“घनी के शांति प्रस्ताव और पाकिस्तान-तालीबान का दोगला रवैया” in Punjab Kesari

गत 28 फरवरी को अफगानिस्तान में दूसरी काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस में राष्ट्रपति अशरफ घनी ने अपनी ओर से शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस 23 देशों, यूरोपियन यूनियन, संयुक्त राष्ट्र और नैटो का एक समूह है जो अफगानिस्तान में सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करता है।

काॅफ्रेंस के पहले दिन ही बड़ी घोषणा करते हुए घनी ने कहा कि वो तालीबान को वैध राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने तालीबानी आतंकियों को कहा कि वो हिंसा छोड़ें और शांति स्वीकार करने के लिए सामने आएं ताकि देश को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि युद्धविराम और शांति प्रक्रिया पर सहमति बननी चाहिए। उन्होंने तालीबान को खुश करने के लिए अनेक प्रस्ताव भी किए। इनमें शांति प्रक्रिया में भाग लेने वाले तालीबानियों को सुरक्षा देना, बंदियों को छोडना, तालीबानी नेताओं के खिलाफ प्रतिबंध हटाना, तालीबान सदस्यों और उनके परिवारों को पासपोर्ट और वीसा देना, उनके लिए काबुल में कार्यालय खोलना आदि शामिल हैं।

राष्ट्रपति घनी ने कहा कि उनका देश शांति को खतरे में डालने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए कृतसंकल्प है और दीर्घकालीन शांति के लिए वो हर तरह के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो शांति कायम करने के लिए बातचीत करे और ये बातचीत काबुल में हो सकती है। उन्होंने कहा कि वो अतीत को भुला कर नए सिरे से बातचीत के लिए तैयार हैं।

पाकिस्तान ने घनी का तालीबान से बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा कि वो शांति प्रक्रिया को संभव बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगा। असल में पाकिस्तान दिखावटी तौर पर ही सही, लंबे अर्से से बातचीत के लिए जोर डालता रहा है। घनी के प्रस्ताव के चंद घंटों के भीतर ही पाकिस्तान में अफगान राजदूत डाॅक्टर ओमर जखीवल ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नासेर खान जंजुआ से बात की। जखीवाल ने जंजुआ को काबुल में हुए शांति सम्मेलन और राष्ट्रपति घनी के प्रस्तावों के बारे में बताया।

जंजुआ ने कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान में खून खराबे का जल्द अंत चाहता है। उन्होंने कहा “पाकिस्तान में शांति के लिए अफगानिस्तान में शांति अनिवार्य है, पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोगों के साथ सर्वनिष्ठ और सहभागी भविष्य के विचार में विश्वास रखता है, इसलिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शांति पहलों के तहत राजनीतिक सुलह-सफाई के प्रयासों का हमेशा स्वागत किया है। पाकिस्तान, राष्ट्रपति घनी के वार्ता और आपसी समझदारी के जरिए शांति लाने के प्रयास का स्वागत करता है और इसे सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा।”

अब सवाल ये उठता है कि काबुल पीस प्रोसेस के तहत जैसे घनी ने शांति प्रस्ताव किया और चंद ही घंटों के भीतर जैसे उसे पाकिस्तान ने स्वीकार भी कर लिया, ये आखिर हुआ कैसे और इसके क्या निहितार्थ हैं? क्या पाकिस्तान वास्तव में उतना ईमानदार है जितना वो दिखा रहा है? और इस प्रस्ताव पर तालीबान का रूख क्या है और क्यों है? इसे कई तरह से समझा जा सकता है।

पहले देखते हैं कि पाकिस्तानी समीक्षक इसके बारे में क्या कहते हैं। वो इसके लिए अपने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को श्रेय देते हैं। उनके अनुसार इसके लिए जमीन जनरल बाजवा की पिछले साल अक्तूबर में हुई काबुल यात्रा के दौरान तैयार की गई। इस यात्रा के कुछ समय के भीतर ही पाकिस्तान ने खामोशी से अफगान तालीबान और हक्कानी नेटवर्क के 27 आतंकियों को काबुल को सौंप दिया। समझा जाता है कि पाकिस्तान ने ये अभूतपूर्व कदम ये जताने के लिए उठाया कि इस्लामाबाद किस हद तक अफगानिस्तान के साथ सहयोग करना चाहता है। जनरल बाजवा की यात्रा के बाद दोनों देश लगातार संपर्क में रहे और पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लगातार ये आग्रह करता रहा कि वो तालीबान से बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार हो। पाकिस्तान, अमेरिका और अफगानिस्तान को बार-बार ये कहता रहा है कि अफगानिस्तान में लंबे अर्से से चले आ रहे संघर्ष का हल सिर्फ संवाद से ही हो सकता है और इसके लिए अफगानिस्तान को तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कुछ प्रोत्साहन देने होंगे।पाकिस्तानी समीक्षकों के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान, तालीबान पर भी वार्ता का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए दबाव डालता रहा है।

दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी उप सहायक सचिव एलिस वेल्स ने कुछ समय पूर्व कहा था कि अमेरिका ने तालीबान के लिए भी बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं। इस पर तालीबान ने बातचीत के लिए सहमति तो दिखाई लेकिन शर्तें ऐसी रखीं जिन्हें मानना अमेरिका के लिए नामुमकिन है। तालीबान ने अमेरिका को एक पत्र में कहा कि “अफगान मसला हल करने में सहायता मिल सकती है अगर अमेरिका अफगानिस्तान पर अपना कब्जा छोड़े और लोगों की वैध मांगों को स्वीकार करे जिसमें सरकार बनाने का तालीबान का हक भी शामिल है और चर्चा के बारे में अपनी चिंताएं और अनुरोध इस्लामिक अमीरात (तालीबान सरकार) को एक शांतिपूर्ण माध्यम से पहुंचाए।” तालीबान ने अमेरिका को अपने खत में हिंसा का रास्ता छोड़ने और इस समस्या को बातचीत से सुलझाने की सलाह भी दी। तालीबान ने अमेरिका से बातचीत के लिए सहमति जताई क्योंकि वो अफगान सरकार को वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता। वो खुद को अफगानिस्तान की जायज सरकार मानता है जिसे अमेरिका ने गिराया था।

तालीबान के पत्र पर एलिस वेल्स ने कहा है कि अब ये दिखाने की जिम्मेदारी तालीबान पर है कि वो बातचीत के लिए तैयार हैं। ये बातचीत मुझसे या अमेरिका से नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के लोगों की वैध और संप्रभु सरकार से होनी चाहिए।

बहरहाल पाकिस्तानी मानते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत उम्मीद लगाना उचित नहीं होगा। पाकिस्तान ने पहले भी अफगान तालीबान और काबुल में वार्ता शुरू करवाई थी, लेकिन इसके नेता मुल्ला उमर और फिर उसके उत्तराधिकारी की ड्रोन हमले में हत्या के बाद वो ठप हो गई। पाकिस्तान इसके लिए अफगान सरकार में कुछ तत्वों को जिम्मेदार ठहराता है।

अब इस मसले को अफगानिस्तान के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं। अफगानिस्तान में शांति और अखंडता के लिए काम करने वाली अफगान हाई पीस काउंसिल के मुताबिक तालीबान ने अब तक ये प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। ज्ञात हो कि अपने मकसद में सफलता हासिल करने के लिए ये तालीबान से भी संपर्क रखती है। इसका गठन सितंबर 2010 में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने किया था।

काउंसिल के मीडिया विभाग के प्रमुख सय्यद एहसानुद्दीन ताहेरी कहते हैं कि ये तालीबान के लिए स्वर्णिम अवसर है। उन्हें अमेरिका को बातचीत के लिए पत्र लिखने की जगह अफगान सरकार से बात करनी चाहिए। अब गंेद उनके पाले में है, देखना होगा कि वो शरिया के खिलाफ कत्लोगारत जारी रखते हैं और अपनी मर्जी चलाते हैं या लोगों की आवाज सुनते हैं। ध्यान रहे कि अगर अफगान सरकार तालीबान को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं तो उनसे भी ये अपेक्षा की जाती है कि उन्हें भी अफगान सरकार को मान्यता देनी होगी और कानून के शासन का सम्मान करना होगा जिसमें महिलाओं के अधिकारों का सम्मान भी शामिल है जिसे अफगानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी बहुत महत्व देते हैं।

जनवरी में हाई पीस काउंसिल के सदस्यों ने अफगान सरकार और तालीबान के बीच अनौपचारिक बातचीत का आयोजन किया था। इसके बाद काउंसिल ने आरोप लगाया था कि कुछ देश (पाकिस्तान) अफगानिस्तान में शांति कायम करने में रोड़े अटका रहे हैं क्योंकि वो वहां शांति के पक्षधर नहीं हैं। काउंसिल के प्रमुख मौहम्मद करीम खलीली ने हालांकि कहा कि तालीबान के साथ अनौपचारिक बातचीत जारी है और तालीबान को बातचीत की मेज तक लाने के तौर-तरीके तलाशे जा रहे हैं। उन्होंने देश के 26 प्रांतों में 280 बैठकें की हैं और उन्हें उम्मीद है कि इनके कारण तालीबान को औपचारिक बातचीत के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी। जाहिर है पीस काउंसिल के प्रयासों से घनी के शांति प्रयासों को भी बल मिला होगा।

