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“अर्बन नक्सलः खूनी दरिंदों का खतरनाक शहरी नेटवर्क” in Punjab Kesari

वो कौन हैं जो पढ़ाते हैं कि भारत तो कभी एक देश था ही नहीं, भारत को राष्ट्र की अवधारणा तो विदेशियों से मिली?

वो कौन हैं जो कहते हैं कि भारत ने कश्मीर, नगालैंड जैसे अनेक राज्य जबरदस्ती अपने साथ मिला लिए और जो राज्य आजाद होना चाहते हों, उन्हें आजाद कर देना चाहिए?

वो कौन हैं जो संसद पर हमला करने वाले आतंकियों को बचाने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और बस्तर में सुरक्षा कर्मियों की नृशंस हत्या पर जश्न मनाते हैं?

वो कौन हैं जो कश्मीरी आतंकी बुरहान वानी को शहीद और आजादी का दीवाना बताते हैं?

वो कौन हैं जिन्होंने हर शहर में मानवाधिकार के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोले हुए हैं जिनका काम सिर्फ आतंकवादियों और बात-बात पर हिंसा करने वाले अपने साथियों को बचाना है?

वो कौन हैं जो सत्ता हासिल करने के लिए हिंसा को भी अनुचित नहीं मानते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक की हत्या का षडयंत्र रचते हैं?

ये और कोई नहीं, अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली हैं। इनका काम है जंगलों में बैठे अपने साथियों को सुरक्षा कवर प्रदान करना, शहरों से नए लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना, लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के खिलाफ भड़काना और आखिरकार पूरे देश पर कब्जा करने के लिए रणनीति तैयार करना। आजकल ये लोग गली-मोहल्लों तक फैल गए हैं। हर झुग्गी झोपड़ी काॅल्नी, अवैध बस्ती, विवादास्पद इलाकों में इनके गैरसरकारी संगठन खुले हैं। ये प्रत्यक्ष रूप में तो लोगों की सेवा और सहायता की बात करते हैं, लेकिन इनका मकसद होता है छोटी-छोटी बातों पर अस्थिरता पैदा करना, हिंसक दंगे करवाना, अराजकता बढ़ाना।

इनका कश्मीर और देश के अन्य हिस्सों के इस्लामिक आतंकी संगठनों, पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई, चीन और पश्चिमी देशों की अनेक गुप्त संस्थाओं, ईसाई मिशनरियों आदि से गहरा संबंध हैं। ये हर उस व्यक्ति और संस्था को मदद देने और उससे मदद लेने के लिए तैयार रहते हैं जो देश के खिलाफ हो या उसके विरूद्ध काम करने के लिए तैयार हो। ये आदिवासी इलाकों में अंदर तक पैठ बना चुके हैं और अब इनकी निगाह दलितों पर है। इनका इरादा इस्लामिक आतंकियों, आदिवासियों, दलितों और ईसाइयों के साथ व्यापकतर गठबंधन बनाना है। इसमें कांग्रेस भी इनको पूरा समर्थन दे रही है। ध्यान रहे इन्हें अंतरराष्ट्रीय ईसाई संगठनों से भी भरपूर मदद मिलती है क्योंकि दोनों का निशाना आखिरकार हिंदू ही हैं। कभी आपने सोचा है कि ये नक्सली आदिवासी इलाकों में काम करने वाले सुरक्षा बलों की तो हत्या कर देते हैं, लेकिन ईसाई मिशनरियों को क्यों कुछ नहीं कहते?

नक्सल आज कहां तक पैठ बना चुके हैं, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, प्राथमिक शालाओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्विद्यालय, नागपुर विश्वविद्यालय आदि तक, पंचायतों से लेकर विधानसभाओं तक इनके लोग घुस गए हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया और जो चार्जशीट दाखिल की, उससे इनके नेटवर्क और पहुंच के पक्के सबूत मिलते हैं।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विल्सन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता’ और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

कुछ समय पूर्व नक्सलियों द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की हत्या का षडयंत्र रचने की खबर सामने आई थी। उनकी हत्या की साजिश का पत्र रोना विल्सन के कम्प्युटर से मिला था। रोना विल्सन अर्बन नक्सलियों के एक संगठन कमेटी फाॅर द रिलीज आॅफ पाॅलिटिकल प्रिसनर्स (सीआरपीपी) का प्रेस प्रवक्ता है। सीआरपीपी का मुखिया है कश्मीरी आतंकी सय्यद अब्दुल रहमान गिलानी। दिल्ली विश्वविद्यालय का पूर्व अध्यापक गिलानी संसद पर आतंकी हमले के मामले में अफजल गुरू, शौकत हुसैन और नवजोत संधु के साथ गिरफ्तार किया गया था, लेकिन सबूतों की कमी के चलते छूट गया था। यानी आप समझ सकते हैं कि नक्सलियों और कश्मीरी आतंकियों में कहां और कैसे संबंध हैं। आश्चर्य नहीं की यूपीए के कार्यकाल में बदनाम लेखिका अरूंधति राय और हुर्रियत आतंकी सय्यद अली शाह गिलानी सरकार के संरक्षण में राजधानी दिल्ली में संयुक्त संवाददाता सम्मेलन करते थे। जब कोई देशभक्त इसका विरोध करता था तो पुलिस उसकी बर्बरता से पिटाई करती थी।

मोदी की हत्या के षडयंत्र से संबंधित पत्र एक काॅमरेड आर द्वारा लिखा गया था और ये काॅमरेड प्रकाश को संबोधित था। काॅमरेड प्रकाश और कोई नहीं रितुपर्ण गोस्वामी है जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का पूर्व शोध छात्र हैा। ये सीपीआई (माओवादी) का महासचिव है और शहरी और भूमिगत नक्सली नेतृत्व के बीच संपर्क का काम करता है।

विल्सन से मिले कई पत्रों से नक्सलियों को कांग्रेस के समर्थन के भी सबूत मिलते हैं। ये कहते हैं कि दलितों को भड़काने के लिए कांग्रेस नक्सलियों को वित्तीय और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। आश्चर्य नहीं विल्सन के कम्प्युटर से मिला एक अन्य पत्र नक्सलियों द्वारा दलितों को भड़काने के षडयंत्र के बारे विस्तार से बात करता है। ये पत्र काॅमरेड प्रकाश (रितुपर्ण गोस्वामी) ने किसी काॅमरेड आनंद को लिखा है। एक अन्य पत्र में काॅमरेड एम (संभवतः काॅमरेड मिलिंद) गढ़चिरोली, छत्तीसगढ़ और सूरजगढ़ में हुए नक्सली हमलों से मिली प्रेस कवरेज पर संतोष प्रकट कर रहा है। ये बताता है कि कैसे कुछ नक्सली हमलों के लिए आंध्र प्रदेश के नक्सली कवि वरवर राव ने वकील सुरेंद्र गाडलिंग को धन दिया जिसे भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में एक अंग्रेजी टीवी चैनल ने खुलासा किया था कि कैसे नक्सली न्यायिक व्यवस्था में भी घुस गए हैं। चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और दुर्दांत नक्सली साईं बाबा को नागपुर जेल से हैदराबाद जेल ले जाने की कोशिश की जा रही है जहां वरवर राव के अनेक न्यायाधीशों से संबंध हैं जिन्होंने साईं बाबा की मदद का आश्वासन दिया है। ध्यान रहे इसी वर्ष जनवरी में साईं बाबा की पत्नी वसंता राव ने उसे हैदराबाद जेल भेजने की अर्जी डाली थी। इसमें बहाना ये बनाया गया था कि वो बहुत बीमार है और हैदराबाद में वो अपने संबंधियों के निकट रह सकेगा और उसे बेहतर इलाज मिल सकेगा। कहना न होगा कि वामपंथी डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट की नेता और दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष नंदिता नारायण ने साईंबाबा को हैदराबाद भेजे जाने का समर्थन किया। नक्सलियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंच कहां तक है। उसे इस बात से भी समझा जा सकता है कि साईं बाबा की रिहाई की मांग मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त जेद राआद अल हुसैन ने भी की है। याद रहे जेद वही आदमी है जिसने आईएसआई के साथ मिलकर कश्मीर में मानवाधिकार हनन के बारे में विवादास्पद रिपोर्ट दी थी।

शहरी नक्सल कितने घातक हो सकते हैं, इसे बस्तर में नक्सल विरोधी अभियान चलाने वाले शामनाथ बघेल की हत्या से समझा जा सकता है। कुछ समय पहले, नवंबर 2016 में बस्तर पुलिस ने आदिवासी शामनाथ बघेल की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। इस एफआईआर में दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान से जुड़े विनीत तिवारी और सीपीएम के नेता संजय पराटे का नाम भी था। ये एफआईआर शामनाथ की पत्नी की निशानदेही पर दर्ज की गई। सशस्त्र नक्सलियों ने शामनाथ को उसके घर में घुस कर मारा था। असल में प्रोफेसर सुंदर और अन्य नामजद लोग उन्हें नक्सल विरोधी अभियान बंद करने के लिए धमका रहे थे और ऐसा न करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दे रहे थे। इस पर शामनाथ ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। इसके बाद शामनाथ और उनके साथियों को सबक सिखाने के लिए नक्सलियों ने उनकी हत्या ही कर दी। इस मामले की सूचना दिल्ली विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के उपकुलपतियों को दी जा चुकी है। मामला फिलहाल अदालत में है। ध्यान रहे सुन्दर बस्तर में रिचा केशव के फर्जी नाम से जाती थी।

सवाल ये है कि नक्सलियों की फ्रंटल संस्थाएं जिनमें अधिकांश अर्बन नक्सल काम करते हैं या जुड़े हैं, इतनी बड़ी तादाद में कैसे पूरे देश में फैल गईं। जाहिर है कई दशकों तक सरकारों ने इस समस्या को जानते-बूझते नजरअंदाज किया। अफसोस की बात है, लेकिन ये भी सच है कि अनेक राजनीतिक दलों ने इन्हें संरक्षण भी दिया है और समय समय पर इनका इस्तेमाल भी किया। 2013 में सामने आई इंटैलीजेंस ब्यूरो (आई बी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 16 राज्यों में नक्सलियों की 128 फ्रंटल संस्थाएं थीं। ये दिल्ली ही नहीं, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हरियाणा जैसे राज्यों में भी सक्रिय थीं जिसके बारे में पहले कल्पना भी नहीं की गई। अगर भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी की मानें तो अरविंद केजरीवाल भी अर्बन नक्सल है जो अन्ना आंदोलन का फायदा उठा कर दिल्ली का मुख्यमंत्री बन बैठा।

अब सोचने की बात ये है कि सरकार आखिर इस समस्या से निपटे कैसे? सरकार ने नक्सलवाद से निपटने के लिए लेफ्ट विंग एक्ट्रीमिज्म डिवीजन बनाई है। इसने नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए व्यापक नीति बनाई है, लेकिन केंद्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में और अन्य शहरों में कैंसर की तरह फैल चुके शहरी नक्सलियों के लिए इसके पास कोई नीति नहीं है। सरकार को इनसे निपटने के लिए अपने खुफिया तंत्र को और मजबूत करना पड़ेगा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। अर्बन नक्सल सरकारी कार्यालयों और स्थानीय निकायों, विधानसभाओं और संसद में न घुस सकें, इसके लिए कानून बनाना होगा। विश्वविद्यालयों में पांव पसार चुके नक्सलियों को भी सबक सिखाना होगा जो भारतवासियों के कर के पैसे से शिक्षा में सबसिडी लेते हैं और फिर देश को ही तोड़ने का षडयंत्र रचते हैं। सरकार को इन विश्वविद्यालयों का शीघ्र अतिशीघ्र निजीकरण करना होगा ताकि परजीवियों के रूप में इनमें पल रहे अर्बन नक्सलियों से मुक्ति पाई जा सके। नक्सल प्रदर्शनों और हिंसा में भाग लेने वाले छात्र विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक न बन सकें, इसकी भी व्यवस्था करनी होगी। सरकारी कर्मचारियों के लिए देश और उसके संविधान के प्रति वफादारी और निष्ठा की शपथ अनिवार्य होनी चाहिए। जो ये शपथ न ले, या शपथ लेने के बावजूद देश के हितों के खिलाफ जाए, उसे नौकरी से तुरंत बाहर करना होगा।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आएंगे, विपक्षी दलों की आक्रामकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही अर्बन नक्सलियों द्वारा प्रायोजित हिंसा भी बढ़ेगी। कभी दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों के नाम पर तो कभी ‘अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोटने’ के विरोध में तो कभी कल्पित ‘हिंदूवादी फासीवाद’ के बेलगाम प्रसार को रोकने के लिए ये अर्बन नक्सल बड़े पैमाने पर अराजकता, हिंसा और तोड़-फोड़ को बढ़ावा देंगे। ये कुछ बड़े नेताओं की हत्या भी कर सकते हैं। जैसे कि सबूत बार-बार सामने आ रहे हैं, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों जैसे इस्लामिक सांप्रदायिक दल न केवल इनका समर्थन करेंगे, बल्कि इनका बचाव भी करेंगे। ऐसे में सरकार को सतर्क रहना होगा।

“10 करोड़ मुस्लिम महिलाओं के उद्धार बिना भारत की आजादी अधूरी” in Punjab Kesari

हाल ही में मुस्लिम महिलाओं के साथ ज्यादतियों के अनेक खौफनाक मामले सामने आए। बरेली के मशहूर आला हजरत खानदान की बहु रह चुकीं निदा खान ने जब तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई तो आला हजरत दरगाह के दारूल इफ्ता ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से ही बाहर कर दिया। उनका हुक्का पानी बंद कर दिया गया और एलान कर दिया गया कि कोई मुसलमान उनसे संबंध नहीं रखेगा। वो बीमार होंगी तो कोई मुस्लिम डाॅक्टर उनका इलाज नहीं करेगा। उनके मरने पर न तो कोई मौलवी नमाज-ए-जनाजा पढे़गा और न ही उन्हें कब्रिस्तान में दफनाया जाएगा।

