुनाव” in Punjab Kesari

पाकिस्तान में आम चुनावों की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। इस बार वहां की सर्वशक्तिमान सेना ने पूर्व क्रिकेट कप्तान इमरान खान नियाजी पर दांव खेला है और उसे प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाने के लिए हर संभव जोड़-तोड़ की है। चुनावों में पाकिस्तानी सेना के हस्तक्षेप की तस्दीक इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिदिकी ने भी की है जिन्होंने आरोप लगाया है कि बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई मनवांछित फैसले हासिल करने के लिए न्याय व्यवस्था पर दबाव बनाती है और वो नहीं चाहती की भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल भेजे गए पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को चुनावों से पहले जमानत मिले।

इमरान के साथ ही अबकी बार सारी दुनिया की नजर पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के उम्मीदवारों पर भी लगी है जो भारी तादाद में चुनाव लड़ रहे हैं। कहना न होगा कि सेना ने इन चुनावों का इस्तेमाल आतंकियों की मेनस्ट्रीमिंग या उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए किया है। लेकिन ‘मुख्यधारा में लाना’ जैसी शब्दावली इस खेल को समझाने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। असल में सेना ने आम चुनावों का इस्तेमाल आतंकियों को राजनीतिक वैधता और कानूनी मान्यता दिलवाने और दुनिया को चिढ़ाने के लिए किया है। इस हरकत से सेना ने दुनिया को जता दिया है – हां हमारे देश में आतंकी हैं, हमने उन्हें पैदा किया है, हम उनकी मदद लेते हैं और हम उन्हें दुनिया के कहने से छोड़ेंगे नहीं और अब हम उन्हें संसद में भी पहुंचाएंगे। जो करना है वो कर लो, हमारे ठेंगे से।

असल में सेना के इरादों की भनक तभी लग गई थी जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा नवाज शरीफ को पनामा पेपर लीक मामले में अयोग्य घोषित किए जाने के बाद उनकी लाहौर (एनए-120) सीट पर अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग का उम्मीदवार याकूब शेख निर्दलीय के तौर पर खड़ा किया गया। ये सीट शरीफ की पत्नी कुलसुम नवाज ने जीती। यहां दूसरे स्थान पर इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की उम्मीदवार यास्मीन राशिद रहीं तो तीसरे स्थान पर याकूब शेख रहा जिसे 5,822 वोट मिले।

पाकिस्तानी चुनाव आयोग की मानें तो इस बार चुनावों में आतंकी संगठन जमात-उद-दावा सहित धार्मिक संगठनों के 460 से ज्यादा उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं जो कि एक रिकाॅर्ड है। इन संगठनों में तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान और पांच इस्लामी पार्टियों का संगठन मजलिस-ए-अमाल (एमएमए) शामिल हैं। आतंकी सईद की पार्टी मिल्ली मुस्लिम लीग को चुनाव आयोग ने मान्यता नहीं दी है इसलिए उसके 265 उम्मीदवार अल्लाह-हू-अकबर तहरीक के परचम तले चुनाव लड़ रहे हैं। हाफिज का बेटा हाफिज ताल्हा सईद और दामाद खालिद वलीद भी उसके उम्मीदवारों की सूची में शामिल हैं। ध्यान रहे मुंबई हमलों का आरोपी हाफिज सईद संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित आतंकी है और अमेरिका ने उसके सर पर एक करोड़ों का इनाम रखा है।

बरेलवी विचारधारा की तहरीक-ए-लबैक या रसूल अल्लाह की राजनीतिक इकाई तहरीक-ए-लबैक पाकिस्तान ने 178 उम्मीवार खड़े किए हैं। ये कट्टरवादी पार्टी पिछले साल नवंबर में चर्चा में आई जब इसने खत्म-ए-नबूवत को लेकर इस्लामाबाद में धरना किया जो कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे के साथ समाप्त हुआ। धरना खत्म होने पर सेना के अफसरों ने इसके कार्यकर्ताओं में रूपए बांटे जिसकी काफी आलोचना भी हुई। सेना के लोगों ने जैसे इस तहरीक का धरना हटवाने की जगह इसके कार्यकर्ताओं को रूपए बांटे, उससे दोनों की सांठ-गांठ ही उजागर हुई।

