“राफेलः झूठी है कांग्रेस” in Punjab Kesari

राफेल लड़ाकू जेट विमानों को लेकर कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल कांग्रेस लगातार जैसे झूठ पर झूठ बोल रही है, वो शर्मनाक है। उससे भी ज्यादा लज्जाजनक तो उन बिकाऊ पत्रकारों का गिरोह है जो सच्चाई जानते हुए भी सिर्फ अपने निहित स्वार्थों के कारण इस सीआईसी पार्टी के दुष्प्रचार का हिस्सा बन रहे हैं। हम इन्हें बिकाऊ कह रहे हैं क्योंकि जब भी ये कांग्रेस के संवाददाता सम्मेलन में जाते हैं या राहुल गांधी से टकराते हैं तो उनसे ऐसे सवाल पूछने की हिम्मत ही नहीं करते जिनसे राहुल गांधी या उनकी पार्टी अपने ही बुने जाल में फंस सकते हैं।

जब राहुल के पिता राजीव गांधी के बोफोर्स घोटाले का मामला उनके ही एक मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उजागर किया था तो एक नारा उछला था – गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है। आजकल राहुल ये नारा राफेल के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। हालांकि दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। बोफोर्स में राहुल के मामा माने जाने वाले इटली के ओतावियो क्वात्रोकी मुख्य दलाल थे जिनके फ्रीज खातों को मनमोहन सरकार के जमाने में संभवतः सोनिया गांधी के इशारे पर डीफ्रीज करवाया गया था। इस मामले में और भी बहुत से सबूत हैं और ये अब भी अदालत में है। अगर सोनिया गांधी के इशारे पर इसे दबाया नहीं गया होता तो अब तक ये हल हो चुका होता।

इसके विपरीत राफेल दो सरकारों यानी भारत और फ्रांस के बीच का समझौता है जिसे इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट (आईजीए) कहा जाता है। ऐसे समझौतों में बिचैलिए नहीं होते जैसे बोफोर्स की खरीद में थे। कांग्रेस सफेद झूठ क्यों बोल रही है, आखिर इसका मकसद क्या है? इस पर विचार करने से पहले आइए जान लेते हैं कि राफेल सौदे की सच्चाई क्या है। इसे समझने के लिए हम किसी नेता या सैन्य विश्लेषक की राय पर यकीन करने की जगह डिप्टी चीफ एयरमार्शल रघुनाथ नांबियार के एक साक्षात्कार के कुछ अंश लेना चाहेगे जो उन्होंने रिपब्लिक टीवी को दिया था।

आगे बढ़ने से पहले आपको बता दें कि नांबियार खुद फुली लोडेड (हथियारों से सुसज्जित) राफेल विमान उड़ा चुके हैं। वो कहते हैं, “ऐसे आधुनिक विमान को उड़ाना बहुत बढ़िया अनुभव था। इसमें वो सभी उपकरण लगे थे जिन्हें भारतीय वायुसेना किसी भी आधुनिक विमान के लिए आवश्यक मानती है। ये उन राफेल विमानों सेे अलग है जो फ्रांस की सेना के पास हैं। मुझे ये विमान उड़ाने का अवसर मिला और ये समझने का अवसर मिला कि इस नए विमान की क्या क्षमताएं हैं, इसमें जो सुधार किए गए हैं उनकी क्या संभावनाएं हैं और इसमें किस सीमा तक सुधार किए गए हैं।“

वो बताते हैं, “इसमें भारत की आवश्यकताओं के हिसाब से 13 संशोधन किए गए हैं। भारतीय वायुसेना ने इन संशोधनों की मांग 2007 की रिक्वेस्ट फाॅर प्रपोसल (आरएफपी) में ही की थी। इनके आधार पर ही राफेल ने प्रस्ताव दिया…जब हमने 2016 में राफेल के लिए समझौता किया तब उसमें भी ये शामिल थे। यानी इनमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया। लेकिन नए विमानों में कुछ अतिरिक्त हथियार भी लगाए गए हैं, जो इन्हें अधिक प्रभावी बनाते हैं।“

