“पाकिस्तानी सेना के जुल्मों की दास्तान बयान करता है पश्तून तहाफुज मूवमेंट” in Punjab Kesari

पाकिस्तान आजकल एक सियासी तूफान का सामना कर रहा है जिसका नाम है – पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) यानी पश्तून सुरक्षा आंदोलन। इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं दक्षिण वजीरिस्तान के 26 साल के जोशीले नेता मंजूर पश्तीन। पश्तून मानवाधिकारों की बात करने वाला ये आंदोलन असल में शुरू हुआ 2014 में ‘महसूद तहाफुज मूवमेंट’ के नाम से। महसूद एक पश्तून कबीले का नाम है और मंजूर भी इसी से जुड़े हैं। इस आंदोलन का आधार है फेडरली एडमिनिस्टरड ट्राइबल एरिया (फाटा) और खैबर पख्तूनख्वा।

मंजूर पश्तीन ने ये आंदोलन क्यों शुरू किया इसकी वजह समझना भी जरूरी है। मंजूर गरीब परिवार से संबंध रखते हैं और उनके पिता अब्दुल वद्दूद महसूद उनके पैतृक गांव सरवाकाई में अध्यापक हैं। वर्ष 2009 में तालीबानी आतंकियों के खिलाफ सेना के आॅपरेशन राह-ए-निजात के कारण हजारों अन्य पश्तून परिवारों की तरह उनके परिवार को भी घर छोड़ कर शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के अनुसार इस वर्ष पश्तून बेल्ट के करीब चार लाख लोगों को घर छोड़ना पड़ा, लेकिन सहायता संस्थाओं की मानें तो असल संख्या कई गुना ज्यादा थी। मंजूर के परिवार को इस उथल-पुथल में चार बार घर बदलना पड़ा। जब ये लोग घर लौटे तो सब लुट चुका था, सब ओर तबाही का मंजर था, कदम कदम पर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और सेना का कड़ा पहरा था।

इस बीच उन्होंने पशुचिकित्सा में स्नातक की डिग्री भी ली। शिक्षा के बाद उन्होंने समाजसेवा के बारे में सोचा और महसूद तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) की शुरूआत की। चारों और फैली बारूदी सुरंगों के बीच जाहिर है उन्होंने जो पहला काम चुना वो था बारूदी सुरंगें हटाना।

वर्ष 2018 के आरंभ में ये आंदोलन एक नई शक्ल में उभरा जब इसने पश्तून माॅडल नकीबुल्ला मेहसूद की न्यायेतर हत्या के विरोध को अपना लक्ष्य बनाया। मेहसूद को कराची में एक फर्जी एनकाउंटर में मार गिराया गया था। मेहसूद की हत्या के विरोध में 26 जनवरी को एक मार्च का आगाज डेरा इस्माइल खां से हुआ और ये पश्तून बहुल पेशावर, मरदान, स्वाबी होता हुआ इस्लामाबाद में धरने के रूप में समाप्त हुआ। शुरू में तो इसने सिर्फ मेहसूद की हत्या का मामला उठाया, लेकिन जल्दी ही उन हजारों पश्तून परिवारों ने भी इसमें अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी जिनके घर के सदस्य सेना के अभियानों में या तो मारे गए थे या गायब हो गए थे। एक अनुमान के अनुसार 8,000 से भी ज्यादा लोग सैन्य अभियानों के दौरान बिना किसी कानूनी कार्रवाई के उठाए गए। जल्दी ही पाक सेना से त्रस्त बलूच लोगों ने भी पीटीएम में शिरकत शुरू कर दी। बहरहाल पीटीएम के इस्लामाबाद धरने को आॅल पश्तून नेशनल जिरगा का नाम दिया गया। जिरगा में मेहसूद की हत्या और पश्तूनों पर होने वाले अत्याचारों की भत्र्सना की गई। जिरगा का अर्थ है प्रतिनिधियों की बैठक।