एमएमए ने 192 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। इसमें शामिल पांच संगठन हैं – जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-एफ, जमात-ए-इस्लामी, जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान, इस्लामी तहरीक और मरकजी जमीयत अहले हदीथ। जमात-ए-इस्लामी का राजनीति इतिहास पुराना है। उसने 1970 के चुनावों में जुल्फीकार अली भुट्टो की पीपल्स पार्टी और शेख मुजीबुर रहमान की आवामी लीग के खिलाफ भी बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारे थे। वर्ष 2002 के चुनावों में एमएमए ने पूरे देश में बड़ी तादाद में उम्मीदवार लड़वाए थे, लेकिन इस बार इनकी प्रत्याशियों की संख्या सर्वाधिक है।

इस्लाम के नाम पर बने पाकिस्तान में कट्टरवादी धार्मिक पार्टियों का चुनाव लड़ना कोई अजूबा नहीं है। लेकिन इस बार सिर्फ धार्मिक पार्टियों का ही नहीं, आतंकी पार्टियों का चुनाव में बड़ी तादाद में उम्मीदवार उतारने का आखिर मकसद क्या है। जाहिर है इसके पीछे सर्वशक्तिशाली सेना का इरादा ये है कि या तो उसका पिट्ठू इमरान खान जीते या फिर किसी को भी बहुमत न मिले। ऐसी स्थिति में जाहिर है बडे़ दलों को आतंकी संगठनों के पास समर्थन के लिए आना पड़ेगा जो नेपथ्य में और कुछ नहीं बल्कि सेना की ही प्राॅक्सी हैं। यानी येन केन प्रकारेण नियंत्रण सेना का ही रहेगा।

शायद ये सेना का ही इशारा था कि 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। फजलुर को पार्टी में शामिल करवाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता की पीटीआई के वरिष्ठ उपाध्यक्ष असद उमर ने। असद मेजर जनरल गुलाम उमर का बेटा है जिस पर पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश में हजारों लोगों के कत्ल का आरोप है। वैस आगे बढ़ने से पहले ये भी बताते चलें कि इमरान खान जिनका पूरा नाम इमरान खान नियाजी है, उन्हीं जनरल अमीर अब्दुला खां नियाजी के कुनबे से हैं जिन्होंने ढाका में लेफ्टीनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के समक्ष 16 अगस्त 1971 में समर्पण किया था। ध्यान रहे फजलुर रहमान अमेरिका द्वारा घोषित वैश्विक आतंकवादी है जिसके सेना से ही नहीं, अल-कायदा से भी करीबी संबंध हैं। 1996 में जब ओसामा बिन लादेन ने विश्व जिहाद की घोषणा की थी तब उसके घोषणापत्र पर ओसामा के साथ खलील ने भी हस्ताक्षर किए थे। अमेरिका ने हरकत-उल-मुजाहीदीन पर 1997 में प्रतिबंध लगा दिया था और उसे वैश्विक आतंकी संगठन घोषित कर दिया था, लेकिन 2013 में ये अंसार-उल-उम्मा के रूप में फिर सामने आया। लेकिन अमेरिका ने 2014 में इसे एचयूएम का ही दूसरा नाम करार दिया। एचयूएम पर भारत और अफगानिस्तान के अलावा खुद पाकिस्तान में भी बड़े आतंकी हमले करवाने का आरोप है।

