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“पाकिस्तानी सेना के जुल्मों की दास्तान बयान करता है पश्तून तहाफुज मूवमेंट” in Punjab Kesari

पाकिस्तान आजकल एक सियासी तूफान का सामना कर रहा है जिसका नाम है – पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) यानी पश्तून सुरक्षा आंदोलन। इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं दक्षिण वजीरिस्तान के 26 साल के जोशीले नेता मंजूर पश्तीन। पश्तून मानवाधिकारों की बात करने वाला ये आंदोलन असल में शुरू हुआ 2014 में ‘महसूद तहाफुज मूवमेंट’ के नाम से। महसूद एक पश्तून कबीले का नाम है और मंजूर भी इसी से जुड़े हैं। इस आंदोलन का आधार है फेडरली एडमिनिस्टरड ट्राइबल एरिया (फाटा) और खैबर पख्तूनख्वा।

मंजूर पश्तीन ने ये आंदोलन क्यों शुरू किया इसकी वजह समझना भी जरूरी है। मंजूर गरीब परिवार से संबंध रखते हैं और उनके पिता अब्दुल वद्दूद महसूद उनके पैतृक गांव सरवाकाई में अध्यापक हैं। वर्ष 2009 में तालीबानी आतंकियों के खिलाफ सेना के आॅपरेशन राह-ए-निजात के कारण हजारों अन्य पश्तून परिवारों की तरह उनके परिवार को भी घर छोड़ कर शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा। पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग के अनुसार इस वर्ष पश्तून बेल्ट के करीब चार लाख लोगों को घर छोड़ना पड़ा, लेकिन सहायता संस्थाओं की मानें तो असल संख्या कई गुना ज्यादा थी। मंजूर के परिवार को इस उथल-पुथल में चार बार घर बदलना पड़ा। जब ये लोग घर लौटे तो सब लुट चुका था, सब ओर तबाही का मंजर था, कदम कदम पर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और सेना का कड़ा पहरा था।

इस बीच उन्होंने पशुचिकित्सा में स्नातक की डिग्री भी ली। शिक्षा के बाद उन्होंने समाजसेवा के बारे में सोचा और महसूद तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) की शुरूआत की। चारों और फैली बारूदी सुरंगों के बीच जाहिर है उन्होंने जो पहला काम चुना वो था बारूदी सुरंगें हटाना।

वर्ष 2018 के आरंभ में ये आंदोलन एक नई शक्ल में उभरा जब इसने पश्तून माॅडल नकीबुल्ला मेहसूद की न्यायेतर हत्या के विरोध को अपना लक्ष्य बनाया। मेहसूद को कराची में एक फर्जी एनकाउंटर में मार गिराया गया था। मेहसूद की हत्या के विरोध में 26 जनवरी को एक मार्च का आगाज डेरा इस्माइल खां से हुआ और ये पश्तून बहुल पेशावर, मरदान, स्वाबी होता हुआ इस्लामाबाद में धरने के रूप में समाप्त हुआ। शुरू में तो इसने सिर्फ मेहसूद की हत्या का मामला उठाया, लेकिन जल्दी ही उन हजारों पश्तून परिवारों ने भी इसमें अपनी आवाज उठानी शुरू कर दी जिनके घर के सदस्य सेना के अभियानों में या तो मारे गए थे या गायब हो गए थे। एक अनुमान के अनुसार 8,000 से भी ज्यादा लोग सैन्य अभियानों के दौरान बिना किसी कानूनी कार्रवाई के उठाए गए। जल्दी ही पाक सेना से त्रस्त बलूच लोगों ने भी पीटीएम में शिरकत शुरू कर दी। बहरहाल पीटीएम के इस्लामाबाद धरने को आॅल पश्तून नेशनल जिरगा का नाम दिया गया। जिरगा में मेहसूद की हत्या और पश्तूनों पर होने वाले अत्याचारों की भत्र्सना की गई। जिरगा का अर्थ है प्रतिनिधियों की बैठक।