नांबियार आगे बताते हैं, “भारतीय वायुसेना ने मीडियम मल्टीरोल काम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के लिए प्रस्ताव 2000 में किया था। 2007 में आरएफपी जारी की गई, 2012 में दासो एविएशन (राफेल बनाने वाली फ्रैंच कंपनी) को शाॅर्टलिस्ट किया गया। लेकिन सौदा नहीं हो सका। एनडीए सरकार ने इमरजैंसी क्लाॅस के तहत 36 फुली लोडेड विमान खरीदने का फैसला किया जिसमे वेपन पैकेज और परफाॅरमेंस बेस्ड लाॅजिस्टिक्स शामिल हैं। लंबे अर्से में ये पहली बार थी जब वायुसेना ने स्वयं काॅस्ट नेगोशिएशन कमेटी का नेतृत्व किया, न कि रक्षा मंत्रालय के नौकरशाहों ने। राफेल के मामले में तत्कालीन दो डिप्टी चीफ आॅफ एयर स्टाफ कमर्शियल नेगोशिएशन कमेटी (व्यावसायिक वार्ता समिति) में शामिल थे। उन्हें बहुत स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि तुम्हें पहले प्रस्तावों के मुकाबले बेहतर विमान, कीमत, उपलब्धता और शर्तें तय करनी हैं। इसी आधार पर कमर्शियल नेगोशिएशन कमेटी की स्थापना की गई। पहले का प्रस्ताव मतलब 2008 का प्रस्ताव क्योंकि आएफपी 2007 में आई थी।“

नांबियार बताते हैं, “दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों में वार्ता के 18 दौर हुए जो करीब 14 महीने चले। फ्रैंच टीम का नेतृत्व जरनल रिब कर रहे थे और भारतीय टीम के नेता थे वायुसेना के डिप्टी चीफ। इसमें कड़ी सौदेबाजी हुई। भारतीय पक्ष ने जबरदस्त तरीके से कोशिश की कि हमें बेहतर कीमत, बेहतर मेनटेनेंस केपेबिलिटी, बेहतर परफाॅरमेंस बेस्ड लाॅजिस्टिक्स, लोंग आवर टर्म प्राॅडक्ट सपोर्ट हासिल हों। असल में हम जो कुछ भी चाह रहे थे वो सब हमने हासिल किया।“

नांबियार के बयान से स्पष्ट है कि भारत को 2016 में काॅट्रक्ट साइन करते समय जो हासिल हुआ वो यूपीए शासन के दौरान एमएमआरसी और आरएफपी दोनों से कहीं बेहतर है। वो आगे महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, “मैं आपको कुछ आंकड़े देता हूं। बेसिक एयरक्राफ्ट की कीमत में अंतर करीब 9 प्रतिशत है। यानी 2008 में जो दाम लगाया गया था, ये उससे 9 प्रतिशत कम है। जहां तक पैकेज की कुल कीमत का सवाल है, तो कीमत में अंतर करीब 20 प्रतिशत है। अगर आपको खरीद की पूरी कीमत हासिल तकनीक और हथियारों के संदर्भ में देखनी हो यानी वो कीमत जो सरकार को अंततः देनी होगी तो हम कहेंगे कि हमने पहले के मुकाबले में 40 प्रतिशत बेहतर क्षमता हासिल की।“

वो इस 40 प्रतिशत का अर्थ भी स्पष्ट करते हैं, “कुल कीमत के दो हिस्से होते हैं। एक – वो कीमत जिस पर आप वार्ता के बाद पहुंचते हैं और दूसरी है भुगतान की शर्तें। इस बार भुगतान की शर्तें 2008 से कहीं बेहतर हैं। हमने इस बात पर जोर दिया और इसे हासिल भी किया कि एस्कलेशन (कीमत वृद्धि) का निर्धारण एक्चुअल टम्र्स (वास्तविक वृद्धि) पर हो बजाए 3.9 प्रतिशत के फिक्सड एमाउंट के जो 2008 में तय किया गया था। इस बार एस्कलेशन क्लाॅस कहता है कि या तो ये एक्चुअल (वास्तविक वृद्धि) के आधार पर होगा, वर्ना 3.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। कल को मान लीजिए यूरोप में मुद्रास्फीति की दर 10 प्रतिशत रहती है, तब भी हमारा एस्कलेशन 3.5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। यानी दशमलव चार प्रतिशत की इस कटौती से ही हमारी करीब 23 प्रतिशत काॅस्ट सेविंग हुई है। आज मुद्रास्फीति की दर 1.2 प्रतिशत है, अगर हम इसके संदर्भ में बात करें तो हमारी काॅस्ट एडवांटेज करीब 40 प्रतिशत है।“

