‘राम मंदिरः हिंदुओं के साथ दोहरा खेल बंद करे कांग्रेस’ in Punjab Kesari

अक्तूबर 29 को जब तीन सदस्यों वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने राम मंदिर मामले की जल्द सुनवाई की अपील को महज पांच मिनिट में अगले वर्ष जनवरी तक टाल दिया, तो समूचे हिंदू समाज में आक्रोश की लहर दौड़ गई। लोगों को ये लगने लगा कि कहीं मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई कांग्रेस का ऐजेंडा तो नहीं चला रहे जो अगले लोकसभा चुनाव तक इस मसले का हल नहीं चाहती। याद दिला दें कि कांग्रेसी वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में मांग की थी कि इस मसले की सुनवाई अगले आम चुनावों के बाद ही की जाए।

रामजन्म भूमि पर अदालती रवैये से निराश और नाराज राम भक्तों को अब एक ही रास्ता नजर आ रहा है – संसद राम मंदिर के लिए वैसे ही कानून बनाए जैसे सोमनाथ मंदिर के लिए बनाया था। इस विषय में नरेंद्र मोदी सरकार पर दबाव बनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने आंदोलन की रूपरेखा भी तैयार कर ली है। इसमें सांसदों से लेकर प्रधानमंत्री तक को ज्ञापन देना और जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक जनजागरण अभियान शामिल है।

कुछ दिन बाद 11 दिसंबर से संसद का शीतकालीन सत्र आरंभ हो रहा है। इससे पहले परिषद ने 15 नवंबर से सांसदों को ज्ञापन सौंपने का अभियान आरंभ कर दिया है। परिषद इस संबंध में 25 नवंबर को अयोध्या में एक विशाल आयोजन करेगी जिसमें प्रमुख साधु संतों सहित रामजन्म भूमि आंदोलन से जुड़े करीब एक लाख लोग भाग लेंगे। ऐसे ही आयोजन इस दिन नागपुर और बेंगलूरू में भी होंगे। नौ दिसंबर को दिल्ली में संतों की बैठक होगी। 18 दिसंबर के बाद पूरे देश में 5,000 से भी अधिक आयोजन होंगे ताकि लोग इस विषय में अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें। अगले वर्ष प्रयागराज में होने वाले कुंभ में भी इस मुद्दे पर धर्म संसद का आयोजन किया जाएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत, सरकार्यवाह भय्याजी जोशी ही नहीं अनेक भारतीय जनता पार्टी नेता और मुस्लिम संगठन भी राम मंदिर के लिए कानून बनाए जाने की मांग का समर्थन कर चुके हैं। उधर कट्टरवादी इस्लामिक-नक्सल कांग्रेस एक बार फिर राम मंदिर के नाम पर मुसलमानों को डराने और भड़काने में लग गई है। वो इसके लिए भय्याजी जोशी के उस बयान का इस्तेमाल कर रही है जिसमें उन्होंने कहा था कि यदि आवश्यकता पड़ी तो राम जन्म भूमि के लिए एक बार फिर 1992 जैसे आंदोलन किया जाएगा। याद दिला दें कि छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिराया गया था और उसके बाद भड़के दंगों में अनेक लोग मारे गए थे।

असल में हुआ यूं था कि मुंबई में तीन दिन चली संघ के कार्यकारी मंडल की बैठक के बाद भय्याजी जोशी संघ के विस्तार के बारे में संवाददाताओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बताया कि गत छह वर्ष में संघ का डेढ़ गुना विस्तार हुआ है। करीब 35,500 गांवों में संघ की परियोजनाएं चल रही हैं। इस समय संघ की 55,825 शाखाएं हैं। संघ की साप्ताहिक और मासिक मिलन बैठकें क्रमशः 17,000 और 9,000 गांवों में होती हैं। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष अलग-अलग कार्यक्रमों में एक लाख स्वयंसेवकों की वृद्धि हुई है…। इस बीच एक संवाददाता ने पूछा कि क्या संघ राम मंदिर के लिए 1992 जैसे आंदोलन भी करेगा? इसपर उन्होंने ने कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो अवश्य ऐसा किया जाएगा। इसके बाद संघ के विस्तार और सामाजिक उपलब्धियों को तो मीडिया ने दरकिनार कर दिया और हर ओर सिर्फ एक ही बात की चर्चा हुई कि संघ ‘1992 जैसा’ माहौल पैदा करना चाहता है।