जिरगा में मांग की गई कि सरकार नकीबुल्ला और पुलिस एनकाउंटर में मारे गए अन्य पश्तूनों की हत्या की न्यायिक जांच करवाए, नस्लीय भेदभाव और दुराग्रह वाले कानून समाप्त हों, गुमशुदा पश्तूनों को अदालतों में पेश किया जाए ताकि निर्दाेष लोगों को पहचान कर रिहा किया जा सके। जिरगा ने सेना से ये गारंटी देने की मांग की कि वो कबाइली इलाकों में खोजी अभियान के दौरान और चेकपोस्टों पर लोगों को परेशान नहीं करेगी, उनका अपहरण नहीं करेगी और गोली नहीं चलाएगी और न ही हिंसा करेगी। यही नहीं वो पूरे के पूरे गांव/ कबीले को सामूहिक सजा भी नहीं देगी और छोटी-मोटी घटनाओं के बावजूद कफ्र्यू नहीं लगाएगी। कबाइली इलाकों से बारूदी सुरंगें हटाने की मांग भी की गई जिनकी वजह से अनेक निर्दोष लोग जान से हाथ धो चुके हैं। कुल मिलाकर मांग ये थी कि लोगोें के लोकतांत्रिक अधिकार बहाल किए जाएं और उन्हें शांति से जीने दिया जाए।

इस्लामाबाद का धरना 10 फरवरी को तब समाप्त हुआ जब प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार इंजीनियर आमिर मुकाम ने उन्हंे प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की तरफ से एक पत्र सौंपा जिसमें कहा गया था कि सरकार नकीबुल्ला की हत्या करने वाले पुलिस अधिकारी राव अनवार को पकड़ेगी, दक्षिण वजीरिस्तान से बारूदी सुरंगें हटाने का काम तेज किया जाएगा, नकीबुल्ला मेहसूद के नाम से इंटरमीडिएट काॅलेज बनाया जाएगा और जिरगा सदस्यों द्वारा उठाई गई वास्तविक समस्याओं को हल किया जाएगा। मुकाम ने उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन की तारीफ की और कहा कि वो जब चाहें अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए उनसे मिल सकते हैं। राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ ही पीटीएम नेता सेना के अधिकारियों से भी मिले और उन्हें भी अपनी समस्याओं से अवगत करवाया।

सरकार ने जिरगा से वादे तो बहुत किए लेकिन निभाया एक भी नहीं। प्रदर्शनकारियों ने भी मुकाम को कह दिया था कि यदि सरकार वादे निभाने में असफल रहेगी तो वो प्रदर्शन जारी रखेंगे। इसके बाद पीटीएम ने कई मार्च निकाले और फिर 22 मार्च को लाहौर और आठ अप्रैल को पेशावर में बड़े प्रदर्शन किए। 22 अप्रैल को पीटीएम ने लाहौर में एक बार फिर रैली की। पीटीएम 12 मई को कराची में एक विशाल रैली की योजना बना रहा है। इसमें अल्ताफ हुसैन के मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट के लोग भी शामिल हो सकते हैं। यानी सेना के सताए बलूच ही नहीं, कराची के मुहाजिर भी इसके साथ आ रहे हैं।

पश्तूनों के इस आंदोलन को पाकिस्तान के वाम दलों सहित अनेक राजनीतिक दल समर्थन दे रहे हैं। लेकिन सेना इसकी बढ़ती लोकप्रियता से खौफजदा है और उसने मीडिया में इसकी कवरेज पर रोक लगा दी है। अब इनपर आरोप लगाया जा रहा है कि भारतीय खुफिया एजेंसी राॅ और अन्य बाहरी ताकते इन्हें पैसा दे रही हैं जो सरासर गलत है। इनके साथ लाखों लोग हैं, आखिर कोई तो वजह होगी जिसके कारण ये लोग इनसे जुड़े हैं।