बरेली की ही शबीना नाम की महिला को हलाला के नाम पर पहले उसके ससुर और फिर देवर के साथ सोने के लिए मजबूर किया गया। शबीना ने जब इसके खिलाफ आवाज उठाई तो उनके पूर्व ससुराल वालों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी। सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला और बहुविवाह के खिलाफ अपील दायर करने वाली सिकंदराबाद की फरजाना ने पुलिस से सुरक्षा मांगी है क्योंकि उनके पूर्व पति ने उन्हें धमकी दी है कि अगर वो याचिका वापस नहीं लेंगी तो वो उन्हें जान से मार देगा और उनका शरीर बोरे में बंद कर नाले में बहा देगा।

मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ ज्यादतियों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आश्चर्य की बात तो ये है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन तलाक को अवैध घोषित किए जाने के बावजूद छोटी-छोटी बातों पर तीन तलाक दिए जाने का सिलसिला जारी है और अनेक मुल्ला-मौलवी इसे बढ़ावा भी दे रहे हैं।

पहले मुस्लिम महिलाएं ज्यादतियों को अपना नसीब और अल्लाह का फरमान समझ खून का घूंट पी कर रह जाती थीं, लेकिन मोदी सरकार द्वारा मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अन्याय के विरूद्ध स्पष्ट रवैया अपनाने से उनका हौसला निःसंदेह बढ़ा है। अगर उनमें अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने का साहस बढ़ा है तो प्रतिगामी और दकियानूसी ताकतों द्वारा उनका दमन भी बढ़ा है। कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय में आलोड़न तेज गति से बढ़ा है। इसके राजनीतिक अभिप्राय भी हो सकते हैं, लेकिन हम इसे मुस्लिम महिलाओं के स्वतंत्रता संग्राम के रूप में देखते हैं। आजादी के 70 साल बाद ही सही, आज इस मुहिम ने जो रूप-रंग अख्तियार किया है, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि और चाहे जो हो, मुस्लिम महिलाएं पुराने ढर्रे पर लौटने के लिए तैयार नहीं हैं। कठमुल्लों की हरकतों से परेशान हो कर उन्होंने अपने लिए अलग पर्सनल लाॅ बोर्ड ही नहीं बनाया, अब अपने लिए अलग शरीया अदालत भी बना ली है।

लेकिन सवाल ये है कि ये मुहिम क्या फिर इस्लाम के नाम पर एक बार फिर दलदल में फंस कर रह जाएगी या मुस्लिम महिलाओं को भारतीय संविधान और आधुनिक मूल्यों के अनुसार अधिकार मिलेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वो किसी ऐसी धार्मिक प्रथा को मान्यता नहीं देगा जो धर्म के नाम पर महिलाओं के संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करती हो। लेकिन सवाल सिर्फ अदालत द्वारा फैसला सुनाने का नहीं है, उसे लागू करने का भी है। तीन तलाक मामले में हम देख चुके हैं कि मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाली कांग्रेस और अन्य प्रतिगामी पार्टियों ने कैसे तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा में पारित नहीं होने दिया और मुस्लिम महिलाओं की पीठ में छुरा घोंपा। स्वतंत्रता दिवस से कुछ दिन पूर्व ही राज्य सभा में पेश किए गए इस विधेयक से मुस्लिम महिलाओं को बहुत उम्मीद थी। उन्हें लगा थी कि अबकी बार वो भी सही मायनों में ‘स्वतंत्रता दिवस’ मना पाएंगी। लेकिन कांग्रेस जैसी इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया।

आश्चर्य की बात तो ये है कि पहले शाहबानो और फिर तीन तलाक मामले में मुस्लिम महिलाओं को नीचा दिखाने वाली कांग्रेस को आजकल एक बार फिर महिला आरक्षण विधेयक की याद आ रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में पूरी तरह अज्ञानी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर संघ का नाम लेकर महिलाओं को डराने में लग गए हैं। उन्हें लगता है कि महिला आरक्षण की बात करके और संघ का हौवा दिखा कर वो महिलाओं के वोट बटोरने में कामयाब हो जाएंगे, लेकिन ये ख्याली पुलाव से अधिक कुछ नहीं है। संसद और विधान सभाओं में महिलाओं को आरक्षण तो मिलना ही चाहिए, लेकिन क्या करोड़ों-करोड़ मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक अधिकार और प्रतिष्ठा दिलवाने का मसला आरक्षण से बड़ा नहीं है? क्या भारत की आजादी मुस्लिम महिलाओं की आजादी के बिना अधूरी नहीं है?

आजादी के बाद जब संविधान बना तो उसमें महिलाओं को पुरूषों के समकक्ष दर्जा दिया गया। मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 14 भारत के हर नागरिक को ‘समानता का अधिकार’ देता है। यानी संविधान की निगाह में स्त्री और पुरूष दोनों समान हैं। हिंदुओं में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने और महिलाओं की स्थिति बेहतर बनाने के लिए वर्ष 1955-56 में हिंदु कोड बिल पारित किया गया। लेकिन प्रतिगामी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को छुआ तक नहीं गया और मुस्लिम महिलाओं को कट्टरवादी, पुरूषवादी मुस्लिम समाज के रहमो-करम पर छोड़ दिया गया। ध्यान रहे कि संविधान के नीति निर्दशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में भारत सरकार से अपेक्षा की गई है कि वो देश में धर्म आधारित कानूनों की जगह संविधान सम्मत समान आचार संहिता लागू करेगी। लेकिन अफसोस इस्लामिक सांप्रदायिक पार्टियों ने समान आचार संहिता को ही ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर दिया और इसे जानबूझ कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

‘प्रगतिशील’ होने का दावा करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने मुस्लिम पर्सनल लाॅ को क्यों नहीं बदला? मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को जानबूझ कर क्यों कुचला गया? इसका स्पष्ट उत्तर शायद ही किसी कांग्रेसी के पास हो। लेकिन ये तो साफ है कि आजादी के बाद मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के प्रति नेहरू की उदासीनता ने उनका जीवन नरक बना दिया। देश में ‘धर्म निरपेक्ष’, ‘समाजवादी’ संविधान होने और लंबे अर्से तक स्वयं एक महिला (इंदिरा गांधी) के प्रधानमंत्री होने के बावजूद मुस्लिम महिलाओं के साथ सौतेला व्यवहार जारी रहा। इंदिरा गांधी ने तो मुस्लिम महिलाओं को गर्त में ढकेलने के लिए एक और इंतजाम किया – उन्होंने आॅल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड नाम का एक गैरसरकारी संगठन बनवा दिया। कांग्रेसी मौलानाओं के इस स्वयंभू संगठन ने देश में मुस्लिम कानूनों के संरक्षण और व्याख्या का काम खामखा अपने जिम्मे ले लिया। हद तो तब हुई जब इन मौलानाओं ने राजीव गांधी सरकार को शाहबानो गुजारा भत्त मामले में कानून बदलने के लिए मजबूर किया। तीन तलाक वाले मामले में भी इस स्वयंभू संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में जो शपथपत्र दायर किया वो विकृत मानसिकता को निकृष्टतम नमूना है।

मौलाना तो मौलाना, तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे मुस्लिम पुरूष, स्त्रियों के बारे में क्या सोचते हैं इसे तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के जज अब्दुल नजीर के फैसले से समझा जा सकता है जिन्होंने महिला विरोधी मुस्लिम पर्सनल लाॅ को मुसलमानों का मौलिक अधिकार बता दिया था।

इस्लामिक सांप्रदायिक कांग्रेस और अन्य मुस्लिम महिला विरोधी दलांे के सतत षडयंत्रों और घटिया वोट बैंक राजनीति के बावजूद मुस्लिम महिलाओं की हक की लड़ाई आज निर्णायक दौर में पहुंच गई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि उन्हें भारत के नागरिक के रूप में संविधान प्रदत्त अधिकार मिलें और इस पुरानी रटंत को त्याग दिया जाए कि ‘मुस्लिम’ अपने मामले खुद हल करेंगे और अन्य समुदायों और संस्थाओं को उनके मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाला हर संगठन धर्म और जाति से ऊपर उठ कर मुस्लिम महिलाओं के समर्थन में सामने आए। जो दल मुस्लिम महिलाओं से गद्दारी कर रहे हैं, उन्हें सबक सिखाना ही चाहिए। एक अनुमान के अनुसार भारत में मुसलमानों की आवादी करीब 20 करोड़ है। इसमें आधी यानी करीब 10 करोड़ महिलाएं भी होंगी। क्या 10 करोड़ आबादी को अंधेरे में रख कर कोई देश तरक्की कर सकता है?

“The Trafficking of persons (Prevention, protection, and rehabilitation) Bill: Transporting stolen lives from a hopeless present to an optimistic future” In TOI Blog

23-year-old Yazidi, Nadia Murad has been designated as the Ambassador for Dignity of Survivors of Human Trafficking for the UN’s Drugs and Crime body.  She is also a Nominee for the Nobel Peace Prize this year.

If humans have learned one thing from the past of their mistakes, it is to not blame the victim, but engage themselves in waging wars against the perpetrators of the crime that have subsumed their spirit.

This approach is a penetrating beam of light in a carton of doom that this world is racing to resemble.

So, is the Trafficking of Persons (Prevention, Protection, and Rehabilitation) Bill, introduced in Lok Sabha by the Minister of Women and Child Development, Maneka Gandhi on July 2018.
The bill accords importance to creating a National Anti Trafficking Bureau for reaching even grass-root level investigation in trafficking cases.

To tackle this menace, Anti Trafficking Relief and Rehabilitation Committees (ATC) will be established in national, state and district levels, which are to take care of compensation, repatriation, and reintegration. There would be protection homes and designated courts in addition.

While critics look at it as endless bureaucratisation, let’s face it, the trafficking racket is a spider’s web that sprawls across continents and begins in the most ordinary places.

Human trafficking is an umbrella term which subsumes trafficking for the purpose of sexual exploitation, forced labour, slavery, drug smuggling, organ smuggling and often for malicious activities such as terrorism, regional violence.

About 8 children go missing every hour, 4 are sexually abused,
2 raped.

In this organised crime, millions are being oppressed at homes, shops, brothels, colluding in an illicit $150 billion trade.
In his novel called ‘A Walk Across the Sun’ Corban Addison gives a chilling account of international trafficking for sexual slavery and drug smuggling in human beings. He explains how the nexus between corrupt police officials, pimps, locals is a net spread wide to reach the international arena. Emerging through the gruesome tale is a revelation and a haunting solution; he says “Trafficking will stop when men stop buying women. Until that happens, the best we can do is win one battle at a time.”

The fight against this evil is not a recent one but the approach is renewed.

Association of Nobel laureates in this war against this crime is a reflection of the urgency, importance of agency and pro-active engagement of civil society.

Nobel Laureate Kailash Satyarthi has been proactively engaged in the struggle against the suppression of children and young people.
In his Nobel peace prize speech, he narrates the woes of a trafficked child labourer.

“Is the world so poor that they cannot give a toy and a book, instead of forcing me to take a gun or a tool?”
Innocence has been cashed on for a donkey’s life of work.
Neither, worth the consequent despair.

However, human trafficking is not limited to kidnapping children and women for labour and sexual exploits as has been largely understood.

One of its myriad forms could be seen in the recent Rohingya refugee contention; here is the other dimension, discussed less often.

An international organisation of Migration has reported that there is evidence of trafficking of Rohingya refugees in India.

Though the media placed the moral compass on the shoulders of the government, it forgot to do its duty and bring to the surface, the fact that these very infiltrators are potential pawns. Speculation is rife that they chose Jammu for the proximity to Pakistan, a politically motivated migration. It points out to a probabilistic angle of terrorism and unnoticed crime. Media reports are unnerving, as they suggest humanitarian aid to migrants and fail to approach it with a circumstantial understanding.

Even religious places are no longer a safe haven.
With Missionaries and orphanages selling children, the age of doom is here.

It is not to malign religious institutions but to chide the clandestine activities that they carry forward under the cloak of benevolence.

Largely, it is the poor, underprivileged, under-informed, naïve who are unfortunate victims of trafficking.

With Government’s policies such as Ujjwala, Swadhar Greh, Juvenile Justice Act 2002, Code of Criminal procedure the issue of rehabilitation is well met.

Another innovation brought in by the government, the Aadhar card could be an effective move, as it keeps records of all the adults and children who are citizens of the country. Although there are hurdles in information storage and execution, these are more like teething problems.

If only people focus on the potential benefits more than minor inconveniences, the issues plaguing humanity can be addressed in a rightful way.

Trafficking is a crime against humanity. The war is to be collectively waged.

With this bill, there is hope that awareness will beget change.
This battle cannot, however, be won by the solitary action of the government.

It requires the sympathy of media, proactive involvement by civil society, and victims must come to the forefront.

Citizens must be welcoming to changes in the legal system.
Someone rightly said, to do nothing would be to die one day at a time.

