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”तानाशाह शी” और ”लोकतांत्रिक भारत” के समक्ष विकल्प in Punjab Kesari

चीनी संसद ने 17 मार्च को एकमत से शी जिनपिंग के आजीवन राष्ट्रपति बने रहने के प्रस्ताव को पारित कर दिया। शी के साथ ही उनके निकटतम सहयोगी और कट्टर राष्ट्रवादी वांग कीशान को उपराष्ट्रपति बनाने का मार्ग भी प्रशस्त कर दिया गया। जाहिर है इसकी तैयारी लंबे अर्से से चल रही थी। इन खबरों के मद्दे नजर भारत में चीन के प्रति रवैये में निश्चित ही बदलाव नजर आया। भारत सरकार ने दलाई लामा के प्रति अपने अति उदारवादी रवैये को थोड़ा नियंत्रित किया और साथ ही दोनो देशों के संबंधों का दूरगामी विश्लेषण भी आरंभ किया। चीन की वैश्विक भूमिका को लेकर शी की महत्वाकांक्षी योजनाओं और अमेरिका के साथ ट्रेड वाॅर के बढ़ते खतरे के आलोक में समयानुसार भारत के लिए नीतिगत समायोजन (एडजस्टमेंट) आवश्यक भी है।
शी को आजीवन राष्ट्रपति पद सौंपने का चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का मकसद क्या है? इसका भारत के लिए क्या अर्थ है और उसके समक्ष क्या विकल्प हैं? इसे समझना आवश्यक है। भारत में कम्युनिस्ट, राष्ट्रवाद और देशप्रेम को गाली मानते हैं, लेकिन चीन में शी इन्हीं विशेषताओं के कारण आजीवन राष्ट्रपति पद पर कब्जा जमा कर बैठ गए हैं। उन्होंने चीन के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य विकास के लिए नया समाजवादी विचार प्रस्तुत किया है जो कट्टरवादी साम्यवाद से बहुत अलग है और राजनीतिक विचारधारा में चीन के इतिहास तथा वर्तमान विशेषताओं और आवश्यकताओं के समायोजन में विश्वास रखता है। संक्षेप में कहें तो इसका मकसद साम्यवाद का विकास नहीं, चीन का विकास है। पिछले साल 18 से 24 अक्तूबर के बीच हुई चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीं नेशनल कांग्रेस में पार्टी के संविधान में शी की इस नई मार्गदर्शक विचारधारा को शामिल किया गया। इसे ”नए युग के लिए समाजवाद का चीनी अभिलक्षणों वाला शी जिनपिंग विचार“ कहा गया। माओ के बाद यह पहली बार था जब किसी जीवित नेता के विचारों को उसके नाम के साथ पार्टी के संविधान में शामिल किया गया।
कांग्रेस के पहले दिन यानी 18 अक्तूबर को अपने उद्घाटन भाषण में शी ने चीन को विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बनाने का खाका पेश किया। चीनी सेना को विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बनाने के बारे में उन्होंने कहा, ”हम अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि 2020 तक सेना का मेकेनाइजेशन पूरा हो जाए…हम हर तरह से अपनी सेना को आधुनिक बनाएंगे, चाहें वो सैद्धांतिक स्तर पर हो, सांगठनिक ढांचा हो, सैनिक हों या हथियार। हम एक मिशन के तौर पर ये सुनिश्चित करेंगे कि 2035 तक हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना का आधुनिकीकरण पूर्ण हो जाए और 21वीं सदी के मध्य तक हमारी सेना विश्व स्तरीय सेना में बदल जाए।“
शी ने अपने भाषण में साफ तौर से तो नहीं कहा मगर उनका इरादा साफ था कि वो चीन को अमेरिका की टक्कर की आर्थिक और सैन्य शक्ति या कहें सुपर पावर बनाना चाहते हैं। शी की अब तक की उपलब्धियों को देखते हुए पार्टी को लगता है कि वो इसे हासिल भी कर सकते हैं। संभवतः यही कारण है कि पार्टी ने उन्हें आजीवन राष्ट्रपति पद पर बिठाने का निर्णय लिया ताकि देश निर्विघ्न चहुंमुखी विकास की दिशा में आगे बढे़ और हर दृष्टि से सर्वाधिक शक्तिशाली होने का लक्ष्य हासिल करे। पश्चिमी देश भले ही चीन की वैश्विक आकांक्षाओं को मान्यता देने में आनाकानी करें, लेकिन चीन ने महाशक्ति के तौर पर खुद को जताना अवश्य आरंभ कर दिया है। चाहे दुनिया भर में अपना व्यावसायिक और सामरिक वर्चस्व कायम करने की वन बेल्ट वन रोड परियोजना हो या साउथ चाइना सी में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की धज्जियां उड़ाना या दुनिया के अनेक गरीब देशों को अपनी दौलत के बल पर गुलाम बनाना, चीन ने बहुत व्यवस्थित और सोचे समझे तरीके से अपनी दूरगामी योजनाओं को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है।
ऐसे में अमेरिका समेत पश्चिम के विकसित देशों का ही नहीं, भारत में सुरक्षा और विदेशनीति के कर्णधारों और विशेषज्ञों का चिंतित होना भी स्वाभाविक है। हाल ही में विदेश सचिव विजय गोखले ने संसद की विदेशी मामलों की स्थायी समिति के सामने चीन के बारे मे अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन विदेशों में अपने हितों की रक्षा के लिए अपनी उपस्थिति बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प है। ये जिबूती समेत कई देशों में सैन्य अड्डे बनाने और एशिया के लगभग हर देश में परियोजनाएं स्थापित करने से स्पष्ट है। ऐसे में भारत के लिए भी आवश्यक है कि वो भी अपने डिलीवरी मैकेनिज्म की गति बढ़ाए।
गोखले आगे कहते हैं, “चीन का उदय हमारे सामने अवसर और चुनौतियां दोनो पेश करता है, खासतौर से तब जब चीन का अंतरराष्ट्रीय पाॅस्चर अधिक आत्मविश्वासी और हठी हो गया है। ज्यादातर प्रमुख विश्व शक्तियां कनेक्टीविटी से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। जहां हम एशिया-अफ्रीका ग्रोथ काॅरीडोर और चाबहार पोर्ट के विकास पर काम कर रहे हैं, वहीं चीन ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना और चाइना पाकिस्तान इकाॅनोमिक काॅरीडोर पर काम की गति बढ़ा दी है। यहां चीन गंभीर खिलाड़ी है। वह पूंजी, तकनीक और आंतरिक ढांचे का बड़ा निर्यातक है।”
एक ओर जहां विदेश सचिव चीन की नीतियों को गंभीरता से लेते हैं और उनका तोड़ तलाशने की बात करते हैं, वहीं सेना के उपप्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद चीन के बरक्स भारत की सैन्य तैयारियों पर गंभीर चिंता प्रकट करते हैं। संसद की रक्षा मामलों की स्थायी समिति के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए वो कहते हैं, “दो मोर्चों पर युद्ध की आशंका वास्तविक है। चीन और पाकिस्तान अपनी सेना का तेज गति से आधुनिकीकरण कर रहे हैं। भारत को भी अपनी सेना को सशक्त बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए। लेकिन मौजूदा बजट इस आवश्यकता को पूरी करने के लिए अपर्याप्त है। सेना के बजट में की गई मामूली बढ़ोतरी मुद्रास्फीति की ही भरपाई बामुश्किल कर पाएगी, इससे तो कर चुकाना भी मुश्किल हो जाएगा।”
लेफ्टिनेंट जनरल शरत चंद आगे कहते हैं, ”सेना को 10 दिन के सघन युद्ध के लिए हथियारों का जखीरा निर्मित करने के वास्ते जितना धन चाहिए उसमें 6,380 करोड़ रूपयों की कमी है। सरकार ने हथियारों की कमी पूरी करने के लिए जून 2018 का लक्ष्य रखा है, ये कमी पूरी करना सेना की लंबे युद्ध की तैयारी के लिए आवश्यक है। यह जरूरी है कि हम अपनी कमियों को दूर करने और आधुनिकीकरण की ओर ध्यान लगाएं। आज, इस बात की पहले से कहीं अधिक आवश्यता है कि हमारा देश अपनी सैन्य क्षमताओं को सुदृढ़ करे और दक्षिण एशिया क्षेत्र में नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर के रूप में जाना जाए।“ रक्षा मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्टों के अनुसार सेना के आधुनिकीकरण के लिए 21,338 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह मौजूदा 125 परियोजनाओं के 29,033 करोड़ के बजट से भी काफी कम है।
रक्षा मामलों की स्थायी समिति के प्रमुख मेजर जनरल बीसी खंडूरी, सेवानिवृत्त अपनी रिपोर्ट में कहते हैं, ”हम इस निराशाजनक स्थिति से दुखी हैं। सेना के प्रतिनिधि स्वयं सेना की तैयारियों के लिए अपर्याप्त धन आवंटन के नकारात्मक प्रभाव के बारे में खुल कर बता रहे हैं, ऐसे में इस समस्या का जल्द से जल्द निराकरण होना आवश्यक है।”
जाहिर है मोदी सरकार, चीन को लेकर सजग ही नहीं चिंतित भी है। पिछले 70 वर्षोंं में चीन के संबंध में सुरक्षा के जो उपास किए जाने चाहिए थे, वो नहीं किए गए। आजादी के शुरूआती दौर में नेहरू सरकार ने कुछ भयंकर कूटनीतिक गलतियां भी कीं जिनका परिणाम देश अब तक भुगत रहा है। बहरहाल, मौजूदा सरकार नौसेना की बेहतरी से लेकर सीमा पर आंतरिक ढांचा विकसित करने तक अनेक प्रयास कर रही है। लेकिन कमजोरियों के बावजूद भारत घुटने टेकने के लिए तैयार नहीं है। ये हम डोकलाम विवाद में देख चुके हैं। कूटनीति के क्षेत्र में भी भारत, अमेरिका, जापान, आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस आदि के साथ रणनीतिक संबंध बना रहा है। भारत ने आसियान देशों के साथ संबंध प्रगाढ़ किए हैं और मध्य एशिया से लेकर अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका तक अपने पांव पसारे हैं। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक महाशक्ति बनने की इच्छा रखता है और अमेरिका, जापान, फ्रांस, रूस जैसे देश इसके लिए पूरा सहयोग करने के लिए तैयार भी हैं, लेकिन भारत को अपनी आकांक्षाओं और संसाधनों में संतुलन बिठाना होगा। बहुत से देश अपने हितों के लिए भारत को आगे तो बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए पैसा नहीं देना चाहते। पर्याप्त संसाधनों के आभाव में ये कैसे संभव होगा? इस पर विचार करना होगा।
भारत को अगर चीन के बरक्स खड़ा होना है तो उसे अपनी आंतरिक स्थिति भी सुधारनी होगी। चीन से सबक लेते हुुए देश को जोंक की तरह चूस रहे आंतरिक दुश्मनों से भी सख्ती से निपटना होगा। एक तरफ चीन ‘तानाशाही व्यवस्था’ के तहत दुनिया में महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहा है तो वहीं भारत में उसके पिट्ठु हमारी सेना पर ही निशाना साध रहे हैं और विघटनकारी ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं। एक ओर चीन जहां अपनी संप्रभुता और अखंडता के लिए हर खतरे को जड़ से समाप्त करने का संकल्प करके बैठा है, वहीं हमारे यहां राष्ट्रविरोधी तत्वों को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में भारत आक्रामक शी जिनपिंग का मुकाबला कैसे करेगा? क्या हम फिर से चीन से पंगा न लेने और देश में उसके पिट्ठुओं को खुली छूट देने की मनमोहन सरकार की नीति की ओर लौट जाएंगे या सख्ती से ऐसे तत्वों का समूल नाश करेंगे? हमें सुनिश्चित करना होगा कि चीन हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली का दुरूपयोग हमारे ही खिलाफ न कर पाए। चीन पर भारत में अलगाववादियों और नक्सलियों की मदद करने और उन्हें हथियार देने का भी आरोप है। चीन से इस विषय में भी दो टूक बात करनी होगी।

“Busting the myth: Women at greater risk of heart attack than men” in TOI Blog

Cardiovascular disease (CVD) is thought of as a man’s disease, but this isn’t true. In fact it’s the number one leading cause of death in Indian women and the risk is eight times greater than that of breast cancer.