जिरगा में मांग की गई कि सरकार नकीबुल्ला और पुलिस एनकाउंटर में मारे गए अन्य पश्तूनों की हत्या की न्यायिक जांच करवाए, नस्लीय भेदभाव और दुराग्रह वाले कानून समाप्त हों, गुमशुदा पश्तूनों को अदालतों में पेश किया जाए ताकि निर्दाेष लोगों को पहचान कर रिहा किया जा सके। जिरगा ने सेना से ये गारंटी देने की मांग की कि वो कबाइली इलाकों में खोजी अभियान के दौरान और चेकपोस्टों पर लोगों को परेशान नहीं करेगी, उनका अपहरण नहीं करेगी और गोली नहीं चलाएगी और न ही हिंसा करेगी। यही नहीं वो पूरे के पूरे गांव/ कबीले को सामूहिक सजा भी नहीं देगी और छोटी-मोटी घटनाओं के बावजूद कफ्र्यू नहीं लगाएगी। कबाइली इलाकों से बारूदी सुरंगें हटाने की मांग भी की गई जिनकी वजह से अनेक निर्दोष लोग जान से हाथ धो चुके हैं। कुल मिलाकर मांग ये थी कि लोगोें के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल किए जाएं और उन्हें शांति से जीने दिया जाए।

इस्लामाबाद का धरना 10 फरवरी को तब समाप्त हुआ जब प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार इंजीनियर आमिर मुकाम ने उन्हंे प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की तरफ से एक पत्र सौंपा जिसमें कहा गया था कि सरकार नकीबुल्ला की हत्या करने वाले पुलिस अधिकारी राव अनवार को पकड़ेगी, दक्षिण वजीरिस्तान से बारूदी सुरंगें हटाने का काम तेज किया जाएगा, नकीबुल्ला मेहसूद के नाम से इंटरमीडिएट काॅलेज बनाया जाएगा और जिरगा सदस्यों द्वारा उठाई गई वास्तविक समस्याओं को हल किया जाएगा। मुकाम ने उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तारीफ की और कहा कि वो जब चाहें अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए उनसे मिल सकते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ ही पीटीएम नेता सेना के अधिकारियों से भी मिले और उन्हें भी अपनी समस्याओं से अवगत करवाया।

सरकार ने जिरगा से वादे तो बहुत किए लेकिन निभाया एक भी नहीं। प्रदर्शनकारियों ने भी मुकाम को कह दिया था कि यदि सरकार वादे निभाने में असफल रहेगी तो वो प्रदर्शन जारी रखेंगे। इसके बाद पीटीएम ने कई मार्च निकाले और फिर 22 मार्च को लाहौर और आठ अप्रैल को पेशावर में बड़े प्रदर्शन किए। 22 अप्रैल को पीटीएम ने लाहौर में एक बार फिर रैली की। पीटीएम 12 मई को कराची में एक विशाल रैली की योजना बना रहा है। इसमें अल्ताफ हुसैन के मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के लोग भी शामिल हो सकते हैं। यानी सेना के सताए बलूच ही नहीं, कराची के मुहाजिर भी इसके साथ आ रहे हैं।

पश्तूनों के इस आंदोलन को पाकिस्तान के वाम दलों सहित अनेक राजनीतिक दल समर्थन दे रहे हैं। लेकिन सेना इसकी बढ़ती लोकप्रियता से खौफजदा है और उसने मीडिया में इसकी कवरेज पर रोक लगा दी है। अब इनपर आरोप लगाया जा रहा है कि भारतीय खुफिया एजेंसी राॅ और अन्य बाहरी ताकते इन्हें पैसा दे रही हैं जो सरासर गलत है। इनके साथ लाखों लोग हैं, आखिर कोई तो वजह होगी जिसके कारण ये लोग इनसे जुड़े हैं।