पाकिस्तानी चुनावों में जिस तरह अतिवादी और आतंकी जमातें बढ़-चढ़ कर भाग ले रही हैं, उससे दुनिया भर में ही नहीं, स्वयं पाकिस्तान में भी चिंता है। पाकिस्तानी मानवधिकार आयोग ने चुनावों में प्रतिबंधित तंजीमों के भाग लेने की कड़े शब्दों में निंदा की है। आयोग कहता है, “हम प्रतिबंधित तंजीमों के चोरी-छुपे दूसरी तंजीमों के नाम से चुनाव लड़ने और राज्य द्वारा उन्हें चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति दे कर राजनीतिक वैधता प्रदान किए जाने से शंकित हैं । इन तंजीमों ने लगातार धर्म का इस्तेमाल खतरनाक और विभाजनकारी अभियान के लिए किया है जो गंभीर चिंता का विषय है। हम चुनाव आयोग से प्रार्थना करते हैं कि वो इस बात की दोबारा जांच करे कि प्रतिबंधित संगठनों के उम्मीदवार चुनाव मैदान में कैसे आ गए।“ आयोग आगे कहता है, “पाकिस्तान के चुनावों की वैधता को लेकर गंभीर शंकाएं हैं, देश में प्रभावी लोकतंत्र की दिशा में बढ़ने की राह में इससे गंभीर बाधाएं पैदा होंगी। 25 जुलाई को होने वाले चुनाव देश के इतिहास के सबसे गंदे, मनवांछित परिणाम पाने के लिए सबसे ज्यादा बारीकी से मैनेज किए गए और सर्वाधिक भागीदारी वाले चुनाव होंगे।“

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने ही नहीं, अनेक राजनीतिक दलों ने भी चुनावों में प्रतिबंधित संगठनों के प्रतिनिधियों के भाग लेने पर चिंता जताई है। हालांकि पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) के अलावा लगभग सभी दलों के नेताओं ने इन तंजीमों की चैखट पर माथा टेका है। पीपीपी प्रमुख बिलावल भुट्टो ने तो आतंकवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है। इमरान खान ने भी अपने घोषणापत्र में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है, लेकिन जैसे उनकी पार्टी में आतंकवादी शामिल हुए हैं, उसके बाद तो उनसे कोई उम्मीद करना ही बेकार है। नवाज शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का ट्रैक रिकाॅर्ड सबसे बदतर है। वो पिछले पांच साल से सत्ता में थे, लेकिन उन्होंने इन तंजीमों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया, उल्टे सरकारी खजाने से उन्हें मदद ही दी।

पाकी सेना चुनावों के जरिए आतंकियों को राजनीतिक वैधता दिलवाने का जो खेल खेल रही है, पूरी दुनिया की नजर उसपर है। विश्व में टैरर फंडिंग और हवाला पर निगाह रखने वाली फाइनेंशियल एक्शन टास्ट फोर्स पहले ही उसे ग्रे लिस्ट में डाल चुकी है। टास्क फोर्स ने उसे आतंकियों पर लगाम लगाने के लिए 126 शर्तों की सूची सौंपी है। मौजूदा हालात में तो नहीं लगता कि नई सरकार, खासतौर से अगर वो इमरान खान की हुई, तो इन्हें पूरा कर पाएगी।

पाकी संसद में आतंकवादियों के आने का असर पहले से ही खराब चल रहे भारत-पाक रिश्तों पर भी पड़ेगा। भारत वैसे भी सीधे पाकी सेना से बात नहीं करता है, संसद में बैठे आतंकी आकाओं से तो क्या ही बात होगी। इमरान ने अपने घोषणापत्र में भारत के साथ रिश्ते सामान्य करने और ‘कम्पोजिट डायलाॅग’ शुरू करने की बात कही है। आतंकियों के साये में ‘कम्पोजिट डायलाॅग’ तो क्या ‘ट्रैक टू डायलाॅग’ भी मुश्किल से हो पाएगा। पाकिस्तान आर्थिक दीवालिएपन की कगार पर तो पहले ही पहुंच चुका है। ‘लाडले इमरान’ के साथ मिलकर सेना जो खेल खेल रही है और जैसे अन्य राजनीतिक दलों को धता बता रही है, उससे तो बड़े पैमाने पर राजनीतिक असंतोष फैलने और देश के एक बार फिर टूटने का खतरा पैदा हो गया है।

भारत को फिलहाल पाकिस्तान में किसी भी तरह से दखल नहीं देना चाहिए। अगर वहां की नई सरकार अपने हालात को संभालने की गरज से कोई प्रस्ताव रखती है, तो उसे अपनी शर्तों पर ही स्वीकार करना चाहिए।

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