Another misconception is that CVD occurs above the age of 50, nowadays people in their early 30’s and living in the city are extremely susceptible to a sudden onset. Whatever age a woman is at it’s time to begin taking proactive measures for a strong and healthy heart.

Though it is true that women have a lesser risk to CVD it’s only before menopause. The natural production of estrogen in women protects the heart, delaying the risk of having a heart attack by 10 to 15 years later than men.

After menopause the significant drop in estrogen puts women at a much greater risk than men. Women whose menses began before the age of 11, or became menopausal at the age of 47 or below are at greater risk of a heart attack, so are women who have recurrent miscarriages.

About 12% of people that have a heart attack in India are below the age of 40, which is double the number in the West. City life puts people at 3 times the risk due to lack of excursion which results in diabetes, obesity, high blood pressure and many other factors which are stronger causes of heart attack in women than in men.

South Asian women are at great risk of cardiovascular disease as they are unlikely to receive timely intervention as compared to men. South-Asian women tend to be lax when it comes to taking care of themselves, as the age old adage of putting the family first and foremost is carried forward through centuries.

Women of our nation have the habit of brushing pain aside, after all the greatest pain felt by a woman is during the birth of a child and comparatively everything else is ‘discomfort’.

The biggest problem is the lack of awareness that heart disease in women doesn’t always manifest itself as it does in men; often times there is no conventional angina pain on the left arm or left chest that occurs. The symptoms of heart disease in women could be pain in the jaw, back pain, or trouble breathing which could be ignored as something trivial; even if she goes to a clinic or hospital there is a chance of it being overlooked by a doctor.

Cardiovascular disease is preventable and corrective measures should be taken immediately. Regular checkups of cholesterol levels, removing all trans-fats, taking alcohol in limited amounts, and exercising regularly for 30 minutes a day can prove to be mighty beneficial.

Focus on diet is the greatest boon, taking a good daily amount of fruits and vegetables, dried nuts, and good cholesterol producing fats can provide multiple benefits. These preventative measures can combat multiple diseases such as the commonly plaguing thyroid, diabetes and high blood pressure. Simple yet life-changing alterations to diet and lifestyle will not rob a child of a mother, and a husband from his beloved wife.

“घनी के शांति प्रस्ताव और पाकिस्तान-तालीबान का दोगला रवैया” in Punjab Kesari

गत 28 फरवरी को अफगानिस्तान में दूसरी काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस में राष्ट्रपति अशरफ घनी ने अपनी ओर से शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। काबुल प्रोसेस काॅफ्रेंस 23 देशों, यूरोपियन यूनियन, संयुक्त राष्ट्र और नैटो का एक समूह है जो अफगानिस्तान में सुरक्षा और राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करता है।

काॅफ्रेंस के पहले दिन ही बड़ी घोषणा करते हुए घनी ने कहा कि वो तालीबान को वैध राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं। उन्होंने तालीबानी आतंकियों को कहा कि वो हिंसा छोड़ें और शांति स्वीकार करने के लिए सामने आएं ताकि देश को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि युद्धविराम और शांति प्रक्रिया पर सहमति बननी चाहिए। उन्होंने तालीबान को खुश करने के लिए अनेक प्रस्ताव भी किए। इनमें शांति प्रक्रिया में भाग लेने वाले तालीबानियों को सुरक्षा देना, बंदियों को छोडना, तालीबानी नेताओं के खिलाफ प्रतिबंध हटाना, तालीबान सदस्यों और उनके परिवारों को पासपोर्ट और वीसा देना, उनके लिए काबुल में कार्यालय खोलना आदि शामिल हैं।

राष्ट्रपति घनी ने कहा कि उनका देश शांति को खतरे में डालने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए कृतसंकल्प है और दीर्घकालीन शांति के लिए वो हर तरह के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान से आग्रह किया कि वो शांति कायम करने के लिए बातचीत करे और ये बातचीत काबुल में हो सकती है। उन्होंने कहा कि वो अतीत को भुला कर नए सिरे से बातचीत के लिए तैयार हैं।

पाकिस्तान ने घनी का तालीबान से बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा कि वो शांति प्रक्रिया को संभव बनाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करेगा। असल में पाकिस्तान दिखावटी तौर पर ही सही, लंबे अर्से से बातचीत के लिए जोर डालता रहा है। घनी के प्रस्ताव के चंद घंटों के भीतर ही पाकिस्तान में अफगान राजदूत डाॅक्टर ओमर जखीवल ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नासेर खान जंजुआ से बात की। जखीवाल ने जंजुआ को काबुल में हुए शांति सम्मेलन और राष्ट्रपति घनी के प्रस्तावों के बारे में बताया।

जंजुआ ने कहा कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान में खून खराबे का जल्द अंत चाहता है। उन्होंने कहा “पाकिस्तान में शांति के लिए अफगानिस्तान में शांति अनिवार्य है, पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोगों के साथ सर्वनिष्ठ और सहभागी भविष्य के विचार में विश्वास रखता है, इसलिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय शांति पहलों के तहत राजनीतिक सुलह-सफाई के प्रयासों का हमेशा स्वागत किया है। पाकिस्तान, राष्ट्रपति घनी के वार्ता और आपसी समझदारी के जरिए शांति लाने के प्रयास का स्वागत करता है और इसे सफल बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेगा।”

अब सवाल ये उठता है कि काबुल पीस प्रोसेस के तहत जैसे घनी ने शांति प्रस्ताव किया और चंद ही घंटों के भीतर जैसे उसे पाकिस्तान ने स्वीकार भी कर लिया, ये आखिर हुआ कैसे और इसके क्या निहितार्थ हैं? क्या पाकिस्तान वास्तव में उतना ईमानदार है जितना वो दिखा रहा है? और इस प्रस्ताव पर तालीबान का रूख क्या है और क्यों है? इसे कई तरह से समझा जा सकता है।

पहले देखते हैं कि पाकिस्तानी समीक्षक इसके बारे में क्या कहते हैं। वो इसके लिए अपने सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा को श्रेय देते हैं। उनके अनुसार इसके लिए जमीन जनरल बाजवा की पिछले साल अक्तूबर में हुई काबुल यात्रा के दौरान तैयार की गई। इस यात्रा के कुछ समय के भीतर ही पाकिस्तान ने खामोशी से अफगान तालीबान और हक्कानी नेटवर्क के 27 आतंकियों को काबुल को सौंप दिया। समझा जाता है कि पाकिस्तान ने ये अभूतपूर्व कदम ये जताने के लिए उठाया कि इस्लामाबाद किस हद तक अफगानिस्तान के साथ सहयोग करना चाहता है। जनरल बाजवा की यात्रा के बाद दोनों देश लगातार संपर्क में रहे और पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लगातार ये आग्रह करता रहा कि वो तालीबान से बिना शर्त बातचीत के लिए तैयार हो। पाकिस्तान, अमेरिका और अफगानिस्तान को बार-बार ये कहता रहा है कि अफगानिस्तान में लंबे अर्से से चले आ रहे संघर्ष का हल सिर्फ संवाद से ही हो सकता है और इसके लिए अफगानिस्तान को तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कुछ प्रोत्साहन देने होंगे।पाकिस्तानी समीक्षकों के मुताबिक पिछले कुछ महीनों में पाकिस्तान, तालीबान पर भी वार्ता का प्रस्ताव स्वीकार करने के लिए दबाव डालता रहा है।

दक्षिण और मध्य एशिया के लिए अमेरिकी उप सहायक सचिव एलिस वेल्स ने कुछ समय पूर्व कहा था कि अमेरिका ने तालीबान के लिए भी बातचीत के दरवाजे खुले रखे हैं। इस पर तालीबान ने बातचीत के लिए सहमति तो दिखाई लेकिन शर्तें ऐसी रखीं जिन्हें मानना अमेरिका के लिए नामुमकिन है। तालीबान ने अमेरिका को एक पत्र में कहा कि “अफगान मसला हल करने में सहायता मिल सकती है अगर अमेरिका अफगानिस्तान पर अपना कब्जा छोड़े और लोगों की वैध मांगों को स्वीकार करे जिसमें सरकार बनाने का तालीबान का हक भी शामिल है और चर्चा के बारे में अपनी चिंताएं और अनुरोध इस्लामिक अमीरात (तालीबान सरकार) को एक शांतिपूर्ण माध्यम से पहुंचाए।” तालीबान ने अमेरिका को अपने खत में हिंसा का रास्ता छोड़ने और इस समस्या को बातचीत से सुलझाने की सलाह भी दी। तालीबान ने अमेरिका से बातचीत के लिए सहमति जताई क्योंकि वो अफगान सरकार को वैध सरकार के रूप में मान्यता नहीं देता। वो खुद को अफगानिस्तान की जायज सरकार मानता है जिसे अमेरिका ने गिराया था।

तालीबान के पत्र पर एलिस वेल्स ने कहा है कि अब ये दिखाने की जिम्मेदारी तालीबान पर है कि वो बातचीत के लिए तैयार हैं। ये बातचीत मुझसे या अमेरिका से नहीं, बल्कि अफगानिस्तान के लोगों की वैध और संप्रभु सरकार से होनी चाहिए।