नांबियार आॅफसेट्स को लेकर उठे विवाद पर भी बात करते हैं और इस विषय में वायुसेना का पक्ष स्पष्ट करते हैं। वो बताते हैं, “जब व्यावसायिक वार्ता हो रही थी तो वो दो सरकारों के बीच यानी भारत और फ्रैंच सरकार के बीच हो रही थी। उनकी तरफ से एक जनरल था और हमारी ओर से उप वायुसेना प्रमुख थे। इस इंटर गवर्नमेंटल वार्ता की समाप्ति पर और इससे पहले कि कैबिनेट कमेटी आॅन सिक्योरिटी (सीसीएस) इसका अनुमोदन करती, हमने दासो और हथियार निर्माता एमबीडीए के साथ आॅफसेट समझौते को भी मंजूरी दी…।“

सीआईसी कांग्रेस रिलायंस को लेकर बहुत दुष्प्रचार कर रही है। नांबियार इसके बारे में भी खुलकर बात करते हैं, “मौजूदा आॅफसेट नीति और दिशानिर्देश कहते हैं कि इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करते समय भारतीय साझीदार कंपनियों के बारे में बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसमें विभिन्न पार्टियों के बीच व्यावसायिक वार्ता और कड़ी सौदेबाजी होती है। जहां तक भारत का सवाल है हमने विमान के आॅफसेट समझौते के लिए दासो से वार्ता की और हथियारों के आॅफसेट के लिए एमबीडीए से बात की। दासो से 3.5 अरब यूरो और एमबीडीए से 350 मिलियन यूरो पर बात हुई यानी कुल पैकेज करीब 3.8 अरब यूरो का रहा। जहां तक रिलायंस का सवाल है तो जब 2016 में वार्ता हो रही थी तब हमने रिलायंस से कोई बात नहीं की। उस समय किसी भारतीय आॅफसेट पार्टनर को चिन्हित नहीं किया गया। ये दासो को देखना था कि वो किस के साथ समझौता करते हैं…।“

वो इन खबरों को सही बताते हैं कि आजकल भी अनेक सरकारी और निजी भारतीय कंपनियां आॅफसेट को लेकर दासो के साथ वार्ता कर रही हैं। लेकिन वो स्पष्ट करते हैं कि, “अभी तक कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है। मैं आपको बताऊं कि हमने जब 2016 में समझौता किया था तब दासो के करीब 22 फ्रैंच पार्टनर थे जो सभी सूचीबद्ध थे। अगर आप उन सबके हिस्से जोड़ लें तो कुल राशी करीब 3.5 अरब डाॅलर तक पहुंचती थी। दासो का अपना हिस्सा इस पूरी राशी का करीब 22 प्रतिशत था जो करीब 6,500 करोड़ रूपए बनता है।“

वो आॅफसेट नीति की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, “आॅफसेट का उद्देश्य है देश में संपत्ति का निर्माण। इससे भारत में आंतरिक ढांचे का निर्माण होगा, तकनीक का तबादला होगा, लोगों को प्रशिक्षण मिलेगा। कुल मिलाकर इससे भारत को हर हाल में फायदा ही होगा।“

नांबियार का साक्षात्कार कांग्रेस के दुष्प्रचार की कलई खोल कर रख देता है। विमानों की कीमत, उनमें लगे आधुनिकतम हथियारों, समझौते के तरीके और शर्तों, आॅफसेट पार्टनर आदि लगभग हर विषय पर वो बहुत साफगोई से बात करते हैं जिससे समझौते में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती।