कहना न होगा, ये वजह है फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में सेना के दमनकारी अभियान। पहले तो सेना ने अफगानिस्तान से सोवियत संघ को खदेड़ने के लिए इस इलाके में बड़ी संख्या में लोगों को इस्लाम के नाम पर रेडिकलाइज किया और उन्हें हथियार थमा दिए। सोवियत रूस तो चला गया और अफगानिस्तान में तालीबान की सरकार भी बन गई, लेकिन 9/11 के बाद हालात बदले और पाकिस्तानी सेना प्रमुख से राष्ट्रपति बने परवेज मुशरर्फ ने आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संघर्ष का साथ देने का फैसला किया। जाहिर है, पहले जो लोग पाकिस्तान के दोस्त थे, उनमें से अनेक दुश्मन बन गए। हाल ही में पाकिस्तानी नेशनल अकाउंटेबिलिटी ब्यूरो के प्रमुख और पूर्व न्यायाधीश जावेद इकबाल ने नेशनल असंेबली की मानवाधिकारों की स्थायी समिति के सामने सनसनीखेज खुलासे किए। उन्होंने परवेज मुशरर्फ पर आरोप लगाया कि उन्होंने कम से कम चार हजार पाकिस्तानी नागरिकों को गुप्त आदान-प्रदान के तहत करोड़ों डाॅलरों की एवज में अमेरिका को बेचा। जावेद इकबाल का बयान ऐसे समय आया है जब पीटीएम गुमशुदा पश्तून लोगों को अदालत में हाजिर करने की मांग जोर-शोर से कर रहा है। ये कहीं न कहीं उनकी आशंकाओं को बल भी देता है।

वर्ष 2007 में एक बड़ा बदलाव तब हुआ जब परवेज मुशरर्फ ने लाल मस्जिद पर हमला किया। इससे नाराज कट्टरवादियों ने तहरीके तालीबान पाकिस्तान (टीटीपी) का गठन किया। इन्होंने पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ युद्ध का एलान किया और सेना का जीना दुश्वार कर दिया।

पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल के हादसे के बाद लोगों को लगा कि अब काफी हो गया और इन्हें खत्म करना ही होगा। पाकिस्तानी सेना ने इसके लिए बड़ा अभियान चलाया। वहां की नेशनल काउंटर टेरररिज्म आॅथोरिटी की 40 पन्ने की रिपोर्ट के मुताबिक टीटीपी के सफाए के दौरान 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया। दो लाख से ज्यादा काॅंबिंग आॅपरेशन हुए, चार लाख से ज्यादा लोगों को रोक कर उनकी तफ्तीश की गई। 6,998 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया। 2,500 आतंकियों को मौत की नींद सुला दिया गया। 19,530 लोगों को विभिन्न आधारों पर गिरफ्तार किया जैसे भड़काऊ भाषण या सामग्री बांटना, जनता को बगावत के लिए उकसाना आदि। 18,790 मामले लाउड स्पीकर के गलत इस्तेमाल के दर्ज किए गए। 1.5 अरब रूपए टेरर फंडिंग के रोके गए। 5,089 बैंक खाते फ्रीज किए गए। 65 संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डाला गया। इनमें से चार संस्थाएं अब भी निगरानी में हैं। 2,052 लोगों पर पाबंदी लगाई गई और उनकी विदेश यात्रा पर रोक लगा दी गई। आतंक फैलाने के आरोप में 1,447 यूआरएल ब्लाॅक किए गए।

दर्ज मामलों की संख्या के लिहाज से पंजाब सबसे आगे है जहां 68,957 लोगों का नाम संभावित आतंकियों के रूप में डिजिटल डेटाबेस मे शामिल किया गया। जिन 483 लोगों को फांसी पर चढ़ाया गया है, उनमें से 400 पंजाब के हैं। लेकिन सनद रहे सबसे ज्यादा दमनकारी सैन्य अभियान फाटा और खैबर पख्तूनख्वा में चलाए गए।