बहरहाल पाकिस्तानी मानते हैं कि इस प्रक्रिया से बहुत उम्मीद लगाना उचित नहीं होगा। पाकिस्तान ने पहले भी अफगान तालीबान और काबुल में वार्ता शुरू करवाई थी, लेकिन इसके नेता मुल्ला उमर और फिर उसके उत्तराधिकारी की ड्रोन हमले में हत्या के बाद वो ठप हो गई। पाकिस्तान इसके लिए अफगान सरकार में कुछ तत्वों को जिम्मेदार ठहराता है।

अब इस मसले को अफगानिस्तान के नजरिए से समझने की कोशिश करते हैं। अफगानिस्तान में शांति और अखंडता के लिए काम करने वाली अफगान हाई पीस काउंसिल के मुताबिक तालीबान ने अब तक ये प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया है। ज्ञात हो कि अपने मकसद में सफलता हासिल करने के लिए ये तालीबान से भी संपर्क रखती है। इसका गठन सितंबर 2010 में पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई ने किया था।

काउंसिल के मीडिया विभाग के प्रमुख सय्यद एहसानुद्दीन ताहेरी कहते हैं कि ये तालीबान के लिए स्वर्णिम अवसर है। उन्हें अमेरिका को बातचीत के लिए पत्र लिखने की जगह अफगान सरकार से बात करनी चाहिए। अब गंेद उनके पाले में है, देखना होगा कि वो शरिया के खिलाफ कत्लोगारत जारी रखते हैं और अपनी मर्जी चलाते हैं या लोगों की आवाज सुनते हैं। ध्यान रहे कि अगर अफगान सरकार तालीबान को राजनीतिक दल के तौर पर मान्यता देने के लिए तैयार हैं तो उनसे भी ये अपेक्षा की जाती है कि उन्हें भी अफगान सरकार को मान्यता देनी होगी और कानून के शासन का सम्मान करना होगा जिसमें महिलाओं के अधिकारों का सम्मान भी शामिल है जिसे अफगानिस्तान के अंतरराष्ट्रीय सहयोगी बहुत महत्व देते हैं।

जनवरी में हाई पीस काउंसिल के सदस्यों ने अफगान सरकार और तालीबान के बीच अनौपचारिक बातचीत का आयोजन किया था। इसके बाद काउंसिल ने आरोप लगाया था कि कुछ देश (पाकिस्तान) अफगानिस्तान में शांति कायम करने में रोड़े अटका रहे हैं क्योंकि वो वहां शांति के पक्षधर नहीं हैं। काउंसिल के प्रमुख मौहम्मद करीम खलीली ने हालांकि कहा कि तालीबान के साथ अनौपचारिक बातचीत जारी है और तालीबान को बातचीत की मेज तक लाने के तौर-तरीके तलाशे जा रहे हैं। उन्होंने देश के 26 प्रांतों में 280 बैठकें की हैं और उन्हें उम्मीद है कि इनके कारण तालीबान को औपचारिक बातचीत के लिए तैयार करने में सहायता मिलेगी। जाहिर है पीस काउंसिल के प्रयासों से घनी के शांति प्रयासों को भी बल मिला होगा।

अब देखते हैं कि इसके विषय में अमेरिका क्या सोचता है। अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए घनी के प्रस्ताव का स्वागत किया है, लेकिन साथ ही कहा है कि वो आतंकवादियों पर तब तक दबाव जारी रखेगा जब तक वो हार नहीं मान लेते। अफगानिस्तान में अमेरिकी राजदूत जाॅन आर बास ने कहा कि हम एक बार फिर तालीबान का आहवान करते हैं कि वो बिना शर्त अफगान सरकार से वार्ता शुरू करे। वो कहते हैं ”तालीबान युद्ध के मैदान में ही नहीं, मादक पदार्थों से आमदनी और आय के स्रोतों पर भी काफी दबाव महसूस कर रहे हैं, क्षेत्रीय देशों सहित इतने सारे देशों की अपील के बाद उनपर दबाव और बढ़ गया है, जब तक हमें फर्क नजर नहीं आता, हम अफगान बलों की सहायता जारी रखेंगे।“ अमेरिकी सेना ने नवंबर से ही तालीबानी ठिकानों, उनके प्रशिक्षण शिविरों, हेरोइन बनाने वाली प्रयोगशालाओं पर हमले बढ़ा दिए हैं। उधर पेंटागन प्रवक्ता दाना वाइट ने कहा है कि तालीबान को आतंक छोड़ना होगा और उसे अफगान संविधान का सम्मान करना ही होगा और फिर उन्हें वार्ता की मेज पर आना होगा।

आखिर में पूर्व अमेरिकी राजनयिक और अफगान मामलों के जानकार बरनेट रूबिन की राय। वो कहते हैं कि “अफगान सरकार का प्रस्ताव अच्छा है और तालीबान बातचीत के लिए तैयार भी होता दिख रहा है, लेकिन वो सीधे अमेरिका से बात करना चाहता है क्योंकि उसकी सरकार अमेरिका ने ही गिराई थी। इस्लामाबाद प्रत्यक्ष रूप से भले ही ताजा शांति प्रस्ताव का स्वागत करे पर बहुत कम संभावना है कि वो इसके लिए तालीबान पर दबाव नहीं डालेगा क्योंकि वो उसकी दोस्ती को नहीं खोना चाहता। मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं है कि पाकिस्तान तालीबान को वार्ता की मेज तक लाने के लिए कोई ठोस प्रयास करेगा। ये सोचना गलत होगा कि पाकिस्तान अमेरिकी दबाव के तहत इस विषय में कोई ठोस पहल करेगा। हकीकत ये है कि पाकिस्तान पर अमेरिका से ज्यादा प्रभाव चीन का है।”

जाहिर है अफगानिस्तान में शांति की राह में काफी पेंच हैं। खून खराबे के बावजूद अफगान सरकार शांति के लिए भी प्रयास करना चाहती है, वहीं अमेरिका की नीति है तालीबान और उसके आका पाकिस्तान को उनके घुटनों पर लाना। उधर पाकिस्तान तालीबान के साथ मिलकर दोहरा खेल खेल रहा है। जाहिर तौर पर तो वो शांति प्रस्ताव स्वीकार करता है पर तालीबान के जरिए उसपर शर्तें लगवाता है। वो अप्रत्क्ष रूप से अमेरिका को बाध्य करना चाहता है कि वो तालीबान को असली अफगान सरकार के रूप में स्वीकार करे। यही तालीबान का प्रस्ताव भी है।

असल में अफगानिस्तान में शांति तभी आ सकती है जब पाकिस्तान, अफगानिस्तान को अपना बगल बच्चा बनाने की नीति छोड़े। इस नीति में तालीबान उसका महत्वपूर्ण हथियार है, इसीलिए वो उसे संरक्षण, प्रशिक्षण और हथियार भी देता है। तालीबान के खात्मे का मतलब है, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव का खात्मा। यही वजह है कि जाहिर तौर पर काबुल प्रोसेस के प्रस्तावों का समर्थन करने के बावजूद वो इन्हें अमली जामा पहनाने के लिए गंभीर प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। तालीबान ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। अपने एक ट्वीट में इसके प्रवक्ता ने कहा है कि घनी का प्रस्ताव “सामूहिक समर्पण का षडयंत्र है।”

घनी ने तालीबान की व्यापक हिंसा के बावजूद उदारता दिखाई, लेकिन पाकिस्तान और तालीबान ने इसमें सेंध लगा दी है। लगता है जैसे मामला जहां से चला था वहीं पहुंच गया है। लेकिन ऐसा नहीं है, कई सतहों पर बातचीत जारी है। वैसे भी अब हालात बदल गए हैं। अब अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की आंखों में धूल झौंकना पहले जितना आसान नहीं है। घनी के प्रस्ताव में पलीता लगा कर पाकिस्तान और तालीबान अपना ही अहित करेंगे। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे सूची में शामिल करवा चुका है, अगर ऐसी ही चला तो उसे ब्लैक लिस्ट में भी शामिल किया जा सकता है। ताजा खबरों के मुताबिक अब यूरोपियन यूनियन भी पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है।

दीवालिया होने की कगार पर खड़ा पाकिस्तान भयंकर भुखमरी, बेरोजगारी, कर्ज और आतंकवाद से जूझ रहा है। वो विनाश के रास्ते पर और आगे बढ़ेगा या संभलेगा…उसे अफगानिस्तान का सपना प्यारा है या देश की जनता का कल्याण? ये पाकी सेना को तय करना है।

“Being Sridevi: An abundance of love, humility & self-sacrifice” in TOI Blogs

India’s first female superstar and Padma Shri Awardee, Sridevi, has been cremated with state honours.

Wrapped in the Tricolor, in a hearse draped with garlands, she was given a gun salute before her last journey. Thousands of mourners clamored to catch a last glimpse of the country’s most powerful actress, a heroine who ensnared watchers of the silver screen with her enamoring presence, often times overshadowing her male counterpart.

The untimely demise of a woman who carried such power came as a shock to all, especially with the twists and turns of the various autopsies creating a shroud of mystery. The news of her death first came as a shock and was defined as a sudden heart attack, later revealed that there was a certain amount of alcohol content in her blood, finally with Dubai authorities stating that her death was due to drowning as she fell unconscious. How all these scenarios intertwine is still a mystery, but the final report is yet to be divulged to the public.

None the less, news of her sudden death has put the nation into a frenzy, and as sketchy as it all looks it would be good for the government to step in and hamper another label of ‘mystery death’. There are too many national heroes, superstars, and well-acclaimed individuals from journalists, to ministers whose death is questionable.

Stories regarding Sridevi’s rather tumultuous life are hitting the headlines. With Ram Gopal Verma’s letter to Sridevi’s fans he has revealed the great sadness behind the ever-smiling face. Sridevi started acting from the tender age of 4 years, her career spanned the course of 50 years. As she kept climbing the ladder of success her personal life was disintegrating. Actors were paid a bulk of their money in black, Sridevi’s father trusted friends and relatives with that money.

After her father’s demise she lost a huge chunk of her hard earned money, and was reared by her overprotective mother. Her mother had invested in a series of bad real estates, leading to more loss. In the 1990’s Sridevi’s mother had a brain tumor, but the surgery was botched leading to damaged brain function. In the midst Srilatha, Sridevi’s sister eloped with her neighbor. Sridevi’s mother signed a will putting the remaining assets in Sridevi’s name, but Srilatha filed a case stating that their mother wasn’t in the right frame of mind to make a sound decision.

When Sridevi finally met Boney Kapoor they were both broke, they fell in love but Boney Kapoor was married. Sridevi was called a ‘home wrecker’ and punched in the stomach by Boney Kapoor’s mother. Many actors and personalities of the industry have come forward and said that Sridevi was unhappy, that she had a miserable personal life, but the one place she was at peace is in front of the camera.

Sridevi was one of the highest paid Bollywood Actress in the 1990’s, at times paid more than her male costars. She is the one and only actress who was capable of huge box office success without the support of a male hero, in fact she would overshadow her male costars and many actors would fear working with her. In the movie ‘Khuda Gawah’ Sridevi managed to overshadow fellow superstar and now King of Bollywood Amitabh Bachchan.