इस खबर को कांग्रेस जैसी कट्टरवादी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियां ही नहीं, इस विवाद के मूल प्रतिवादी हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी, कांग्रेसी मौलानाओं के जमावड़े आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड आदि ने भी तूल देना शुरू कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ये मसला अदालत में है तो 25 नवंबर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और शिवसेना के लोग अयोध्या क्यों आ रहे हैं, इससे वहां के मुसममानों में ही नहीं, हिंदुओं में भी भय पैदा हो गया है कि कहीं ‘बाहरी लोग’ ‘1992 जैसे’ दंगे न करें। इन लोगों को ये तो याद है कि 1992 में कुछ मुसलमान मारे गए थे, लेकिन उन्हें ये नहीं याद रहा कि इस विवाद में कितने हिंदू भी मारे गए। 1990 में तो उत्तरप्रदेश के तबके मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम वोटों की खातिर हिंदू कारसेवकों को गोलियों से भून दिया था। 1992 में जब विवादास्पद ढांचा ढहाए जाने के बाद दंगे भड़के तो उसमें मुस्लिम ही नहीं हिंदू भी मारे गए। अयोध्या में ही एक मुस्लिम समाजवादी नेता ने हिंदुओं पर अंधाधुंध गोलियां बरसाईं थीं।

संघ और परिषद के ताजा आंदोलन को कठघरे में खड़ा करने वाली पार्टियां ये भूल जाती हैं कि 1992 में और 2018 में जमीन आसमान का अंतर है। आज आंदोलन का लक्ष्य मोदी सरकार को जनता की भावना से अवगत करवाना और उस पर कानून बनाने के लिए दबाव डालना है। रामभक्तों का अयोध्या जाना प्रतीक है राम मंदिर के प्रति अपनी आस्था दोहराने का न कि किसी को आक्रांत करने का।

वर्ष 1984 में जब से विश्व हिंदू परिषद ने राम जन्मभूमि आंदोलन चलाया है, कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी आदि जैसी इस्लामिक पार्टियां परिषद और बजरंग दल को अतिवादी, हिंसक संगठनों के रूप में बदनाम करने में लगी हैं। जबकि स्वयं ये पार्टियां राष्ट्रविरोधी, खूनी नक्सलियों तथा पहले सिमी और अब पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया जैसे इस्लामिक आतंकी संगठनों को समर्थन देती रहीं हैं। हाल ही में भीमा कोरेगांव मामले में पूना पुलिस ने जो चार्जशीट दाखिल की है वो आंखें खोलने वाली है। ये लोग न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रच रहे थे, बल्कि देश के लोकतांत्रिक और सामाजिक ताने-बाने को तोड़ने का षडयंत्र भी कर रहे थे। इस चार्जशीट में शामिल दस्तावेजों में वो पत्र भी है जिसमें एक नक्सली आतंकी दूसरे को कह रहा है कि यदि हम दलितों को भड़काते हैं और दंगे करवाते हैं तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हमें विŸाीय और कानूनी सहायता उपलब्ध करवाने के लिए तैयार हैं। कांग्रेस ने देश में कितने कैसे और कब कब दंगे भड़काए हैं, वो हम अपने स्तंभ में बताते रहते हैं।

सोचने की बात है कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल के नाम पर मुसलमानों को डराने वाली ये पार्टियां खुद कितने दंगे भड़का चुकी हैं और देश में कितने लोगों की हत्या करवा चुकी हैं। अयोध्या में विवादित ढांचा मुसलमानों का मक्का-मदीना जैसा कोई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल नहीं था, फिर भी इन पार्टियों ने इसे हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्षता’ का प्रतीक बना दिया और इसका इस्तेमाल मुस्लिम वोट बटोरने के लिए किया।