जैसे-जैसे देश में आतंकवाद बढ़ा, उसका सामना करने के लिए समाज का सैन्यीकरण भी किया गया। हर जगह कंटीले तार लगाए गए, कदम-कदम पर चेकपोस्ट बनाए गए, सशस्त्र सैनिकोें, पुलिसवालों की तैनाती की गई। इससे आतंकवाद कम भी हुआ। 2010 में जहां 2,060 आतंकी हमले हुए, वहीं 2017 में 681 हमले हुए। आतंकी हमलों में कमी आई, लेकिन सैन्यीकरण वैसे का वैसा ही रहा। अब भी उतनी ही तलाशियां, तफ्तीशें और गिरफ्तारियां हो रहीं हैं, उतने ही छापे पड़ रहे हैं। लेकिन लोग इससे ऊब चुके हैं। वो अब चाह रहे हैं कि हालात सामान्य हों। अब और सैन्यीकरण की गुंजाइश नहीं है। संविधान में दिए गए हक उन्हें फिर मिलें। वो चाहते हैं कि आतंकवाद में जो कमी आई है, उसका फायदा उन्हें भी मिले, उन्हें सिर्फ कुर्बानी ही क्यों देनी पड़े? राहत भी मिले।

स्पष्ट है पीटीएम सेना द्वारा सताए गए लोगों की अपेक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। तभी इनकी रैलियों में सेना के खिलाफ नारे भी लगाए जाते हैं। लोग कहते हैं – ये जो दहशतगर्दी है, इसके पीछे वर्दी है। इन्हें राहत मिलनी ही चाहिए। आतंकी घटनाएं अगर कम हुईं हैं तो चेकपोस्ट भी कम होने ही चाहिए। बारूदी सुरंगें भी हटाई जानी चाहिए। आतंकवादियों से निपटने के लिए जो सैन्य अदालतें या आतंकविरोधी अदालतें बनाई गईं हैं, उन्हें भी खत्म होना ही चाहिए। बाकी बचे मामलों को सामान्य अदालतों में निपटाया जाना चाहिए।

पीटीएम में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके परिवार वालों को महज शक की बिना पर पकड़ा गया। बहुत से लोग तो ऐसे हैं जिन्हें पुलिसवालों ने व्यक्तिगत दुश्मनी के कारण आतंकविरोधी मामलों में फंसा दिया। इसी प्रकार अनेक मामले पारिवारिक झगड़ों, संपत्ति या ट्रेड यूनियनों के थे, लेकिन उन्हें भी आतंकविरोधी कानूनों के दायरे में डाल दिया गया। स्पष्ट है आतंकविरोधी कानून लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर डाका डाल रहें हैं, इन्हें समाप्त होना ही चाहिए।

लेकिन फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता कि पाकिस्तानी सेना पश्तूनोें की मांग को लेकर गंभीर है। उसका दमनकारी रवैया अब भी जारी है। इसके पीछे कारण ये है कि उसके दिल में खोट है। उसे पता है कि पश्तूनों के दिलों में जो घाव हैं, वो उसी ने दिए हैं। अब सेना के पास मौका है कि वो पुराना ढर्रा छोड़, आंदोलन को कुचलने की जगह सहानुभूतिपूर्वक लोगों के आक्रोश का कारण समझने की कोशिश करे और देश में बढ़ते अलगाववाद पर लगाम लगाए। उधर पश्तूनों की गहरी नाराजगी के बावजूद मंजूर पश्तूनी कहते हैं कि उनका कोई अलगाववादी लक्ष्य नहीं है। उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है और अहिंसक ही रहेगा। वो चाहते हैं कि फाटा और पख्तूनख्वा को पंजाब जैसे ही लोकतांतित्रक अधिकार और सम्मान मिले और वहां के लोग भी संगीनों के साए से परे सामान्य जीवन जी सकें।

पाकिस्तान की चुनी हुई सरकार लोगों के दिल पर मलहम लगा सकती थी, लेकिन उसके सामने भी सीमाएं हैं। एक तो वो सेना का विरोध नहीं कर सकती, दूसरे उसका कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है। ऐसे में ये आंदोलन क्या शक्ल अख्तियार करेगा, अभी कहना मुश्किल है। पर एक बात तो तय है कि इसने सेना के जुल्मो सितम के खिलाफ लोगों के दिलों में जो चिंगारी फूंकी है, उसे अब बुझाना मुश्किल होगा।

