“वहाबी आतंक पर शहजादे सलमान की स्वीकारोक्ति स्वागतयोग्य लेकिन कई सवाल बाकी” in Punjab Kesari

सउदी अरब का वली अहद या क्राउन प्रिंस घोषित होने के बाद वैसे तो शहजादे मौहम्मद बिन सलमान अपने सामाजिक सुधारों और भ्रष्टाचार के खिलाफ कथित संघर्ष के लिए लगातार सुर्खियों में रहे। लेकिन अपनी पहली अमेरिका यात्रा में उनके बयानों की कुछ ज्यादा ही चर्चा हो रही है और जैसे वो बयान हैं, उन पर बहस होना लाजमी भी है।

अमेरिका में शहजादे के विवादास्पद बयानों पर चर्चा से पहले एक नजर उनके सामाजिक सुधारों पर। सउदी में महिलाओं को ड्राइविंग की इजाजत दिए जाने पर तो बहुत सुर्खियां बनीं, लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि वहां महिलाओं को पुरूषों की अनुमति के बिना भी व्यापार शुरू करने की इजाजत दी गई है। वहां इतिहास में पहली बार एक महिला को स्टाॅक एक्सचेंज का प्रमुख नियुक्त किया गया है। अब सउदी महिलाएं तलाक के बाद बिना किसी मुकदमे के तुरंत अपने बच्चों की कस्टडी ले सकती हैं। पिछले साल दिसंबर में वहां पहली बार किसी महिला का संगीत कार्यक्रम हुआ। इस वर्ष जनवरी में जेद्दाह के एक खेल स्टेडियम में पहली बार महिलाओं को प्रवेश दिया गया। 35 वर्ष बाद सउदी में एक फिर सिनेमाहाॅल शुरू होंगे। वहां धार्मिक पुलिस बहुत शक्तिशाली है। शहजादे ने उसके अधिकार कम करने के लिए भी जोरदार लाॅबिंग की।

परंपरागत सोच से बाहर जा कर उन्होंने महिलाओं के प्रति जो उदारता दिखाई, उससे स्पष्ट लगने लगा है कि शहजादे देश के कट्टरवादी समाज को एक नई दिशा की ओर ले जाना चाहते हैं। उनकी सोच भविष्योन्मुखी और समताकामी है, लेकिन ये भी सच है कि सदियों से कबिलाई सोच में बंद सउदी समाज को अभी इस दिशा में लंबा रास्ता तय करना है।

बहरहाल अब हम उनकी अमेरिका यात्रा पर आते हैं जहां उनके बयानां ने दुनिया को एक बदलते सउदी अरब से परिचित करवाया। जब उनसे सउदी द्वारा वित्तपोषित और प्रचारित वहाबी इस्लाम के बारे में पूछा गया जिसका उनके देश में अनुसरण किया जाता है और जिसे दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के लिए जिम्मेदार माना जाता है, तो उन्होंने कहा, “शीतयुद्ध के दौरान जब सहयोगी देशों ने कहा कि हम अपने संसाधन मुस्लिम देशों में सोवियत रूस का विस्तार रोकने में लगाएं, तब हमने विदेशों में मदरसों और मस्जिदों में निवेश शुरू किया। एक बार ये कार्यक्रम शुरू तो हो गया, लेकिन आने वाली सरकारें इस पर नियंत्रण न रख सकीं। हमें इस पर लगाम लगानी है। आजकल ऐसे कामों के लिए सरकार से ज्यादा पैसा सउदी फाउंडेशनों द्वारा दिया जाता है।

ये शायद पहली बार है जब सउदी अरब के शाही परिवार के किसी व्यक्ति ने इतनी साफगोई से ये माना कि वहाबी इस्लाम और इस्लामिक आतंकवाद के प्रसार में उसका प्रमुख हाथ रहा है। शहजादे सलमान के इस बयान के बाद पूरे इस्लामिक जगत में भूचाल आ गया। इसकी दो खास वजहें थीं। एक तो ये कि इस बयान ने दुनिया भर की इस्लामिक आतंकी तंजीमों को कठघरे में खड़ा कर दिया। अब तक वो अपने आतंकी रवैये को यह कह कर सही ठहराती रहीं हैं कि वो तो मुसलमानों पर पश्चिम के इसाई देशों की ज्यादतियों का प्रतिकार कर रही हैं और उनका तथाकथित जिहाद बिल्कुल जायज है। दूसरा ये कि इस बयान ने आतंकी तंजीमों की फंडिंग पर सवाल खड़ा किया और ये भी स्पष्ट किया कि भविष्य में इस मद में दिए जा रहे धन पर लगाम लगाई जाएगी। ये सउदी धन पर पलने वाले वहाबी मदरसों और मस्जिदों के लिए बिलाशक बुरी खबर है।