विवादित ढांचा गिरने के बाद जब दंगे भड़के तो इस्लामिक पार्टियों ने इसके लिए सीधे-सीधे संघ और उसकी सहयोगी संस्थाओं को जिम्मेदार ठहरा दिया। वैसे अब तक इस विषय में कोई गहन जांच नहीं हुई है कि ये दंगे किसने भड़काए? कभी किसी ने ये सोचा कि जब देश भर के कारसेवक और विश्व हिंदू परिषद के सदस्य या तो अयोध्या में थे या जेल में तो दंगे किसने भड़काए? ऐसा तो नहीं कि दंगे किसी और ने करवाए और ठीकरा किसी और के सर पर फोड़ा गया? क्या ये मुसलमानों के ध्रुवीकरण की कुत्सित चाल नहीं थी? क्या आज भी वो ताकतें मुसलमानों को राम मंदिर के नाम पर डरा नहीं रहीें? ध्यान रहे आज की तरह तब ज्यादातर राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें नहीं थी, तब केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं।

ये सही है कि जब विवादित ढांचा गिरा तब उत्तरप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे। ये भी सही है कि कल्याण सिंह ने ढांचा गिराए जाने की नैतिक जिम्मेदारी ली थी और चंद घंटों के भीतर ही इस्तीफा भी दे दिया था। लेकिन क्या ये सही नहीं है कि तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और विद्वान नेता नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे। ढांचा गिरने और उसके बाद हुई हिंसा की क्या कोई जिम्मेदारी नरसिम्हा राव और उनकी सरकार की नहीं थी?

जब ये घटना हुई तब माधव गोडबोले केंद्र में गृह सचिव थे। उन्होंने ‘अनफिनिश्ड इनिंग्स’ नाम से एक पुस्तक लिखी है। इसमें वो विस्तार से बताते हैं कि कैसे तबके गृह मंत्री एस बी चव्हाण ने विवादित स्थल को कब्जे में लेने के लिए छह दिसंबर से बहुत पहले जुलाई में ही योजना बना ली थी। लेकिन नरसिम्हा राव ने काफी विलंब से 24 नवंबर को केंद्रीय बलों को उत्तर प्रदेश भेजने की मंजूरी दी और बल वहां पहुंच भी गए, लेकिन उन्होंने उनकी तैनाती का आदेश कभी नहीं दिया।

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो नरसिम्हा राव ने वादा किया था कि अगर विवादित स्थल के नीचे मंदिर निकलता है तो वो ये परिसर हिंदुओं को दे देंगे। लेकिन खुदाई में मंदिर होने की पुष्टि के बावजूद राव वादे से मुकर गए। पहले परोक्ष रूप में ढांचा ढहाने में मदद करके और फिर अपने वादे से मुकर कर वो आखिर क्या खेल खेल रहे थे, वो क्या चाहते थे, ये अब तक अस्पष्ट है। लेकिन इतनी बात तो साफ है कि वो और उनकी पार्टी ढांचा गिराए जाने के बाद भड़के दंगों की जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।

आज जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठन अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग कर रहे हैं और अनेक मुस्लिम संगठन भी इसका जोरदार समर्थन कर रहे हैं, तब कांग्रेस और उसके जैसी अन्य इस्लामिक-नक्सल पार्टियां एक बार फिर मुसलमानों को डराने में लग गईं हैं। हिंदू वोटों के लिए मंदिरों के दौरे करने वाले जनेऊधारी राहुल गांधी राम मंदिर के नाम पर खामोश हैं।

सुप्रीम कोर्ट के टरकाऊ और विपक्षी दलों के दोगले रवैये से हिंदुओं में निराशा और नाराजगी है और वो इस संबंध में सरकार पर दबाव बनाने के लिए आंदोलन भी कर रहे हैं, लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं कि अयोध्या में एक बार फिर दंगे भड़केंगे। कांग्रेस, इकबाल अंसारी, आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड और उनके राजनीतिक आका राम मंदिर के नाम पर लोगों को डराना बंद करें। अपनी राजनीति के लिए राम को बदनाम न करें। इन लोगों के भड़काऊ बयानों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि अयोध्या ही नहीं, पूरे प्रदेश में कानून व्यवस्था चाक चैबंद रहेगी और किसी को डरने की आवश्यकता नहीं।

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