“मां पर जान न्यौछावर करने वाला ही समझ सकता है संघ का राष्ट्रवाद” in Punjab Kesari

कुछ दिन पूर्व कनाडा से लौट रही एक ईसाई रिसर्चर (शोधछात्रा) सोफिया ने जब विमान में तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष तमिलिसई सौंदराजन को देखा तो भाजपा और मोदी सरकार को ‘फासिस्ट’ बताते हुए उनके खिलाफ नारे लगाने लगी। स्पष्ट था कि रिसर्चर होते हुए भी उसका दिमाग धार्मिक और राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरा था। बल्कि यूं कहा जाए कि वो ब्रेनवाश्ड थी तो गलत नहीं होगा।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष को देखते ही उसने जैसी उग्र प्रतिक्रिया दी, उससे साफ पता लगता है कि उसमें सहिष्णुता की कितनी कमी थी। आश्चर्य की बात तो ये है कि जब उसे विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए गिरफ्तार किया गया तो कांग्रेस और सीपीएम समेत सभी कास्टिस्ट इस्लामिक कम्युनल (सीआईसी) पार्टियां उस बिगड़ैल और बदतमीज लड़की का पक्ष लेकर मोदी सरकार और भाजपा पर ही हमला करने लगीं और ”अभिव्यक्ति की आजादी समाप्त करने” का समूहगान शुरू हो गया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि किसी भी सीआईसी पार्टी ने उस लड़की को विमान में बेवजह उपद्रव करने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया। सोचिए अगर इस लड़की की जगह भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कोई कार्यकर्ता होता और वो सोनिया गांधी या सीताराम येचुरी को ‘हिंदू हेटर’, ‘देशद्रोही’, ‘चीनी दलाल’ आदि कह कर नारे लगा रहा होता तो क्या होता? तब क्या भाजपा और संघ उसे इसी तरह तूल देते? हरगिज नहीं। वैसे तरस तो 25 साल की सोफिया पर भी आता है जो कहने को तो ‘रिसर्चर’ है लेकिन उसके राजनीतिक और धार्मिक पूर्वाग्रहों ने उसके सोचने और समझने की शक्ति ही समाप्त कर दी। उसमें और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ‘आजादी’ के नारे लगाते उन अर्बन नक्सलियों में क्या अंतर है जिन्हें ये समझ नहीं आता कि आज हम 1940 के दशक में नहीं, 2018 में रह रहे हैं।

विदेशी विचारधारा को मानने वाले कम्युनिस्ट भले ही भाजपा और और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को विदेशी विचारधारा के चश्मे से देख रहे हों और अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार उन्हें तानाशाह हिटलर की तर्ज पर ‘फासिस्ट’ करार दे रहे हों, लेकिन हिटलर के उग्र, आततायी और सत्तामूलक राष्ट्रवाद और संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की न कहीं तुलना हो सकती है और न ही दोनों में कोई समानता है। संघ के लिए राष्ट्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना भारत देश। संघ के लिए राष्ट्र और नागरिक का संबंध माता और पुत्र का है। वो इस भूमि में जन्म लेने वाले हर व्यक्ति को, भले ही वह किसी भी धर्म, जाति, रंग, समुदाय का हो, भारत मां की संतान मानता है। वो भारत माता की जय में विश्वास करता है। संघ समन्वयवादी, समावेशी, समरस सांस्कृतिक अवधारणा में विश्वास करता है। संभवतः यही कारण है कि केंद्र में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है तब उसने सीआईसी पार्टियों के पूर्वाग्रहग्रस्त ढिंढोरे के बावजूद वास्तव में उदावादी और प्रगतिशील शासन दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया है वो वस्तुतः उपनिषद की सुविख्यात प्रार्थना की कल्पनाशील सरल व्याख्या मात्र है जो इस प्रकार हैः

 सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् 
 शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

प्रतिबंधित सीपीआई (एमएल) के नक्सली आतंकी विध्वंस, हिंसा और हत्या के लिए कुख्यात हैं। इन हत्यारों के शहरी प्रतिनिधियों यानी अर्बन नक्सलियों की गिरफ्तारी पर सीआईसी पार्टियां जैसे विरोध कर रहीं हैं और जैसे इन देशद्रोही षडयंत्रकारियों को समर्थन दे रहीं हैं, उसे देख कर आश्चर्य ही नहीं, दुख भी होता है। इस पर तुर्रा ये है कि ये पार्टियां खुद को ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ बताती हैं और अर्बन नक्सलियों को ‘वामपंथी विचारक’। वैसे कोई इनसे पूछे कि ये ‘वामपंथी विचारक’ आखिर विचार क्या करते हैं तो पता लगेगा कि ये तो देश को तोड़ने, अराजकता, हिंसा, जातीय नफरत फैलाने, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार को बदनाम करने, उसका तख्ता पलट करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने पर ‘गंभीर चिंतन’ करते हैं। वैसे अगर गौतम नवलखा, वरवर राव, अरूंधति राय, सुधा भारद्वाज जैसे लोग ‘विचारक’ हैं तो सनातन संस्था के लोग तो वास्तव में युगदृष्टा हैं। वो कम से कम देश तोड़ने की बात तो नहीं करते। उनका कुसूर सिर्फ इतना बताया जा रहा है कि वो अपने देश और धर्म को बदनाम करने वालों को सबक सिखाना चाहते हैं जिनके कुकृत्यों को सीआईसी पार्टियों ने ‘उदारवाद’ और ’प्रगतिशीलता’ बता कर सदा बढ़ावा दिया। बहरहाल हम स्पष्ट कर दें कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा के विरूद्ध हैं और सनातन संस्था के क्रियाकलापों का समर्थन नहीं करते।