कुछ कट्टरवादी इसे डोनाल्ड टंªप के सामने समर्पण मानते हैं क्योंकि ट्रंप ने न केवल इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को चुनावी मुद्दा बनाया, अपितु सत्ता में आने के बाद इसके खिलाफ ठोस कदम भी उठाए। लेकिन सच ये भी है कि शहजादे सलमान खुद अब इस प्रतिकामी सोच से अपने देश को बाहर लाना चाहते हैं और इस ओर कदम भी उठा चुके हैं। उन्हें लगता है कि यदि सउदी को तेल आश्रित अर्थव्यवस्था से परे जाना है तो उन्हें पश्चिमी देशों से बेहतर तालमेल करना पड़ेगा। यदि उन्हें अमीर पश्चिमी पर्यटकों को अपने देश की ओर आकर्षित करना है तो कबीलाई ढर्रा बदलना होगा।

शहजादे के बयान के बाद भारत में भी मंथन आरंभ हो गया है क्योंकि यहां भी वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए बड़ी मात्रा में सउदी अरब से धन आया। देश भर में और खासतौर से केरल और कश्मीर में सउदी से अंधा पैसा आया और जल्दी ही इस धंधे में मुसलमान वोटों की राजनीति करने वाले दल भी शामिल हो गए। इन्होंने तेजी से बढ़ते इस्लामिक कट्टरवाद से जानबूझ कर निगाहें फेर लीं। जिन्होंने इसके खिलाफ आवाज उठाई उसे ‘सांप्रदायिक’ करार दे दिया गया। हद तो तब हुई जब देश में हिंदुओं को ही आतंकवादी साबित करने की साजिश होने लगी। क्या हम जाकिर नायक को भूल सकते हैं जिसने हिंदुओं के खिलाफ विषवमन करने और उनका धर्म परिवर्तन करने के लिए पूरा दम लगा दिया। जिस तरह केरल और कश्मीर में धरती से जुड़े उदारवादी इस्लाम की जगह वहाबी इस्लाम ने पैर पसारे, क्या उसे झुठलाया जा सकता है।

बहरहाल शहजादे सलमान के बयान का सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान में देखने को मिला। रूस के अफगानिस्तान में घुसने के बाद फ्रंटलाइन स्टेट होने के नाते पाकिस्तान को सउदी से सबसे ज्यादा पैसा मिला। जहां अस्सी के दशक से अब तक 32,000 से भी ज्यादा मदरसे खोले जा चुके हैं। इन्हीं मदरसों से निकले तालीबानियों की मदद से अमेरिका ने अफगानिस्तान से रूस को खदेड़ा और पाकिस्तान ने वहां अपने बगल बच्चों की सरकार बनाने का सपना साकार किया। सउदी ने पाकिस्तान को परमाणु बम विकसित करने के लिए भी भरपूर धन दिया और शायद यही वजह है जब उसने पहली बार बम तैयार किया तो उसे ‘इस्लामिक बम’ का नाम दिया गया। आश्चर्य नहीं कि कुछ समय पूर्व जब सउदी ने 39 देशों वाला आतंकवाद विरोधी सैन्य गठबंधन बनाया तो उसका मुखिया पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख राहिल शरीफ को बनाया।

सउदी ने न सिर्फ पाकिस्तान को वहाबी इस्लाम के प्रसार के लिए भरपूर धन दिया बल्कि उसे दुनिया भर की कट्टर इस्लामिक ताकतों को एकजुट करने, आतंकियों का नेटवर्क तैयार करने और उनमें पैसा बांटने का काम भी सौंपा। इस काम में पाकी खुफिया एजेंसी आईएसआई और उसके उच्चायोगांे और दूतावासों ने सक्रिय भूमिका निभाई। ओसामा बिन लादेन से लेकर मुल्ला उमर तक अगर दुनिया के सबसे दुर्दांत इस्लामिक आतंकी अगर पाकिस्तान में ही पाए गए हैं तो इसमें किसी को अचरज नहीं होना चाहिए।