“मोदी के नेतृत्व में नई उंचाइयों पर पहुंचे भारत-अमेरिका संबंध” in Punjab Kesari

कुछ विपक्षी दलों ने बिना जाने-समझे भारत-अमेरिका संबंधों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था। मुसलमान वोटों की सांप्रदायिक राजनीति करने वाली भारत की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की झप्पी को लेकर अपमानजनक ट्वीट तक कर डाले। लंबे समय तक सत्ता में रह चुकी इस पार्टी से ऐसे बचकाने बर्ताव की उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन आजकल ये पार्टी जिन हाथों में है और जैसे लोग इसका सोशल मीडिया विभाग संभाल रहे हैं, उनसे किसी परिपक्वता की आशा करना भी बेमानी है।

कांग्रेस भूल गई कि जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उसने झूठा दुष्प्रचार करके उनकी अमेरिका यात्रा तक पर प्रतिबंध लगवा दिया था। लेकिन इसके बावजूद मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों जाॅर्ज बुश और बराक ओबामा के समझौतों का न केवल सम्मान किया बल्कि उन्हें आगे भी बढ़ाया। मोदी ने अपनी अमेरिका नीति में बिना किसी दुराग्रह के सिर्फ एक बात का ध्यान रखा और वो है – भारतीय हित।

पिछले कुछ दिनों में भारत-अमेरिका संबंधों में आए उल्लेखनीय सुधार की अगर हम गहराई से समीक्षा करें तो पता चलेगा कि ये उपलब्धियां एक दिन में हासिल नहीं हुईं। इनके पीछे दोनों देशों में विकसित हुई गहरी समझ है जिसे पहले मनमोहन सिंह और फिर मोदी ने आगे बढ़ाया। दीगर बात ये है कि दोनों देशों में सरकारें बदलीं, लेकिन परस्पर हितों में सहयोग और सामंजस्य की जो समझ विकसित हुई वो अक्षुण्ण रही। बहुमत के साथ सरकार में आए मोदी ने तो इसे नई ऊर्जा और दूरदर्शिता के साथ आगे बढ़ाया। आज हम निसंदेह ये कह सकते हैं कि भारत-अमेरिका संबंध आज जिस उंचाई पर हैं और जितने मजबूत हैं, वैसे पहले कभी नहीं थे।

जून 7, 2016 को अमेरिका ने भारत के साथ संयुक्त वक्तव्य में भारत को अपना ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ (महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी) घोषित किया। इस वक्तव्य का शीर्षक था – द यूनाइटेड स्टेट्स एंड इंडियाः एनड्योरिंग ग्लोबल पार्टनर्स इन द ट्वंटी फस्र्ट सेंचुरी (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और भारतः 21वीं सदी में स्थायी वैश्विक सहयोगी)। पिछले साल 22 अगस्त को ट्रंप द्वारा घोषित की गई नई दक्षिण एशिया नीति में इसकी प्रतिध्वनि साफ सुनाई देती है। ट्रंप ने इसमें न केवल भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में भारत की महत्वपूण भूमिका को रेखांकित किया बल्कि पाकिस्तान की इच्छा के विरूद्ध अफगानिस्तान में भी उसे अपना सहयोगी घोषित कर दिया। अमेरिका ने मोदी के कार्यकाल में भारत को दुनिया के चार बड़े मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम (बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाएं) में से तीन में प्रवेश करने की मदद की। ये हैं – मिसाइल टेक्नोलाॅजी कंट्रोल रिजीम (प्रवेश तिथि – जून 27, 2026), वासनर अरेंजमेंट (प्रवेश तिथि – दिसंबर 7, 2017) और आॅस्ट्रेलिया ग्रुप (प्रवेश तिथि – जनवरी 19, 2018)। चैथा महत्वपूर्ण मल्टीलेट्रल एक्सपोर्ट कंट्रोल रिजीम है – न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप। अमेरिका ने इसमें प्रवेश के लिए भी पूरी मदद की लेकिन चीन के अड़ियल रवैये के कारण भारत इसमें शामिल नहीं हो सका। हालांकि इसके लिए भी प्रयास जारी है।

भारत को विश्वस्त सहयोगी मानते हुए अमेरिका ने इसी वर्ष 31 जुलाई को भारत को स्ट्रैटेजिक ट्रेड आॅथोराइजशन -1 (एसटीए – 1) देश का दर्जा दिया। बहुत जल्दी, यानी चार अगस्त को इस संबंध में अधिसूचना भी जारी कर दी गई। इसके पश्चात भारत का दर्जा अमेरिका के नैटो (नाॅर्थ एटलांटिक ट्रीटी आॅर्गनाजेशन) सहयोगियों के समकक्ष हो गया। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका भारत को उच्च तकनीक वाले उत्पाद और रक्षा उपकरण बिना कानूनी अड़चनों और भारी-भरकम कागजी कार्यवाही के बेच सकेगा। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विलबर राॅस के अनुसार एसटीए – 1 का दर्जा भारत को रक्षा क्षेत्र में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी उच्च तकनीक वाले उत्पादों के आयात के लिए बेहतर अवसर प्रदान करेगा। अमेरिका की निर्यात नियंत्रण व्यवस्था में भारत के दर्जे में यह महत्वपूर्ण बदलाव है। पिछले सात वर्षों में भारत अमेरिका से 9.7 अरब डाॅलर का उच्च तकनीक का सामान खरीद सकता था, लेकिन विभिन्न प्रतिबंधों के कारण यह संभव नहीं हो सका, परंतु अब ये संभव हो सकेगा।

अमेरिका ने जिन 36 देशों को ये दर्जा दिया है उनमें से अधिकतर नैटो सहयोगी हैं। अब तक एशिया में ये दर्जा सिर्फ दक्षिण कोरिया और जापान को ही दिया गया था। जाहिर है भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस कदम को स्वागत किया। मंत्रालय ने कहा – “भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ घोषित किए जाने का ये तार्किक उत्कर्ष है। ये इस बात को एक बार फिर स्थापित करता है कि संबंधित बहुपक्षीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं के जिम्मेदार सदस्य के रूप में भारत का रिकाॅर्ड बेदाग है। इससे भारत और अमेरिका के बीच रक्षा और उच्च तकनीक के क्षेत्र में सहयोग को बढ़ावा मिलेगा।

इस बीच दो अगस्त को अमेरिकी संसद ने नेशनल डिफेंस आॅथोराइजेशन एक्ट – 2019 के तहत भारत को ‘काउंटरिंग अमेरिकास एडवरसरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ (काटसा) से छूट देने का विधेयक भी पारित कर दिया। भारत रूस से लगभग 4.5 अरब डाॅलर की लागत से एस-400 ट्राइंफ एयर डिफेंस सिस्टम खरीदना चाहता है जिसमें रूस के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों से बाधा आ रही थी। बराक ओबामा के कार्यकाल में वाइट हाउस में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी और सेनेट आम्र्ड सर्विसेस कमेटी के वरिष्ठ सदस्य रहे अनीश गोयल कहते हैं कि काटसा छूट के लिए अमेरिकी संसद की प्रशंसा की जानी चाहिए। ऐसा करके संसद ने दोनों देशों के संबंधों में आने वाले तनाव को दूर कर दिया है। ये इस बात का मजबूत संकेत है कि अमेरिका, भारत से अपने संबंधों को कितना महत्व देता है।

पिछले कुछ ही दिनों में अमेरिका ने जिस सक्रियता से भारत के साथ उच्च तकनीक और रक्षा क्षेत्र में सहयोग के क्षेत्र में पेश आ रही बाधाओं को दूर करने का प्रयास किया है और जैसे भारत की रक्षा जरूरतों को समझते हुए रूस से उच्च तकनीक वाली रक्षा सामग्री खरीदने के लिए छूट दी है, उससे भारत के प्रति अमेरिका की संवेदनशीलता तो प्रकट होती ही है, साथ में यह भी स्पष्ट होता है कि वो भारतीय-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसेफिक रीजन) में अपनी रणनीति को लागू करने के विषय में कितना गंभीर है जहां चीन का व्यावसायिक और रणनीतिक दखल लगातार बढ़ता जा रहा है।

चीन अगले 50 वर्षों के दौरान अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों को देखते हुए इस क्षेत्र में महत्वाकांक्षी योजनाएं बना रहा है। म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान, मालदीव जैसे भारत के पड़ोसी देशों तक ही नहीं चीन ने मध्य एशिया, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका तक में अपने पैर पसारे हैं। वो दुनिया के 76 देशों में परियोजनाएं विकसित कर रहा है और रेल, सड़क, समुद्री मार्गों से ही नहीं दुनिया भर से वायु मार्गों से जुड़ने की योजना भी बना चुका है।

चीन को लगता है कि जैसे 19वीं सदी में ब्रिटेन और 20वीं सदी में अमेरिका की शक्तिशाली नौसेनाओं ने नौसैनिक अड्डों के विश्वव्यापी नेटवर्क के माध्यम से अपने व्यापारिक अधिपत्य को बढ़ाने का काम किया, वैसे ही अगर उसे भी अगली सदी में आगे बढ़ना है तो उसे भी दुनिया भर में, और खासतौर से भारतीय-प्रशांत क्षेत्र में अपने अड्डे बनाने होंगे जहां विश्व के व्यस्ततम जलमार्ग मौजूद हैं। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए वो सिर्फ अड्डे ही नहीं बना रहा, लंबी चैड़ी नौसेना भी तैयार कर रहा है।

चीन की नीयत और योजनाएं अब किसी से छुपी नहीं हैं। जाहिर है अमेरिका ने इसकी काट निकालने के लिए योजना तैयार कर उसे लागू करना भी शुरू कर दिया है। भारत इस योजना का महत्वपूर्ण अंग है। अगर अमेरिका ने इस क्षेत्र में भारत को अपना सहयोगी चुना है तो उसे तकनीकी और सैन्य दृष्टि से मजबूत भी बनाना होगा, उसे आधुनिकतम हथियार भी देने होंगे। अमेरिका ने इसके लिए ईमानदारी से प्रयास भी किए हैं। इस पूरी योजना का रणनीतिक महत्व है तो यह भी सच है कि इससे अमेरिका को हथियारों का नया और बड़ा बाजार भी मिलेगा। भारत को चाहिए कि वो अमेरिका का सहयोगी तो बने पर अपने स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए। चीन जैसे पड़ोसी देश को दुश्मन न बनाया जाए, लेकिन उसके अतीत को देखते हुए तैयारी भी पूरी रखी जाए।

आगामी छह सिंतबर को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जिम मैटिस की भारतीय विेदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ 2$2 वार्ता है। ट्रंप और उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन के शिखर सम्मेलन में व्यस्त रहने के कारण अमेरिका में प्रस्तावित यह वार्ता पहले टाल दी गई थी, अब ये भारत में होगी। 2$2 वार्ता में भारत के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री एक साथ अमेरिकी विदेश और रक्षा मंत्री से बात करते हैं ताकि दोनों क्षेत्रों के बारे में समग्र और व्यापक बातचीत हो सके और अड़चनें दूर कर राजनयिक और रणनीतिक मसलों को जल्दी से जल्दी सुलझाया जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस उच्च स्तरीय बैठक के बाद दोनों देशों के संबंधों में आपसी समझ और गहरी होगी और जमीनी स्तर भी कामकाज को और गतिशील बनाया जा सकेगा।

“Which colour is your violence? Scrutinising mob lynching in India through transparent glasses” in TOI Blog

One’s heart bleeds for the loss of life, whether it belongs to one religion or the other, one caste or the other.

The incidents of mob lynching are as painful as stabbing a dagger in the heart of the country. The attacks to which several lives have succumbed are deeply condemned.

India has sadly witnessed mob violence since its inception and yet it takes on a different kind of podium today; one where it is not just about religious differences as used to be the case, post partition, but increasingly about the involvement of agencies that orchestrate moral sensitivities of the society.

It is deeply perturbing that one’s bereavement is cashed upon by certain people for political mileage.

Pratik Sinha of Alt news adds an interesting perspective to the new age WhatsApp driven mob violence, he says , “Suddenly people from the rural areas in particular are inundated with information and are unable to distinguish from what is real and what is not. They tend to believe whatever is sent to them.” The nature of trigger has changed over time and so has the indulgence of Opposition parties.

Media has been playing the blame game back and forth and waiting for the ball in the court to be coloured by the accusations launched by one party against another. It is a strong tactic for prime time and TRP but a heartless one indeed.

With no sufficient proof, with a severely deficient background check, and a largely biased lobby, how can one expect the truth to be delivered, the way it is.

It is quite unsettling that the news reports have been relaying Hindu religious fundamentalism like a parrot lured with red chillies. The victims of mob lynching are always shown as wearing the green garb while the perpetrators of crime, an orange one.

Why are so many attacks on Hindus dusted under the carpet?

Killing of Hindu devotees at Akshradham temple of Gandhinagar, temples of Jammu and Kashmir , Godhra have been called as acts of mere terrorism and it has been categorically stated time and again that terrorism has no religion.

However hooliganism has religious back support?

When Muslims are killed, they are viewed as minority, when Hindus are killed it is mere behavioural condemnation with suddenly no weightage given to religion? When a Muslim is killed, the murderer is naturally presumed to be given shelter and shade of RSS propaganda, even though no report, no statistics can verify it.

Where Islam is guarded against, Hinduism is not?

Such divisive treatment is the root cause of perpetuating violence.
The point of this argument is not to portray Hindus as victims but rather to show that the acts of hate crime need to be viewed with a zeal for justice for individual lives, not with a politically tarnished religious lobby.

Furthermore, the term ‘Cow vigilantism’ is being used as sensitive bait where the dialogue between two religions can be made into a political strife and be used in divisive voting.

The opposition parties seem to want to hit two birds with one stone with the issue of cow slaughter as they wage wars between the sensitivities of Dalits and lower caste men and Muslims as opposed to Hindus.

Yogi Adityanath made a clear speech where he stated that the people’s lives are important and so are the cows. This was misinterpreted and misquoted as cows being more important than people and hence once again paid media sowed the seeds for hate and hate induced crime.

Some went on to put words in his mouth and make his concern look like apathy towards loss of life. If anything, the Chief Minister of Uttar Pradesh has acted as a law abiding minister and only banned illegal slaughterhouses. Why, is not the protection of cows a mandate of the Directive Principles of State Policy, Article 48?