After an 8 year sabbatical she made her return with the movie ‘English Vinglish’ which according to Komal Nahta is “the best comeback in Bollywood history”. Established as a formidable actress on-screen with versatile roles each time she did a movie, Sridevi was a shy and humble person off-screen. In her last advertisement she created a homely feel on set, she was keen on being punctual, and didn’t have the ‘star tantrum’ that are usually heard of in celebrities. Her passion and love for acting reflected with the ease she would perform.

Two decades of her life she has spent as the wife of Boney Kapoor and the mother of Jhanvi and Khushi, her daughters. She let her rising career take a step back and placed her family in the forefront, even after her experience with her family she gave all her love to her husband and daughters. Frequently the family was seen together, often times she was seen holding her daughters hands and promoting them for upcoming movies. At the core of her being she was a woman with abundant love, self-sacrificing and humble. Let us remember Sridevi not for the manner of her untimely demise, but for the beauty she shared with her devoted fans.

“Budget 2018: The government takes major steps with the aim of uplifting the nation’s women and children” in TOI Blog

The year 2017 witnessed landmark rulings in the favor of women which were on a standstill for decades, having begun with women appointed in high profile government positions, and keen awareness for child protection.

Upholding the national pledge to uplift and protect women and children, the government has kick-started 2018 with greater momentum than the previous year. The Union Budget of 2018 has heightened its focus on welfare for women and children. This year’s budget has provided the Women and Child Development Ministry with an increase in funds by almost 12%, bringing the total to Rs. 24,700 Crores.

To inculcate a panorama of women ranging from rural to urban, Finance Minister Arun Jaitley introduced a boon to working women. With our prevailing governments no-nonsense attitude we witnessed a range of successes in the previous year’s Budget, 2018 is aimed at being the icing on the cake with yet provisions and more protection.

The obvious disparity in pay based on gender has been long plaguing the world, this year’s Budget aims at curbing economic discrimination. With a never before introduced provision, Arun Jaitley announced a reduction in the contribution that women employees make to the Employees Provident Fund Organisation, from 12% to 8%.

This move will increase the take-home pay, and is expected to increase job opportunities. India has a women’s labour force participation at a meager 24% as opposed to 40% globally, hopefully the reduction in EPFO will bring us at a global par. Modi’s campaign ‘Start Up India’ has made leaps and bounds through MUDRA Yojana, a scheme to provide funds to first time entrepreneurs at a concessional rate.

Arun Jaitley stated that a whopping 76% of the beneficiaries are women, to continue from the previous year this scheme has received a boost of Rs 3 Lakh Crores.  In order to further assist working women and mothers we will see a significant increase to existing schemes in the coming financial year.

The National Creche Scheme’s allocation will be doubled; under this scheme the children of working mothers are provided a safe haven, while the allocation for Working Women’s Hostel Scheme has been raised by 20%. These facilities are free of cost and provide women the required freedom and safety needed to be self-dependent.

On the other hand to further ensure cost-cutting and better health standards of women there is the Ujjwala Yojana. Under this Yojana poor families are provided cleaner cooking gas for a bare minimum amount, which is a boon to the health of women who choke in the kitchen due to the smoke from cooking. Conceived two years ago the current government exceeded its annual target in 2016-17, for the 2018-19 budget we can expect a similar projection.

The Pradhan Mantri Saubhagya Yojana, which provides free electricity to rural households has been given a target of 4 crores households, and 2 crore toilets will be installed under the Swachch Bharat Mission.  Mahila Shakti Kendra, a One Stop Shop for women empowerment at the village level, is one of the ambitious projects of the Ministry. Its allocation has been increased four-fold to Rs. 267 Crores.

The Finance Minister further stated that the loans extended to Women Self-Help Groups are expected to increase to Rs. 75000 Crores by the end of 2018-19 from Rs. 42500 Crores. Rs. 500 Crores have been provided for transfer to the Nirbhaya fund from which various schemes of Central Government and State Governments are supported for safety and protection of women. The enhanced allocation will help in creating a safety net for women in difficult situations.

Witnessing the horrendous 2017 events which brought a limelight to the predominant vulnerability of children, the Ministry has shown that the protection of children is an important area of focus. The allocation for the protection of children has been increased by 12% for the year 2018-19.

Arun Jaitley also shared some good news about a recently started Scheme launched by the Beti Bachao Beti Padhao Campaign. Approximately 1.26 crore girls have benefitted through the Sukanya Samridhi Yojana accounts, which is a deposit scheme meant to meet the marriage and education expense of a girl child.

Discrimination against women is prevalent in all classes, yet up till now each budget was focused on underprivileged women. The major complaint by most regarding the previous budget was that working class women weren’t included.

For this year’s budget the government has taken serious consideration and introduced the reduction of EPFO for women of all classes. This year’s budget has been widely received with warmth when it comes to women and children, especially due to the great achievements by the current government in previous budgets.

“पाकिस्तान पर कार्रवाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे अमेरिका, सभी पाकिस्तानियों को वापस भेजे” in Punjab Kesari