“मोदी नीतिः अस्त-व्यस्त, पस्त पाकिस्तान” in Punjab Kesari

मुस्लिम वोटों का सौदा करने वाले भारतीय राजनीतिक दलों का प्रिय विषय रहा है – पाकिस्तान। देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार जवाहर लाल नेहरू से लेकर अटलबिहारी वाजपेयी तक, सबने पाकिस्तान के साथ अच्छे संबंध कायम करने के प्रयास किए। 10 साल शासन करने वाले मनमोहन सिंह भी इस कोशिश में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन सबके साथ समस्या ये रही कि इन्होंने पाकिस्तान में प्रत्यक्षतः सत्तासीन नेताओं से बात करने की कोशिश की और पर्दे के पीछे काम करने वाली असल सत्ता यानी सेना को नजरअंदाज किया।

जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभाला तो उन्होंने भी इसी लीक पर चलने की कोशिश की। तबके पाकी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को शपथग्रहण समारोह में बुलाया। अचानक उनके घर भी पहुंचे, तोहफों का आदान-प्रदान भी हुआ, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। जब भी भारत ने सद्भावना प्रदर्शित करने के लिए बड़ा कदम उठाया, पाकिस्तानी सेना ने उसका जवाब खून खराबे से दिया।

जल्द ही मोदी सरकार को समझ आ गया कि जिस नवाज शरीफ से वो बात करने की कोशिश कर रहे हैं, वो सेना की कठपुतली से अधिक कुछ नहीं हैं। वो सेना की अनुमति के बिना भारत से संबंध सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठा सकते।

25 दिसंबर 2015 को मोदी शरीफ के निमंत्रण पर अचानक लाहौर पहुंचे। मकसद था नवाज शरीफ को उनके जन्मदिन की बधाई देना और उनके परिवार के एक विवाह समारोह में भाग लेना। मोदी के स्वागत के लिए शरीफ स्वयं अल्लामा इकबाल एयरपोर्ट पहुंचे। इससे भारत और पाकिस्तान में सद्भावना की नई उम्मीद जगी, लेकिन पाकी सेना को ये रास नहीं आया। सेना समर्थक मीडिया ने शरीफ के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू कर दिया। उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने अपने व्यापारिक हितों के लिए पाकिस्तान के हितों को मोदी के हाथों बेच दिया। 10 दिन के अंदर ही यानी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयर फोर्स स्टेशन पर हमला हो गया। भारत ने इसके लिए जैश-ए-मौहम्मद को जिम्मेदार ठहराया और शरीफ ने इस हमले की निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के अधिकारी जांच के लिए पठानकोट भी आए, लेकिन मामला किसी सिरे तक नहीं पहुंचा।

पठानकोट मामले की जांच चल ही रही थी कि 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ जिसमें 19 भारतीय सैनिक शहीद हो गए। भारत ने इसके लिए लश्कर-ए-तैयबा को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने पाक सरकार से जांच की अपेक्षा करने की जगह, पाकिस्तान पर चहुंमुखी हमला करने की योजना बनाई। इसमें सैन्य, राजनयिक, रणनीतिक से लेकर सिंधु जल समझौते तक, हर क्षेत्र में पाकिस्तान को सबक सिखाने की नीति बनाई गई। मोदी सरकार ने एक झटके में पुरानी सरकारों के इस तर्क को कूड़ेदान में डाल दिया कि स्थिर पाकिस्तान, भारत के लिए जरूरी है। ये समझ लिया गया कि जब तक पाकिस्तान को उसकी हिमाकत की कीमत चुकाने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, वो बाज नहीं आएगा।

उड़ी हमले की अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन, जर्मनी, जापान, कनाडा, भूटान और यहां तक कि पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन ने भी निंदा की। इस हमले के बाद भारतीय सेना ने घोषणा की कि वो अपने सैनिकों की शहादत का बदला लेगी, लेकिन इसका समय और स्थान वो खुद तय करेगी। जाहिर है, मोदी सरकार ने अब भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना से अपनी तरह से निपटने की छूट दे दी थी।