हम लौट कर मूल विषय पर आते हैं। सीआईसी पार्टियां भले ही ‘उदारवादी’ और ‘प्रगतिशील’ होने का ढोंग करती रही हों लेकिन इन्होंने हमेशा इस्लामिक कट्टरवाद और धर्म के नाम पर महिलाओं पर अत्याचार का समर्थन किया है। जहां कांग्रेस ने शाहबानो गुजारा भत्ता मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला वहीं मोदी सरकार ने तीन तलाक मामले में खुल कर मुस्लिम महिलाओं का समर्थन किया। उसने न केवल सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक का विरोध किया, फिर इस संबंध में संसद में विधेयक भी पेश किया। ये लोकसभा में तो पारित हो गया, लेकिन सीआईसी पार्टियों ने इसे राज्य सभा में नहीं पारित होने दिया जहां भाजपा का बहुमत नहीं है।

ताजा मामला धारा 377 का है। मोदी सरकार ने इस विषय में सुप्रीम कोर्ट में 11 जुलाई 2018 को जो शपथपत्र दाखिल किया उसमें स्पष्ट रूप से कहा कि केंद्र सरकार ये मामला पूरी तरह अदालत पर छोड़ती है। अदालत अपने विवेक से जो भी निर्णय लेगी वो सरकार को मंजूर होगा। संक्षेप में कहें तो सरकार ने समलैंगिक संबंधों के मामले में किसी भी सामाजिक अथवा धार्मिक पूर्वाग्रह को संरक्षण या समर्थन देने से इनकार कर दिया। संघ ने भी इस विषय में अपना पक्ष बहुत ही स्पष्ट तरीके से रखा कि वो समलैंगिक संबंधों को प्राकृतिक नहीं मानता, लेकिन अदालत के निर्णय का सम्मान करेगा।

कहना न होगा संघ ने सदैव भारत की लोकतांत्रिक और न्यायिक संस्थाओं को सम्मान दिया है। अपनी मतभिन्नता को संविधान के दायरे में रहकर, अपने लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकारों के तहत व्यक्त किया है। संघ ने सदैव रचनात्मकता, सुधार और देश को सुदृढ़ करने की बात कही है और इसे मूर्तरूप भी दिया है। जब भी कोई भीषण दुर्घटना हुई है या प्राकृतिक आपदा आई है तो संघ ने आगे बढ़ कर राहत और सुधार का जिम्मा उठाया है। ताजा उदाहरण केरल का है जहां भीषण बाढ़ के दौरान हजारों संघ कार्यकर्ताओं ने खामोशी से, प्रचार की अभिलाषा के बिना, राहत, बचाव और पुनर्निमाण का कार्य किया जो अब भी जारी है। अगर आप इसकी नक्सलियों के विध्वंसकारी कृत्यों से तुलना करें तो समझ में आ जाएगा कि जहां वो रेलवे स्टेशनों, विद्यालयों, पुलों, सड़कों, बिजली के खंभों, दूरसंचार के आंतरिक ढांचे आदि को बम से उड़ा देते हैं वहीं संघ रचनात्मकता और सृजन में विश्वास रखता है।

संघ भले ही नक्सलियों के समान ‘मानवाधिकार’, ‘दलित अधिकार’, ‘नागरिक स्वतंत्रता’ आदि जैसे मोटे मोटे जुमले नहीं इस्तेमाल करता, लेकिन असल में इन सब विषयों पर नक्सलियों से कई सौ गुना अधिक काम करता है। यहां ये भी बताते चलें कि जहां नक्सली, आदिवासी इलाकों में विध्वंस का नंगा नाच कर रहे हैं, वहीं संघ बहुत खामोशी से इन क्षेत्रों में विकास कार्यों में लगा है। संघ के सुप्रयासों से अब तक लाखों आदिवासी युवक-युवतियों का जीवन सुधर चुका है।

आगामी 17 से 19 सितंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में संघ प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम होने जा रहा है। इसमें जब राहुल गांधी को बुलाने की अपुष्ट खबर अखबारों में छपी तो कुछ कांग्रेसी नेताओं ने राहुल गांधी को सलाह दी कि वो संघ के समीप न जाएं क्योंकि वो ‘जहर’ है। आश्चर्य की बात तो ये है कि जिस पार्टी के नेताओं ने इस देश को तोड़ा, 20 लाख से ज्यादा लोगों को मरवाया और करोड़ों को विस्थापित करवाया, वो संघ को ‘जहर’ बता रही है। इस पार्टी की विघटनकारी और विध्वंसकारी राजनीति अब भी जारी है। ये आजकल पूरे जोरशोर से देशद्रोही अर्बन नक्सलियों का ही नहीं पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों का भी समर्थन कर रही है और व्यापक हिंसा फैला कर मोदी सरकार को विस्थापित करने का षडयंत्र कर रही है।

हाल ही में जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि चुनाव देश को बांटने का काम रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत शीघ्र देश सोवियत संघ जैसे बिखर जाएगा। जहां तक चुनावों की विघटनकारी भूमिका का सवाल है, वो कहीं न कहीं सही भी कह रहे हैं क्योंकि जैसे कांग्रेस अध्यक्ष सत्ता की लालसा में राष्ट्रविरोधी तत्वों से हाथ मिला चुके हैं, उससे ऐसी आशंका का पैदा होना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब तक संघ है, हम विश्वास रख सकते हैं कि ऐसी ताकतों के षडयंत्र सफल नहीं होंगे। संघ के देशभक्त सूरमा ऐसी ताकतों का पर्दाफाश करते रहेंगे और लोगों में राष्ट्रीय एकता और अखंडता की अलख जगाए रखेंगे।

 

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