कहना न होगा, ये वजह है फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में सेना के दमनकारी अभियान। पहले तो सेना ने अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए इस इलाके में बड़ी संख्या में लोगों को इस्लाम के नाम पर रेडिकलाइज किया और उन्हें हथियार थमा दिए। सोवियत रूस तो चला गया और अफगानिस्तान में तालीबान की सरकार भी बन गई, लेकिन 9/11 के बाद हालात बदले और पाकिस्तानी सेना प्रमुख से राष्ट्रपति बने परवेज मुशरर्फ ने आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष का साथ देने का फैसला किया। जाहिर है, पहले जो लोग पाकिस्तान के दोस्त थे, उनमें से अनेक दुश्मन बन गए। हाल ही में पाकिस्तानी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो के प्रमुख और पूर्व न्यायाधीश जावेद इकबाल ने नेशनल असंेबली की मानवाधिकारों की स्थायी समिति के सामने सनसनीखेज खुलासे किए। उन्होंने परवेज मुशरर्फ पर आरोप लगाया कि उन्होंने कम से कम चार हजार पाकिस्तानी नागरिकों को गुप्त आदान-प्रदान के तहत करोड़ों डाॅलरों की एवज में अमेरिका को बेचा। जावेद इकबाल का बयान ऐसे समय आया है जब पीटीएम गुमशुदा पश्तून लोगों को अदालत में हाजिर करने की मांग जोर-शोर से कर रहा है। ये कहीं न कहीं उनकी आशंकाओं को बल भी देता है।

वर्ष 2007 में एक बड़ा बदलाव तब हुआ जब परवेज मुशरर्फ ने लाल मस्जिद पर हमला किया। इससे नाराज कट्टरवादियों ने तहरीके तालीबान पाकिस्तान (टीटीपी) का गठन किया। इन्होंने पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ युद्ध का एलान किया और सेना का जीना दुश्वार कर दिया।

पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल के हादसे के बाद लोगों को लगा कि अब काफी हो गया और इन्हें खत्म करना ही होगा। पाकिस्तानी सेना ने इसके लिए बड़ा अभियान चलाया। वहां की नेशनल काउंटर टेरररिज्म आॅथोरिटी की 40 पन्ने की रिपोर्ट के मुताबिक टीटीपी के सफाए के दौरान 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया। दो लाख से ज्यादा काॅंबिंग आॅपरेशन हुए, चार लाख से ज्यादा लोगों को रोक कर उनकी तफ्तीश की गई। 6,998 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया। 2,500 आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया गया। 19,530 लोगों को विभिन्न आधारों पर गिरफ्तार किया जैसे भड़काऊ भाषण या सामग्री बांटना, जनता को बगावत के लिए उकसाना आदि। 18,790 मामले लाउड स्पीकर के गलत इस्तेमाल के दर्ज किए गए। 1.5 अरब रूपए टेरर फंडिंग के रोके गए। 5,089 बैंक खाते फ्रीज किए गए। 65 संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डाला गया। इनमें से चार संस्थाएं अब भी निगरानी में हैं। 2,052 लोगों पर पाबंदी लगाई गई और उनकी विदेश यात्रा पर रोक लगा दी गई। आतंक फैलाने के आरोप में 1,447 यूआरएल ब्लाॅक किए गए।

दर्ज मामलों की संख्या के लिहाज से पंजाब सबसे आगे है जहां 68,957 लोगों का नाम संभावित आतंकियों के रूप में डिजिटल डेटाबेस मे शामिल किया गया। जिन 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया है, उनमें से 400 पंजाब के हैं। लेकिन सनद रहे सबसे ज्यादा दमनकारी सैन्य अभियान फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में चलाए गए।