Prime Minister Narendra Modi has condemned the self styled cow vigilantes and also brought to the surface how these are anti social elements, playing the gossip mongers, hate spreaders, pulling wool over the eyes of innocent people.

It is in the keeping with the issue of circulation of false news and politically motivated messages that the Government has decided to revamp the structure.

As observed, fake news in India travels extensively through Apps such as ‘Whatsapp’ and these become the fulcrum of mob violence.

A four-member committee headed by Union Home Secretary Rajiv Gauba has been constituted to tender suggestions to deal with the issue of mob lynching. Recommendations will be submitted to Home Minister Rajnath Singh and further on to Prime Minister Narendra Modi.

The selective screening of issues is another of the dirty tricks employed by paid media. Why does the news of BJP workers being killed by TMC in West Bengal only get a one day, one para coverage?

A certain nexus of the opposition parties wants to oust the party in power by using these diabolic narratives.

It is also uncanny that such controversies always seem to crop up right around the elections.

Is the life of a party person less valuable than a socially religious person? What a low move to kill the party workers because they have performed well in Panchayat polls. However, the loss of life is condemned less here because well, there are no religious signs to play with?

If violence has a colour it’s not green or orange, it’s red, it’s blue back.

We condemn violence, we condemn death, we condemn cheap tricks that infest upon the wounds of the mothers and fathers, brothers and sisters of our nation.

“इमरान! तुम सेना के बूट पाॅलिश करने वाले नहीं तो और क्या हो?” in Punjab Kesari

चुनावी नतीजे आने के बाद अपने पहले विजय संबोधन में इमरान खान ने भारतीय मीडिया से शिकायत की कि उसने उन्हें बाॅलीवुड फिल्मों के विलेन (आतंकी पाकी सेना के एजेंट) के तौर पर पेश किया। अगर इमरान के नजरिए से देखें तो हो सकता है कि उनकी शिकायत जायज हो, लेकिन अगर ठोस तथ्यों के आधार पर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मीडिया का रवैया बहुत हद तक सही है। वैसे भी भारतीय मीडिया इमरान की तरह सेना के इशारों पर नहीं चलता जिन्हें उनकी दूसरी पूर्व पत्नी रेहाम खान सेना का ‘बूट पाॅलिशर’ करार दे चुकी हैं।

भारतीय मीडिया अगर इमरान को सेना का एजेंट मानता है जो इसके पीछे ठोस कारण भी हैं। बात शुरू करते हैं प्री-पोल रिगिंग से यानी चुनाव से पहले की धांधली से। क्या ये अकस्मात था कि पाकिस्तानी अदालतों ने चुनाव से एन पहले ताबड़तोड़ कई फैसले सुनाए और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को जेल भिजवा दिया? क्या ये महज संयोग था कि शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज (पीएमएलएन) के अनेक मजबूत उम्मीदवारों को धमकाया गया और पार्टी बदलने के लिए मजबूर किया गया? क्या ये संयोग था कि चुनाव प्रचार के दौरान इमरान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को वरीयता दी गई जबकि पीएमएलएन और बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी) को अनेक स्थान पर रैली करने की इजाजत तक नहीं दी गई? आखिर किसकी शह पर अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी हाफिज सईद के गुर्गों को चुनाव लड़ने की मोहलत दी गई? आखिर क्यों एन चुनाव से पहले 17 जुलाई को इमरान खान ने हरकत-उल-मुजाहीदीन (एचयूएम) के सरगना और घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी फजलुर रहमान खलील को उनके समर्थकों समेत अपनी पार्टी में शामिल कर लिया? आखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने इमरान को जिताने के लिए पूरी बिसात बिछाई….इतनी मेहनत (धांधली) की? आखिर क्यों सेना और इमरान की आलोचना करने वाले अखबारों और न्यूजचैनलों पर गाज गिराई गई, उनका प्रसारण का रोका गया?

इसका जवाब इस्लामाबाद हाई कोर्ट के जज शौकत अजीज सिद्दिकी ने दिया। उन्होंने इसके लिए साफ तौर से पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने साफ कहा कि आईएसआई अपने इरादे पूरे करने के लिए अदालतों, मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सबको धमकाती है। जज सिद्दिकी को 30 जुलाई को उनकी इस ‘हिमाकत’ के लिए सजा भी दे दी गई। वो इमरान खान नाअहली (अयोग्यता) केस की सुनवाई करने वाली डिवीजनल बैंच के सदस्य थे। उन्हें बड़ी बेशर्मी से इससे हटा दिया गया और उनकी जगह जज मियां गुल हसन औरंगजेब को शामिल किया गया। इस मामले की सुनवाई एक अगस्त को होनी है, लेकिन फैसला क्या आएगा, लगता है ये भी पहले ही तय हो चुका है।

अब बात करते हैं चुनाव के दौरान होने वाली धांधलियों की। आगे बढ़ने से पहले ये बता दें कि ये सिर्फ भारतीय मीडिया नहीं था जिसने पाकिस्तानी चुनावों को फर्जी करार दिया। पाकिस्तान के अनेक दलों ने चुनाव नतीजों को स्वीकार करने से इनकार किया है। पीएमएलएन और पीपीपी ने तो चुनाव आयोग के अधिकारियों के इस्तीफे तक मांग लिए। 27 जुलाई को विपक्षी दलों की बैठक में पीएमएलएन और मुŸााहिदा मजलिए-ए-अमल ने चुनाव नतीजों को खारिज करते हुए दोबारा चुनाव करवाने की मांग की। नेशनल असेंबलीऔर राज्यों की विधानसभाओं के करीब 300 उम्मीदवारों ने फिर से मतगणना की मांग की है।

इमरान खुद को पाकिस्तान का नया हीरो मानने की गलतफहमी पाल सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें खुद नहीं सोचना चाहिए कि उनकी और आईएसआई की इतनी कड़ी मेहनत के बावजूद क्यों वो नेशनल असेंबली और पंजाब विधानसभा में सादा बहुमत तक नहीं हासिल कर सके? ऐसा क्या हुआ कि आतंकियों को चुनाव लड़वाने की महत्वकांक्षी योजना क्यों मुंह के बल गिर पड़ी? आईएसआई की पूरी मेहनत के बावजूद वो एक सीट तक नहीं हासिल कर सके?

इमरान क्या इस बात का जवाब देना चाहेंगे कि जो मतगणना चंद घंटों में पूरी हो जाती है, वो चार दिन तक भी पूरी क्यों नहीं हो सकी? नेशनल असेंबली की करीब 18 सीटें ऐसी हैं जिनमें इमरान की पार्टी की जीत का अंतर 1,000 मतों का भी नहीं है। 23 सीटों में जीत का अंतर 5,000 से भी कम है, जबकि 41 सीटों में 10,000 से भी कम। ध्यान रहे इन सीटों पर रिजेक्टेड वोट हजारों में हैं।

मतगणना में देरी क्यों की गई? अन्य सीटों के मुकाबले चुनींदा सीटों पर ही रिजेक्टेड वोट इतनी बड़ी तादाद में क्यों पड़े? क्या पाकिस्तान के वोटर इतने जाहिल हैं कि वो ठीक से वोट तक नहीं दे सकते? आखिर एन चुनाव नतीजों की घोषणा से पहले ही चुनाव आयोग का सर्वर क्यों जवाब दे गया? ऐसे हालात में पाकिस्तानी जनता और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी क्यों आंख मंूद कर मान ले कि पाकिस्तानी चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हुए?

27 जुलाई को इस्लामाबाद में अपने संवाददाता सम्मेलन में यूरोपियन यूनियन के निगरानी दल ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान सभी राजनीतिक दलों को बराबरी से अवसर नहीं मिला। इमरान भले ही इस बार के चुनावों को सबसे साफ-सुथरे बता रहे हों, लेकिन यूरोपियन यूनियन इलेक्शन आॅब्सर्वेशन मिशन (ईयूईओएम) के चीफ आॅब्सर्वर माइकल गेहलर ने साफ कहा, “इस बार के चुनाव 2013 के चुनावों जितने अच्छे नहीं थे। हालांकि सभी पार्टियों को निष्पक्ष तरीके से समान अवसर देने के लिए अनेक वैधानिक उपाय मौजूद थे, लेकिन हमारा निष्कर्ष है कि न तो इस मामले में समानता बरती गई और न ही पार्टियों को बराबरी से अवसर मिले। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व सŸाारूढ़ दल को हानि पहुंचाने के लिए व्यवस्थागत तरीके से प्रयास किए गए। राजनीतिक दलों, नेताओं, उम्मीदवारों और चुनाव अधिकारियों पर लगातार हमलों ने चुनाव प्रचार के माहौल को प्रभावित किया।“

यूरोपियन पार्लियामेंट इलेक्शन आॅब्सर्वेशन डेलीगेशन के प्रमुख जीन लैम्बार्ट ने मतदान के दौरान मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में फौजियों की उपस्थिति पर आपŸिा दर्ज करवाई। उन्होंने कहा, “हम मतदान केंद्रों के भीतर बड़ी तादाद में सुरक्षाबलों की उपस्थिति से हैरान थे। हम सुरक्षा की आवश्यकता समझते हैं, लेकिन चुनाव सिविल सोसायटी का काम होता है, हम चाहते हैं कि इसमें सेना से ज्यादा सिविल संस्थाओं का सुपरविशन हो, खासतौर से मतदान केंद्रों के भीतर जहां लोग वोट डालते हैं।”

यही नहीं काॅमनवेल्थ पर्यवेक्षकों ने भी अनेक विषयों पर आपŸिा जताई। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपनी विज्ञप्ति में कहा, ”शासन-प्रणाली की मजबूत लोकतांत्रिक और सिविल संस्थाओं का विकास पाकिस्तान के दीर्घकालिक स्थायित्व और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में अमेरिका, मतदान पूर्व चुनावी प्रक्रिया में त्रुटियों को लेकर पाकिस्तानी मानवाधिकार आयोग की चिंताओं से सहमति जताता है। इनमें अभिव्यक्ति की आजादी पर लगाम लगाना भी शामिल है….हम इस विषय में ईयूईओएम के निष्कर्षों से भी सहमत हैं।“

यूरोपियन यूनियन, काॅमनवेल्थ और अमेरिका इशारों ही इशारों में जिन्हें पाकिस्तान के लोकतंत्र का दुश्मन बता रहे हैं, क्या इमरान उसे नहीं समझ पा रहे हैं? क्या ये ‘लोकतंत्र के दुश्मन’ ही तो इमरान के दोस्त नहीं हैं? ये सिर्फ भारत का मीडिया ही नहीं है जो उन्हें सेना का पिट्टू मानता है, पूरी दुनिया और खुद उनके देश के लोग और चुने गए स्वतंत्र उम्मीदवार भी यही मानते हैं जिन्हें इमरान को समर्थन देने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

इमरान ने चुनाव प्रचार के दौरान जिस प्रकार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मुसलमानों का हत्यारा’, झूठा और न जाने क्या क्या कहा, वो हो सकता है भारत में मुसलमान वोट बैंक की राजनीति करने वाले दलोें को बहुत भाया हो, लेकिन उससे करोंड़ों-करोड़ लोगों को इमरान से वितृष्णा भी हुई है। इमरान ने नवाज शरीफ को मोदी का यार बताते हुए नारा लगाया – जो मोदी का यार है, वो देश का गद्दार है। नवाज शरीफ ने दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए पर इमरान ने उनपर ‘देश बेचने’ का आरोप लगा दिया। न केवल चुनावी भाषणों में, बल्कि अपने विजय संबोधन में भी इमरान ने जैसे कश्मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद को आजादी की लड़ाई बताया और भारतीय फौज को गाली दी, उससे भारत की आम जनता का उनसे मोहभंग होना स्वाभाविक है।

ये आश्चर्यचकित ही करता है कि जो इमरान पूरे चुनाव प्रचार के दौरान नवाज शरीफ को भारत से व्यापार के लिए ‘गद्दार’ बताते रहे, वो अपने विजय संबोधन में आतंकवाद को जायज ठहराते हुए भी भारत से दोस्ती के गीत गाने लगे, भारत के साथ ‘व्यापार संबंधों’ की बात करने लगे? डूबती हुई पाकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए उन्होंने अपने चुनाव घोषणापत्र में 100 दिवसीय कार्यक्रम की घोषणा की है। जाहिर है, भारत के साथ व्यापारिक संबंध इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए उन्हें अब थूक कर चाटना भी मंजूर है। इमरान, शरीफ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन चले अपने धरने को इतनी जल्दी भूल जाएंगे, ऐसा सोचा भी न था।

इमरान खान! भारतीय मीडिया तुम्हें ‘बाॅलीवुड के विलेन’ की तरह नहीं पेश कर रहा, तुम्हें सिर्फ ‘सच का आइना’ दिखा रहा है। तुम्हारी पार्टी ने तुम्हें पाकिस्तान के युवाओं की धड़कन के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है, हालांकि हम ये भी नहीं मानते। इस बार कुल 51.85 प्रतिशत मत पड़े, इसमें सिर्फ तुम्हारे समर्थक और युवा ही नहीं, दूसरी पार्टियों के समर्थक और सभी आयुवर्ग के लोग थे। ऐसे में हमारे लिए ये बात गले के नीचे उतारना मुश्किल है कि तुम युवाओं के दिल की धड़कन हो, लेकिन जैसे आईएसआई ने तुम्हें जितवाने के लिए जी जान एक कर दिए, उससे ये तो साफ है कि तो सेना के मुखबिर हो।

भारत की सेना को लतिया कर तुम भारत के नेताओं का समर्थन नहीं हासिल कर सकते। पाकिस्तान के आवाम ने हाफिज सईद के उम्मीदवारों को धक्का दे कर ये स्पष्ट कर दिया है कि वो आतंकवाद के समर्थक नहीं है। अगर तुम्हारी सेना खुद ये बात समझ जाए, या तुम उन्हें अपनी नीतियों बदलने के लिए तैयार कर सको तो दोनों देशोें के संबंध बेहतर हो सकते हैं। याद रखना आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते। अगर तुम और तुम्हारी सेना कश्मीर सहित पूरे भारत में अपना आतंकी नेटवर्क समेटने के लिए गंभीरता दिखाओगे तो भारत तुम्हारी अवश्य मदद करेगा। पहल तुम्हें और तुम्हारी सेना को ही करनी होगी।

“Missionaries: A new age Trojan horse tactic?” in TOI Blog

In a poignant upturn of events, what was seen as a messiah of justice and harbinger of reform has been concealing a dark truth.