शहजादे सलमान के बयान से पाकिस्तान बहुत चिंतित है क्योंकि उसने इस पैसे का इस्तेमाल सिर्फ अफगानिस्तान ही नहीं, दुश्मन देशों भारत और बांग्लादेश में भी आतंकी नेटवर्क खड़ा करने के लिए किया। अगर सउदी से आने वाले धन में कटौती होती है तो इसका असर सीधे पाकी मदरसों और आतंकी तंजीमों पर पड़ेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान के लिए ये बेशक बहुत बुरी खबर है।

शहजादे सलमान के इस्राइल से जुड़े बयान ने भी दुनिया में तहलका मचाया। उन्होंने कहा कि फिलिस्तीनियों की तरह ही इस्राइल को भी अपने लिए जमीन का हक है। ये असल में इस बात की ओर इशारा था कि शहजादे सलमान और अमेरिका में इस विषय में अंदर ही अंदर कुछ पक रहा है। उनके दौरे में इसकी पुष्टि भी हो गई। पता लगा कि डोनाल्ड ट्रंप ने इस्राइल और फिलिस्तीन के लिए शांति योजना तैयार करने के वास्ते अपने दामाद जेरेड कुशनर को नियुक्त किया है। उन्होंने इस संबंध में शहजादे से भी बात भी की है। कुशनर चाहते हैं कि शांति योजना तैयार होने के बाद सउदी अरब और दूसरे अरब देश फिलिस्तीन को समझौता मानने के लिए समझाएं।

ध्यान रहे सउदी अरब का इस विवाद पर आधिकारिक मत ये है कि जो भी शांति समझौता हो उसमें फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दी जाए और पूर्वी येरूशलम को उसकी राजधानी माना जाए। कुछ समय पूर्व जब ट्रंप ने येरूशलम को इस्राइल की राजधानी के तौर पर मान्यता दी थी तो अरब देशों ने इसे पीड़ादायक बताया था। सउदी अरब की विदेशनीति का आंख मूंद कर अनुसरण करने वाले पाकिस्तान को इससे भी समस्या है। दिलचस्प बात ये है कि पाकिस्तान की स्कूली किताबों में दुनिया का जो नक्शा छापा जाता है उसमें इस्राइल का वजूद ही नहीं होता। यही नहीं पाकिस्तानी पासपोर्ट पर साफ लिखा होता है कि ये इस्राइल को छोड़ सभी देशों के लिए मान्य है।

वहाबी आतंकवाद और इस्राइल जैस विषयों पर शहजादे सलमान की बातें सुनने में तो अच्छी लगती हैं, लेकिन इनकी असली परीक्षा तो इनके क्रियान्वयन के समय ही होगी। अब जब उन्होंने इस्राइल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं, तो क्या वो अपने जानी दुश्मन ईरान की ओर भी दोस्ती का हाथ बढ़ाएंगे तथा कतर, यमन और सीरिया में भी शांति की नई राहें तलाशेंगे या इस्राइल के साथ संबंधों को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल करेंगे क्योंकि सउदी की तरह इस्राइल भी ईरान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। अमेरिका के तुरंत बाद उनके फ्रांस दौरे में ईरान के मसले पर हुई तनातनी से तो नहीं लगता कि वो फिलहाल ईरान के प्रति नरमी बरतने के मूड में हैं। ध्यान रहे फ्रांस, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में ईरान के साथ हुए समझौते का समर्थक है और जब ट्रंप ने इसे रद्द करने की धमकी दी थी तो फ्रांस ने उन्हें इसके खिलाफ चेताया भी था।

इस पूरे परिदृश्य में भारत को भी अपने पत्ते सही तरीके से खेलने चाहिए। दक्षिण एशिया में आतंकवाद के खिलाफ भारत और अमेरिका सहयोग कर रहे हैं। अपनी दक्षिण एशिया नीति में ट्रंप ने भारत को करीबी सहयोगी माना है। ये सही समय है जब भारत भी अपनी खुफिया जानकारियों के साथ सउदी अरब से संपर्क करे और वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए देश में आ रहे पैसे पर रोक लगाए। यही नहीं भारत को सउदी फाउंडेशनों, आईएसआई और इनके सहयोग से भारत में पनपीं आतंकी तंजीमों पर रोक के लिए भी सउदी से सहयोग मांगना चाहिए।

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