जैसे-जैसे देश में आतंकवाद बढ़ा, उसका सामना करने के लिए समाज का सैन्यीकरण भी किया गया। हर जगह कंटीले तार लगाए गए, कदम-कदम पर चेकपोस्ट बनाए गए, सशस्त्र सैनिकोें, पुलिसवालों की तैनाती की गई। इससे आतंकवाद कम भी हुआ। 2010 में जहां 2,060 आतंकी हमले हुए, वहीं 2017 में 681 हमले हुए। आतंकी हमलों में कमी आई, लेकिन सैन्यीकरण वैसे का वैसा ही रहा। अब भी उतनी ही तलाशियां, तफ्तीशें और गिरफ्तारियां हो रहीं हैं, उतने ही छापे पड़ रहे हैं। लेकिन लोग इससे ऊब चुके हैं। वो अब चाह रहे हैं कि हालात सामान्य हों। अब और सैन्यीकरण की गुंजाइश नहीं है। संविधान में दिए गए हक उन्हें फिर मिलें। वो चाहते हैं कि आतंकवाद में जो कमी आई है, उसका फायदा उन्हें भी मिले, उन्हें सिर्फ कुर्बानी ही क्यों देनी पड़े? राहत भी मिले।

स्पष्ट है पीटीएम सेना द्वारा सताए गए लोगों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। तभी इनकी रैलियों में सेना के खिलाफ नारे भी लगाए जाते हैं। लोग कहते हैं – ये जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है। इन्हें राहत मिलनी ही चाहिए। आतंकी घटनाएं अगर कम हुईं हैं तो चेकपोस्ट भी कम होने ही चाहिए। बारूदी सुरंगें भी हटाई जानी चाहिए। आतंकवादियों से निपटने के लिए जो सैन्य अदालतें या आतंकविरोधी अदालतें बनाई गईं हैं, उन्हें भी खत्म होना ही चाहिए। बाकी बचे मामलों को सामान्य अदालतों में निपटाया जाना चाहिए।

पीटीएम में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके परिवार वालों को महज शक की बिना पर पकड़ा गया। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जिन्हें पुलिसवालों ने व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण आतंकविरोधी मामलों में फंसा दिया। इसी प्रकार अनेक मामले पारिवारिक झगड़ों, संपत्ति या ट्रेड यूनियनों के थे, लेकिन उन्हें भी आतंकविरोधी कानूनों के दायरे में डाल दिया गया। स्पष्ट है आतंकविरोधी कानून लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर डाका डाल रहें हैं, इन्हें समाप्त होना ही चाहिए।

लेकिन फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तानी सेना पश्तूनोें की मांग को लेकर गंभीर है। उसका दमनकारी रवैया अब भी जारी है। इसके पीछे कारण ये है कि उसके दिल में खोट है। उसे पता है कि पश्तूनों के दिलों में जो घाव हैं, वो उसी ने दिए हैं। अब सेना के पास मौका है कि वो पुराना ढर्रा छोड़, आंदोलन को कुचलने की जगह सहानुभूतिपूर्वक लोगों के आक्रोश का कारण समझने की कोशिश करे और देश में बढ़ते अलगाववाद पर लगाम लगाए। उधर पश्तूनों की गहरी नाराजगी के बावजूद मंजूर पश्तूनी कहते हैं कि उनका कोई अलगाववादी लक्ष्य नहीं है। उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है और अहिंसक ही रहेगा। वो चाहते हैं कि फाटा और पख्तूनख्वा को पंजाब जैसे ही लोकतांतित्रक अधिकार और सम्मान मिले और वहां के लोग भी संगीनों के साए से परे सामान्य जीवन जी सकें।

पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार लोगों के दिल पर मलहम लगा सकती थी, लेकिन उसके सामने भी सीमाएं हैं। एक तो वो सेना का विरोध नहीं कर सकती, दूसरे उसका कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है। ऐसे में ये आंदोलन क्या शक्ल अख्तियार करेगा, अभी कहना मुश्किल है। पर एक बात तो तय है कि इसने सेना के जुल्मो सितम के खिलाफ लोगों के दिलों में जो चिंगारी फूंकी है, उसे अब बुझाना मुश्किल होगा।

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