पिछले वर्ष अगस्त में अमेरिकी राष्टंपति डोनाल्ड टंप द्वारा दक्षिण एशिया नीति की घोषणा के बाद समय का पहिया तेजी से घूमा। शुरू में तो पाकिस्तानी विश्लेषक टंप को सिरफिरा और बिगड़ैल बता कर उसकी नई नीति का मजाक उडा़ते रह।े हाल ही में अमेिरका से लाटै े पाक सने टे की सरु क्षा समिति के प्रमुख मुशाहिद हुसैन स ̧यद ने तो ये तक कहा कि जब कोई अमेरिका में ही टंप को गंभीरता से नहीं लेता, तो पाकिस्तान को भी उसकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। लेकिन अमेरिका द्वारा पहले 255 मिलियन डाॅलर आरै फिर कलु 1.1 बिलियन डाॅलर की सरु क्षा सहायता बदं करने के एलान के बाद पाकिस्तान को अहसास हो गया कि मामला बेहद गंभीर हो चुका है। अभी तो सुरक्षा सहायता बंद हुई है, अगर ऐसे ही चलता रहा तो संभव है मानवीय और विकास की मद में दी जा रही सहायता राशी भी रोक दी जाए।
अमेरिकी संसद मंे बलूचिस्तान को लेकर पहले ही कुछ बिल लंबित हैं, अब रिपब्लिकन सेनेटर रंैड पाॅल ने कहा है कि वो पाकिस्तान को हर तरह की सहायता बंद करने के संबंध में जल्दी ही विधेयक लाएंगे। राष्टंपति टंप ने इसे ‘गुड आइडिया’ कह कर इसका स्वागत भी किया है। इस बीच वाइट हाउस के वरिष्ठ अधिकारी कह रहे हैं कि पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए अमेरिका के सामने सभी विकल्प खुले हैं। लेकिन बड़ा सवाल अब ये है कि क्या टंप प्रशासन ‘आॅक्टोपस’ 1⁄4सेना और हथियार उद्योग की लाॅबी1⁄2 के भीतराघातों को निरस्त कर पाएंगे जिसका पाकिस्तानी सेना और संभ्रांत वर्ग से गहरा और पुराना रिश्ता ह?ै
इस रिश्ते की एक बानगी हैं पाकिस्तानी विेदश मंत्री ख्वाजा आसिफ जिन्होंने अमेरिका के खिलाफ मोर्चा संभाला हुआ है। इन्होंने अमेरिका को ‘यार मार’ तक बता दिया है। ये अमेरिका को सरेआम ललकार रहे हैं और उसकी ईंट से ईंट बजाने की धमकी तक दे रहे हैं। लेकिन विश्लेषक उनकी धमकियों पर ही सवाल उठा रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है उनके बच्चों का उसी अमेरिका में बसे होना जिसकी वो ईंट से ईंट बजाना चाहते हैं। ख्वाजा आसिफ की तीन लड़कियां और एक लड़का है। उनकी सबसे बड़ी बेटी अतिका सफदर ख्वाजा स्वतंत्र लेखक हैं और न्यूयाॅर्क में रहती हैं। उनकी दूसरी लड़की अमीरा सफदर ख्वाजा ने विदेश से पत्रकारिता की पढ़ाई की है जबकि उनकी सबसे छोटी बेटी फातिमा की शादी हाल ही मंे अमेि रकी पाकिस्तानी व्यापारी सल्ु तान खान के बटे  समीर से र्हइु हैं। फातिमा की शादी हालांकि लाहौर में हुई, लेकिन सगाई अमेरिका में ही हुई थी। उनका लड़का ख्वाजा मुहम्मद असद भी अमेरिका में बसा हुआ है।
जाहिर है पाकिस्तानी नते ा आरै जनरल इस्लाम आरै दश्े ाभक्ति के नाम पर आम नागरिक के साथ दोगला खेल खेलते हैं। एक तरफ तो वो लोगांे को उकसाते हैं कि वो अपने देश की खातिर सूली पर चढ़ने के लिए तैयार रहें, वहीं दूसरी ओर उनके खुद के बच्चे विदेशों में पढ़ाई करते हैं और वहां नौकरियां और व्यापार करते हैं। वो पाकिस्तान मंे खुला भ्रष्टाचार करते हैं और अपनी काली कमाई का विदेशों में निवेश करते हैं। अगर पाकिस्तान युद्ध मंे तबाह होता है तो फर्क आम पाकिस्तानी को ही पड़ेगा, ये तो विदेश भाग जाएंगे। इसलिए अगर अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों को पाकिस्तान के खिलाफ कोई कार्रवाई करनी है तो तीन काम पहले करने होंगे – 1. अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तान की सेना और नेताआंे के साथ उसके रिश्तांे की रीढ़ तोड़नी होगी, 2. अमेरिका और उसके सहयोगी नैटो देशों में बसे जनरलों और नेताओं के बच्चों और अन्य रिश्तेदारांे को वापस भेजना होगा और 3. विदेशों में निवेशित इनकी काली कमाई को जब्त करना होगा। वाइट हाउस के अधिकारी पाकिस्तान के खिलाफ हर विकल्प ‘खुला’ होने की बात कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अगर पाकिस्तानी सेना और उसके मोहरे नेताआंे को घुटने पर लाना है, तो सबसे पहले इन विकल्पांे पर विचार करना
चाहिए।
अमेरिकी आॅक्टोपस और पाकिस्तानी सेना और राजनीति के संबंध कितने गहरे हैं उसे इस बात से समझा जा सकता है कि पाकिस्तान के लगभग हर बड़े जनरल और नेता के बच्चे/रिश्तेदार अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशांे में बसे हैं। जनता को देशभक्ति के नाम पर बेवकूफ बनाने वालांे में सबसे ऊपर नाम है पूर्व राष्टंपति और तानाशाह जनरल परवजे मश्ु ारर्फ का जो भारत विराध्े ाी आरै आतकं वाद समर्थक बयानों के लिए हमेशा सुर्खियों में बने रहते हैं। ये खुद को देश का सबसे बड़ा देशभक्त मानते हैं और हाल ही में इन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि सरकार को विदेशों में बसे देश के दुश्मनों को मरवा देना चाहिए। इनपर बेनजीर भुट्टो के कत्ल का आरोप भी है। इनकी मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण हजारों पाकिस्तानियों ने जान गंवाई, लेकिन कम ही लोगों को मालूम होगा कि ये पाकी जनरल अरबपति भी है। जुलाई 2016 में पाकिस्तानी गृह मंत्रालय ने एक अदालती मामले के सिलसिले में बताया कि मुशरर्फ के पास देश में आठ संपत्तियां और नौ बंैक खाते हैं जिनकी कीमत अरबांे में हैं। ये तो सिर्फ पाकिस्तानी संपत्तियां हैं, इसके अलावा इनके पास इंग्लंैड, अमेरिका, दुबई, रियाद आदि मंे भी अनेक संपत्तियां हैं। इनकी पत्नी और बच्चों के पास भी बेशुमार दौलत है। इन्होंने देशभक्ति भले ही जसै ी भी की हो पर दश्े ा को भी भरपरू लटू ा। ध्यान रहे इनका बटे ा बिलाल मश्ु ारर्फ अमेि रकी नागरिक है। इनका बड़ा भाई डाॅक्टर जावेद मुशरर्फ अर्थशास्त्री है जो रोम में बसा है। इनका छोटा भाई नावेद मुशरर्फ एनिस्थोलाॅजिस्ट है जो अमेरिका में बसा है।
पाकिस्तान में सेना के जनरलों के पास लंबी चैड़ी जमीनें होना कोई अपवाद नहीं है। असल में वहां सेना के जनरलों को सेवानिवृत्ति पर 10 एकड़ जमीन दी जाती है और सेना प्रमुख को इसके अलावा 40 एकड़ अतिरिक्त जमीन मिलती है। वर्तमान सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा से पहले सेना प्रमुख रहे राहिल शरीफ को को भी 50 एकड़ जमीन दी गई जिसपर काफी विवाद भी हुआ। ये मामला तब शांत हुआ जब सेना ने इस विषय में अपने नीति-नियमों का सार्वजनिक तौर पर खुलासा किया।
लेकिन पाकिस्तान में सिर्फ जनरलों के पास ही लंबी-चैड़ी जायदादें नहीं हैं। वहां के राजनेता भी अपनी दौलत और विलासिता पूर्ण जीवन के लिए जाने जाते हैं। पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पाकिस्तान के सबसे अमीर लोगों में गिने जाते हैं। उनकी अनेक स्टील, चीनी और पेपर मिलंे हैं। उनके बेटे हसन और हुसैन इंग्लंैड में बसे हैं और वहीं से पारिवारिक व्यापार संभालते हैं। पनामा लिस्ट में नाम आने के बाद, पिछले वर्ष जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोप में प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। अब वो और उनके परिवार के सदस्य भ्रष्टाचार, हवाला, अघोषित संपत्तियों आदि के कई मामलों में मुकदमों का सामना कर रहे हैं। नवाज शरीफ के समधि इसहाक डार दश्े ा के वित्त मत्रं ी हैं आरै उनपर भी भष््र टाचार के अनेक आरोप हैं। इसहाक डार के बड़े लड़के की शादी नवाज शरीफ की बड़ी बेटी अस्मा नवाज से वर्ष 2004 में जद्दे ाह, सउदी अरब में हइु र्। कहा जाता है कि मकु दमांे से बचने के लिए इसहाक डार आजकल लंदन के एक अस्पताल में भर्ती हैं और वहीं से वित्त मंत्रालय चला रहे हैं।
भष््र टाचार पर सिर्फ पाकिस्तान मुस्लिम लीग, नवाज का ही एकाधिकार नहीं है। प्रमुख विपक्षी दल पाकिस्तान पीपल्स पार्टी भी कुछ कम नहीं है। बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद इसके प्रमुख बने उनके पति आसिफ अली जरदारी को मिस्टर टेन परसेंट कहा जाता था। यानी वो हर सरकारी ठेके में दस प्रतिशत कमीशन लेते थ।े पाकिस्तानी के जानमे ाने जमीदं ार जरदारी की इग्ं लडंै , अमेि रका मंे ही नहीं खाड़ी के देशों में भी अकूत संपत्ति हैं।
जाहिर है अमेि रका को पाकिस्तान के खिलाफ र्काइे भी बडा़ कदम उठाने से पहले ये सुि नश्चत कर लेना चाहिए कि उसका उसका निशान कौन बनेगा और उसका अपेक्षित परिणाम मिलेगा कि नहीं। अगर अमेरिका पाकिस्तान में आतंकवादियांे की तलाश में अंधे डंोन हमले करता है तो इससे आम पाकिस्तानी को जान-माल की भारी तबाही हागे ी, लेि कन असली दाष्े ाी यानी पाकिस्तानी जनरल आरै उनके इशारे पर सरकार चलाने वाले अमीर नेता फिर भी बचे रहेंगे। अगर अमेरिका को पाकिस्तान को राह पर लाना है तो इन दोनों के खिलाफ सख्त कदम उठाने होंगे। वैसे भी आतंकवादी तो सिर्फ सेना के माहे रे हैं, उन्हें समाप्त करके कछु हासिल नहीं हागे ा। कछु दिन बाद सैि नक जनरल कछु आरै माहे रे खड़े कर देंगे।
अमेरिका को अगर अफगानिस्तान में सफलता हासिल करनी है तो पाकिस्तानी सेना की अफगान नीति को बदलवाना हागे। लेि कन पाकी सने  अपनी नीति बदलने की जगह अमेरिका से दो सौदे करना चाहती है – 1. अमेरिका अफगानिस्तान में भारत को बढ़ावा देना बंद करे और वहां उसके ‘स्टंेटेजिक इंटंेस्ट्स’ को मान्यता दे और 2. उसे भारत में खुला खेल खेलने का खुला मौका दे। अगर अमेरिका, पाकिस्तानी सेना की ये बातंे मानता है तो ठीक है, वरना पाकिस्तान न तो अफगानिस्तान में अपने आतंकियांे पर लगाम लगाएगा और न ही उसे अफगानिस्तान तक सैनिक सहायता पहंुचाने के लिए रास्ता देगा। पाकिस्तान ने अब अमेरिका को ये धमकी देना भी शुरू कर दिया है कि अगर अमेरिका उसके साथ ऐसे ही सख्ती करता रहा तो वो चाइना-पाकिस्तान इकाॅनाॅमिक काॅरीडोर का न सिर्फ चीनी सहायता से सैन्यीकरण कर देगा, बल्कि ग्वादर पोर्ट पर भी चीन का सैनिक अड्डा बनवा देगा।
स्पष्ट है पाकिस्तानी उन्हीं आतंकवादियों को सौदेबाजी के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं जिन्हें अमेरिका खत्म करना चाहता हैं। ये एक आरे तो अमेि रका में अपने बच्चांे को पढा़ ना आरै बसाना चाहते हैं तो दूसरी तरफ उसी पर आंख तरेर रहे हैं। ऐसे में अब अमेरिका को चाहिए कि वो पाकिस्तान की सफाई से पहले अपने यहां सक्रिय पाकी लाॅबी को ध्वस्त करे और अपने यहां बसे हर पाकिस्तानी को वापस भजे  आरै अपने नटै  सहयाेि गयांे पर भी इसके लिए दबाव डाल।े जब तक पाकी जनरलांे आरै सभ्ं ाा्र तं वर्ग के आर्थिक और व्यक्तिगत हितों पर चोट नहीं होगी, आतंकवाद के प्रति उनका रवैया नहीं बदलेगा।

“Triple Talaq Bill: Opposition’s double game will be counterproductive” in TOI Blog

Biddat in talaq-e-bidat (triple talaq) means innovation, but in real sense it is no innovation but pervert distortion which is not even supported by Quran. Muslim men in India have used this ‘innovation’ to ruin the lives of women and they want it to continue the same way. Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Bill was introduced in the parliament by the Modi government not to interfere in the religious matters of Muslim community but to empower women by removing this distorted practice and punishing the culprits for their criminal act.

The bill was introduced for the mothers and sisters of our Muslim community, to uphold their dignity, respect and right to equality. There is no space for compromise in the instant talaq as it doesn’t leave any scope for that. This mindless practice allows Muslim men to terminate the marriage in a jiffy, leaving aggrieved woman with her children helpless and shelter less. So the only objective of this bill was, is and will be to stop talaq-e- bidat forever and provide succour to aggrieved Muslim women.

When marriage is solemnized in the presence of all the family members and friends then why triple talaq is given in a one-sided, secluded manner? This bill will strengthen the status of women and prevent their social and economic harassment. The opposition parties played double game on this issue in the parliament. They allowed the bill to pass smoothly in the Lok Sabha but taking advantage of their majority, created hurdles in the Rajya Sabha. They raised frivolous objections on the viability of the bill and tried hard to make the government bite the dust. Their clear intention was to appease fundamentalists whom they use as vote bank but little did they realize that their gimmicks would ultimately back-stab Muslim women and deprive them of long awaited justice.

When this practice was declared unconstitutional by the Supreme Court in view of the constitutional guarantees and rights given to Muslim women as equal citizens of India, it is not hard to understand why opposition parties are playing dirty politics over this issue. Thanks to their blind support for Islamic fundamentalists, this pervert practice is still continuing unabated. Recently, two more cases of instant divorce took place in Uttar Pradesh. In one of the cases, the woman was deserted because of skin colour and in the other, she was thrown out because she demanded money for the treatment of her daughter. Such uncouth treatment with women is simply shameful and unacceptable. How can a civilized society allow such blatant injustice?

Uttar Pradesh has become the first State to authenticate the Central government’s draft bill that makes triple talaq a cognizable and non-bailable offence. Under the draft law, triple talaq given by uttering, in writing or by electronic means such as email, SMS and WhatsApp — would be wrong or illegal and unconstitutional. The draft law, which provides for three-year imprisonment and a fine to a man trying to divorce his wife by uttering “talaq” three times, got the State government’s approval at a Cabinet meeting.

Politically motivated Muslim fundamentalists are attacking the Modi government for interfering in their religious matters but the fact remains that the proposed bill is not against their religion but the inhuman malpractice of triple talaq which according to Supreme Court infringes upon the fundamental rights of Muslim women. Whereas the Supreme Court declares triple talaq illegal, the bill provides the framework for the delivery of justice. When triple talaq is declared illegal by the Supreme Court, those who perpetrate such practice must be punished adequately and must provide compensation for their misdeeds.