उड़ी हमले के करीब 10 दिन बाद भारतीय सेना ने पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में सर्जिकल स्ट्राइक की जिसमें वहां मौजूद आतंकियों के अनेक ठिकानों पर हमला किया गया। सर्जिकल स्ट्राइक भारत की नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। अब तक भारतीय सेना घुसपैठ करने वाले आतंकियों को देश की सीमा में ही मारती थी, यह पहली बार थी जब सेना ने लाइन आॅफ कंट्रोल (एलओसी) पार कर हमला किया। ये भारत की तरफ से स्पष्ट संकेत था कि अब वो रक्षात्मक नीति छोड़, आक्रामक नीति अपनाएगा और जरूरत पड़ने पर एलओसी पार करने में परहेज नहीं करेगा। अब तक पाकिस्तान अपने परमाणु बम की धमकी देता था, सर्जिकल स्ट्राइक के साथ ही भारत सरकार ने उसकी परमाणु धमकियों की भी धज्जियां उड़ा दीं।

सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद जब पाकिस्तानी सेना नहीं मानी तो भारतीय सेना ने आॅपरेशन अर्जुन शुरू किया। इसके तहत लंबी दूरी के हथियारों से एलओसी के परे आतंकी ठिकानों को ही नहीं, पाकी सेना को भी निशाना बनाया जाने लगा। प्रत्यक्षतः ऐसा लगता है कि पाकी सेना पर इसका असर नहीं पड़ा है और वो बदस्तूर घुसपैठिए भेज रही है। यदि गहराई में देखा जाए तो समझ आएगा कि इस दौर में भारतीय सेना ने एलओसी और अंतरराष्ट्ररीय सीमा पर जितने घुसपैठिए और पाकी सैनिक मार गिराए, उतने पहले कभी नहीं हलाक किए गए। यही नहीं भारतीय सेना ने देश की सीमा के भीतर भी जितने आतंकी अब मारे हैं, उतने पहले कभी नहीं मारे।

अगर आप पाक अधिकृत कश्मीर के न्यूज चैनलों को देखें तो आपको पता चलेगा कि भारतीय सेना की नई नीतियों का किस हद तक असर हुआ है। वहां लोग कहते हैं कि वो लगातार युद्ध जैसे हालात में जी रहे हैं और न तो पाकिस्तानी सेना और न ही सरकार उनके जान-माल के नुकसान की भरपाई कर रही है। वो चाहते हैं कि इससे पहले भारतीय सेना और कोई बड़ा कदम उठाए, पाकी सेना अपने आतंकी शिविर वहां से हटा ले। वो कहते हैं कि पाकी सेना की मूर्खता और हठधर्मी की वजह से उनका व्यापार और रोजगार चैपट हो गया है और भूखों मरने की नौबत आ गई है। जाहिर है इस समय पीओके निवासियों का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है और वो पाकी सेना की आतंकी नीति से मुक्ति पाना चाहते हैं।

इस बीच 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला भी उठा दिया। संकेत साफ था कि अगर पाकिस्तान बाज नहीं आएगा तो भारत, जम्मू-कश्मीर से परे भी संघर्ष के नए क्षेत्र खोलने के लिए तैयार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान ने जहां-जहां कश्मीर का मुद्दा उठाया, भारत ने वहां-वहां बलूचिस्तान और गिलगित-बालतिस्तान का मामला उठाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को बेनकाब और अलग-थलग करने का भूतो न भविष्यिति प्रयास शुरू कर दिया। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इन प्रयासों को बहुत बल मिला।