Missionaries of Charity, a Roman Catholic religious congregation established by Mother Teresa in 1950 have been embroiled in unfortunate events. Although established with aim to aid the aged, mentally ill, unmarried mothers, sick abandoned children that are often left to fend for themselves, the functioning of missionaries has rather become inconspicuous.

India is a land of virtues, of religious ethics that guide the daily lives of millions. The Hindu societal fabric vows to the concept of ‘Vasudhaiva Kutumbakam’ wherein, the emphasis is laid on two factors of primary importance, the ‘World’ and the ‘Family’ An immense amount of significance is catered to the familial values and the binding glue is that of motherly love, fatherly protection. Yet tales of those that are deprived of this core value are blemished with controversies that are beyond their own understanding.

Children are considered to be the universal epitome of love and yet in these homes where they are promised a better future, their lives lead an uncertain trajectory.

Due to corruption of agencies and mechanisation of the modern day institutions, a great deal of ethics has been lost to the wind. At these homes where unmarried pregnant women are given shelter, and newborn children a ray of hope, a topsy turvy administration has paved way to child trafficking.

Unmarried mothers are given the option to either take their children with them or leave them in the charity houses.

However, the missionaries are to follow a strict protocol and maintain a registry of the babies thus born.

It is rather upsetting that such institutions with the endeavour to save lives are themselves not immune from contemporary social evils.

The matter came to light when a couple in Ranchi approached the Child welfare committee, complaining that after having spent a sum of 1.2 lakh, the staff that promised to deliver the baby didn’t stick to their word. Naïve as they seemed to be about the formal procedure of adoption, or maybe they were circumventing laws of adoption, owing to the misfortune of its inconvenience and delay through the legal route, the matter is yet to be probed.

Sister Koshlenia and staffer Anima Indwar of Nirmal Hriday have been arrested. Unsettling confessions were made during the interrogation, which revealed that about 4 babies had been sold. It’s a bleak day for humanity, as the pious and seemingly self righteous have committed an unforgivable sin.

The Child welfare committee has issued instructions that all state governments must inspect Missionaries of Charities immediately. 12 centres of congregation in the state are under scrutiny.

Apart from the blatant violation of protecting the children, the Missioners are under the scanner for a probable violation of the FCRA Act (Foreign contribution regulation act)

As missionaries receive a score of foreign funds, it is probed whether these funds have been misappropriated for godforsaken reasons.

The unfortunate malfeasance brings to surface twin issues.
While child trafficking has been cemented in the constitution as a punishable offence, adoption certainly needs an overhaul.

In India in order to adopt, one has to go through an entangled web of civil courts and family courts and painstakingly long procedure, which may at times take up to years. It has lead to wretched consequences such as illegal adoptions, sex racket, child trafficking.

Although rules and regulations have been set in place, the bone of contention remains implementation of these regulations and the need to take cognizance of the loopholes.

According to the law, childcare institutions must be registered and linked to the federal adoption authority, CARA (Central Adoption Resource Authority) CARA is ttatutory under ministry of women and child development. It is the nodal body to monitor and regulate in country adoptions.

In December, the Supreme Court ordered mandatory registration and since then 2300 Childcare institutions have been linked to CARA. As many as 4000 are still pending.

Juvenile Justice (JJ) law mandates that the courts have to dispose off adoption cases within 2 months from the date of filing of application, although it seldom happens.

The ministry of women and child development has proposed to amend the Juvenile Justice care and protection of children act 2015 It suggests to incorporate a clause to allow courts of DM to pass the adoption order, as DM is the on the ground implementing agency
Verification of prospective parents is done by the Child welfare committee which come under the DM

Thereby enhancing efficiency and reducing time.

An inter ministerial panel headed by the External Affairs Minister, Sushma Swaraj has cleared the proposal. This is likely to unburden the Civil courts, fast-track the adoption process and in due course make it crime an improbable occurrence.

While a lot more murk needs to be clear, the urgency of the situation cannot be overseen.

The children of our country, the future of our nation deserve first class treatment. What better place to begin than here.

Before their dreams are shattered and hope smeared with vile blood, before their throats strangled and lives discoloured with ghastly truth, we must rise and live through our motto, make the ‘World’ a ‘Family’ indeed.

“Female Genital Mutilation: A millennial crime” in TOI Blog

It is commonplace knowledge that Islam preaches circumcision, a form of male genital mutilation as a tenet and a sacrament of Islamic practices however little do people know about the equally practiced female genital mutilation.

Under the garb of sacrosanct religious diktats, the Dawoodi Bohra community is obstinate to continue the sublime horror of FGM (Female Genital mutilation) The Bohra high priest vehemently favours this custom, rendering religious justification for its continuation.

While in the West, actresses such as Gwyneth Paltrow, Ashley Judd, Jennifer Lawrence, Uma Thurman have actively engaged in the campaign ‘Me too’ A movement against sexual harassment and assault.

India is rather taking a snail’s pace in the domain. However, Actress Nusrat Bharucha (Pyar ka panchnama actress) who belongs to the Bohra community and whose mother had undergone FGM has filed a petition and speaks vociferously against the custom.

Also known as ‘Haraam ki boti’ in native parlance, it translates to ‘the source of sin’ thereby validating the removal of ‘unwanted skin’.
It is believed that partial or total removal of the external female genitalia will enable individual hygiene, coupled with societal stabilization through controlled female sexual act.

Clitoral mutilation is carried out in these communities, between infancy and adolescence. But the more odious part is that it is carried out by untrained midwives and self-proclaimed experts from amongst the elders in the community.

The usage of instruments such as common knives and blades point out to medical apathy. Looming large over dismal medical procedure is the aftermath of extreme pain, continual bleeding and infections, probable cyst formation, sexual disorders. And it doesn’t stop at that, in severe cases it could lead to childbirth complications, worst comes to worst, even death.

It is presumed to take away excessive libido, prevent unpleasant odor, and ironically reduce urinary infection. However there are no medical records to ascertain this claim, much to the contrary, World Health Organization (WHO) along with United Nations International Children’s Emergency Fund (UNICEF), United Nations Population Fund (UNPF) issued a joint statement against the FGM in 1997.

In December 2012, United Nations General Assembly (UNGA) came up with a resolution to eliminate FGM from the world. It has designated 6th February as the international day for Zero tolerance for FGM.

The sentiment is echoed by United Nations Convention on the Rights of the child (UNCRC) and the UN universal declaration of human rights, of which India is a signatory.

In the international arena, FGM is practiced in places such as Africa, South America and the Middle East. In the present day it has been banned in as far as 27 African countries, America, England, France and the general fervor seems to grow.

Closer home, a PIL has been filed, intervention applications are sprouting in the Supreme Court.

Justice D.Y. Chandrachud has taken cognizance of the clandestine act and regarded it to be a violation of the bodily integrity of the girl child. It was pointed out, why should anyone have the authority to access a girl’s private part, even if it is in the name of faith.

When the SC ascertained its stand, deeming it unacceptable, Congress politician and lawyer for the Bohra community, Abhishek Manu Singhvi claimed that the practice is a thousand year old custom, adding on he said that since only a small section of the foreskin is removed, women do not face any complications and it is not any different from male circumcision. He backed the argument with the Right to religious freedom under article 25 as a basic fundamental right.

Central government’s attorney general K. K. Venugopal threw light upon the difference in FGM and MGM stating as a matter of fact that while the MGM may have benefits however the FGM must be out and out banned, not only is it futile, in most cases it leads to further irreversible complications.

Early in 2016, about 50 FGM survivors launched a month-long campaign in Mumbai ‘Each one reach one’ where experiences and accounts of unfortunate victims are shared on the online portal by women across the world.

A number of women have come forward to show their displeasure and cry out against the nefarious act.

Since most of the victims are minors due to the age frame within which the act is conducted, it is also a violation of the POCSO act.

Earlier this year in February came out the first qualitative study on FGM titled ‘The clitoralhood – a contested sight’ released by Masooma Ranalvi whose network ‘We Speak Out’ is the largest survivor-led movement to end female circumcision.

Statistics that stand testimony to the abhorrent practice revealed that near about 75% of all daughters of the study sample were subjected to FGM, 97% remembered the pain inflicted on them, 33% categorically pointed out that the painful memory remained with them much after they grew up.

As there are 2 sides to one coin, so there exists a fraction of women in the community The Dawoodi Bohra Women’s association which is crying foul against the elimination of the practice.

It is noteworthy however that some women of the community have joined hands in fighting against Triple Talaq, Nikah halala, Polygamy, FGM. But the apathy of politicization of atrocities is a matter of concern. Orthodox members of the Muslim community have made it their manifesto to keep every wrong act alive. And those vouching for Muslim votes are favoring even these wrongs.

The SC verdict is eagerly awaited; however a greater challenge than the SC verdict is societal acceptance.

In order to see real changes manifest in the society, it is the people’s understanding of human rights, scientific hygiene standards and adjustment of moral compass that need to take the front seat. And bigger than that is the victims’ bravery for they alone have to fight out against the atrocities they are subjected to. They alone need to recognize their rights and fight for them.

“नवाज शरीफ की वापसी, इमरान को नहीं, सेना को चुनौती है” in Punjab Kesari

स्तानी संसद के निचले सदन कौमी असेम्बली या नेशनल असेम्बली के ताजा चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं जब पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को हराने के लिए करोड़ों रूपए बांटे थे। तबके आईएसआई प्रमुख असद दुर्रानी ने स्वयं फरवरी, 2012 में एक मुकदमे के दौरान सुप्रीम कोर्ट को इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख मिर्जा असलम बेग ने उन्हें इसका आदेश दिया था। इस योजना के लिए धन जुटाने वाले बैंकर युनुस हबीब ने बताया कि राष्ट्रपति गुलाम इसहाक खान ने इस योजना के लिए 34 करोड़ रूपए मंजूर किए थे। सेना के जनरल जब बेनजीर को राजनीति से बाहर नहीं कर सके तो उन्होंने उनकी हत्या ही करवा दी। 27 दिसंबर, 2007 को बेनजीर एक चुनावी रैली के दौरान मारी गईं। उन्हें इसकी आशंका थी और मरने से पहले उन्होंने अपने करीबियों से अंदेशा जताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ उनकी हत्या करवा सकते हैं।

हम लौट कर ताजा चुनावों पर आते हैं। ये चुनाव 1990 के चुनावों की याद दिला रहे हैं क्योंकि इस बार भी सेना नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज को हराने और इमरान खान को प्रधानमंत्री पद की गद्दी पर बिठाने के लिए पूरी जोड़-तोड़ कर रही है। पाकिस्तान का इतिहास बताता है कि वहां जब भी कोई राजनेता सेना को चुनौती देता है या चुनौती देने लायक शक्तिशाली बन जाता है तो उसके पर कतर दिए जाते हैं। 1953 में गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने ख्वाजा नजीमुद्दीन की सरकार बरखास्त कर दी। 1954 में जनरल अयूब खान की मदद से उन्होंने संविधान सभा को ही भंग कर दिया ताकि वो उनके अधिकारों में कटौती न कर पाए। 1958 में राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को हटा कर अयूब खान को मुख्य मार्शल लाॅ प्रशासक बना दिया। 1977 में जनरल जिया-उल-हक ने जुल्फीकार अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया और बाद में तो उन्हें फांसी ही दे दी। जुल्फीकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर की भी हत्या करवा दी गई। 1999 में नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर मुशर्रफ न कमान संभाली तो 26 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी को एक मामले में फंसा कर चलता कर दिया गया।

नवाज शरीफ ने जब इस बार, यानी तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की कमान संभाली तो उन्होंने सेना को तुष्ट करने की पूरी कोशिश की। विदेश और रक्षा नीति खुद सेना संभालती है, इसलिए उन्होंने चार साल तक स्वयं विदेश मंत्रालय की कमान संभाली ताकि सामंजस्य में कोई कोताही न हो। लेकिन शरीफ ने दृढ़तापूर्वक ये भी सुनिश्चित करने की कोशिश की कि लोकतांत्रिक सरकार सम्मानपूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे और सेना की पिछलग्गू न हो कर रह जाए। संभवतः इसी वजह से सेना को शुरू से ही लगने लगा कि अगर नवाज शरीफ के पर नहीं कतरे गए तो वो आगे चलकर पाकिस्तान में सेना के प्रभुत्व और श्रेष्ठता को समाप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और आखिरकार सेना को सिर्फ दिखावे के लिए ही नहीं, वास्तव में भी चुने हुए प्रतिनिधियों के मातहत काम करना पड़ेगा।