Despite road block in the Rajya Sabha, the Modi government has expressed its 100% commitment towards this bill. If they really want to enact this law, they still have many options. The government can reintroduce it in the budget session after due consultation with the opposition parties. If the opposition parties try to vitiate the soul of the bill, then government can convene a joint parliamentary session to get it passed. Hope good sense will prevail on opposition parties this time and they will help government enact this historic law that empowers Muslim women.

“From moon to the world, it’s all about Indian women” in TOI Blog

It is always said to each and every Indian women out there that you are born to fight. Fight with rituals, myths, society, men domination and what not. Indian women have almost fought a war to be what they are now. Whether it is the great Matreiye or Kalpana Chawla or the world’s most beautiful lady- Manushi Chillar, every one has contributed a lot to make this nation proud and independent. Indian history is flooded with all these great women who had shown a remarkable face of themselves when the society needed them the most. One should not get surprised after knowing the fact the it was not the Indian men like Chanakya and Ashoka who dreamt of ‘Akhand Bharat’ but she was the mother of Puru, Anusuya who had been killed for dreaming so.

When it comes to sacrifice, those were Indian women who put their step forward before anyone to protect their family, to protect their nation. Rani Padmavati is in lot of debates nowadays and we Indians must not forget that she was the one who with other 16,000 women did ‘Johar’ after struggling against Alaudin khilji. Not only this, there were many powerful women like Rani Lakshmi Bai, Bhagwati Devi, Aasha Devi, Uda Devi and Begum Hazart Mahal who played an incredible role in 1857 Indian Revolution against Britishers. They made Britishers hollow from inside and this revolt encouraged various other women to jump in the Indian Freedom Movement. Women like Sarojini Naidu, Hansa Mehta, Durgabai, Renuka Ray and Malti Chowdhry had become sensations for Indian people who later on became the framers of Indian Constitution. Even when Netaji Subhash Chandra Bose build Indian national army, he made a special branch for women which was headed by Lakshmi Sehgal.

From then, our Indian government noticed the true power and capabilities of women of our country and allowed them to be there not only in Indian Military but also in Airforce and Navy so that they can fight with the enemies of our nation. But these ladies are just not strong, they are supreme in every other category and this was purely proved by the most beautiful ladies of this world and that too Indian whether we name Rita Fariya, Sushmita Sen, Aishwarya Rai, Diana Hayden, Yukta Mukhi, Priyanka Chopra or the most recent Manushi Chillar who has made India proud in front of the whole world. And its all about the culture and values of Indian women which are further been given to their daughters and Manushi Chillar gave a great example of this thing by beautifully describing her mother’s contribution in her life.

India was known as the underdeveloped land of snake charmers and acrobats, but these daughters has totally changed the image of our country. Its not just about beauty but also brain whether knowledge, logics or scriptures are concerned. And in all these things, government is also providing a back hand to develop women in every way possible. There is greater thrust on women’s issues by Modi’s government. One of most recent step taken by this government by passing a bill to abolish this ‘triple talak’ practice which would help the Muslim women to be stronger. He is building on a variety of women-focused initiatives like campaigns to educate girls, increased maternity leave, the provision of safer cooking fuels for rural families and also a bill seeking one-third representation for women in Parliament and State Assemblies seeing that women are no less than men in politics and can run a nation as well.

This journey of Indian women so far is much respectable and appreciable. They are now much capable of raising voice for their rights. It can easily be seen that women place themselves in a much stronger place nowadays as on one hand we have India’s first woman defence minister Nirmala Sitharaman while on other the lioness Sushma Swaraj whose voice is enough to calm other men down. These ladies are not less than anyone. Now no moon is farther for any new budding Kalpana Chalwla and the world seems less for ladies like Manushi Chillar.

India is a country of goddesses where women are treated above all, where they are worshipped, where disrespecting them is always an offence. Now they are awaken and much more powerful than ever, powerful enough that they don’t rely on others. They very well know how to fight with social disparities to maintain their family and how to fight with enemies to run a nation because Indian women are born fighters.

“Bill against Triple Talaq: How long will this fight continue? Include polygamy and Nikah Halala in this Bill too” in TOI Blog

On November 24, a 32-year-old woman was allegedly divorced by her husband via phone call. They were married for 10 years and have children. Her husband uttered “talaq” thrice on the phone as the woman wasn’t able to meet his extortionist demands for dowry.

“There were 177 reported cases of triple talaq before the Supreme Court verdict. Even after the verdict, 67 cases of instant talaq were reported. The majority of such cases were in Uttar Pradesh,” said a senior government official.

On August 22, the Supreme Court declared instant triple talaq unconstitutional. The court’s ruling was that instant triple talaq is “violative of the fundamental right under Article 14 (equality before law) of the Constitution of India”.

The verdict added that Muslim Personal Law (Sharia) Application Act, 1937, when it comes to the matter of triple talaq, must be removed. After the landmark judgment, it was up to Parliament to enact the legislation regarding Muslim marriages and divorce, which is to be implemented within six months of the Supreme Court ruling.

The government plans to introduce legislation aimed at outlawing the controversial Muslim practice of instant triple talaq in the coming winter session of Parliament. “The draft has been sent to all the state heads, and their recommendations and comments have been sought on the draft. Once that is done, further steps will be taken to table the Bill,” a Home ministry official had said. It has been reported that state heads had been given three months to give their suggestions and consent.

The plan is to bring a bill that will ban instant triple talaq, create a non-bailable punishment, and a three-year imprisonment sentence against the husband. The bill may also grant the wife maintenance and custody of her minor children by moving the court. The bill will make instant talaq through any form (verbal, writing, electronic etc) illegal and void. Any aggrieved Muslim woman would be entitled to approach a magistrate court to seek redressal.

A senior BJP leader said, “the issue of triple talaq has become a social concern because women have started coming out against it. The practice is now being opposed by women who are financially and socially vulnerable.” When instant triple talaq happens, a victim has no option but to approach the police for justice. “Even police are helpless as no action can be taken against the husband in the absence of punitive provisions in the law. The step taken by the government is a positive message and legislation will go a long way in deterring Muslim husbands from divorcing their wives. Legislation will also empower women who find themselves helpless against the use of the practice,” the BJP leader had said.

The best solution to remove all hardships faced by women would be to apply Uniform Civil Code nationally and remove Personal Laws. When it comes to polygamy, instant triple talaq and nikah halala in Sharia Law, they all are a violation of the rights and integrity of a woman. To follow a UCC which guides each individual under the same purview of the law with equality not only of religion, but also of gender, is the aim of our constitution and our judicial system. Till when will our Muslim sisters fight these archaic practices?
Though the problem of Personal Laws isn’t limited to Muslim women, it also extends to other factional divisions.

In 1991, Goolrukh Gupta, who was named Goolrukh Contractor before her marriage, was married in South Gujarat to a Hindu Man. Originally from the Zoroastrian faith, she held to her religion and continued her practices even after marriage. After her father’s death she was denied entry to the Tower of Silence in Mumbai, even though her father’s last rights were performed there.  She approached Gujarat High Court against this discrimination.

The Gujarat High Court stated in 2012 that due to the Special Marriage Act, (applicable where two individuals from different faiths marry), her religion had changed to that of her husband. She is no longer a Parsi and is now a Hindu. She took the case to the Supreme Court against the Gujarat High Court’s judgment which claimed that Ms Goolrukh Gupta ceased to be a Parsi after her marriage to a Hindu. Chief Justice Misra stated that a woman is not mortgaged to her husband after marriage, her individual identity as well as religious identity are maintained under the Special Marriage Act.

The Chief Justice further said that only a woman can choose to follow or curtail her religious identity, she has that freedom of choice under the Special Marriage Act. If only such freedom of choice, identity and equality were granted to members of all religions and faith.

“We welcome capital punishment for child rapists” in TOI Blog

Shivraj Singh Chouhan, the chief minister of Madhya Pradesh, wants death as punishment to rapists. This extreme sentiment felt 8 months ago by Mr Chouhan has now taken civic action. According to National Crime Records Bureau (NCRB) in 2016 Madhya Pradesh recorded the highest number of rape cases in the country. In the past two months there has been a sharp increase in rape crimes, and on this Sunday the Madhya Pradesh state cabinet passed a proposal for amendment of the Indian Penal Code (IPC) for harsher punishments for rape, molestation, stalking, and sexual harassment. The proposal has approved the appeal for death penalty of raping a girl child 12 years old or younger, and for convicts convicted of gang rape. There is also an amendment in the IPC to increase fine and punishment for rape convicts.

After the Cabinet meeting Finance Minister of MP Jayant Malaiya stated that there should be provisions for harsher punishment under IPC sections 376 (rape) and 493 (cohabitation caused by a man deceitfully inducing a belief of lawful marriage). “The recommendation is to impose a fine of Rs 1 lakh for such crimes in addition to harsher punishment for stalking, harassment, rape, and capital punishment for those convicted of rape and gang rape of children aged 12 years and below,” Malaiya said. “For this, the proposal is to add a subsection 376A IPC and 376D (gang rape) IPC. Punishment should be increased under section 493A also.”

Even though Madhya Pradesh might have passed the amendment for this bill the result may not be predictable as it will have to be passed by both houses of Parliament due to the request of capital punishment. A proposal for amendment of these two sections will be presented in the assembly during the winter session. After it is passed in the House, it will be sent to the President for assent.

After the infamously heinous Nirbhaya rape case public demand was to make it safer for women to leave her household without fear for her life or integrity. Another demand was to have stricter and swifter punishable action against criminals, and for more effective criminal proceedings in court. It was during that time that Indian nationals and eminent politicians demanded capital punishment for rapists, Mr Chouhan is one of them. Yet Madhya Pradesh has decided to approve the amendment after the state had come under criticism over rape incidents. The greatest trigger being when a 19 year old UPSC aspirant was raped when returning home from coaching. Her FIR registration was delayed and it led to the suspension of some police officers. In 2014 MP reported 5,076 rape cases, which was 14 percent of the total rape incidents reported in the country.

Yet the proposal has narrowed down to specifics, it will be applicable to a child under the age of 12 and the child should be a girl. The biggest flaw with this amendment is that the rape or molestation of boys is not taken into account. Amod Kanth, former police officer and founder of NGO Prayas said, “When we conducted a national study on child abuse in 2007, along with the Ministry of Women and Child Development, we found that there were as many male victims of child abuse as female.” It is time to forget about gender when it comes to rape, justice for everybody should be on an equal basis irrespective of their differences.

“The power of a mother: from Manushi Chillar to Majid Khan” in TOI Blog

India is a nation whose people value their mother with reverence, from the portrayal of deities in powerful and caregiving roles to men folding their hands in obeisance to ‘lakshmi’. A country which terms its nation as ‘Bharat Mata’ is a rare find in this technologically advancing world. The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.The power of a mother is undeniable, her tears can bring her son back from the abyss and her values can make a woman globally acclaimed.