अमेरिका ने मोदी और ट्रंप की पहली मुलाकात से पहले ही, न सिर्फ भारत को रणनीतिक सहयोगी बनाने की बराक ओबामा की नीति का पुरजोर समर्थन किया, बल्कि सय्यद सलाहुद्दीन के आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहीदीन को अंतरराष्ट्रीय संगठन भी घोषित कर दिया जिसे पाकिस्तान ‘कश्मीरियों की आजादी की आवाज’ बताता रहा है। संदेश साफ था कि अमेरिका को कश्मीरियों की पाक समर्थित आजादी की मुहिम में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसके बाद तो ट्रंप ने एक के बाद एक अनेक ऐसे कदम उठाए जिनसे पाकिस्तान को गहरा आघात लगा। 21 अगस्त 2017 को ट्रंप ने नई दक्षिण एशिया नीति का एलान किया जिसमें पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भारत को महत्वपूर्ण स्थान देने की घोषणा की गई। दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के समय ट्रंप ने पाकिस्तान को खुली चेतावनी दी कि अगर उसने अपनी धरती से आतंकी शिविर समाप्त नहीं किए तो उसे नतीजा भुगतना पड़ेगा।

पाकिस्तान ने आदतन अमेरिका की धमकी को हलके में लिया। वो भूल गया कि अब वाइट हाउस में बराक ओबामा नहीं डोनाल्ड ट्रंप बैठे हैं। ट्रंप ने पहले तो पाकिस्तान की करीब दो अरब डाॅलर की रक्षा सहायता बंद करने का एलान किया फिर ये सुनिश्चित किया कि उसे दुनिया में टेरर फंडिंग और हवाला कारोबार की निगरानी करने वाली ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ की ‘ग्रे लिस्ट’ में शामिल किया जाए। पाकिस्तान इस सदमे उभरा भी नहीं था कि अमेरिका ने परमाणु प्रसार का आरोप लगा कर पाकिस्तान की उन सात कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिए जो उसके परमाणु हथियारोें के लिए सामान उपलब्ध करवाती हैं।

अमेरिका के नए विदेश मंत्री और सीआईए के पूर्व प्रमुख माइक पोमपेओ ने खुली धमकी दे दी है कि अगर पाकिस्तान नहीं चेता तो अमेरिका उससे मेजर नाॅन-नेटो अलाय (महत्वपूर्ण गैर-नैटो सहयोगी) का दर्जा वापसस ले लेगा, उसे आतंकी देश घोषित करेगा और उसके अधिकारियों के अमेरिका आने पर रोक भी लगाएगा। जाहिर है अमेरिका जो कदम उठाएगा, उसके सहयोगी भी उसका अनुसरण करेंगे।

पाकिस्तानी आतंकी फक्ट्रियों के लिए अमेरिका से एक और बुरी खबर हाल ही में तब आई, जब वहां के दौरे पर गए सउदी अरब के शहजादे मौहम्मद बिन सलमान ने घोषणा की कि वो धीरे-धीरे वहाबी इस्लाम के प्रचार-प्रसार की नीति समाप्त करेंगे जिसके तहत सउदी वित्तीय सहायता से दुनिया भर में वहाबी मदरसे खोले गए और आतंकी बनाए गए। इस नीति का सबसे बड़ा फायदा पाकिस्तान ने उठाया जहां 32,000 से ज्यादा ऐसे मदरसे चल रहे हैं। इन मदरसों में तैयार आतंकियों को पाकिस्तान भारत और अफगानिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करता है। जाहिर है शहजादे सलमान की घोषणा पाकिस्तान की आतंकी फैक्ट्रियों पर सीधे असर करेंगी। अमेरिका और सउदी अरब के फैसले उसकी विदेश नीति के दो प्रमुख स्तंभों – परमाणु बम और आतंकी नेटवर्क, दोनों को प्रभावित करेंगे।