अब देखते हैं कि इसके विषय में अमेरिका क्या सोचता है। अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए घनी के प्रस्ताव का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही कहा है कि वो आतंकवादियों पर तब तक दबाव जारी रखेगा जब तक वो हार नहीं मान लेते। अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत जाॅन आर बास ने कहा कि हम एक बार फिर तालीबान का आहवान करते हैं कि वो बिना शर्त अफगान सरकार से वार्ता शुरू करे। वो कहते हैं ”तालीबान युद्ध के मैदान में ही नहीं, मादक पदार्थों से आमदनी और आय के स्रोतों पर भी काफी दबाव महसूस कर रहे हैं, क्षेत्रीय देशों सहित इतने सारे देशों की अपील के बाद उनपर दबाव और बढ़ गया है, जब तक हमें फर्क नजर नहीं आता, हम अफगान बलों की सहायता जारी रखेंगे।“ अमेरिकी सेना ने नवंबर से ही तालीबानी ठिकानों, उनके प्रशिक्षण शिविरों, हेरोइन बनाने वाली प्रयोगशालाओं पर हमले बढ़ा दिए हैं। उधर पेंटागन प्रवक्ता दाना वाइट ने कहा है कि तालीबान को आतंक छोड़ना होगा और उसे अफगान संविधान का सम्मान करना ही होगा और फिर उन्हें वार्ता की मेज पर आना होगा।

आखिर में पूर्व अमेरिकी राजनयिक और अफगान मामलों के जानकार बरनेट रूबिन की राय। वो कहते हैं कि “अफगान सरकार का प्रस्ताव अच्छा है और तालीबान बातचीत के लिए तैयार भी होता दिख रहा है, लेकिन वो सीधे अमेरिका से बात करना चाहता है क्योंकि उसकी सरकार अमेरिका ने ही गिराई थी। इस्लामाबाद प्रत्यक्ष रूप से भले ही ताजा शांति प्रस्ताव का स्वागत करे पर बहुत कम संभावना है कि वो इसके लिए तालीबान पर दबाव नहीं डालेगा क्योंकि वो उसकी दोस्ती को नहीं खोना चाहता। मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कोई ठोस प्रयास करेगा। ये सोचना गलत होगा कि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के तहत इस विषय में कोई ठोस पहल करेगा। हकीकत ये है कि पाकिस्तान पर अमेरिका से ज्यादा प्रभाव चीन का है।”

जाहिर है अफगानिस्तान में शांति की राह में काफी पेंच हैं। खून खराबे के बावजूद अफगान सरकार शांति के लिए भी प्रयास करना चाहती है, वहीं अमेरिका की नीति है तालीबान और उसके आका पाकिस्तान को उनके घुटनों पर लाना। उधर पाकिस्तान तालीबान के साथ मिलकर दोहरा खेल खेल रहा है। जाहिर तौर पर तो वो शांति प्रस्ताव स्वीकार करता है पर तालीबान के जरिए उसपर शर्तें लगवाता है। वो अप्रत्क्ष रूप से अमेरिका को बाध्य करना चाहता है कि वो तालीबान को असली अफगान सरकार के रूप में स्वीकार करे। यही तालीबान का प्रस्ताव भी है।

असल में अफगानिस्तान में शांति तभी आ सकती है जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान को अपना बगल बच्चा बनाने की नीति छोड़े। इस नीति में तालीबान उसका महत्वपूर्ण हथियार है, इसीलिए वो उसे संरक्षण, प्रशिक्षण और हथियार भी देता है। तालीबान के खात्मे का मतलब है, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव का खात्मा। यही वजह है कि जाहिर तौर पर काबुल प्रोसेस के प्रस्तावों का समर्थन करने के बावजूद वो इन्हें अमली जामा पहनाने के लिए गंभीर प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। तालीबान ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। अपने एक ट्वीट में इसके प्रवक्ता ने कहा है कि घनी का प्रस्ताव “सामूहिक समर्पण का षडयंत्र है।”

घनी ने तालीबान की व्यापक हिंसा के बावजूद उदारता दिखाई, लेकिन पाकिस्तान और तालीबान ने इसमें सेंध लगा दी है। लगता है जैसे मामला जहां से चला था वहीं पहुंच गया है। लेकिन ऐसा नहीं है, कई सतहों पर बातचीत जारी है। वैसे भी अब हालात बदल गए हैं। अब अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकना पहले जितना आसान नहीं है। घनी के प्रस्ताव में पलीता लगा कर पाकिस्तान और तालीबान अपना ही अहित करेंगे। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे सूची में शामिल करवा चुका है, अगर ऐसी ही चला तो उसे ब्लैक लिस्ट में भी शामिल किया जा सकता है। ताजा खबरों के मुताबिक अब यूरोपियन यूनियन भी पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है।

दीवालिया होने की कगार पर खड़ा पाकिस्तान भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी, कर्ज और आतंकवाद से जूझ रहा है। वो विनाश के रास्ते पर और आगे बढ़ेगा या संभलेगा…उसे अफगानिस्तान का सपना प्यारा है या देश की जनता का कल्याण? ये पाकी सेना को तय करना है।

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