भारत में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने सभी पड़ोसी देशों के प्रमुखों का बुलाया। शरीफ को भी न्यौता भेजा गया। पाकी सेना ने उन्हें भारत न जाने की सलाह दी, लेकिन उन्होंने इसके विपरीत फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी ने गर्मजोशी से इसका जवाब भी दिया और उनके जन्मदिन पर पाकिस्तान भी गए। दोनों प्रधानमंत्री रिश्तों में बेहतरी चाहते थे, लेकिन भारत के विरोध के नाम पर रोजी-रोजी चलाने वाली पाकी सेना को ये मंजूर नहीं हुआ। नवाज शरीफ का कद छांटने के लिए कठपुतली इमरान खान और उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) को तैयार किया गया। उन्होंने नवाज शरीफ के कथित ‘भ्रष्टाचार’ के खिलाफ इस्लामाबाद में 126 दिन तक धरना दिया। इसके बाद नवाज शरीफ जो दबाव में आए तो उभर नहीं सके। कुछ समय बाद इमरान खान ने पनामा पेपर केस में नवाज शरीफ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया और सेना-अदालत की मिलीभगत से नवाज को पहले चुनाव लड़ने और फिर अपनी पार्टी की अध्यक्षता करने के भी अयोग्य करार दे दिया गया।

क्योंकि शरीफ के खिलाफ शिकायत सीधे सुप्रीम कोर्ट में की गई थी, कोर्ट ने सारे मामले नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (नैब) को भेज दिए जिसे भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए बनाया गया है। नैब ने सबसे पहले उन्हें लंदन के पाॅश इलाके में बने एवनफील्ड हाउस में चार लक्जरी फ्लैट खरीदने के मामले में 10 साल कैद और आठ मिलियन पाउंड जुर्माने की सजा दी। इसी मामले में उनकी बेटी मरियम और दामाद रिटायर्ड कैप्टन सफदर को भी सजा सुनाई गई। लंदन में रह रहे शरीफ के दो बेटों हसन और हुसैन को इस मामले में पहले ही भगोड़ा घोषित किया जा चुका है।

जब सजा सुनाई गई तब शरीफ लंदन में अपनी बीमार पत्नी की देखभाल कर रहे थे जो कई दिनों से कोमा में है। सेना ने काफी कोशिश की कि वो वापस नहीं आएं। बकौल शरीफ, उन्हें धमकाया गया, लंदन में उनके घर और परिवार वालों पर हमले भी किए गए, लेकिन उन्होंने पाकिस्तान वापस लौटने का फैसला किया। शरीफ का कहना है कि उन्होंने लौटने का निर्णय लिया क्योंकि वो कानून का पालन करने वाले शहरी हैं जो लोकतंत्र और वोट की ताकत में यकीन रखता है। लौटते समय उन्होंने एक जुमला उछाला – वोट को इज्जत दो। लेकिन कयास लगाने वाले कयास भी लगा रहे हैं। कानून के जानकारों के मुताबिक अगर शरीफ और उनकी बेटी नियत समय सीमा में सपर्पण नहीं करते तो उन्हें जमानत भी नहीं मिलती। कुछ लोग कह रहे हैं कि वो लौटे क्योंकि उन्हें अपने से ज्यादा अपनी बेटी के राजनीतिक भविष्य की चिंता है जो इस दफा पहली बार चुनाव मैदान में उतरीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा शरीफ को अयोग्य करार देने के बाद बड़े पैमाने पर उनके कार्यकर्ता इमरान खान की पार्टी में शामिल हुए। शरीफ की मानें तो उनकी पार्टी में सेना के इशारे पर तोड़-फोड़ की गई और कार्यकर्ताओं को डरा-धमका कर दल बदलने को मजबूर किया गया। कभी उनके बहुत खास माने जाने वाले और सेना के साथ उनके संपर्कसूत्र रहे चैधरी निसार तक ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। शरीफ के अयोग्य करार दिए जाने के बाद पार्टी की कमान उनके छोटे भाई शाबाज शरीफ के हाथ में आई, लेकिन वो हिचकोेले खाती पार्टी को संभाल नहीं सके। ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि नवाज शरीफ की वापसी से लोगों में उनके प्रति सहानुभूति की लहर पैदा होगी और उनके समर्थकों में नया जोश। वो अब चुनाव मैदान में खम ठोक कर दावा कर सकते हैं कि उनका नेता जनरल परवेज मुशर्रफ जैसा भगोड़ा नहीं है जो अनगिनत अदालती आदेशों के बावजूद पाकिस्तान वापस आने के लिए तैयार नहीं है। शरीफ की पार्टी का देश के सबसे बड़े प्रांत पंजाब में वर्चस्व रहा है। उनके आने से समर्थकों में उम्मीद जगी है कि वो सेना की सारी तिकड़मों के बावजूद पंजाब में सम्मानजनक संख्या में सीटें जीत पाएंगे।

शरीफ की वापसी के पीछे लोग चाहे जितने कारण गिनाएं, लेकिन इसके पीछे सबसे बड़ा कारण ये है कि शरीफ जानते हैं कि यदि आज वो सेना के वर्चस्व को चुनौती नहीं देंगे तो आने वाले लंबे समय तक देश में कोई और नेता सेना के खिलाफ सीना तान के खड़ा होने लायक नहीं बचेगा। उन्हें पता है कि उनका मुकाबला इमरान खान से नहीं, उसकी आका यानी सेना से है। उनका लौटना इमरान के लिए नहीं, सेना के लिए चुनौती है। वो हारें या जीतें, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वो सेना को चुनौती देते रहेंगे। उनके विरोधी उनके खिलाफ चाहें जो बोलें, सेना के प्रतिबंधों से मजबूर मीडिया भले ही उनका मजाक उड़ाए, लेकिन सब जानते हैं उन्होंने पाकिस्तान लौट कर साहस का परिचय दिया है। उनका अतीत भले ही पाक-साफ न रहा हो, भले ही उन्होंने बार-बार सेना से समझौते किए हों, अयोग्य घोषित किए जाने के बाद भले ही उन्होंने सेना का विरोध उसे ‘डील’ के लिए मजबूर करने के लिए किया हो, लेकिन अब लंदन से लौटने का अर्थ यही है कि उन्होंने सेना से संघर्ष का रास्ता चुन लिया है।

अभी तो सिर्फ एक मामले में उनके खिलाफ फैसला आया है, अभी कई मामले बकाया हैं जिनमें उनके विरूद्ध और भी सख्त फैसले आ सकते हैं। 68 बसंत देख चुके शरीफ कब तक अपनी टेक पर कायम रहेंगे, ये देखना दिलचस्प होगा। लेकिन ये लड़ाई उनकी व्यक्तिगत नहीं है, ये देश में लोकतंत्र के जीवन-मरण का प्रश्न है, इसमें उनके परिवार वालों और कार्यकर्ताआंे को ही नहीं, विपक्षी दलों और देश की जनता को भी समझदारी से उनका साथ देना होगा। आसिफ अली जरदारी की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी और लंदन में जलावतनी झेल रहे अल्ताफ हुसैन की मुŸााहिदा कौमी मूवमेंट जैस बड़ी पार्टियां ही नहीं, अनेक छोटी पार्टियां भी चुनाव प्रचार में रोक-टोक और मीडिया पर पाबंदी के आरोप लगा रही हैं। सेना की ज्यादतियां झेल रहे शरीफ और सभी विपक्षी दल अगर इमरान खान की पीटीआई के खिलाफ कोई साझा मोर्चा खोल सकें तो ये निश्चित ही पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।

“चिंताजनक है शहरी नक्सलियों और मुख्यधारा के दलों की सांठगांठ” in Punjab Kesari

एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार देश के 640 जिलों में से 90 जिले अब भी माओवादी या नक्सली आतंक से पीड़ित हैं। यानी देश के करीब 15 प्रतिशत भूभाग पर उनका कब्जा है। मोदी सरकार का दावा है कि उसके अब तक के कार्यकाल में 44 जिलों को माओवादी आतंकियों के कब्जे से छुड़वाया गया। भारत का कुल क्षेत्रफल 32,87,000 वर्ग किलोमीटर है। इसके 15 प्रतिशत यानी 4,93,050 वर्ग किलोमीटर पर माओवादी आतंकियों का कब्जा है। ये क्षेत्रफल इंग्लैंड के कुल क्षेत्रफल 2,42,495 वर्ग किलोमीटर से लगभग दुगना है अर्थात किसी छोटे-मोटे देश से भी बडे़ भूभाग पर नक्सलियों का कब्जा है।

जाहिर है, ये समस्या छोटी नहीं है। ये अकारण नहीं था कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नक्सली आतंकवाद को भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ जंगलों में या सुरक्षित पनाहगाहों में ही रहते हैं? जवाब है नहीं। नक्सली सिर्फ उस इलाके पर कब्जा करके ही संतुष्ट नहीं हैं। उनका असली लक्ष्य तो है – भारत में अराजकताा फैलाना, उसे अस्थिर करना, उसके टुकड़े करना और फिर उसपर कब्जा करना। सिर्फ जंगलों में रह कर वो अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते, इसके लिए जरूरी है वो देश के अन्य हिस्सों में भी अपने पैर पसारें, जंगलों के बाहर भी लोगों के बीच अपनी पैठ बनाएं। सरकारी कार्यालयों, मीडिया, पुलिस, प्रशासनिक सेवाओं, न्यायपालिका, विधानसभाओं और लोकसभा में भी घुसपैठ करें। जंगलों से बाहर जो नक्सली चुपचाप अपने काम को अंजाम देते हैं, उन्हें हम अर्बन नक्सल या शहरी नक्सली कहते हैं।

कभी आपने सोचा कि अफजल गुरू की फांसी के खिलाफ आधी रात को न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने वाले कौन लोग थे? वो कौन हैं जो आतंकियों को फांसी दिए जाने को ‘न्यायिक हत्या’ करार देते हैं और नक्सलियों के हाथों पुलिस वालों के मारे जाने पर जश्न मनाते हैं? वो कौन हैं जो कश्मीरी अलगाववादियों को महिमामंडित करते हैं, हिंदुओं को ‘फासीवादी’ करार देते हैं? ये और कोई नहीं शहरी नक्सली ही हैं। ये अपना नेरेटिव स्थापित करने के लिए फर्जी प्रचार करते हैं और लोगों को बहकाते हैं। हाल ही में जब नक्सलियों की प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश का भंडाफोड़ हुआ तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की एक कुख्यात शहरी नक्सली शहला राशिद ने ट्वीट किया कि मोदी को नक्सली नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और नितिन गडकरी खत्म करना चाहते हैं।

शहला राशिद की बात चली है तो बता दें कि जेएनयू में नक्सली गतिविधियों से परेशान अनेक शिक्षकों ने हाल ही में मीडिया को विश्वविद्यालय परिसर में इनकी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के सबूत दिए। उन्होंने इसके लिए नक्सली विचारधारा वाले शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराया जो छात्रों का ब्रेनवाश करते हैं। वैसे भी वहां अफजल गुरू की बरसी पर हुए हंगामे को कौन भूल सकता है, जब सरेआम भारत विरोधी नारे लगाए गए। उसके बाद कैसे राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, अरविंद केजरीवाल, डी राजा आदि वहां नक्सलियों को समर्थन देने पहंुचे, ये भी आप भूले नहीं होंगे। सिर्फ जेएनयू ही क्यों, दिल्ली विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, नागपुर विश्विद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय आदि भी इनके अड्डे बने हुए हैं। आपको नक्सली रोहित वेमूला का आत्महत्या प्रकरण तो याद ही होगा जिसे इन्होंने दुनिया भर में बहुत उछाला। रोहित नक्सलियों द्वारा चलाए जा रहे अंबेदकर विचार मंच का सदस्य था जबकि असलियत में अंबेदकर का नक्सलियों से तो क्या, कम्युनिस्टों तक से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। वो तो साम्यवाद के धुर विरोधी थे।

राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में ही नहीं, मीडिया, अदालतों, गैरसरकारी संगठनों यहां तक कि सरकारी महकमों तक में इनकी गहरी घुसपैठ है। इनका नेटवर्क सिर्फ भारत में ही नहीं, विकसित देशों में भी है। ये बहुत सोची समझी साजिश के तहत राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुद्दों को उछालते हैं और सरकार पर दबाव बनाते हैं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में इनकी पहुंच और पैठ कितनी गहरी है, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने 2014 में गिरफ्तार किए गए शहरी नक्सली और दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साइंबाबा की रिहाई की अपील की। ध्यान रहे ये वही आयोग है जिसने कुछ ही दिन पहले कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के बारे में फर्जी रिपोर्ट जारी की थी।

अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि नक्सलियों को पैसा कहां से मिलता है? ये अपने प्रभाव वाले इलाकों में लोगों पर मनमाने कर लगाते हैं और वहां काम करने वाली कंपनियों, ठेकेदारों आदि से वसूली करते हैं। ये मादक पदार्थों, हथियारों और जाली नोटों का कारोबार भी करते हैं। इनके लिए धन एकत्र करने के लिए शहरी नक्सली अलग-अलग नामों से गैरसरकारी संगठन बनाते हैं जो चीन और पाकिस्तान से ही नहीं, अमेरिका और इंग्लैंड आदि से इनके लिए ‘सहायता राशी’ इकट्ठा करते हैं। दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ काम करने वाली ईसाई और इस्लामिक संस्थाएं भी इन्हें काफी पैसा देती हैं। कभी आपने सोचा कि नक्सली इलाकों में ईसाई मिशनरियों पर कोई हमला क्यों नहीं होता? सिर्फ पुलिस, सुरक्षा बल या उनके कथित मुखबिर ही क्यों इनका शिकार बनते हैं?