After a 17 year drought, India’s Manushi Chhillar won the coveted Miss World 2017 title in China. The previous winner was Priyanka Chopra, in her winning answer, Priyanka stated that her idol is Mother Theresa. Manushi, after 17 years, also gave a response based on the value of mother’s which received a huge applause from the audience. The question asked was, “Which profession deserves the highest salary and why?” The 20-year-old said, “A mother deserves the highest respect. It’s just not about cash but also the love and respect that you give to someone. My mother has been a huge inspiration. it is the mother’s job that deserves the biggest salary.”

This reply has awoken the people of India to embrace their cultural values and put their beloved mother’s on the pedestal they deserve yet are rarely acknowledged for.

It has been the argument of feminists that housewives are the largest unpaid workers globally, resulting in work done worth billions of dollars yet not recognised in our economy. The Organisation for Economic Cooperation and Development revealed that an average woman in India spends five hours a day in unpaid work, Indian men spent under 51.8 minutes a day. If the same woman has children from the age range of 1 to 6 years of age, the workload hours increase. Yet the term ‘housewife’ is frowned upon, a mother’s work is thought to be trivial, and her life imagined to be a ‘waste’.

Even if the work of a mother is thought to be a backbreaking task the entire process is imagined to have no economic value whatsoever, even though motherhood helps prepare kids for the national and international labour market. Yet all the efforts that a mother puts into the household, giving her love to her child are not disregarded. On one hand, where a mother’s love brought the coveted Miss World title back to India, a mother’s love also brought back a son from the brink of self and national destruction.

The effect of the love of a mother on her child is profound. Footballer Majid Khan who joined Lashkar-e-Taiba returned home after seeing a video of his mother crying for his return. Majid was seen at the funeral of Muzamil Manzoor, a militant killed during a gunfight in Kund. A week after he announced on Facebook that he was joining the militant ranks he returned. J&K chief minister Mehbooba Mufti welcomed Majid’s decision to return home.

‘’A mother’s love prevailed. Her impassioned appeal helped in getting Majid, an aspiring footballer, back home. Every time a youngster resorts to violence, it is his family which suffers the most,’’ she tweeted. Shortly after the return of Majid Khan, a 16-year-old boy heeded to his parents’ call and returned home in Chimmer village.
Seeing the positive effect that has been created by these videos of mothers telling their sons to come back home, many other mothers of terrorist sons have started doing the same.

In response, there are sons who are returning back home and aren’t being arrested. The government of J&K has declared that there will be no penalty for first-time offenders of any crime. In this manner, we can see that the role of a caregiver isn’t limited to our conventional belief of mother, but is also by the government. This different approach to rehabilitation of the youth, the belief that there is still hope, and the understanding that there is a gap in approach between the Indian government and Kashmiri youth has brought about a new approach.

The question still arises that with the hullabaloo surrounding Manushi Chillar’s response, to the return of children from terrorist groups, are we truly deserving to be called a nation who respects their mother in the 21st century? Compared to Western countries where children tend to live in nuclear families and leave their residence at the tender age of 18 years old, the attachment to parents isn’t as strong as in India.

Or yet that was the case until at least a decade ago, the new age trend is for Indian children to be educated outside of India and continue to live there, Indian children are leaving their parents alone. To achieve the dream of being successful in life, where success is measured in terms of international standards of income, the primary caregiver falls behind. Perhaps it is time to follow what we preach, not just say that we love our mothers but be there to care for our caregivers at a time that matters the most.

“देशभक्ति और राष्ट्रवादः चीन से सबक लें भारत के कम्युनिस्ट” in Punjab Kesari

भारतीय कम्युनिस्ट…माफ कीजिएगा भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट अपने देशद्रोही तौेर तरीकों और राजनीतिक हत्याओं के लिए बदनाम हैं। इनका ये देशद्रोही रवैया आजादी के पहले से चला आ रहा है। इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का अपमान ही नहीं किया, महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे कद्दावर नेताओं को अपशब्द कहे और देश के विभाजन का समर्थन भी किया। 1962 की लड़ाई में इन्होंने बेशर्मी से चीन का साथ दिया। अपनी हत्यारी, विघटनकारी और राष्ट्रविरोधी विचारधारा के चलते ये लगातार भारत में बाहरी ताकतों की सहायता से चलाए जा रहे आतंकवादी, अलगाववादी हिंसक आंदोलनों का समर्थन करते रहे हैं। ये यहीं रूक जाते तब भी गनीमत थी, ये धर्मनिरपेक्षता के चोले में प्रतिगामी इस्लामिक आतंकवाद और कट्टरवाद का समर्थन भी करते हैं। शायद यही वजह है कि क्रूर आईएस में सबसे ज्यादा मुसलमान लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) शासित केरल से ही गए।

भारत की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों और देश के 90,000 वर्ग किलोमीटर पर कब्जा जमा कर बैठे माओवादियों का चीन से गहरा नाता है। इन्होंने मानवाधिकारों के तिरस्कार और राजनीतिक विरोधियों की हत्या की सीख चीन से बखूबी ली है, वैसे ये इनकी विचारधारा के मूलभूत तत्वों में भी शामिल हैं। लेकिन ये चीन से कुछ अच्छी बातें भी सीख सकते थे जो इन्होंने शायद जानबूझ कर नहीं सीखीं क्योंकि ये इनकी विचारधारा से ज्यादा इनके निहित स्वार्थों के विपरीत हैं।

इन्हें चीन से जो चीज सबसे पहले और सबसे ज्यादा सीखने की जरूरत है वह है – प्रबल राष्ट्रवाद और देशभक्ति। भारत में जब भी कोई देश प्रेम या देश के लिए बलिदान होने की बात करता है तो सबसे पहले कम्युनिस्ट ही उसका मजाक उड़ाना शुरू कर देते हैं। उसे फासिस्ट बताया जाता है, उसे दकियानूस साबित करने की हरसंभव कोशिश की जाती है और उसे आधुनिकता और उदारवाद का विरोधी करार दिया जाता है। हालांकि अभी तक ये साबित नहीं कर पाए हैं कि देश से प्रेम करना और उसके प्रति वफादार होना कैसे उदारवाद और आधुनिकता विरोधी है और क्योंकर देश को गाली देना ही खुलेपन और आधुनिकता की निशानी माना जाए। अपनी इसी विकृत विचारधारा के कारण ये हमेशा से देश की सेना का मजाक उड़ाते रहे हैं और उसके खिलाफ शत्रुओं को समर्थन देते रहे हैं। मेजर रितुल गोगोई मामले में कैसे सारे कम्युनिस्ट और नक्सली सेना के खिलाफ एकजुट हो गए, वो देश शायद ही कभी भूल पाए। हम कैसे भूल सकते हैं कि जब अप्रैल 2010 में नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 75 जवान मार गिराए थे तब इन्होंने कैसे जश्न मनाया था और मिठाइयां बांटी थीं।

भारत के कम्युनिस्टों और नक्सलियों की विकृत राष्ट्रद्रोही नीतियों के उलट चीन में कम्युनिस्ट पार्टी आरंभ से ही प्रबल राष्ट्रवाद और यहां तक ही विकृत विस्तारवादी राष्ट्रवाद की समर्थक रही है। इसी विस्तारवादी नीति के कारण उन्होंने तिब्बत हड़पा, अक्साई चीन पर कब्जा जमाया और अब भी अरूणाचल प्रदेश समेत भारत के अनेक हिस्सों पर दावा ठोक रहे हैं। यही नहीं अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी उनका यही रवैया है। चाहे जापान हो, वियतनाम हो, भूटान हो या ताईवान, चीन का शायद ही कोई पड़ोसी होगा जो उसके विस्तारवादी रवैये से परेशान नहीं होगा। अब तो चीन सिर्फ जमीन पर ही नहीं, समुद्री मार्गों पर भी कब्जा जमाने में लग गया है। वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट और साउथ चाइना सी का विवाद इसी का परिणाम है। आज दुनिया भर की ताकतें चीन पर आरोप लगा रही हैं कि वो आर्थिक रूप से कमजोर देशों को ऊंची दरों पर कर्जा देकर उन्हें अपने जाल में फैला रहा है और एक नए किस्म के आर्थिक उपनिवेशवाद को बढ़ावा दे रहा है।

भारत के कम्युनिस्ट और नक्सल कभी चीन के विस्तारवादी राष्ट्रवाद पर उंगली नहीं उठाते, लेकिन देश की राष्ट्रवादी पार्टियों का मजाक उडाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। बेहतर हो ये देश को तोड़ने का एजेंडा छोड़ कर अपने प्रेरणा स्रोत और पितृ देश चीन की तरह भारत की संप्रभुता और अखंडता का सम्मान करें।
भारत में जब राष्ट्र के मूलभूत प्रतीकों जैसे राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत या तिरंगे के सम्मान की बात उठती है तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। ये इनकी विचारधारा के अनुरूप तो है ही, इससे इन्हें कट्टरवादी मुसलमानांे को पोटने का मौका मिलता है जो मानते हैं कि वो मुसलमान पहले हैं और उनके लिए मुस्लिम बिरादरी भारत से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर हम इस मामले में भारत की तुलना चीन से करें तो पता लगेगा कि वहां कम्युनिस्ट पार्टी नागरिकों को देशभक्ति सिखाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। इसी वर्ष सितंबर में नेशनल पीपल्स कांग्रेस की स्टैंडिंग कमेटी ने ‘नेशनल एनथम लाॅ’ को मंजूरी दी। इसके अनुसार पूरे देश में प्राइमरी और मिडिल स्कूलों में राष्ट्रगान बजाया और गाया जाना चाहिए। इस कानून के मुताबिक राष्ट्रगान देशभक्ति की शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है। चीन का संविधान कहता है कि “चीनियों को अपने देश और लोगों को प्यार करना चाहिए…उन्हें देशभक्ति, सामूहिकता, अंतरराष्ट्रवाद और साम्यवाद की शिक्षा दी जानी चाहिए।” इसके अलावा शिक्षा से जुड़े कानून कहते हैं कि छात्रों को हर स्तर पर देशभक्ति की शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षकों से संबंधित कानून के अनुसार देशभक्ति की शिक्षा देना अध्यापकों का कर्तव्य है। स्वयं राष्ट्रपति शी जिनपिंग इसपर बार बार बल देते रहे हैं। दिसंबर 2015 में शी ने कहा देशभक्ति चीनी राष्ट्र का अध्यात्मिक केंद्र है और देशभक्ति की शिक्षा देश के समूचे शिक्षातंत्र में प्रवाहित होनी चाहिए।

हाल ही में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की 19वीें नेशनल कांग्रेस मंे शी जिनपिंग को एक बार फिर राष्ट्रपति चुना गया । जहां भारत के कम्युनिस्ट यहां चल रहे अलगाववादी षडयंत्रों को समर्थन और बढ़ावा देते हैं, वहीं शी जिनपिंग ने कहा कि ”हम किसी भी ऐसे व्यक्ति को सहन नहीं करेंगे जो देश की एक इंच जमीन भी देश से अलग करने की कोशिश करेगा…..ध्यान रहे खून पानी से ज्यादा गाढ़ा होता है…हमें ऐसे लोगों का सामना करने के लिए देशभक्त ताकतों को मजबूत करना होगा, देशभक्ति का प्रचार करना होगा।“ शी का इशारा ताइवान और हाॅंगकाॅंग की ओर था। ताइवान खुद को अलग देश मानता है। हाॅंगकाॅंग चीन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन वहां लोकतंत्र समर्थक चीनी साम्यवाद का विरोध कर रहे हैं।