अब तक के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि भारत ने सैन्य और राजनयिक दोनों स्तर पर पाकिस्तान को घेरा है। पाकिस्तान के खिलाफ भारत के अंतरराष्ट्रीय अभियान का पश्चिमी देशों में ही नहीं, खाड़ी के मुस्लिम देशों में भी व्यापक असर हुआ है, जो पहले कभी पाकिस्तान के करीबी माने जाते थे। आज चाहे अफगानिस्तान हो या ईरान, पाकिस्तान के सभी पड़ोसी देश भी उसके खिलाफ हैं। उसके सदाबहार दोस्त चीन ने भी न केवल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में उसके विरूद्ध आवाज उठाई, बल्कि ‘फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स’ में भी उसके खिलाफ मत दिया। पाकी सेना अपनी जनता को भरमाती है कि चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर पाकिस्तान की माली हालत बहुत बेहतर कर देगा, लेकिन चीन ने इसकी लगभग सभी प्रमुख परियोजनाओं से हाथ खींच लिए हैं। ध्यान रहे पाक अधिकृत कश्मीर से निकलने वाले इस काॅरीडोर का भारत विरोध करता रहा है क्योंकि भारत इसे अपना अटूट अंग मानता है।

भारत अब तक अपने बयानों और कामों से पाकिस्तान को ये स्पष्ट संदेश दे चुका है कि अगर उसने भारत में आतंक का निर्यात नहीं बंद किया तो वो सिंधु जल समझौते पर पुनर्विचार करने से नहीं हिचकेगा। दीवालिया होने की कगार पर खड़े पाकिस्तान से इससे सबसे बड़ी खलबली मची है। वहां आम आवाम को बिजली, पेयजल, रोजगार, इंधन, शिक्षा कुछ भी हासिल नहीं है। ऐसे में अगर भारत ने पानी रोक लिया तो उसके खेत खलिहान सूख जाएंगे और भारत बिना कोई यु़द्ध किए ही युद्ध जीत जाएगा।

हाल ही में पाकी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने चुनींदा पत्रकारों के सामने विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखे जिसे उनके चमचे ‘बाजवा डाॅक्टरीन’ के नाम से प्रचारित कर रहे हैं। इसमें बाजवा कहते हैं कि भारत को आर्थिक कारणों से बातचीत की मेज पर आना पड़ेगा। वो डींगे मारते हुए कहते हैं कि उन्होंने कठोर अमेरिकी दबाव के बावजूद, परवेज मुशरर्फ की तरह घुटने नहीं टेके। हो सकता है वो पाकिस्तानियों को बहलाने के लिए ऐसी बातें कर रहे हों, लेकिन इन्हीं पाकिस्तानियों ने हाल ही में देखा कि कैसे एक अमेरिकी एयरपोर्ट पर उनके प्रधानमंत्री शाहिद खकान अब्बासी की खाना तलाशी ली गई और कैसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने उन्हें आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई करने की सलाह देकर बैरंग वापस कर दिया।

भारत में विपक्षी दल बिना सोचे समझे मोदी सरकार पर आरोप लगा देते हैं कि उसकी कोई पाकिस्तान नीति नहीं है। अब तक ये स्पष्ट हो गया होगा कि मोदी सरकार ने अपने अनुभवों और पाकिस्तान की वास्तविकताओं के आधार पर अपनी नीति न केवल तैयार की है, बल्कि उसे हर मोर्चे पर लागू भी कर दिया है। सबसे बड़ी बात – इसका आधार किसी वर्ग का तुष्टिकरण नहीं है, राष्ट्रहित है। संभवतः यही कारण है कि मोदी सरकार ने हुर्रियत के पाकिस्तानी दलालों पर भी हाथ डाल दिया है, जिन्हें पिछली सरकारें पवित्र गाय समझती थीं।

कुल मिलाकर मोदी सरकार ने पाकिस्तान के चुने हुए नेताओं से बातचीत का नाटक करने की जगह, सीधे उसकी सेना पर वार किया है। इसका दंश वो महसूस भी कर रही है। धीरे-धीरे उस पर शिकंजा कस रहा है। उसे स्पष्ट कर दिया गया है कि उसे अपनी हरकतों की कीमत चुकानी पड़ेगी। अब ये उसे तय करना है कि वो अभी सुधरने का संकल्प लेती है या नुकसान उठाने के बाद। ध्यान रहे इस बार सुधार का नाटक नहीं चलेगा।