शहरी नक्सलियों के काम करने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। लेकिन ये लोग आमतौर से पहले पिछड़ी बस्तियों में जनकल्याण के नाम पर गैरसरकारी संगठन खोलते हैं। धीरे-धीरे ये लोगों में आक्रोश भड़काते हैं या अगर कोई मसला पहले से ही गर्म हो तो उसमें आग में घी डालने का काम करते हैं। देसी-विदेशी मीडिया, विश्वविद्यालयों, मानवाधिकार संगठनों आदि में बैठे इनके साथी तत्परता से इनका साथ देते हैं और जनता के मन में चुनी हुई सरकार की छवि बिगाड़ने का सुनियोजित तरीके से षडयंत्र रचते हैं। पूरी कोशिश की जाती है कि लोगों का स्थापित व्यवस्था से मोहभंग हो और उसके प्रति आक्रोश बढ़े। आजकल शहरी नक्सली देश-दुनिया में मोदी सरकार की छवि बिगाड़ने और उसे मुस्लिम-दलित विरोधी करार देने की मुहिम छेड़े हुए हैं। इसके पीछे कारण ये है कि ये अपने अलगाववादियों, इस्लामिक आतंकियों और चर्च के नेटवर्क में दलितों को भी शामिल करना चाहते हैं। इसके लिए इन्होंने बहुत सोचे-समझे तरीके से दलित संगठनों में पैठ भी बना ली है। तथाकथित दलित रोहित वेमूला प्रकरण दलितों को भड़काने और उन्हें अपने साथ लाने की साजिश ही तो थी। दुख की बात है कि मुख्यधारा के दलों ने भी इस साजिश में इनका साथ दिया।

नक्सली, दलितों में पहुंच बनाने और उन्हें भड़काने को कोई मौका नहीं छोड़ते। भीमा कोरेगांव में इसी नाम से 200 साल पहले लड़े गए युद्ध की वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम में जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद, सुधीर धवले आदि के भड़काऊ भाषणों के बाद फैली सुनियोजित हिंसा इसका जीता-जागता सबूत है। इस मामले में पुलिस की चार्जशीट आंखें खोलने वाली है। इसके मुताबिक नक्सली कई महीनों से इसकी तैयारी कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर को खास तौर पर चुना क्योेंकि दलित भीमा कोरेगांव युद्ध को इसलिए याद करते हैं कि इसमें मूलतः दलित सैनिकों वाली ब्रिटिश सेना ने सवर्ण पेशवाओं की सेना को हराया था। अबकी बार इस युद्ध की 200वीं सालगिरह थी, और नक्सली इस अवसर का इस्तेमाल दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काने और अपने साथ लाने के लिए करना चाहते थे। उन्होंने इसके लिए भड़काऊ पोस्टर लगाए, पर्चे बांटे और आखिर में उग्र भाषण करवाए और उसके बाद सुनियोजित हिंसा की गई, अफवाहें फैलाई गईं और जितना हो सकता था, दलितों को सवर्णों के खिलाफ भड़काया गया और उनसे दूर किया गया।

भीमा कोरेगांव षडयंत्र के लिए जिन पांच लोगों को पकड़ा गया है उनमें नागपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शोमा सेन, ‘दलित अधिकार कार्यकर्ता’ और मराठी पत्रिका विद्रोही के संपादक सुधीर धवले, वकील सुरेंद्र गाडलिंग, ‘मानवाधिकार कार्यकर्ता’ और जेएनयू के पूर्व छात्र रोना जैकब विलसन, ‘सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व कांग्रेसी मंत्री जयराम रमेश के करीबी और प्राइम मिनिस्टर रूरल डिवेलपमेंट प्रोग्राम के पूर्व फेलो महेश राउत शामिल हैं। शोमा के पति तुषारकांत भट्टाचार्य को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका था।

इस मामले में में दायर चार्जशीट में संलग्न दस्तावेज शहरी नक्सलियों के काम-काज, उनके सहयोगियों और उनके इरादों पर विस्तार से प्रकाश डालते हैं। एक पत्र में एक कामरेड दूसरे को बता रहा है कि ‘वरिष्ठ कामरेड’ ने ‘कांग्रेस में अपने मित्रों’ से बात कर ली है और वो सवर्ण विरोधी षडयंत्र के लिए पैसा और कानूनी सहायता देने के लिए तैयार है। एक पत्र में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की हत्या के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि उनके लिए भी वैसा ही षडयंत्र हो जैसा राजीव गांधी की हत्या के लिए किया गया था। यानी उन्हें किसी सार्वजनिक समारोह में मौका मिलते ही खत्म कर दिया जाए।

भीमा कोरेगांव प्रकरण में शहरी नक्सलियों की गिरफ्तारी और उनके षडयंत्र का भंडाफोड़ होने के बाद, देश-विदेश में इनके समर्थक इनके बचाव में उतर पड़े। इन्हें दलित अधिकार कार्यकर्ता बताया गया और दावा किया गया कि ‘दलित विरोधी, सवर्णवादी’ मोदी सरकार इनकी आवाज दबाने और इन्हें फंसाने की कोशिश कर रही है। इन्हें मानवाधिकारों का मसीहा बताया जा रहा है, जबकि असलियत ये है कि सिर्फ ये पांच ही नहीं, नक्सलियों को पूरा गैंग, संविधान में नागरिकों को दिए गए अधिकारों का दुरूपयोग देश तोड़ने और बदनाम करने में करता है। ये ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘मानवाधिकारों’ के सबसे बड़े पैरोकार बनते हैं, जबकि हकीकत में ये सबसे पहले इनका गला घोंटते हैं। ये अपने अधिकार वाले इलाके में विकास के हर काम में बाधा डालते हैं, पुलिस थानांे, रेलवे स्टेशनों, बिजली कें खंभों, स्कूलों, सड़कों को डायनामाइट से उड़ा देते हैं। इनकी अपनी अदालतें चलती हैं जिनमें दोषियों और सरकार के मुखबिरों को सबक सिखाने के लिए दिल दहलाने वाली क्रूर सजाएं दी जाती हैं।

नक्सली और शहरों में उनके प्रतिनिधि तो देश के लिए घातक हैं हीं, उससे भी ज्यादा खतरनाक ये है कि कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, आम आदमी पार्टी जैसी मुख्यधारा की पार्टियां, अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए इनसे समझौता कर चुकी हैं और जरूरत पड़ने पर इनका बचाव भी करती हैं। नक्सली जिग्नेश मेवानी और राहुल गांधी का रिश्ता किसी से छुपा नहीं है। दूर जाने की आवश्यकता नहीं, कुछ समय पहले हुए गुजरात और कर्नाटक चुनावों में कांग्रेस ने नक्सलियोें, पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया के इस्लामिक आतंकियों और चर्च का जैसा इस्तमेमाल, उसे सबने देखा। कुछ वर्ष पहले कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नक्सलियों को सबसे बड़ा खतरा बता रहे थे, क्या ये चिंता की बात नहीं कि आज उसी पार्टी के अध्यक्ष नक्सलियों की ढाल बन कर खड़े हो गए है?

“उत्तर प्रदेशः संयुक्त विपक्ष के सामने भाजपा की चुनौतियां और संभावनाएं” in Punjab Kesari

उत्तर प्रदेश में लगातार तीन लोक सभा सीटें हारने के बाद केंद्र में सत्तारूढ़  भारतीय जनता पार्टी में निःसंदेह विचार विमर्श आरंभ हो गया होगा। वर्ष 2014 में 282 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भाजपा आज 272 सीटों पर सिमट गई है, जो लोकसभा की कुल सीटों का करीब 50 फीसदी है। अब भी तीन लोक सभा सीटें– शिमोगा 1⁄4बी एस येदियुरप्पा, भाजपा1⁄2, बेल्लारी 1⁄4बी श्रीरामुलु, भाजपा1⁄2, अनंतनाग 1⁄4मेहबूबा मुफ्ती, पीडीपी1⁄2 खाली है। अगर भाजपा ये तीनो  सीटें जीत लेती है तो वो पुनः 50 प्रतिशत के निशान के ऊपर जा सकती है। वैसे ध्यान रहे, चुनाव आयोग आमतौर से उपचुनाव तब नहीं करवाता जब लोकसभा या विधानसभा का कार्यकाल एक वर्ष से भी कम बचा हो।

हम फिर अपने विषय उत्तर प्रदेश पर आते हैं। 2014 के चुनावों में भाजपा को देश के इस सबसे अधिक जनसख्ं या वाले पद्र श्े ा में अपत््र याशित रूप से 80 में से 71 सीटें मिली। तब राज्य में मसु लमानांे आरै यादवों को अपना वोट बैंक मानने वाली समाजवादी पार्टी की बहुमत वाली सरकार थी। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी की चुनौती भी थी जिसकी प्रमुख मायावती खुद को दलितों का मसीहा बताती हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में सपा को 29.15 आरै बसपा को 25.91 और भाजपा को 15 प्रतिशत मत मिले थे। ऐसे में 71 सीटें हासिल करना चमत्कार से कम नहीं था। इसके लिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने काफी दिमाग लगाया और लगातार दो साल तक मेहनत की। उन्हांेने यादवांे को छोड़ कर सभी पिछडे़ वर्गांे आरै जाटवांे को छाडे ़ कर सभी अन्य दलित वर्गांे को अपने साथ लाने का पय्र ास किया। इसके लिए सपा और बसपा के अनेक जातीय नेताओं को भाजपा में शामिल किया गया।

वर्ष 2014 के लोक सभा चुनावों में मात खाने के बाद सपा नेता अखिलेश यादव को समझ आ गया कि सिर्फ अपने बूते पर वो भाजपा का सामना नहीं कर पाएंगे। इसलिए उन्हांेने राहुल गांधी से हाथ मिलाने का मन बनाया। एक के बाद एक चुनाव हार रही कागं े्रस को भी ये पस््र ताव भाया। 2017 के विधानसभा चुनावों में ‘उत्तर प्रदेश के लड़कों’ ने एक साथ सघन प्रचार किया, लेकिन नतीजा आया तो पता लगा कागंसे्र , सपा को ले डूबी। गठबंधन में उसे सौ सीटें दी गईं थीं, लेकिन वो सिर्फ सात सीटें ही जीत पाई। इसके बाद बबुआ अखिलेश ने राहुल गांधी को छोड़ बुआ मायावती का दामन थामने का मन बनाया जिनके पास अपना समर्पित वोट बैंक है।
फलू परु आरै गारे खपरु चुनावों में अखिलेश की रणनीति काम कर गई। इन दोनों  चुनावों में सपा ने
अपने प्रत्याशी खड़े किए और मायावती ने अपने समर्थको को सीधे सपा को वोट करने के लिए तो नहीं कहा, बस उस पत््र याशी के लिए वाटे डालने के लिए कहा जो भाजपा को हरा सक।े कछु सपा-बसपा के सहयोग और कुछ भाजपा के अतिविश्वासी रवैये के कारण भाजपा ये उपचुनाव बुरी तरह हारी। बेहद कम मतदान के बावजदू वो फलू परु में वो 54,960 आरै गारे खपरु में 21,881 मतांे से हार गइर्। फलू परु लोक सभा सीट तो 2014 में पहली बार भाजपा को मिली थी, लेकिन केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बावजूद, भाजपा इसे संभाल नहीं सकी। उधर गोरखपुर की हार के लिए तो कोई स्पष्टीकरण देना भी मुश्किल हो गया क्यांेकि स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस सीट को पांच बार जीत चुके थे और उनसे पहले तीन बार उनके गुरू स्वर्गीय महंत अवैद्यनाथ इसका प्रतिनिधित्व कर चुके थे।
जहां गारे खपरु आरै फलू परु सीटें यागे ी आरै मौर्य के मुख्यमंत्री आरै उपमख्ु यमंत्री पद सभ्ं ाालने के कारण खाली र्हइु ं, वहीं करै ाना सीट भाजपा सांसद हकु ुम सिंह के निधन के कारण खाली हइु र्। यहां भाजपा ने उनकी बेटी मृगांका सिंह को चुनाव में उतारा। मृगांका ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत 2017

में कैराना विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने के साथ की जो वो सपा के नाहिद हसन से हारीं। इस बार उन्हें तब्बसुम हसन ने हराया जो नाहिद की मां हैं। कैराना से पहले सांसद रही चुकीं तब्बसुम भी पूर्व
में सपा में थीं। अजित सिंह और अखिलेश की रणनीति के तहत उन्हें 2018 के संसदीय चुनावों के लिए खासतारै से राष्टंीय लोकदल में शामिल करवाया गया ताकि जाटों आरै मसु लमानों का समीकरण तयै ार