भारतीय नेता जब भी देशगौरव या राष्ट्रउत्थान और सशक्तीकरण की बात करते हैं तो सबसे पहले साम्यवादी ताकतें ही उनका विरोध और अपमान करने के लिए तत्पर हो जाती हैं। इस विषय में इन्हें चीन से सबक लेने की सख्त जरूरत है। 19वीं पार्टी कांग्रेस में शी बहुत शान से बताते हैं कि पिछले पांच साल में चीनी का सकल घरेलू उत्पाद 54 ट्रिलियन डाॅलर से बढ़ कर 80 ट्रिलियन डाॅलर तक पहुंच गया। इस दौरान चीनी अर्थव्यवस्था लगातार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी रही। इस अवधि में चीन ने सेना के आधुनिकीकरण और सशक्तीकरण के लिए अनेक कदम उठाए। शी ने वर्ष 2050 तक अपनी सेना को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेना बनाने का लक्ष्य भी रखा। ध्यान रहे, चीन ने साम्यवादी व्यवस्था होते हुए भी बड़े बड़े पूंजीपतियों को बढ़ावा दिया, लेकिन भारत के कम्युनिस्ट भारत के उद्यमियों को विलेन की तरह चित्रित करने से बाज नहीं आते। चीन अपनी सेना के दम पर दुनिया जीतने का सपना देखता है, लेकिन यहां के साम्यवादी नागरिकों को देश की सेना के खिलाफ भड़काने से बाज नहीं आते।

भारत के कम्युनिस्ट खुद को देश के हजारों वर्ष पुराने इतिहास और संस्कृति से अलग मानते हैं। कहा जाए कि इसे त्याज्य मानते हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन्होंने हमेशा ही भारतीय इतिहास को अपने संकीर्ण नजरिए से देखा है जिसके कारण इनके इतिहासकारों द्वारा लिखी गई पुस्तकों में भयानक विसंगतियां पैदा हो गई हैं। अगर भूले से भी कोई भारतीय अपने इतिहास को स्वर्णिम बता दे या अपने भारतीय होने पर गौरव करे तो कम्युनिस्ट सबसे पहले उसका मान मर्दन करने के लिए बंदूक उठा लेते हैं।

इनके खिलाफ शी जिनपिंग ने अपने भाषण में चीन के 5,000 साल पुराने इतिहास का गर्व से जिक्र किया। वो कहते है -“5,000 साल के इतिहास के साथ हमारे देश ने शानदार सभ्यता रची, दुनिया को महत्वपूर्ण योगदान दिए और हम दुनिया के सबसे महान देशों में से एक बने। लेकिन 1840 के अफीम युद्ध के बाद देश घरेलू विवादों के अंधेरे में डूब गया…….जब से आधुनिक युग शुरू हुआ है देश का कायाकल्प करना और उसे पुरानी ऊंचाइयों तक पहुंचाना चीनी लोगों का सबसे महान स्वप्न रहा है।“ अगर भारत में कोई भारत को पुरानी बुलंदियों तक पहुंचाने की बात करे तो कम्युनिस्ट तुरंत उसे ‘रिवाइवलिस्ट’ कह कर गाली देना शुरू कर देंगे।

हमारे यहां कम्युनिस्ट संसद पर हमला करने वालों की पैरवी करते हैं, कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा मानने वाले हुर्रियत के आतंकियों की चैखट पर सजदा करते हैं। ये हमें जबरदस्ती ये पढ़ाने की कोशिश करते हैं कि अलगाववाद की बात करना उदारवाद है और अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है। इनके विपरीत चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अलगाववाद तो क्या लोकतंत्र की बात करने वालों तक को सहन नहीं करती। वो लोकतंत्र की मांग करने वालों पर टैंक चलवा देती है (आपको ‘1989 का लोकतंत्र आंदोलन’ और तिअनअनमेन चैक पर छात्रों पर टैंक चलवाना याद होगा), ये चीनी नेल्सन मंडेला कहे जाने वाले ल्यू जिआबो को कैद में डाल देती है। इन्हेें शांति और मानवाधिकारों के लिए नोबल पुरस्कार दिया जाता है पर चीनी इन्हें जेल में तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर करते हैं। चीन राजनयिक अपने हितों के लिए किस हद तक जा सकते हैं उसे तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के प्रति उनके रवैये से समझा जाता है। दलाई लामा दुनिया के जिस भी देश में जाते हैं, उनका दूतावास उसके नेताओं को पहले ही धमकी देने लगता है कि दलाई लामा के स्वागत से उनके संबंध चीन से बिगड़ सकते हैं। जहां चीनी मीडिया हर कूटनीतिक और राजनयिक अभियान में अपने देश का साथ देता है, वहीं यहां के पार्टी कामरेड अपनी सरकार और देश के हितों में पलीता लगाने में ही शान समझते हैं।

भारत के कम्युनिस्ट लंबी चैड़ी बातें तो करते हैं धर्मनिरपेक्षता की, लेकिन बड़ी बेशर्मी से इस्लामिक कट्टरवादियों को प्रश्रय और प्रोत्साहन देते हैं। इनके विपरीत आप उईगुर प्रांत में इस्लामिक कट्टरवादियों और अलगाववादियों के खिलाफ चीनी सरकार का रवैया देखिए। वहां उन्होंने मुसलमानों के रोजा रखने, दाढ़ी बढ़ाने, काले कपड़े पहनने तक पर रोक लगा दी है।

एक बात और, चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया और भ्रष्टाचार में लिप्त बड़े-बड़े पार्टी अधिकारियों तक को जेल की हवा खिला दी। लेकिन हमारे यहां ये खरबों रूपए के घोटालों की आरोपी कांग्रेस और दुनिया की भ्रष्टतम नेताओं में से एक सोनिया गांधी के साथ मेलमिलाप कर रहे हैं।

अब सोचने की बात ये है कि साम्यवाद तो चीनी भी मानते हैं और भारत के कम्युनिस्ट भी, लेकिन यहां के कम्युनिस्ट अपने देश, उसकी हजारों साल पुरानी संस्कृति, उसके गौरव, उसकी सेना, उसके लोगों की देशभक्ति, वफादारी के खिलाफ क्यों हैं? इन्हें क्यों हिंदुओं से इतनी नफरत है? ये क्यों इस्लामिक कट्टरवादियों और आतंकवादियों के सरपरस्त और खैरख्वाह बने हुए हैं? इसके दो ही जवाब हो सकते हैं – एकः ये अपनी विचारधारा को सर्वोपरी मानते हैं, खुद को अंतरराष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन का हिस्सा मानते हैं और इनका भारत और उसके इतिहास और संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है, इनका लक्ष्य तो किसी भी तरह सत्ता हासिल करना है और इसके लिए भारत विरोधियों को बढ़ावा देना पड़े तो भी कोई हर्ज नहीं। दोः भारत में रहने वाले कम्युनिस्ट विदेशी ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं जिनका लक्ष्य देश को तोड़ना और देश में गृहयुद्ध और अराजकता भड़काना है। इनका अपना कोई वजूद नहीं है, ये सिर्फ वैचारिक उपनिवेशवाद और अंधे तरीके से अपने आकाओं का हुकुम बजाने में विश्वास करते हैं।

बात चाहे पहली हो या दूसरी, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि विचारधारा के नाम पर देश को तोड़ने के षडयंत्रों को अनुमति नहीं दी जा सकती। किसी को देश की अखंडता और एकता से खिलवाड़ का मौका नहीं दिया जा सकता। कम्युनिस्टों का भारत द्रोह का पुराना और वीभत्स इतिहास है। इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो इन पर प्रतिबंध भी लगाना चाहिए। ऐसा हम क्यों कह रहे हैं इसे समझाने के लिए हम इनके विघटनकारी इतिहास की एक घटना का उल्लेख करते हुए लेख समाप्त करेंगे।

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का झुकाव साम्यवाद की तरफ था जिसकी भारत ने बड़ी कीमत भी चुकाई, लेकिन स्वयं नेहरू ने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) को सबक सिखाया था। हैदराबाद का निजाम और उसके रजाकार (सैनिक) भारत में विलय के खिलाफ थे। इसी प्रकार सीपीआई भी भारत में विलय नहीं चाहती थी। सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीति के बाद निजाम तो भारत में शामिल होने के लिए तैयार हो गया लेकिन सीपाआई के काॅमरेडों ने रजाकारों के साथ मिलकर भारत के खिलाफ जंग छेड़ दी और तेलंगाना के करीब 3,000 गांवों पर कब्जा भी जमा लिया। ये यहां रिपबिल्क आॅफ तेलंगाना स्थापित करना चाहते थे। ये सोचते थे कि जैसे माओ त्से तुंग ने चीन के एक हिस्से येनान पर कब्जे के बाद पूरे देश पर कब्जा कर लिया वैसे ही ये भी तेलंगाना के बाद पूरे भारत को हथिया लेंगे। भारत के खिलाफ इनका गुरिल्ला युद्ध 1951 तक चला। इन्होंने अपनी मुहिम के लिए सोवियत रूस से गुहार लगाई, लेकिन स्टालिन ने इनका साथ नहीं दिया। इसके बाद इनके हौसले पस्त हो गए। ये लोग नेहरू सरकार को ब्रिटिश और अमेरिकी साम्राज्यवादियों का नौकर बताते थे। कहना न होगा नेहरू ने इन्हें अच्छा सबक सिखाया। 1962 में जब कम्युनिस्टों ने बेशर्मी से चीन का साथ दिया तब फिर नेहरू सरकार ने इनके कई नेताओं को सलाखों के पीछे भेजा।

अपनी हरकतों और औंधी सोच की वजह से भारत में कम्युनिस्ट का राजनीतिक प्रभाव धीरे धीरे सीमित हो रहा है लेकिन पत्रकारिता, साहित्य, इतिहास, शिक्षण संस्थानों आदि कई क्षेत्रों में कामरेडों ने कांग्रेस की मदद से गहरी पैठ बना ली है। ये अब भी प्याले में तूफान खड़ा करने और देश की छवि को नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं। अब सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि ये भारत के लोकतंत्र और स्वतंत्र मीडिया का नाजायज फायदा न उठा पाएं। सरकार को इनकी हरकतों पर निगाह रखनी चाहिए और जब ये देशद्रोह के आरोपी पाए जाएं, तो तुरंत इन्हें फांसी पर लटकाया जाना चाहिए।