लेकिन वायुसेना के समर्पित अधिकारी की तरह वो विवादास्पद मुद्दों पर बात नहीं करते। वो नहीं बताते की मनमोहन सरकार के दौरान ये समझौता क्यों नहीं हो सका? इसका जवाब भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा देते हैं। वो बिना लागलपेट और लिहाज के कहते हैं कि कांग्रेस के जमाने में समझौता नहीं हुआ क्योंकि दासो ने सोनिया गांधी के दामाद राॅबर्ट वाड्रा के मित्र संजय भंडारी को “पत्ती“ देने से इनकार कर दिया। पात्रा कांग्रेस पर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने का आरोप लगाते हैं जो नांबियार के साक्षात्कार से भी स्पष्ट होता है। वायुसेना ने मीडियम मल्टीरोल काम्बेट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के लिए प्रस्ताव 2000 में किया। 2007 में आरएफपी जारी की गई, 2012 में दासो एविएशन (राफेल बनाने वाली फ्रैंच कंपनी) को शाॅर्टलिस्ट किया गया। यानी करीब 12 साल प्रक्रिया चली, लेकिन वायुसेना को विमान हासिल नहीं हो सके।“

मनमोहन सरकार का ढुलमुल रवैया भारत के लिए कितना खतरनाक हो सकता है, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि वायुसेना को कम से कम 42 बेड़ों की आवश्यकता है जबकि उसकी मौजूदा ताकत 31 बेड़ों तक सीमित हो गई है। अगले दो साल में तीन और बेड़े समाप्त हो जाएंगे। जाहिर है वायुसेना के लिए ये संकट की घड़ी है। अगर ऐसे में मोदी सरकार इमरजैंसी क्लाॅस के तहत 36 राफेल विमानों की व्यवस्था नहीं करती तो वायुसेना की हालत और भी पतली हो जाती। ऐसे में अगर कोई दुश्मन भारत पर हमला कर देता तो हश्र क्या होता, इसकी कल्पना की जा सकती है। जाहिर है सोनिया सरकार ने देशहित और सुरक्षा तैयारी की जगह दलाली को तरजीह दी। अब राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस दासो से खुंदक निकालने की कोशिश कर रही है कि अगर तुमने हमें दलाली नहीं दी तो हम अब भी ये सौदा नहीं होने देंगे, भले ही हम सरकार में न हों।

देश की सुरक्षा को संकट में डालने के लिए शर्मसार होने की जगह कांग्रेस प्रधानमंत्री मोदी पर ही लगातार कीचड़ उछाल रही है जो अपना कर्तव्य पूरी ईमानदारी से निभा रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का आरोप सही लगता है कि कांग्रेस देश की दुश्मन ताकतों के साथ ‘महागठबंधन’ बना रही है। आश्चर्यजनक नहीं कि इस पूरे मामले में पाकिस्तान के पूर्व गृह मंत्री रहमान मलिक, वर्तमान सूचना एवं प्रसारण मंत्री फवाद चैधरी जैसे अनेक पाकिस्तानी नेता ही नहीं, आईएसआई का साइबर सेल भी कूद पड़ा है और सब बेशर्मी से राहुल का समर्थन कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि इस विवाद से मोदी की छवि खराब होगी और वो अगला लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाएंगे। यही नहीं, विवाद बढ़ा तो राफेल विमानों की खरीद भी खटाई में पड़ जाएगी जो पाकिस्तानी सेना असल में चाहती भी है।

बहरहाल मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वो इस सौदे को किसी भी हालत में रद्द नहीं करेगी। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि ये प्राॅपागैंडा वाॅर है और हम इसका माकूल जवाब देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने जगह-जगह मनमाने तरीके से अलग-अलग आंकड़े पेश करने वाले राहुल गांधी को चुनौती दी है कि अगर वो अपना होमवर्क ठीक से करके आएं तो वो उनके हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार हैं।

डिप्टी चीफ एयरमार्शल रघुनाथ नांबियार का साक्षात्कार निम्न लिंक पर उपलब्ध हैः

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