किया जा सके। इसका परिणाम भी आशानुरूप निकला और तब्बसुम हसन 44,600 मतांे से जीतीं। हालांकि जाटों और मुसलमानों के समीकरण के बूते जिस भव्य जीत का दावा किया जा रहा था, वो हासिल न हो सकी। तब्बसुम हसन को 51.26 प्िर तशत मत मिले तो मगृ ाकं ा सिहं को 46.51 प्िर तशत यानी कुल अंतर 4.75 प्िर तशत का रहा। ध्यान रहे तब्बसुम विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार थीं जिन्हें सपा और रालोद का ही नहीं, कांगे्रस और बसपा का समर्थन भी हासिल था। संयुक्त विपक्ष के बरक्स अकेली मृगांका को 46.51 प्िर तशत मिलना भाजपा से अधिक विपक्ष के लिए चितं ा का विषय हाने ा चाहिए।
करै ाना लाके सभा सीट में पाचं विधानसभा सीटें हैं – कैराना, शामली, थानाभवन, नकुड़ और गंगोह। इनमें से दो सीटों – कैराना और शामली में भाजपा क्रमशः 14,203 और 414 मतों से जीती। यानी जिस विधानसभा सीट से मृगांका पहले हारीं, वहां उन्हें इस बार जीत हासिल हुई। ये सीट मुस्लिम बहुल है, फिर भी यहां भाजपा को अधिक मत मिलना, विपक्षियों को हैरान कर रहा है। थानाभवन और नकुड़ विधानसभा सीटों पर इस बार भाजपा पिछड़ गई जबकि इन दोनों सीटों के मौजूदा विधायक क्रमशः सुरेश राणा और धरम सिंह मंत्री हैं। सुरेश राणा तो स्वतंत्र प्रभार वाले गन्ना मंत्री हैं, जिनपर इस क्षेत्र के गन्ना किसानांे की समस्या हल करने का दारामे दार भी था।
अभी कैराना और पहले फूलपुर और गोरखपुर से भाजपा को कई सबक मिल सकते है। पहला सबक तो ये है कि अगर विपक्षी साथ आ जाएं तो भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकते है। इसके अलावा स्थानीय आंदोलनों और संस्थाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्वयं भाजपा के विश्लेषण पर विश्वास करें तो कैराना में भाजपा, जाट-मुसलमान गठबंधन की वजह से नहीं, बल्कि भीम सेना की वजह से हारी जिसने नकुड़ और गंगोह में दलितों के साथ मुस्लिम युवकों को भाजपा के खिलाफ लामबंद किया। इन दोनों क्षेत्रों में अन्य क्षेत्रों से अधिक मतदान दर्ज किया गया था।
2014 के चुनावों से पहले अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरण साधने में लंबा समय लगाया था। 2019 के चुनावों में मुि श्कल से एक वर्ष का समय रह गया है| एसे े में विपक्षी एकता के मद्दे नजर भाजपा को हर सीट के लिए बहतु साचे विचार कर अलग-अलग रणनीति बनानी होगी। इसके लिए तेज दिमाग वाले एक नहीं अनेक अमित शाह चाहिए होंगे। 2014 की तरह, भाजपा नेता 2019 में भी मोदी लहर की उम्मीद लगाए बैठे हैं। अबकी बार मोदी लहर होगी या नहीं, ये अभी से कहना मुश्किल है, लेकिन ये बिना झिझक कहा जा सकता है कि वहां सिर्फ विकास का नारा काम नहीं आएगा। राज्य के अधिकाश्ं ा लागे अब भी धामिर्क आरै जातीय समदु ायांे में बटं े है आरै बार-बार ये स्पष्ट हो रहा है कि वो इससे ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं।

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 2014 के लाके सभा आरै 2017 के विधानसभा चुनावों में जो वाद किए थे उन्हें पूरा करना। ऐसा नहीं है कि योगी सरकार ने काम नहीं किए, लेकिन जो काम किए हैं, उन्हें जनता तक पहंुचाना भी होगा और इसके लिए बेहतर मीडिया प्रबंधन करना होगा। योगी आदित्यनाथ जनता से सीधे संपर्क के लिए जाने जाते हैं, लेि कन अब जनसंपर्क के काम में जैसी नौकरशाही फैल गई है, उसका इलाज तो करना ही।
विपक्षी अगर एकजुट हो रहे हैं तो भाजपा को भी अपने वर्तमान सहयोगियों की व्यथा को समझना होगा और उसे दूर करना होगा। राज्य के वक्फ मंत्री मोहसिन रजा ने बसपा नेता मायावती को भाजपा के साथ आने का सुझाव दिया था। मायावती के पास समर्पित वोट बैंक है, भाजपा नेतृत्व उचित समझे तो इस दिशा में संभावनाएं टटोल सकता है। हालांकि मायावती ने राजनीतिक हलकों में ये खबर फैला दी है कि बसपा उसके साथ गठबंधन करेगी जो उसे 40 सीटें देगा। संकेत साफ है कि मायावती से कोई बातचीत आसान नहीं होगी।
ये सही है कि विपक्ष के पास प्रधानमंत्री नरेंदर  मोदी जैसा कोई बड़ा नेता नहीं है, न ही अमित शाह
जैसा चाणक्य, लेि कन भाजपा सिर्फ उनके भरासे े हाथ पर हाथ रख कर नहीं बठै सकती। भाजपा के स्थानीय नेताओं को जमीनी स्तर पर परू ी तयै ारी खदु करनी होगी। अब भाजपा 2014 वाली भाजपा नहीं रही, देश के अधिकांश राज्यों में उसकी सरकार है। मोदी और शाह को अब सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं,
पूरे देश की कमान संभालनी है, वो हमेशा उन्हें उंगली पकड़ कर नहीं चला सकते। ऐसे में स्थानीय नेताआंे को अपने झगड़ांे और गुटबाजी से ऊपर उठ कर अपना स्तर उठाने और छवि सुधारने के लिए खदु काम करना होगा।

“WHAT LIES BENEATH” in The Pioneer

The Church seems to have led the media by the nose in helping build a Congress-Communist narrative that dragged the RSS into the Tuticorin protests

The coverage by the national media of the protests in Tuticorin, Tamil Nadu, against Vedanta’s copper smelting plant has been injudicious, based on hearsay and without application of mind. A narrative has been parroted without critical examination.

It is true that protestors were killed in Tuticorin. But unfortunate and tragic as that is, did anyone bother to ask why police had to open fire? These protestors outnumbered the police force by a huge number at the collectorate; they assaulted police personnel physically, pelted them with stones, tore the clothes of female law enforcers and molested them, indulged in wanton acts of arson including setting fire to public property and indulged in an orgy of violence that threatened the safety of innocent people. Should it not be asked what forces were behind this extremely violent protest which is against every democratic norm? Was the protest sponsored or did it occur spontaneously? Who allowed the assault on police personnel and the burning of vehicles, buildings, ambulances and even setting the collectorate ablaze? Who made Tuticorin a battleground? Is death the only indicator of violence? Have we stopped condemning violence unless it results in deaths? Since when have we started celebrating protests indulge in acts of violence and destruction?

It is the absence of these questions being asked that the Opposition, led by the Congress and Communists, were quick to blame without any basis whatsoever the Narendra Modi-led Central Government rather than lay the responsibility for both the protests and the deaths of protestors in police firing at the door of the Tamil Nadu State Government which is in charge of law and order. But facts are of no consequence for those Opposition leaders who took to make wild, defamatory charges against Modi calling him a “murderer”. But then that is par for the course for the conspirators who pushed the Tuticorin protests into violence as it helped them in their goal of slinging mud at the Modi regime. Another motive could well have been to ensure the closure of the Sterlite Copper Smelting plant. But has anyone rationally thought about the negative effects of closing the plant? Is anyone worried about how this will affect our country’s economy and the thousands of employees who will be laid off?

The most provocative statement on the situation came from Congress chief Rahul Gandhi. Apropos of nothing in particular, he blamed the Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) for the Tuticorin row, keeping in tune with his politics which begins and ends with RSS-baiting. When journalist Gauri Lankesh was murdered, Gandhi accused the Sangh of being behind the killing within half-an-hour of the shooting. When BS Yeddyurappa resigned as the Chief Minister of Karnataka because he couldn’t prove his majority on the floor of the House, Gandhi proclaimed he was supporting the rump JDS to “save the people from the RSS”. Rahul’s anti-Hindu bias is understandable but accusing the Sangh of being a terrorist organization is beyond the pale. In fact, the Congress-Communist cabal by baseless charges against the RSS instead of engaging in an ideological debate has ensured that the Sangh has come to represent Hindu sentiment nationwide. As a corollary, opposition to the RSS is considered ‘opposition to communalism’ and support of Islamic and Christian communalism and is termed ‘secularism’ by this cabal.

In the Tuticorin case, however, there seems to be more to it than just the reflexive blame-the-Sangh approach; a concerted attempt by the Church in those parts, supported by Gandhi and the so-called secular media, to drag the Sangh into the row is evident. The districts of Tirunelveli, Tuticorin and Kanyakumari in Tamil Nadu have the highest number of Christians and the Church has great influence on the public. It is not a coincidence that in the last two decades these districts have faced the greatest opposition to national development projects.

The Kudankulam Nuclear Power Project in Tirunelveli, which was developed in collaboration with Russia, also saw a lot of protests. America’s disdain for this project was quite evident. The then Prime Minister Manmohan Singh publicly blamed US-funded institutions for the protests against Kudankulam. The then Union Minister V Narayanasamy alleged that Bishop Yavon Ambrose of Tuticorin received Rs 54 crore and was the key figure behind the protests. Many Christian institutions such as People’s Education for Action and Liberation, and Good Vision were on the Union Home Ministry’s radar as instigators. The Home Secretary had announced that bank accounts of four such NGOs were sealed, as money was transferred from overseas to fund national protests and incite disruption.

The Christian population in Tuticorin is close to 30 per cent and the Church has a deep impact on residents’ everyday life. The plan to expand the Sterlite copper plant was brought forward as a new addition to the scope of already on-going disputes. Before the Sterlite plant was closed, it was producing four lakh tons of copper annually. Under the proposed expansion, which would have happened if not for the violent protests and subsequent deaths in police firing, Sterlite would have produced eight lakh tons of copper annually. If this project had gone through, almost all of India’s copper needs would have been met domestically.

According to official police reports, the Tuticorin protest has a clear foreign influence. Samarendra Das of the ‘Foil Vedanta Group’ flew in from London and secretly met Sterlite protesters and assured them that he would fully support the continuation of the protests, according to police. Is it a coincidence that after the Tuticorin violence John McDonnell, a prominent leader of the Opposition Labour Party in the UK, declared that Vedanta is a rogue company and demanded it be removed from the London Stock Exchange? The discussions regarding Sterlite were used to instigate the locals of Tuticorin. Brother Mohan C. Lazarus on a YouTube video said, without any scientific backing, that Sterlite is a toxic factory. He said that the Church is praying to shut down the factory. He further stated that a protest will be held on 24 March, 2018, at Rajaji Park in Tuticorin, where all Catholics, Pentecostals, Church of South India (CSI) would unite to participate against Sterlite. Scientists of the National Environmental Engineering Research Institute (NEERI) and the National Green Tribunal (NGT) had visited Sterlite and certified that emissions were within prescribed limits. Then what have these Churches achieved by provoking people against Sterlite, claiming that pollution levels are extremely hazardous? The Kundankulam protests saw the participation of Bishop Yvon Ambroise and SP Udayakumar, while the Sterlite protest had Brother Mohan C. Lazarus and other churches in the surrounding area as prime movers. Is the anti-development attitude of the Church not to be questioned? If the Manmohan Singh Government could take action against such disruptive elements then why can’t the Modi Government?

Police were portrayed as villains in Tuticorin. The media narrative was overwhelmingly of trigger-happy cops going berserk; did anyone try to figure out why the police was compelled to take last-resort action? Local journalist N. Rajesh’s report says the Deputy Inspector General of Police Kapil Kumar Saratkar made elaborate arrangements at the protest venue so that activists would not reach the collectorate. Even when senior police officers were talking to protest leaders and asking them to ensure a peaceful demonstration, radical activists broke the barricades and used iron pieces from them to assault police personnel. Police responded with a ‘lathi’ charge. Rajesh’s report says he and some other journalists climbed to the rooftop of a hotel opposite the collectorate to get a better sense of what was going down. At 11:30 am some protesters, who had forced their way into the collectorate, began burning vehicles. When the protestors saw that their photographs were being clicked and videos being recorded, they pelted journalists with stones. When journalists came down from the roof of the hotel some were assaulted and many had their cameras snatched.

The testimony of the collectorate employees supports Rajesh’s reportage. A female employee said that at 11.10 a.m., she was having tea in the canteen with her colleagues; about 20 minutes later they witnessed bruised and battered police personnel being chased by stone-pelting protesters. The employees were scared and didn’t know what to do, so they went back to their office for safety. Then there was a second wave of protestors when an estimated 15,000-20,000 activists entered the collectorate office. They had weapons fashioned from iron rods, glass bottles, petrol bombs and lathis. They set about destroying the office and setting fire to government vehicles. There were about 100 policemen deployed for security who tried to control the protestors and prevent them from entering the collectorate. But the protesters outnumbered the policemen by thousands. They ruthlessly attacked the policemen who ran away in fear of their lives. They then set fire to all collectorate vehicles. The entire office was filled with smoke, suffocating the employees. The protesters didn’t even spare female police personnel. They tore their clothes and molested them. There are hundreds of eye-witnesses to what transpired and they all say the same thing.

Opportunistic politicians and parties who blame police for opening fire need to be more circumspect. Any loss of life is tragic and unfortunate, but what would they have done if faced with a life-threatening situation had they had been stationed at the Sterlite plant and tasked with ensuring its safety? Should violent mobs have been allowed to create havoc and decimate Tuticorin and the copper plant? Should physical assaults on cops and government officials have been allowed? Congress leader Ghulam Nabi Azad compared those who died in the police firing to the martyrs of Jallianwala Bagh. Azad should be asked if the martyrs of Jallianwala were armed with stones, iron rods, lathis, petrol bombs and glass bottles and whether they chased, assaulted and attempted to kill police officers and commit arson.

The public may have a short memory but they cannot be fooled. Prior to Rahul Gandhi blaming the Sangh, and Ghulam Nabi’s comparison to Jallianwala Bagh, back in 2007 the UPA government led by Manmohan Singh had allowed the extension of the Sterlite plant. The Congress party’s blue-eyed boy and former Home and Finance Minister P. Chidambaram was a Director in Sterlite’s parent company Vedanta before becoming a minister in the UPA government. Blinded by his intense hatred for the Sangh, Rahul Gandhi has also forgotten that law and order is a state subject. There is no BJP government in Tamil Nadu, so why indirectly or directly accuse the RSS?

It is about time that the BJP, the Central Government, and especially the Union Home Ministry learn from this incident. Asking for a report on the incident is not enough. The Home Ministry has failed to investigate the conspiracy, for which it needs to work in collaboration with State Government officials, to bring out the truth. During Manmohan Singh’s regime, there were some attempts to stop radical elements in the Church harming the national interest. What is stopping the Modi Government from following suit?